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कविता

अजूबे की बेचैनी
आलोक पराड़कर


एक अजीब बेचैनी से भरा रहता हूँ इन दिनों
उठता हूँ और खुद को बाजार में पाता हूँ
ढेरों रंगबिरंगे सामान बिखरे हैं चारों ओर
और मैं जानता हूँ कि इनमें से ज्यादातर की मुझे जरूरत नहीं है

मैं कार्ड से पेमेंट करता हूँ और मुस्कुराता हूँ
मैं मल्टीप्लेक्स जाता हूँ
यह जानते हुए कि मैं जो फिल्म देख रहा हूँ
वह कुछ ही हफ्तों बाद टीवी पर आने वाली है
मैं महँगी आइसक्रीम खाता हूँ

मैं महसूस करना चाहता हूँ
कोई है जो मुझे देख रहा है
यह सब कुछ करते हुए
मैं संतोष का अनुभव करना चाहता हूँ
खुद में भरोसा जगाना चाहता हूँ
कि मैं भी अपने आसपास के लोगों की तरह हूँ
उनमें शामिल हूँ
उनकी भीड़ का हिस्सा हूँ
कोई अजूबा नहीं हूँ मैं
और न ही किसी पिछली सदी का प्रतिनिधि हूँ
जैसा कि मेरी पत्नी या बच्चे मुझे मानते हैं

 


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