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नाटक

श्रीरुक्मिणीरमणो विजयते
अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध

अनुक्रम

अनुक्रम अध्याय 1     आगे

प्रार्थना

प्रिय सहृदय पाठकगण!

नाटकरचना विषयक मेरा यह प्रथमोन्माद है। इस नाटक के प्रथम मैंने कोई दूसरा नाटक लिपिबद्ध नहीं किया है। नाटक क्या, वास्तव बात तो यह है कि एक 'श्रीकृष्णशतक' नामक लघु पुस्तिका के अतिरिक्त इस नाटक के प्रथम अपर कथित ग्रन्थ मेरे द्वारा न अनुवादित हुआ है न रचा गया है। नाटक रचकर विद्वज्जनमण्डली में अंकित होना और उसको सांगोपांग सम्पन्न करना, कैसा दुरूह कार्य है, इससे विबुध समाज अनभिज्ञ नहीं है, अतएव इस विषय का उत्थान यहाँ निरर्थक जान पड़ता है। हाँ, यह विषय यहाँ अवश्य वक्तव्य है कि मैं इस दुरूहताबारिधि-सन्तरण में कहाँ तक कृतकार्य हुआ हूँ। प्यारे पाठक! मेरी जिह्ना क्या ऐसी क्षमता रखती है जो नाटक विषय की थोड़ी अवतारणा भी यहाँ कर सके? इतना ही नहीं, इस जटिल प्रश्न की मीमांसा आप लोगों द्वारा ही होनी है! मैं शंकित हूँ कि मुझको आप लोगों द्वारा उपहास का लक्ष्य अवश्य बनना पड़ेगा, क्योंकि यह बहुत सत्य है कि मैंने बामन होकर चाँद को छूने का साहस किया है। किन्तु यदि बाण सावधान करता सनसनाता हुआ समीप से निकल जावेगा, अंग भंग की न ठहरेगी, तो मैं अपने ऊपर आप लोगों का प्रसाद समझूँगा, अन्यथा मुझको वेदना परवश होना पड़ेगा, यह अप्रगट नहीं है।

मुझको इस छोटे नाटक में जितने दोषों के होने की आशंका है उतने सद्गुणों के होने की आशा नहीं है। कारण यह है कि यह एक ऐसी अप्रगल्भा और अर्ध्दशिक्षिता बुध्दि द्वारा प्रणीत हुआ है जो अपने कलेवर को नाटकरचना प्रणाली और काव्य-रीति-परिपक्वता आदि आभूषणों से नितान्त असज्जित रखती है। किन्तु हर्ष का स्थान है कि इसने एक लोकोत्तर व्यक्ति की गाथा गुंफन में अपने समय को व्यय किया है, किसी ऐसे पुरुष का रोमांच कर चरित्र नहीं लिखा है जिसके नाम श्रवण से ही आप कान पर हाथ रखें। अतएव आशा है कि आप लोगों के हृदय में जो बिराग मेरी उच्छृंखल वाक्य रचना और अमनोरंजक नाटक-प्रणयन प्रणाली से उत्पन्न होगा वह उक्त श्रध्दास्पद पूजनीय महानुभाव के हृदयग्राही सच्चरित्रों और अलौकिक स्पृहणीय कार्य-कलापों की समालोचना से विदूरित हो जावेगा। यद्यपि मेरे सौभाग्य के लिए यह पर्याप्त नहीं है, तथापि मैं आपलोगों की इतनी ही उद्भावित प्रसन्नता को अपनी मनस्तुष्टि के लिए विशेष समझता हूँ। और इस युक्तिसंगत सम्भाषण पश्चात् किसी और विषय का उत्थान निरर्थक समझ अपनी लेखनी को अब यहीं विश्राम देता हूँ।

अनुगृहीत

पं. अयोध्या सिंह ( हरिऔध )

नि जा माबाद-आज गढ़

 

 

 

नान्दी पाठ

दोहा

अहि विधु झख केहरि कमल जोहि घन के उपमान।

बरसि बारि मति सो हरित करै अ बुध महि जान।

कुण्डलिया

बानी गननायक सदा रहत जासु बल सौंह।

निसदिन ताकी चहत हौं सू धी कुटिल सुभौंह।

सू धी कुटिल सुभौंह चहत हौं निसदिन ताकी।

रचन चहत हरिऔध ग्रन्थ अनुकम्पा जाकी।

रहित सुवास प्रसून सुग न्धि त करन प्रमानी।

जासु कृपा आधार देहि सो बर बु धि बानी।

 

(इसके अनन्तर सूत्रधार का प्रवेश)

सूत्र- अहा अब बिलम्ब का क्या कारण है ।(इधर उधर और उपर देखकर) रात्रि अपने प्यारे निशाकर के संयोग में दो घडी व्यतीत कर चुकी है,रसिकों के नेत्र रंगशाला की ओर लग रहे हैं हमारे साथियों ने उचित परेचछॆ धारण करने का प्रयत्न कर लिया है,वाद्धोंके स्वर ताल मिल गये हैं,दर्शकों की वाणी कंठ में रुक रही है,कौतुक देखने की कामना से उनका ह्रदय उमग रहा है,जिसका प्रकाश उनकी मन्द मुस्कान और अंगडाइयां लेने से भली-भांति होताहै,रंगभूमि शब्दहीन होकर कालाभिधान भगवान रुद्रकृतप्रलयान्त की भूमि का अनुभव करा रही है, शीतल वायु के मन्द मन्द चलने से चित्त हरा और कौतूहललाक्रान्त हो रहा है,अतएव अब अभिनय होना भी युक्तिसंगत जान पडता है, (थोडा आगे बढकर)  कोई है ?

 

(नट का प्रवेश)

नट- (सूत्रधार की ओर देखकर आप ही आप) मनुष्य के चित्त को भी ईश्वर ने कैसा बनाया है, अभी आज ही इनका मन कुछ सांसारिक झमेलों से कैसा मलीन था, पर अब इस समय कैसा प्रसन्न है, मानो किसी अकाल वृष्टि से आकुल कृषक का मन आकाश को स्वच्छ देखकर आनन्द प्रगट करता है, उत्साह की सीमा नहीं है, उमंग पूर्णिमा के समुद्र समान अनुक्षण बढ़ता जाता है, फिर मैं क्यों न इस आनन्द का भागी बनूँ (प्रगट) महोदय! मैं उपस्थित हूँ, कहिए क्या आज्ञा है?

सूत्र.- (प्रसन्न होकर) मित्र! मेरा मन कुछ काल के लिए समस्त सांसारिक झमेलों से रहित और समग्र उपस्थित असमंजसों से निरस्त होकर इस काल ऐसा प्रसन्न है, जैसा किसी काल महाराज भीष्मक का चित्त भगवान वासुदेव और श्रीरुक्मिणी का संयोग हो जाने पर था, मैं चाहता हूँ कि अपने इस आनन्द का भागी किसी उत्तम अभिनय अभिनीत द्वारा सकल दर्शक महाशयों को बनाऊँ, क्या तुम इस समय कोई उत्तम और नवीन नाटक बतला सकते हो? जिसके अभिनय के लिए मैं बद्धपरिकर हो जाऊँ।

नट- महाशय! कुछ काल हुआ कि मेरे हृदय में यह कामना आज स्वभावत: हुई कि कोई उत्तम नाटक खेला जाय, अतएव प्रिया ने मेरे हृदय का भाव जान कर एक नवीन नाटक खेलने का प्रयत्न इस भाँति कर रखा है जैसे महारानी जानकी ने भगवान रामचन्द्र के हृदयज विचारों को जानकर अग्नि को अपना निवास स्थान बना रखा था, किन्तु मैं उससे पूर्ण अभिज्ञ नहीं हूँ, इस कारण इस विषय का परिज्ञान बिना उसके नहीं हो सकता, आज्ञा हो तो उसको बुलाकर पूछ देखूँ।

सूत्र.- हाँ! हाँ! बुलाओ।

नट- (नेपथ्य की ओर देखकर) प्रिये! क्या अभी पात्रों का यथोचित शृंगार नहीं हुआ?

( नटी का प्रवेश)

नटी- प्राणोपम! हो तो गया, पर इतने विलम्ब होने का कारण केवल आप लोगों का निदेशन देना है, यदि आज्ञा हो तो नाटकपात्रगण को निज कलाकामिनी द्वारा दर्शकजनों के मनहरण करने की आज्ञा दी जावे।

सूत्र. - वरानने! क्या कोई नवीन अभिनय अभिनीत करने की कामना है? और यदि नवीन है तो उसका रचयिता कौन है?

नटी- हाँ! रुक्मिणीपरिणय नामक नवीन नाटक खेलने की इच्छा है, जो थोड़ा दिन हुआ कि मृगराज सहित रघुनाथ राजधनी द्वारा निर्मित हुआ है।

सूत्र.- यह तो कूट सा जान पड़ता है (विचारकर) अहा। समझ गया, पण्डित अयोध्यासिंह निजामाबाद निवासी रचित, जिनका संकेत नाम हरिऔध है। यद्यपि ये नवीन ग्रन्थकार हैं, और प्रशंसित लेख और उत्तम ढंग इनके नाटक में होने की कम आशा है, तथापि चरित्र विलक्षण है, जो आशा है कि सज्जन दर्शकों को अवश्य मोदजनक होगा, क्योंकि स्वरूपानुरागी मनुष्यों को आभूषण की कोई आवश्यकता नहीं होती, उनका सुन्दर स्वरूप ही आनन्दकर होता है।

नट- (हर्ष से) आपके मुख से नवीन ग्रन्थकार प्रभृति शब्द सुनकर मेरा मन इस काल किसी उत्तम नाटक अन्वेषण करने के लिए अति असमंजस में पड़ गया था, पर अब आपके उक्त नाटक को किसी प्रकार पसन्द कर लेने से वह असमंजस दूर हो गया, मानो निविड़ पर्जन्यआच्छादित आकाशमण्डल प्रचण्ड वायु के झोंकों से स्वच्छ और निर्मल बन गया।

नटी- प्रियतम! अब बृथा कथोपकथन करके समय नष्ट करने का अवसर नहीं है, राजा जनक समान महाराज भीष्मक भी इस समय कन्यापाणिपीड़न विषय में अति आकुल हो रहे हैं, अतएव सभ्यजनों को एकत्र करके शीघ्र कोई उचित उपाय करना चाहते हैं, सो अब हम लोग भी चलकर करणीयकर्तव्य में तत्पर हों, और जैसे हो उस चिन्ता के निवारण करने का यत्न करें, जिसके कारण महाराज का मुखमयंक पीतवर्ण और शरीर कृमिखादित काष्ठ की भाँति सारहीन होता जाता है।

सूत्र.- (आप ही आप) सत्य है! चिन्ता ऐसी ही वस्तु है इससे केवल शरीर ही निर्बल नहीं होता, एक ही विषय के बार-बार विचार करने से मन भी दुर्बल हो जाता है, जिससे मनुष्य की बड़ी हानि होती है। यह मनुष्य के आन्तरिक भाग में जीवित जन्तु का गुण रखती है, जो सदैव उसके रुधिर और मांस से अपना पोषण करता और उसे निर्बल बनाता रहता है (सुनना नाटय करके प्रकट) अहा! यह मधुरस्वर मिलित अनुपम गान की ध्वनि कैसी आनन्दजनक है।

नटी- महाशय! ऐसा जान पड़ता है कि कुछ याचकों का समूह गान करता हुआ इसी ओर आ रहा है।

सूत्र. - वरेक्षणे! तो चलो हम लोग भी चलकर आवश्यकीय कार्यसाधन में तत्पर हों।

नटी- जो आज्ञा? (सब जाते हैं)

(जवनिका पतन)


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