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कहानी

हाकिम कथा
अखिलेश


पुनीत ने तलाक़ क्या दिया, गायत्री काफ़ी कुछ बदल गई। जैसे कहाँ वह पौधों से बेहद लगाव रखती थी, पर अब उसके पास फटकती भी नहीं। उसे भ्रम होता पौधों में कोई हरा साँप हिल रहा हैं। साँप का ही भय नहीं, वह अपनी चारपाई दीवारों से एक हाथ दूर रखती, छिपकली न गिर पड़े। कभी-कभी वह सारी सीमाएं तोड़ देती, गर्मी न पड़ने पर भी आँगन में सोती कि कहीं कमरे की छत न गिर न पड़े। दिन में वह अकेली रहती और यही सब सोचती। दिन में भी चैन नहीं था।

पुनीत ने उसके दो चिढ़ाने वाले नाम रखे थे- गेंद और ग्रामोफ़ोन। ये नाम प्यार के दिनों की सर्जना थे। गायत्री उछलती कूदती ख़ूब थी, इसलिए गेंद, और बातूनी भी कम नहीं, इसलिए ग्रामोफ़ोन। लेकिन अब उछलना-कूदना और बातूनीपन, सब ग़ायब हो गए थे। सभी का ख़्याल रखने वाली गायत्री को अब किसी से, यहाँ तक कि अर्पणा और संध्या दोनों बेटियों से भी लगाव नहीं रहा। वह मकान और उसके भीतर के क़ीमती सामानों के लिए ही चिंतित थी।

तलाक़ हो जाने पर पुनीत गायत्री को इन चीज़ों से बेदखल करना चाहते थे लेकिन उस दिन गायत्री को विषाद ने इतना पवित्र, निश्छल और सुंदर बना दिया था कि पुनीत के सामने प्रेम के पुराने दृश्य कौंधने लगे और भावुकता में उन्होंने गायत्री को यह सब उपहार दे दिया। मकान, सामान और दो बेटियाँ सौंपकर वह ज़िम्मेदारी से मुक्त हो गए थे।

बेटियाँ भी बाप पर गई थीं। वैसा दिमाग़ और वैसी ही आत्मा। गायत्री महसूस करती, शुरू से ही दुनिया में अँधेरा रहा है। यह सही नहीं था। दुनिया क्या, खुद उसकी ज़िंदगी में कभी उजाला था। उसने और पुनीत ने प्रेम-विवाह किया था।

पुनीत एक ज़िलाधिकारी की संतान थे। जिसने ग़ुलाम और आज़ाद दोनों ही सूरतों में भारत सरकार की सेवा अच्छे-बुरे सभी तरीकों से निष्ठापूर्वक की थी। गायत्री अपने पिता की इकलौती संतान थी। बाप ने बनियान के कारोबार में अतुल धनराशि अर्जित की थी। पुनीत ने इस धन के कारण गायत्री से प्यार नहीं किया था। धन नहीं होता। तब भी वह गायत्री से प्यार करते। इतना ज़रूर है कि धन ने उनके प्रेम को टिकाऊ बनाया था, उनमें गायत्री से विवाह करने का लालसा पैदा की थी सोलह साल की गायत्री का विवाह धूमधाम से हुआ।

पर समय ने पुनीत के साथ बड़ा मज़ाक़ किया। इधर विवाह किया और उधर गायत्री की माँ ने गर्भधारण किया। समय आने पर गोल-मटोल गोरा-चिट्टा सुपुत्र पति को सौंप दिया, पुनीत के सपनों की इमारत चूर-चूर हो गई, उन्हें लगता गायत्री ने उनके साथ धोखा किया है। उसका दिल गायत्री से उखड़ गया। लेकिन बेटी देकर गायत्री ने पुनीत से क्षमादान पा लिया था। लगभग दो घंटे शब्दकोश देखकर पुनीत ने बेटी का नाम रखा था अपर्णा। दूसरी बेटी हुई संध्या। फिर तलाक़ ही हुआ। जाड़े का मौसम था। गायत्री के आँगन से धूप का आखिरी टुकड़ा भी खिसक गया। वह बुझे मन से भीतर आई और रजाई लपेटकर आराम से लेट गई। एक अजीब-सी गंध से भरने लगी वह। रजाई के भीतर आते ही उसे पास में पुनीत की अनुभूति होने लगती थी। अचानक वह भय से सिहर गई। हमेशा ऐसा ही होता रजाई उसे मादकता की नदी में डुबोकर खौफ़ की झाड़ी में फेंक देती थी। वर्तमान का अहसास ख़ौफ की झाड़ी ही था उसके लिए। वह रजाई से डरती थी, लेकिन उसे छोड़ना भी नहीं चाहती थी। इसी सप्ताह पुनीत का जन्म दिन था। बेटियाँ जाने की ज़िद कर रही थीं, उसका भी मन था, बेटियाँ पिता से मिल आएँ। वैसे उसके न चाहने पर भी कौन रुकनेवाला था। रजाई के भीतर गायत्री का दिल डूबने लगा। बेटियाँ पुनीत की दूसरी बीवी मंदिरा को अपनी माँ बतलातीं। मंदिरा उन्हें लंबे-लंबे भावुक पत्र और क़ीमती सामान भेजकर इस रिश्ते को मजबूत बनाती, क्योंकि वह डरती थी, लड़कियाँ कहीं फिर गायत्री और पुनीत के बीच पुल न बन जाएँ। उसकी रणनीति थी कि बेटियों और गायत्री के बीच दूरी बढ़ती रहे।

गायत्री बेचैन हो गई। उसे गर्मी-सी लगने लगी। वह रज़ाई से बाहर आ गई। लेकिन बेचैनी का क्या करें ? वह आँगन में पहुँचकर चहल-कद़मी करने लगी। कोई फ़ायदा नहीं हुआ। पास के कमरे में आकर सोचने लगी, ''पुनीत को जन्मदिन पर क्या उपहार भेजा जाए?' महँगा सामान भेजकर साबित कर दे कि वह किसी से कम नहीं। या कोई मामूली चीज़ भेजकर वह दिखलाए कि उसे पुनीत में कोई दिलचस्पी नहीं, या कुछ भी न भेजकर उसके गालों पर तमाचा जड़ दे। उसे वे ज़्यादतियाँ याद आने लगीं, जिसके कारण उसे पुनीत से घृणा हुई थी। और जिन्हें अस्वीकार करने पर पुनीत से उसे उसके संबंध बिगड़े थे। पुनीत उसकी शालीनता और भोलेपन पर रीझे थे और उन्हीं की वजह से उन्होंने संबंध तोड़ा। पुनीत को जल्दी-जल्दी प्रमोशन मिले थे। क्लब, पार्टीयाँ वगैरह उनके लिए हवा-पानी की तरह ज़रूरी हो गए। वह दूसरों की बीवियों पर रीझने लगे और चाहते, दूसरा भी उनकी बीवी पर रीझे। किसी सहकर्मी, अफ़सर को गायत्री का सान्निध्य देकर उसकी लिप्सा को जगाते फिर हटा लेते। इस खेल में वे असीम आनंद का अनुभव करते थे। लेकिन बड़े अफ़सरों के लिए वे उदार थे। इतना की गायत्री की अनुदारता उन्हें काट खाती थी।

गायत्री नारीसुलभ गालियाँ देते हुए थककर कुर्सी पर बैठ गई। अहसास हुआ कि अब तक कल्पना की दुनिया में थी। पर अभी उसकी घृणा खत्म नहीं हुई। उसका चेहरा लाल होने लगा और वह फिर कल्पना की दुनिया में खो गई ''मुझे डांस नहीं आता था...चिपटना-सटना नहीं आता था.....''

पोस्टमैन की आवाज़ से उसकी तंद्रा टूटी। बेटियों के आने का वक़्त हो गया था। वह उठ खड़ी हुई। अर्पणा के कमरे का चादर ठीक करने लगी। उसे लगा पायल बज रही है। उसने अपने को पायल की रुनझुन को पकड़ने में व्यस्त कर लिया। इस पायल पर वह विशेष ध्यान देती थी। गोया यह बताना चाहती थी कि पुनीत का स्थान अब उसके पैरों में है। उसका दिल थोड़ी देर पायल की आवाज़ पकड़ने में लगा रहा, फिर वह पानी लाने के लिए बोली। नौकरानी पानी लेकर आई, तो वह अलमारी में लगी किताबें गिन रही थी। घूँट भर पानी मुँह में रखकर चबाने लगी जैसे बच्चे खेल-खेल में करते हैं। इस काम में मन लगाने की कोशिश कर रही थी कि पानी गले के नीचे उतर गया। वह नाखून कुतरने लगी। कुछ देर कुतरा होगा कि बाहर से लेटरबाक्स खुलने की आवाज़ सुनाई पड़ी। अपर्णा थी।

छोटे क़द, अच्छे-नाक-नक्श की अपर्णा गोरी, कुलीन और होशियार थी। वह भाँति-भाँति के कपड़े पहनती थी। डाक टिकटों का संग्रह करना उसकी हॉबी थी। युनिवर्सिटी से आकर घर में घुसने के पहले उसने लेटर बाक्स का ताला खोला। एक साइंस की पत्रिका थी, जिनका चंदा उसके पापा ने जमा किया था और जिसे वह कभी नहीं पढ़ती थी। उसने डाक लेकर ताला लगाया। वह चाहती थी, माँ को उसकी चिट्ठियाँ कभी न मिलें और माँ की हर चिट्ठी की जानकारी उसे हो। इस प्रबंध के लिए वह डाकिया को प्रतिमाह पंद्रह रुपए देती थी। घर में आकर उसने किताबें फेंक दीं और बिस्तर पर गिर पड़ी। उसकी भवें सिकुड़ गईं,'' चादर महक रहा है,'' आवाज़ में व्यंग्य था। उसकी बात को अनसुनी करते हुए गायत्री कमरे के बाहर आ गई। उसके जाते ही संध्या पहुँची। वह युनिवर्सिटी से जल्दी लौटती थी। संध्या की इच्छा हुई कि वह भी बिस्तर पर गिर पड़े लेकिन यह अपर्णा का बिस्तर था। उसे अपनी इच्छा दबानी बड़ी। दोनों बहनों के बीच विशेष यह था कि अपर्णा संध्या को तुच्छ समझती और संध्या अपने को वैसा महसूस भी करती, क्यों क़द में छोटी होने के बावजूद अपर्णा उससे अधिक सुंदर थी।

क़द की कमी से भी कभी-कभी अपर्णा को बहुत दुख होता था। लेकिन अपने को यह दिलासा देकर संतोष कर लेती कि नई फ़िल्मी नायिकाएं भी कुछ ख़ास लंबी नहीं। फिर रामबाण ऊँची हीलवाली चप्पलें तो कहीं गई नहीं थीं। नौकरानी दोनों के लिए काफ़ी रख गई अपर्णा ने संध्या से कहा तू अपनी काफ़ी उठाकर अपने कमरे में जा।''

एकांत पाकर अपर्णा ने अलमारी से परीक्षित की तसवीर निकाली और ग़ौर से देखने लगी। परीक्षित कुछ दिन पहले तक उससे मूक प्रेम करता था और उसे कभी पसंद नहीं आया था। लेकिन समय की ताकत, वह आई.पी.एस. अफ़सर बनने वाली परीक्षा में पास हो गया। इसका परिणाम यह हुआ कि अपर्णा को उसका प्रेम अर्थवान लगने लगा। अपर्णा ने यह भी गणित लगाया कि सुंदरता की दृष्टि से उसकी लंबाई परीक्षित से बहुत ज्यादा है, इसलिए वह दबेगा। आई.पी.एस. पति दबेगा। वह अपने सामने दरोग़ाओं को एड़ियाँ उठाकर जयहिंद बोलते हुए देखने लगी। उसने परीक्षित की तसवीर अलमारी में उछाल दी और खुद मंसूबों के कुलाबे भरने लगी। वह देर तक बेखुदी में रहती लेकिन गायत्री की आवाज़ ने दिक्कत पैदा कर दी। वह नौकरानी से कह रही थी कि अपर्णा के मन की सब्जी पूछ ले, तब बाज़ार जाए। नौकरानी आई, तो अपर्णा झुंझला उठी। मगर वह फ़ैशन को जड़ से जज्ब कर चुकी थी। वह जानती थी कि झुँझलाहट में चेहरा ख़राब हो जाता है इसलिए उसको ज़बान पर रख लेना चाहिए, ''सभी मम्मी लोग अपने बच्चों की पसंद जानती हैं लेकिन मेरी मम्मी- भई वाह! क्या कहने हैं...''

नौकरानी के चेहरे पर खीझ की रेखाएँ उभर आईं। वह झोला झुलाती हुई चली गई। गायत्री अकेली हो गई। अपर्णा के व्यंग्य से पैदा हुई तिलमिलाहट से भरी थी वह। यकायक उसमें प्रश्न कौंधा, वह किसलिए जीवित है? उसे लगा इस संसार में कोई नहीं है। और वह बड़ी गहराई तक डर गई।

अजीब बात थी एक तरफ उसमें अकेलापन का ज्वार-भाटा तेज़ हो रहा था, दूसरी तरफ़ भीतर पुनीत और बेटियों के साथ बीते हुए सुखद दृश्यों की बरसात भी ज़ोरों पर थी। बादलों में बिजली की तरह माँ-बाप की स्मृतियाँ चमकती-बुझती थीं। पुनीत नायक और खलनायक दोनों की तरह याद आ रहे थे, कभी-कभी चेहरे का एक हिस्सा नायक और दूसरा खलनायक की तरह लगता। धीरे-धीरे सब कुछ गड्‍मड हो गया। उसे लगने लगा, पुनीत उसके लिए सिर्फ़ पति हैं। वह गिड़गिड़ा उठी, "पुनीत, मैं आपको तोहफा दूँगी। आपके जन्म-दिन पर मैं आ नहीं सकती लेकिन मेरा तोहफा पहुँचेगा। मेरा प्रेजेंटेशन ज़रुर पहुँचेगा पुनीत।"

पुनीत की कनपटी के बाल पकने शुरु हो गए थे। उन्होंने सुबह के वक़्त घूमना भी शुरु कर दिया था।

वह ग्यारह दिसंबर को पैदा हुए थे। इस बार उन्होंने अपना जन्म-दिन नौ दिसंबर को मनाना तय किया। क्योंकि उनके चीफ़ दस को बाहर जाकर चौदह को लौटने वाले थे।

चीफ़ अपनी पत्नी के साथ आए थे। पार्टी अब ढलान पर थी। लोगों ने दूसरों की बीवियों से बात करने की गति बढ़ा दी थी। दो-चार लोग बाहर लॉन में उल्टियाँ करके ढुनक गए थे। संगीत की हल्की ध्वनि गूँज रही थी लेकिन अब किसी के कान उस तरफ़ नहीं थे...

अर्दली पुनीत के पास आया और का़गज़ का टुकड़ा सामने कर दिया। अपर्णा और संध्या आई थीं। पुनीत के चेहरे पर प्यार और आंनद का गुलाबीपन छा गया। उसने चीफ़ से दो मिनटों की मोहलत माँगी।

बाहर आकर पुनीत ने दोनों बेटियों को गले से लगा लिया। हँसते हुए वह आने लगे। पुनीत दोनों को पीछे के दरवाज़े से भीतर लाए बोले, "देखो बेटा लोगो, तुम अपने सबसे अच्छे कपड़ों में तैयार हो जाओ। और हाँ, मम्मी के टेबल की नीचेवाली ड्रार में परफ्‍यूम्‍स रखे हैं। जल्दी करो। हरिअप्‌।" "पर पापा, पार्टी तो एलैवेंथ को थी?" "अँ हाँ...हम अपने बच्चों को सरप्राइज देना चाहते थे।" "ओ पापा...ऽ..ऽ..." दोनों शेखी बघारने लगीं। "अच्छा तुम लोग जल्दी से तैयार होकर आओ।" कहकर वह चीफ़ के पास चले गए। मौका पाकर मंदिरा पुनीत के एक दोस्त के पास खिसक आई थी। पुनीत को देखते ही चीफ़ के पास चली गई। पुनीत ने फुसफुसाकर बेटियों के आने की ख़बर दी।

वह उल्लास और ममता को उभारने की कोशिश करने लगी। इसके अलावा वह जूड़ा वगै़रह भी ठीक करने लगी। उसकी तैयारी देखकर लोगों को लगा, कोई वी.आई.पी. आनेवाला है। पुरुषों के नशे हिरन होने लगे। महिलाओं को मेकअप ताजा़ करने के लिए बाथरुम जाने की तलब महसूस हुई।

अपर्णा और संध्या ने प्रवेश किया। वी.आई.पी. की आशंका से लोगों में जो बैचनी पैदा हुई थी, उसकी ज़गह उत्‍साह की लहर दौड़ गई। अपर्णा उदास राजकुमारी-सी लग रही थी। अधिकांश महिलाएँ हीनता से ग्रस्‍त होकर कुपित हो गईं। कुछ अपर्णा की तारीफ़ करने लगीं, तो कुछ नुक्‍़ता-चीनी पर गईं। संध्या ने पुरजोर कोशिश की थी लेकिन अपर्णा के साथ होने के कारण मामला जम नहीं रहा था। पुनीत ने दोनों को पास बुलाया। मंदिरा ने दोनों का हाथ लेकर छोड़ दिया और मुस्‍कराने लगी|

"ये मेरी बेटी अपर्णा है।" चीफ़ भी पुनीत के अतीत से परिचित थे, इसलिए चौंके नहीं। "अपर्णा, तुम सर से बातें करो।" पुनीत अपर्णा को चीफ़ के पास छोड़ शेष से संध्या को मिलाने लगे।

यह पार्टी का आखि़री कार्यक्रम साबित हुआ जो बहुत देर तक चला। शाब्बाश...कहकर अपर्णा की पीठ सहलाते-सहलाते चीफ़ के हाथ थक गए थे। देखते-देखते श्रीमती चीफ़ की आँखें दुखने लगी थीं। उन्होंने पति को चलने के लिए कहा।

चीफ़ दंपति क्या गए, सभी को देर होने लगी। सब चले गए। उनके पीछे शराब की गंध बची थी।

पुनीत मंदिरा और बेटियों के साथ दूसरे कमरे में आ गए। शराब ने पुनीत और मंदिरा की नींद उड़ा दी थी। अपर्णा को भी चीफ़ ने चखा दी थी, फिर पार्टी जीतने का नशा- वह काफी़ मूड में थी। थकी हुई संध्या सोने चली गई। कमरे में वह तीनों रह गए थे। "कहो बेटे पार्टी में कैसा रहा?" मंदिरा ने पूछा।

अपर्णा हँस दी। नशे में होने के कारण उसके होंठ कुछ ज़्यादा खिंच गए। कुछ देर बाद ही अपनी जगहों पर वापस आ सके। मंदिरा उसके बालों सहलाने लगी, "मम्मी", कहकर अपर्णा चिपट गई। उसने सूँघा, मम्मी ने कहीं ज़्यादा अच्छा परफ्‍यूम तो यूज़ नहीं किया है? "मेरे लिए क्या लाए हो बेटे?" पुनीत की आवाज़ लरज़ रही थी।

अपर्णा पास के कमरे में जाकर लौटी और एक पैकेट, पुनीत को पकड़ा दिया, उसमें से एक जरकिन निकला, "थैंक यू माय बेबी।" पुनीत की पलकें झुकी जा रही थीं, जबकि वह उन्हें उठाने का भरसक प्रयास कर रहे थे। "पापा, ये अमेरिका का है।" वह मुस्कराई लेकिन नशे के कारण उसका चेहरा वीभत्‍स हो गया, "और ये मेरी ग्रेट मम्मी ने आपके लिए भेजा है।"

वह कैसेट था।

पुनीत भौचक हो गए। मंदिरा चुप। अपर्णा बोलने को तत्‍पर हुई लेकिन दोनों के रुख ने उसे रोका।

पास में टेपरिकार्ड रखा था। पुनीत ने लड़खड़ाते हुए जाकर कैसट लगा दिया और ख़ुद वहीं कालीन पर बैठ गए।

कैसट शुरु हो गया। गायत्री ने पुनीत से आधा घंटा तक कुछ कहा था। भीगी आवाज़ में भेद देनेवाले शब्द थे।

थोड़ी ही देर बाद, पुनीत रोने लगे।

अपर्णा ने चुप कराना चाहा, "पापा..." पुनीत ने हाथ उठाकर रोका। उनकी आँखों से गिरे आँसुओं की कतार टूट नहीं रही थी।

गायत्री बोलती जा रही थी।

कैसेट ख़त्‍म हुआ, तो पुनीत उठकर सोफ़ा पर लेट गए। आँखों पर बाईं बाँह रख ली। मंदिरा और अपर्णा भी जहाँ थीं, वहीं पड़ गईं। कब वे सो गए, पता न चला। कमरे में केवल घड़ी और हीटर जल रहे थे। लग रहा था, अगले दिन से इस घर के लोग बदल जाएँगे, बेहतर हो जाएँगे।

सुबह नाश्‍ते के बाद से ही पुनीत क्रोध में जल रहे थे। उनका मन होता, गायत्री के पास पहुँचकर उसका गला दबा दें। उसकी आँखें निकाल लें। या उसका सिर दीवार से टकरा दें...

अपर्णा ने नाश्‍ते के दौरान बताया था कि एक डॉक्‍टर बरनवाल से मम्मी शादी करनेवाली है। डॉक्‍टर अकसर आते हैं घर पर। तभी से पुनीत उद्विग्‍न थे। हत्या तक के लिए उद्यत। डॉक्‍टर द्वारा गायत्री को स्‍पर्श करने मात्र विचार से उनमें कँपकँपी आ जाती। मांसपेशियाँ तन जातीं। कभी-कभी फड़कने लगतीं।

आफ़िस में भी वह अशांत रहे। घर लौटे, तो सबसे पहले अपर्णा और संध्या को अपने पास बैठाया। आनन-फानन प्यार-स्नेह करने के बाद उन्होंने पूछा, "डॉक्‍टर की उम्र क्या होगी?" संध्या ने उम्र बता दी। पुनीत फ़ौजदारी के वक़ील की तरह डॉक्‍टर बरनवाल के रहन-सहन, मुखाकृति, डील-डौल, धन-प्रतिष्‍ठा आदि के बारे में सवाल करने लगे।

लड़कियों से जो जानकारी मिली, उससे उनके अंदर की आग और भड़क उठी। लड़कियों के अनुसार डॉक्‍टर बरनवाल आकर्षक व्यक्‍तित्‍व वाले शहर के प्रतिष्‍ठित व्यक्‍ति थे। वह बैडमिंटन के शौक़ीन थे और राजनीति में उनकी अच्छी घुसपैठ थी।

पुनीत को डॉक्‍टर पर गुस्सा नहीं आ रहा था। वह गायत्री को ही सबक सिखाना चाहते थे। उनका मन हो रहा था कि गायत्री को जलती सिगरेट से जलाएं।

उनकी दशा देखकर मंदिरा घबड़ा गई। उसने अपर्णा से विनती की कि पापा को ख़ुश करो।

मंदिरा की चापलूसी में संध्या पहले बोल पड़ी, "बस भी करो पाप्पा। अब हम लोगों को घुमाओ-उमाओ नाँ।"

क्षण-भर इधर-उधर देखने के बाद पुनीत ने मंदिरा से कहा, "ड्राइवर से बोल दो, गाड़ी निकाले, तब तक तुम लोग तैयार हो लो।"

मंदिरा राहत की साँस लेती हुई बोलने चली गई। पुनीत ने सिगरेट सुलगा ली।

बेटियों के जाने बाद गायत्री ख़ुशी में डूबने-उतरने लगी थी। उसे ऐसे कामों को निपटा लेने का मौका मिला था, जिन्हें करने में बेटियों की ख़ुफ़िया निगाहें बाधक थीं। उसने डॉक्‍टर बरनवाल से प्रेम करने से लेकर शापिंग तक की। जिस दिन उसे मालूम हुआ, डॉक्‍टर विधुर है, वह उनसे प्रेम करने लगी थी।

उसने पड़ोस और दो-तीन बाहर के लोगों को बुलाया। खाना खिलाया और बेटियों की तारीफ़ की। कहा की बेटियाँ उस पर जान देती हैं और वह बेटियों पर जान देती है। कुल मिलाकर वह ख़ुश और उत्‍साहित थी।

लेकिन कई लोगों के पास पहुँचे पत्र ने सबकुछ बदल दिया। वह स्‍तब्ध और बदहवास हो गई। डॉक्टर बरनवाल, पड़ोसियों, रिश्‍तेदारों और ख़ुद उसके पास वह पत्र पहुँचा था। उसमें डॉक्टर और उसको नाजायज संबंधों में लिप्‍त बताया गया था। उसे वेश्‍या कहा गया था।

शाम को वह डॉक्‍टर के पास पहुँची। डॉक्‍टर उसका इंतजार कर रहा था। उसे कंधे उचकाने की आदत थी। उसने आत्‍मीय लहजे में गायत्री से कहा, "देखो, चूँकि मेरे किसी रिलेटिव के घर लेटर नहीं आया है, इसलिए यह तुम्हारे ही किसी परिचित की शरारत है।" उसने कंधे उचकाए। "मुझे मालूम है। मैं लैंग्‍वेज से ही जान गई। यह पुनीत की बदमाशी है।" "पर यह हुआ कैसे?" डॉक्‍टर डर गया था। "बेटियों ने जाकर बताया होगा।" "ओ गॉड !" उसने फिर कंधे उचका दिए। "लेकिन अब प्राब्लम ये है कि आगे क्या हो?" गायत्री चाहती थी कि शादी हो और उसकी इच्छा थी कि प्रस्ताव डॉक्‍टर ही करे। पर डॉक्‍टर ने घाघपन से कहा- "जो होना है, हो" वैसे वह गायत्री का आशय समझ रहा था। "मेरा मतलब यह नहीं। मैं चाहती हूँ..." "देखो गायत्री, लेटर्स इतनी जगह पहुँच गए हैं कि हमारे चाहने-वाहने से कुछ होनेवाला नहीं।" भीतर ही भीतर वह अपनी चालाकी पर पुलका।

गायत्री ने सोचा, डॉक्‍टर परेशान होने के कारण इशारा समझ नहीं पा रहा है। उसने दूसरे दिन बात करना उचित समझा।

रास्ते में उसे आशंका हुई कि कहीं डॉक्‍टर उससे शादी न करे। सड़क पर चहल-पहल थी। नियान लाइट के उजाले में सब कुछ बड़ा अलौकिक-सा लग रहा था। लेकिन गायत्री डर से सिहर गई। वह रिक्शे पर सिकुड़ चली। उसका डर बढ़ने लगा। उसे चिंता हुई कि रिक्शा कहीं उलट न जाए। सामने आतीं कारों, बसों, ट्रकों आदि को देखकर उसे भयानक घबराहट हो रही थी। उसे महसूस होता, रिक्शा-वाला भाग जाएगा और गाड़ियाँ रिक्शा को कुचलती हुई उस पर चढ़ जाएँगी। उसका दिल तेज़ी से धड़क रहा था। साँस की गति बढ़ गई थी। एक नौजवान साइकिल चलाता हुआ आ रहा था। वह डरी कि कहीं वह उसे 'रंडी' न कह दे।

किसी तरह वह घर पहुँची। रिक्‍शावान को किराया पकड़ाकर तेज़-तेज़ चलने लगी। उसे रिक्‍शावान शातिर बदमाश लग रहा था।

ताला खोलकर वह घुसी और सोफ़ा पर बैठकर हाँफने लगी। उसके सिर के कई बाल पसीने से गीले हो गए थे।

थोड़ी राहत मिलने पर वह संदूक खोलने लगी। संदूक से एक बॉक्‍स निकाला। बॉक्‍स भी खोल दिया। सोने के गहने भरे थे। गहनों को वह दीवानी-सी देखने लगी। उसे राहत और ताकत मिल रही थी।

जब भी बुढ़ापा, विपत्ति आदि सवाल उससे टकराते, ये गहने उसके लिए आरामदेह जवाब होते थे।

उसने बॉक्‍स बंद कर दिया। खोला। बंद किया। खोल दिया। वह यह खेल कर रही थी कि कालबेल घनघनाने लगी। रास्‍ते की घबड़ाहट फिर सिर उठाने लगी। उसे संदेह हुआ, कोई उसका गहना लूटने आया है। रिवाल्‍वर लेकर खड़ा होगा। जल्‍दी-जल्दी उसने सब कुछ ठीक किया। संदूक में ताला लगाने के बाद वह उठी, तो कालबेल की चीख़ बढ़ गई थी।

बेटियाँ थीं। दोनों बढ़कर माँ से लिपट गईं। गायत्री की तरफ़ से ठंडापन था।

वे भीतर आईं। अपर्णा ने अटैची खोली और सामान निकालने लगी। वह गायत्री को बताती जा रही थी, "ये पापा ने दिया है। ये मम्मी ने दिया है। ये संध्या के लिए हैं। ये मेरे लिए हैं।" "अपर्णा वो वाली बात बतलाओ ना", संध्या ने इठलाते हुए कहा। "कौन-सी?" अपर्णा के चहरे पर दबी हुई मुस्कराहट और नक़ली जिज्ञासा थी। "अरे बनो मत।" "सच्ची में नईं मालूम। बता दे न।" वह मुस्‍कराहट रोक न सकी। "मम्मी, अपर्णा की च्वाइस पापा ने इक्‍सेप्‍ट कर ली।" "कैसी च्वाइस?" गायत्री न चाहते हुए भी बोली। "परीक्षित आई.पी.एस. में आ गया था। मेरा दोस्‍त है। पापा बीच में यहाँ आए थे। बात पक्की कर गए। अगले महीने उन्नीस तारीख़ को डेट पड़ी है।" अपर्णा उत्‍साह और संयम दोनों भावों का इस्‍तेमाल कर रही थी। "लेकिन इतनी जल्दी तैयार कैसे होगी?" गायत्री की उदासीनता बरकरार थी। "मैरिज वहीं लखनऊ से होगी। पापा सब अरेंजमेंट कर लेगें।"

गायत्री को धक्का लगा। उसे तकलीफ़ हुई कि इतना कुछ हो गया और उसे ज़रा भी भागीदार नहीं बनाया गया। लेकिन उसने कोई प्रतिक्रिया व्‍यक्‍त नहीं की। नौकरानी को बुलाकर कहा, "बेटी लोगों को कुछ खिलाओ-पिलाओ।"

कुछ ही देर में नाश्‍ता और खाना दोनों हो गया। सब लोग सोने की तैयारी करने लगे। रात-भर गायत्री बुरे सपने देखती रही। सुबह कोहरे से ढकी थी। नौकरानी बड़ी देर से खटर-पटर कर रही थी। उन तीनों की नींद ग़ायब हो चुकी थी लेकिन वे रज़ाई में पड़ी पैर हिला रही थीं। आख़िर गायत्री उठी। नाश्‍ता किया और डॉक्‍टर बरनवाल के पास चल दी। वह बाँटे गए पत्रों से भयभीत हो गई थी। और जितनी जल्दी हो सके, डॉक्‍टर से शादी कर लेना चाहती थी। आज उसने तय किया था कि वह ख़ुद ही शादी का प्रस्‍ताव करेगी।

बहुत दिनों बाद दोनों बहनों ने नाश्‍ता बिस्‍तर पर किया। अपर्णा ने संध्या को भी अपने बिस्‍तर पर बुला लिया था।

आफ़िस खुलने तक दोनों तैयार हो गईं। बैंक जाकर उन्हें पापा का दिया ड्राफ्‍ट भुनाना था। फिर शापिंग करनी थी। "शापिंग का यह सिलसिला कब तक चलेगा, अपर्णा?" "जब तक तू मुझे यहाँ से भगा नहीं देगी। अच्छा यार, आओ, अब चलते हैं।" "जीजाजी को ले लें रास्‍ते में।" "कौन? अरे वो तुम्हारे एस.पी. साहब? वह तो बनारस ड्‌यूटी पर होंगे।" दोनों के जाने-के थोड़ी देर बाद गायत्री वापस आ गई। वह फिर डरी थी। दिनोंदिन उसका डर बढ़ता जा रहा था। डॉक्‍टर ने उसके प्रस्‍ताव को टाल दिया था लेकिन अब वह डॉक्‍टर की मंशा भाँप गई थी।

वह पैरों को पेट से चिपकाकर बैठी थी। इस वक़्त उसकी आत्‍मा बूढ़ी हो गई थी जिसकी हल्की छाप उसके चहरे पर भी दिखाई दे रही थी।

वह सोचने लगी। 'कुछ दिनों बाद यह घर पूरी तरह ख़ाली हो जाएगा, तब? एक दिन वह बुढ़िया हो जाएगी।' वह काँप उठी। 'या पुनीत कोई बदमाश भेजे। वह रात में आकर उसे चाकुओं से गोद डाले। या मकान पर पेट्रोल छिड़ककर आग लगा दे तब? या वह रास्‍ते में जाती रहे, कोई बम फेंककर उसके परखचे उड़ा दे, तब...'

उसने नौकरानी को बाहर भेज दिया और संदूक खोलकर बॉक्‍स निकाला। चमकते हुए गहनों को देखने लगी। उसका वश चलता तो वह अपनी आँखें बॉक्‍स में टाँग देती।

कुछ लोगों से संबंध बिगड़ने के बाद से सोना ही उसका दोस्‍त था।

शादी सलीके से हो रही थी। महँगे होटल में सारा प्रबंध था। होटल का खर्च एक व्‍यापारी उठा रहा था। पुनीत ने दंद-फंद करके दो मंत्रियों का भी आगमन करा लिया था। उसके आस-पास अनेक लोग मँडरा रहे थे। बहुत सारे लोग इस बात के लिए लालायित थे कि किसी तरह उनकी तसवीर मंत्रियों के साथ खिंच जाए। वर पक्ष वाले भी स्‍तरीय लोगों को लाए थे, लेकिन टक्कर में पुनीत भारी पड़ रहे थे।

पुनीत ने इसी अफरा-तफरी में अपने ट्रांसफर की भी बात पक्की कर ली थी। इस जगह के लिए लोग पचास हज़ार तक देने के लिए तैयार रहते, पर काम नहीं होता। और उसने तीस हज़ार पर बात बना ली थी। वह दृढ़ता से बुदबुदाया, "मैं दो सालों में ही फैक्‍ट्री लगवा दूँगा। अपर्णा के नाम।"

नशे का असर उस पर अच्छी तरह हो चुका था। उसकी इच्छा हुई कि वह जाकर दलाल के पैरों पर गिर पड़े जो मंत्रियों को यहाँ तक ले आया था। लेकिन उसने घुटनों के बल गिरकर मंदिरा के पाँव पकड़ लिए, "मंदिरा, तुम मेरी बीवी नहीं, मेरी देवी हो। तुम्हीं ने मुझे इतने प्रमोशन दिलवाए। तुम्हीं ने मेरे ट्रांसफर करवाए। तुम्हीं ने मुझे हर बार चीफ़ के करीब पहुँचाया। तुम औरत नहीं, देवी हो, जल्दी ही तुम्हारा यह भक्‍त तुम्हारे चरणों में एक फैक्‍ट्री अर्पित करेगा। तुम बहुत बड़ी उद्योगपति बनो मंदिरा। तेरे भक्‍त का यह आशीर्वाद है..."

मंदिरा ने उसे असीम प्‍यार-दुलार से देखा और मत्‍थे पर झुक आए बालों को सहलाकर ठीक कर दिया। उसने पुनीत का गाल भी थपथपा दिया। फिर बोली, "यह इमोशनल होने का टाइम नहीं है डार्लिंग! इतना अच्छा चान्स है। इसे एक्‍सप्‍लायेट करो।"

वैसे वक़्त का सही इस्‍तेमाल अपर्णा कर रही थी। उसने सोचा, बाद में नामालूम इन लोगों से मुलाकत हो या न हो। ख़ास-ख़ास लोगों से घनिष्‍ठता स्‍थापित करने का अभियान चला रखा था उसने। हालाँकि वह सफल नहीं हो पा रही थी। क्योंकि हर कोई संपर्क बढ़ाओ अभियान में व्‍यस्‍त था। इधर बहुत देर से वह फकीर को प्रभावित करने की कोशिश कर रही थी। क्योंकि उसने साफ़-साफ़ देखा था कि बड़े-बड़े अधिकारी-उनकी बीवियाँ-यहाँ तक कि दोनों मंत्री फकीर से मुताअसर दिखलाई पड़ रहे थे। फकीर ने दोनों मंत्रियों को तीन-तीन अँगूठियाँ दी थीं। उसकी हसरत थी कि एक ही सही, अँगूठी उसे भी मिल जाए।

अँगूठी तो नहीं मिली लेकिन उसका साहस और कौशल अंत तक अटूट रहा। यहाँ तक कि विदाई के समय सारे सामान उसने खुद ही रखवाए। बातें करती और मशविरे लेती-देती वह विदा हो गई। जाते-जाते उसने पुनीत, मंदिरा और गायत्री के सीने पर कीलें ठोंक दीं...

पुनीत ने सोचा था, जाते समय अपर्णा उनके प्रति भावुक होकर रोएगी। लेकिन अपर्णा ने उनकी आकांक्षा पूरी नहीं की। वे दुखी थे। मंदिरा अपमानित महसूस कर रही थी। उसे दुख था, विदा होते समय भी अपर्णा ने उसे किसी प्रकार का विशेष सम्मान नहीं दिया, "डायन कितना तो चूना लगा गई।"

गायत्री शादी की रात ही वापस लौट आई थी। उसने अपर्णा की एक उँगली में अँगूठी देखी थी। उसके नग ने उसे परेशान कर रखा था। उसे यह अँगूठी अपने संदूक के भीतर रखे हए बॉक्‍स की निधि लगी थी। कुछ देर वह टालती रही लेकिन मन माना नहीं, वह वहाँ से चल दी।

उधर अपर्णा विदा हो रही थी और इधर गायत्री ने संदूक खोला। बॉक्‍स नदारद। वह भागती हुई एक पड़ोसी के घर पहुँची और लखनऊ के लिए कॉल बुक कराया।

जब फ़ोन पर बातें हुईं, तो अपर्णा को गए डेढ़ घंटे बीत चुके थे।

उसके हाथ से फ़ोन छूट गया। पड़ोसी मिस्‍टर नारायन घबड़ा गए, "क्या हुआ? बेटी तो ठीकठाक है न?" "हाँ।" वह घुटनों पर हाथ रखकर किसी तरह खड़ी हुई। चलते समय उसकी चप्पलें घिसट रही थीं।

घर आई, तो सिर में दर्द होने लगा था। हलक सूख गया था। उसमें कुछ नुकीला-सा धँस रहा था। लग रहा था, जैसे चेहरा चिचुककर लंबा हो गया है।

उसने नींद की गोलियाँ मँगाईं। एक गोली गटककर लेट गई। नौकरानी को उसने डपट दिया कि वह जगाए नहीं। लेकिन कुछ देर बाद संध्या ने उसे 'मम्मी-मम्मी' कहकर जगा दिया। वह लखनऊ से आ गई थी। क्योंकि पढ़ाई में पिछड़ जाने का डर था।

गायत्री का फूला किंतु बुझा हुआ चेहरा देखकर संध्या को जिज्ञासा हुई। उसने पलकें उठा-गिरा नौकरानी से पूछा।

नौकरानी ने संध्या को दूसरे कमरे में ले जाकर सबकुछ बता दिया। गहने वाली बात से संध्या स्‍तब्‍ध हो गई। उसे यक़ीन नहीं आ रहा था कि अपर्णा ने उसके साथ इतना बड़ा धोखा किया है। माँ के गहनों पर आख़िर उसका भी अधिकार बनता था। वह अपर्णा के खिलाफ़ अपने को गायत्री के पक्ष में पाने लगी। वैसे भी उसे गायत्री का नींद की गोलियाँ खाना बड़ा प्‍यार लग रहा था। अपर्णा को लेकर वह बार-बार कड़वाहट से भर जाती थी। तभी उसके दिमाग़ में मकान का विचार कौंधा। अपर्णा गहने ले गई, तो मकान उसे मिल सकता है।

वह गायत्री के पास जाकर लाड़ जताने लगी। लेकिन गायत्री पर ख़ास असर नहीं हो रहा था। उसे झपकी आ रही थी। वह आँखें बंद कर लेती, फिर झटके से खोलकर आस-पास देखने लगती। संध्या ने उस पर लिहाफ डाल दिया। इस काम से फ़ुरसत पाकर कर वह अपर्णा के कमरे में आई। उसके होंठों पर कुटिल मुस्‍कराहट और आँखों में भयानक चमक थी।

उसने अपर्णा की अलमारी, मेज़ का ड्रार वग़ैरह सब कुछ तलाश डाला, अपर्णा के विभिन्न प्रेमियों द्वारा लिखे गए प्रेम पत्र नहीं मिले। बिखरी हुई किताबें चिढ़ा रही थीं। उसके दाँत भिंच गए, "कुतिया ने एक भी लेटर नहीं छोड़ा। नहीं चखाती मज़ा।" वह कसमसा रही थी, "साली ने गहने ग़ायब किये, लेटर्स भी ग़ायब कर दिए। ओ गॉड एक ही लेटर दिला दो।"

वह थक गई। हताश-सी आई और लेट गई। लेटे हुए ही उसने नौकरानी से कहा, "ज़रा दूध में ग्‍लूकान-डी मिलाकर देना।"

नौकरानी खाना पका रही थी। कूकर उतार दूध चढ़ा दिया।

संध्या धीरे-धीरे शांत होने लगी। रात हो गई थी। घर उसे अजीब-सा लगने लगा। पहली बार उसे अपर्णा के न होने का अहसास हुआ। वह ख़ालीपन महसूस करने लगी। लेकिन बुरा नहीं लग रहा था, क्योंकि उसे सब कुछ खुला-खुला-सा एकदम उन्मुक्‍त महसूस हो रहा था। आज उसने पहली बार अनुभव किया कि उसका भी व्‍यक्‍तित्‍व है। इन अहसासों के बीच अपर्णा के प्रति उसका क्रोध भी कम हो गया।

ग्‍लूकान-डी लेने के बाद उसने मुँह पोंछा। वह सोचने लगी कि उसमें स्‍फूर्ति आ गई है। माँ को देखा, सो रही थी। नौकरानी किचन में थी। फिर उसका क्या!

वह दबे पाँव दूसरे कमरे में रखे आदमक़द आईने के सामने आ खड़ी हुई। अपने को निहारा और कलात्‍मक अँगड़ाई ली, "मुझमें अपर्णा से ज्‍़यादा सेक्‍स अपील है।" शरीर के विभिन्न हिस्सों को ऐंठा-घुमाकर अपना जायजा लेने लगी, "मूझे फ़िल्मों में काम मिल जाता, तो कितना फंटास्‍टिक होता। हंड्रेड परसेंट फंटास्‍टिक।"

उसमें धीमे से उत्‍तेजक धुनों वाला रिकार्ड चला दिया। कमरा बंद करके वह धुन पर थिरकने लगी। वह कल्‍पना करने लगी, सिनेमा हाल के पर्दे पर उसकी फ़िल्म चल रही हैं। उसने थिरकने को नाचने में बदल दिया।

वह कब तक फ़िल्मलोक में भ्रमण करती रही और कब सो गई, उसे पता न चला। सुबह देर से उठी। देखा, गायत्री नाश्‍ता कर रही है। वह बेड-टी से फ़ुर्सत पाई, तो गायत्री नींद की गोली गटक रही थी।

गेट के एक तरफ़ 'पुलिस अधीक्षक(नगर)' का बोर्ड टँगा था। दूसरी तरफ़ छोलदारी थी। छोलदारी में दो बक्‍सों के ऊपर हनुमानजी की तस्‍वीर रखी थी। ऊपर टँगी रस्‍सी पर दो लँगोट लटक रहे थे। तख़्‍त पर कुछ सिपाही बैठकर भुट्‌टा खा रहे थे जिसे उन्होंने राह चलते एक ठेलेवाले से घुड़कर लिया था।

गाड़ी की आवाज़ आई तो सभी ने भुट्‌टा रखकर सैल्‍यूट मारा। एक सिपाही आगे बढ़कर गेट खोलने लगा।

पेक्षा और उत्‍तर के रुप में अपर्णा की ठोढ़ी हल्‍की-सी काँप गई। कार भीतर आई। सामने के सीट पर बैठे सिपाही ने कार का दरवाज़ा खोला। वह साड़ी को चुटकी से हल्‍का उठाकर उतरी और आगे बढ़ गई। ड्राइवर और सिपाही बाज़ार में ख़रीदे गए सामान उतारने लगे। वे इतनी तत्‍परता से सामान उतार रहे थे कि जैसे अभी कार भाग जाएगी।

अपर्णा बदामदे में आई, तो देर से बैठे दरोगा हरमान सिंह ने तगड़ा सैल्‍यूट ठोंका। उसने प्रत्‍युत्तर में सिर हिला दिया। थोड़ी देर बाद अपर्णा का बुलावा आया। दरोग़ा ने अपने बग़ल बैठे समाजसेवी दिवाकर चौबे को अपना ब्रीफकेस थमा दिया। चौबे के जाते ही वह जाँघों के बीच हाथ डालकार चिंतित हो गया। दिवाकर ने लौटकर ब्रीफकेस दरोग़ा को पकड़ाया। उसे हल्का पाकर उसका चेहरा खिल गया।

गेट के बाहर आकर वह मूँछ उमेठने लगा। खँकारकर थूक दिया, "इंचार्जी मिल गई। अब सालों की डंडा कर दूँगा। हरामज़ादो..." उसने समूची सृष्‍टि को माँ-बहिन की गालियाँ देते हुए मोटर साइकिल स्टार्ट की।

समाजसेवी दलाल के ज़रिए रुपया अपर्णा को मिलता था। इसे अपनी महत्ता में वृद्धि मानती थी वह। लेकिन ऐसा अनायास नहीं होता था, बल्कि इसके पीछे परीक्षित का दिमाग़ था। रुपए भी आ जाते थे और उसका स्वाभिमान भी बरकरार रहता था।

रुपए रखकर अपर्णा ने खानसामा को आवाज़ दी और सोफा पर बैठ गई।

खानसामा कान में बीड़ी खोंसता हुआ नमूदार हुआ। "शरबत बिस्‍किट्‌स ले आओ। हाँ सुनो, अर्दली से बोलो कि मेमसाहब ने बुलाया है।"

वह बढ़े हुए नाख़ूनों के सौष्‍ठव को निहारने लगी। उसके चहरे पर आत्‍ममुग्‍धता का भाव खेल रहा था। "मेमसाहब, आपने बुलाया मेमसाहब।" अर्दली था। "साब कब गए?" "थोड़ी देर हुआ मेमसाहब। देर से आने को बोले हैं मेमसाहब। खाना नहीं खाएँगे मेमसाहब।"

उसे बहुत तेज़ धक्का लगा। हूक-सी उठी। तिलमिलाहट से चेहरा लाल हो गया। उसने अर्दली को देखा, कहीं उस पर हँस तो नहीं रहा है। पर ऐसा कुछ नहीं था।

उसने ज़ोर से निचला होंठ काटा। उसके नथुने फड़फड़ा रहे थे। वह फ़ोन की तरफ़ झपटी और डायल करने लगी। हास्पिटल के डॉक्टर गंगाबख्‍श सिंह का नंबर था। वह मुख्य चिकित्‍साधिकारी थे।

डॉक्‍टर गंगाबख्‍श ने अपर्णा ही नहीं, शहर के कई अफसरों, नेताओं और धनवालों की बीवियों की नींद हराम कर दी थी। पत्रकारों के मध्य वह नर्सों के सप्‍लायर के रुप में चर्चित थे।

अपर्णा ने फ़ोन पकड़ रखा था। उत्तेजना में उसके हाथ काँप रहे थे। लगता था, फ़ोन पर ही वह क्रुद्ध शेरनी की तरह डॉक्‍टर गंगाबख्‍श पर झपट पड़ेगी।

लेकिन उधर से आवाज़ आई, तो हाथ की थरथराहट बढ़ गई। चेहरे पर खिसियाहट उभर आई। उसने फ़ोन रख दिया था। उसने सोचा था, इस हरकत से प्रेस्‍टिज बिगड़ेगी। इस तरह तो छोटे घर की औरतें लड़ती हैं।

हालाँकि वह डॉक्‍टर गंगाबख्‍श को कड़ा से कड़ा दंड देना चाहती थी लेकिन फ़ोन रख दिया और छत निहारने लगी।

उसकी आँखों में अथाह दुख की लहरें हिलने लगीं। उसके सामने परीक्षित और किसी नर्स के अश्‍लील दृश्‍य घूमने लगे। वह साँस रोककर उन्हें विभिन्न मुद्राओं में देख रही थी।

उसे सबकुछ घिनौना लगने लगा। वह अपने को एक बेबसी से जकड़ी हुई महसूस करने लगी। साँस फूल आई। वह पस्‍त हो गई थी। उसे अपने उपर गुस्सा आने लगा, क्यों अपने को सोशल बनाया। जब तक घर में थी, ठीक था। पता तो नहीं चलता था परीक्षित क्या गुल खिला रहा है। लेकिन संयोग ही था कि उसे एक दिन लगा, इस तरह की जीवन-शैली की मियाद ख़त्‍म हो गई और अब कुछ समाज-सेवा होनी चाहिए। उसी सप्‍ताह समाज-सेवा शुरु कर दी। पुरस्‍कार वगै़रह बाँटने लगी। वाद-विवाद प्रतियोगिताओं आदि में जज बनने लगी। इसी सामाजिकता में परीक्षित की पोल खुल गई थी। सबसे पहले उसे मालूम हुआ, परीक्षित बड़ा क्रूर आदमी है। रुपए लेकर तीन फ़्रर्जी एनकाउंटर कर चुका है। बड़े आदमियों और नेताओं से उसके ताल्लुकात प्रसिद्ध थे। उन्हें लाभ पहुँचाने में वह पटु था। उन सबसे अपर्णा को कोई तकलीफ़ नहीं हुई थी।

लेकिन एक पार्टी में मिसेज बतरा ने जो थुल-थुल, अधेड़ और मूर्ख महिला थीं, सारा दारोमदार मिसेज तिवारी पर थोपते हुए कहा, "मिसेज तिवारी कह रही थीं।" वह इस बात के लिए पूरी तरह सतर्क थीं कि एस.पी.साहब कुतिया के पिल्ले बाँटते हैं। खरगोश भी बाँटते हैं। वो मिसेज तिवारी ही कह रही थीं।" असली अर्थ अभी उनकी खामोशी में छिपा हुआ था। "क्या मतलब?" "मैं नहीं कह रही। वो मिसेज तिवारी ही कह रही थीं।" "क्या कह रही थीं?" अपर्णा ने झुँझलाकर पूछा। "मिसेज तिवारी कह रही थीं कि इससे उनकी इमेज बड़ी ख़राब बन रही है। मिसेज तिवारी कह रही थीं कि वह उन्हीं घरों में पिल्ले और खरगोश देते हैं, जहाँ ब्‍यूटीफुल जवान गर्ल्स रहती हैं।"

इस तरह की बातों से उसे बहुत बार गुज़रना पड़ा। धीरे-धीरे सब कुछ साफ़ होने लगा। परीक्षित ऐसे अवसर पर गाड़ी नहीं ले जाता था और देर से आता था। आज फिर देर से आने के लिए कहकर जाना और गाड़ी यहीं पर।

वह उखड़ने लगी। उसे लग रहा था, चीज़ें उसके हाथ से निकलती जा रही हैं। कहाँ उसने गणित लगाया था कि सुंदर न होने के कारण परीक्षित दबेगा और कहाँ से यह परवर्टेड एप्रोच? उसे ताज्जुब होता था कि कभी मूक प्रेम करनेवाला निष्‍ठावान प्रेमी इस तरह कैसे बन गया?

वह पुराने दिनों में खो गई। आँखें अधमुँदी हो गईं। वह सारे अच्छे-अच्छे क्षणों का स्मरण कर लेना चाहती थी। वह खोज-खोजकर दृश्‍यों को सामने लाने लगी। इन सबमें ऐसा कुछ था कि उसमें आत्‍मविश्‍वास, शक्‍ति और स्फूर्ति पनपने लगी। खाई हुई दृढ़ता वापस लौट रही थी...

उसका पुराना ख़ूँखार जागने लगा, जो शादी के बाद खो गया था। वह परीक्षित के क्रियाकलापों को धराशायी करने की योजना बनाने लगी। उसकी आत्‍मा में कुटिलता लबालब भर उठी। उसने परेक्षित को करारी शिकस्त देने के लिए ताना-बाना बुनना शुरु कर दिया। उसके दिमाग़ में लगी ज़ंग अब साफ़ हो गई थी। उसका दिमाग़ अब सान चढ़े चाकू की तरह चमक गया था।

वह सोचने में इतना मशगूल हो गई कि उसकी साड़ी की क्रीज ख़राब हो चली। होंठों की लिपस्टिक बेतरतीब हो गई। नाक के नीचे पसीने की क़तार खिंच आई थी।

लेकिन उसे कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था...हिम्मत हारने लगी। वह अपने ही रचे व्‍यूह में गिरफ़्‍तार हो गई थी। वह हाँफ़ने लगी। किसी तरह उठकर लाइट बुझाई। वह सोने की कोशिश करने लगी।

रात थोड़ी ही देर में खत्‍म होनेवाली थी। बुरे सपनों ने अपर्णा को नींद में भी त्रस्त कर रखा था। बार-बार वह क्रोध और नक़ली मुस्कराहट के बीच जूझती हुई दिख रही थी।

डरकर वह जाग गई। कमरे में उजाला फैला हुआ था। परीक्षित जूता का फ़ीता खोल रहा था। वह अनमनी बनी रही। साँस रोककर परीक्षित की पदचापों का इंतज़ार करने लगी। थोड़ी देर बाद वह आया और उसकी बगल में लेट गया। जल्द ही नींद में डूब चला वह।

अपर्णा को लगा, परीक्षित नहीं उसकी बगल में कोई कुत्ता लेटा हुआ है। सड़ा हुआ जानवर। वह उठकर खड़ी हो गई और दाँत पीस डाली।

कमरे में चहलक़दमी करने लगी वह। सोचना शुरु किया। बहुत कोशिश की लेकिन कोई रास्ता न दिखा। वह हार गई। 'पापा तुम्हीं कुछ करोगे' उसने तय किया, थोड़े दिनों के लिए पापा के पास चली जाएगी। उनसे कहेगी, कोई रास्ता निकालें। सब कुछ फिटफाट हो जाए।

पुनीत को पता चला की अपर्णा आ रही है, तो उसने संध्या को भी अपने पास बुला लिया। सोचा, दोनों बहनें मिल लेंगी। संध्या के पास तो अपर्णा जाएगी नहीं। माँ के गहने जो गायब हुए थे।

जैसे भूखे को निमंत्रण मिल गया हो, संध्या के प्रतिहिंसा की आँच से उबलने लगी। दो दिन पहले ही पापा के पास पहुँच गई, जिससे अपर्णा के पहले वह पापा को पटा ले।

एक मंत्री जी का आकस्मिक कार्यक्रम बन जाने के कारण परीक्षित नहीं आ सका। अपर्णा एक कपड़ा मिल के डायरेक्‍टर की गाड़ी से आई। उसे तीन सिपाही छोड़ने आए थे। संध्या यह देखकर जल-भुन गई। गोया, यह सारी शान-शौक़त गहनों की वजह से थी।

अपर्णा ने संध्या को देखा, तो चौंककर सिहर गई। लेकिन अगले ही पल उसने अपने को सहज कर लिया था। वह सबसे पहले लगभग दौड़ती हुई संध्या के पास पहुँची और अपने वक्ष से लगा लेना चाहा लेकिन कुछ नाटी होने की वजह से वह खुद ही संध्या के वक्ष से जा लगी।

सब लोग भीतर आए। मंदिरा नाश्‍ते की व्यवस्था करने चली गई। पुनीत ने जो मंदिरा की तरह सजा-सँवरा था, आवाज़ को रोबोली बनाते हुए कहा, "कहो बेटे क्या हाल-चाल हैं?"

"फर्स्ट क्लास पापा। संध्या के लिए लड़का पटा लिया है। हमारे यहाँ का रुरल एस.पी. अनूप कुमार, बेचारा कुँवारा है।"

हल्के शोरगुल के बाद मंदिरा, अपर्णा और पुनीत गंभीरता से बात करने लगे। संध्या वहाँ मौजूद होकर भी नहीं बोल रही थी। उसका दिल उसे कोस रहा था कि वह क्यों अपर्णा से ऐंठी थी। अगर वह भनक भी पा गई उसके ऐंठने की, तो हो सकता है कि बात बिगाड़ दे इतना अच्छा चान्स हाथ से निकाल जाएगा। वह अपने को कोसने लगी। धिक्कारने लगी। 'बड़ी चली थी बदला लेनेवाली। पूरी पट्‍ठी की उल्लू हो।' चिड़चिड़ाहट में मुहावरा उल्टा कर दिया। वह चाह रही थी कि कितनी जल्दी बिगड़ी बात बना ले।

पुनीत को मंदिरा के साथ एक दोस्त के यहाँ पार्टी में शामिल होना था। उसके पहले भी कुछ काम निपटाने थे। तभी दोनों सजे-सँवरे थे। पुनीत ने अपर्णा से इसके लिए माफ़ी माँगी। मंदिरा ने कुछ नहीं कहा। उसे शादी के समय की बेरुखी अभी तक याद थी।

दरवाजा बंद करके संध्या ने अपर्णा गर्दन में बाँहें डाल दीं, "बहुत स्वीट लग रही हो।" "चलो यार मस्का मत लगाओ। मैं वैसे ही अनूप कुमार के बारे में बता दूँगी।" "मस्का की बात नहीं। तुम जब आईं, तो मेरा सिर बड़ा तेज़ दर्द कर रहा था। पर तुम आईं क्या, मेरा सिरदर्द ग़ायब। तुम कोई ज़ादू जानती हो क्या?" "और नहीं तो क्या।" "तब तो जीजाजी पर ख़ूब चलाया होगा।" "धुत्‌।" वह इस तरह शरमा गई। जैसे सचमुच चलाया हो। संध्या उसकी चापलूसी में जुट गईं उसकी छाया सी हो गई। अपर्णा सबकुछ समझ रही थी। मन ही मन मुस्कराती कि ऐन वक़्त पर क्या ख़ूब आइडिया सूझा। अपने यहाँ के रुरल एस.पी. तीन बच्चों के बाप-बेचारे कुँवारे बन गए। उसकी इच्छा हुई कि ठहाका लगाकर हँसे लेकिन ऐसा न करके वह बोली, "देखो मुझे तो मालूम भी नहीं था कि तुम भी यहाँ हो, इसलिए कुछ ले नहीं आई। जो लेना है, बताना। मैं यहाँ से ले दूँगी। अरे हाँ, वहाँ मम्मी की क्या न्यूज़ है?" संध्या ने मुस्कराकर कहा, "घूस मत दो, मैं वैसे सी बता दूँगी।" "अच्छा जड़ा। बहुत ख़ूब। अच्छा डॉक्टर बरनवाल से उनका कैसा है?" "जब से उनका गहनों वाला बॉक्स गायब हुआ, तब से किसी से कोई रिश्ता नहीं।" "कैसे ग़ायब हुआ?" "इसको तुमसे अच्छा कौन जान सकता है?" बहुत चाहने के बावजूद संध्या अपने मनोभावों को ज़ब्त न कर सकी। अपर्णा को शंका हुई कि कहीं रुरल एस.पी. के शादीशुदा होन वाली बात संध्या जानती है क्या, जो इस तरह बोल रही है। संध्या ने बोल तो दिया लेकिन पछता रही थी। उसने अपर्णा को फिर से ख़ुश करने के लिए गायत्री के बारे में बताना शुरु किया, "मम्मी की कुछ मत पूछो, नींद की गोलियाँ हमेशा उनके पास रहती हैं। नींद लाने के लिए नींद की गोली ली। नींद टूटी, फिर नींद की गोली। फिर तो फिर। हमेशा सोती रहती हैं। चेहरा गोलगप्पा की तरह फूला रहता है। और बुझा भी रहता है। आँखों के नीचे काला-काला-सा हो गया है। किसी से भी कुछ बोलती नहीं है। बस सोना। नींद की गोली ही उनकी फ्रेंड है। अगर यही हाल रहा, तो तुम देखना जल्द ही गॉड एक दिन उन्हें अपने पास बुला लेगा।" "फिर मकान का क्या होगा?" "उस पर पापा ने आँखें गड़ा रखी हैं।" संध्या की आवाज़ में पापा के लिए रोष था, "ये लो पापा-मम्मी आ भी गए।" मंदिरा की साड़ी पर उल्‍टी के दाग़ थे। अनाज के छोटे-छोटे लोथड़े बिखरे थे। बदबू भी आ रही थी। पुनीत फ़ोन पर पार्टी में न पहुँच पाने के लिए नर्म शब्दों में माफ़ी माँग रहे थे। लेकिन चेहरे पर खीझ झलक रही थी। मंदिरा साफ़-सुथरी होकर आई और अपने फूले हुए पेट पर हाथ फेरने लगी। उसकी पस्ती अब कम हो गई थी। रास्ते में ड्राइवर और अन्य लोगों के देख लेने के भय से वह चुप लगा गया था। लेकिन घर में आकर उसका ग़ुस्सा भड़क उठा, "बताओ पार्टी में क्या सोचते होंगे लोग? लेकिन यहाँ उल्टी करनी जरुरी थी। इतनी इंपोर्टेंट पार्टी मगर सब चौपट। क्या बताएँ। ओफ। माइंड साला अपसेट हो गया...अब टाइम भी नहीं है...क्या बताएँ...!" वह मंदिरा को शातिर अपराधी के रुप में देख रहा था। मंदिरा इन सबसे बेख़बर एक विज्ञापन की कमसिन लड़की की बिंदी देखने में जुटी थी। हालाँकि पार्टी की मौज से वंचित होने की कसक उसमें भी कम नहीं थी। अपर्णा को चिंता हुई, आज वह पापा से परीक्षित के बारे में बातें नहीं कर पायेगी। पापा का मूड बिगड़ा है। मम्मी को भी आज ही वोमिटिंग करनी थी। उसने सोचा कि फ़िलहाल वह थोड़ी देर के लिए इन लोगों से अलग हो जाए। वह लॉन में जाने के लिए खड़ी हुई। पुनीत कुछ पूछे, इससे पहले फ़ोन घनघना उठा। लॉन में अपर्णा को बड़ा सुख मिल रहा था। आस-पास की हरीतिमा और आकाश का उड़ा-उड़ा सा नीलापन शांति और संतोष की रचना कर रहे थे। अपर्णा ने पुलकित होकर कहा, "नेचर इज गॉड।" मगर उसका अधिक समय प्रकृति की उच्चकोटि की प्रशंसा में नहीं बीत सका। जल्द ही वह परीक्षित को लेकर परेशान हो उठी। और वहीं घास पर लेट गई।

उसने एक अनोखा खेल खेलना शुरु कर दिया था। वह घासों को अपने चेहरे से रगड़ती और कल्पना करती, ये घासें नहीं किसी की मूँछें हैं। उसने इस खेल की कई पालियाँ खेलीं। इतना कि आसमान के तारे निकल आए। घासों की हरीतिमा कालेपन में तबदील होने लगी। उसने कहा, "अच्छा ये मूँछें परीक्षित की हैं।" और खेल में मशगूल हो गई। मगर जल्द ही उसका मन उचाट हो गया। उसे परीक्षित के कारनामे याद आने लगे, सोच-सोचकर उसमें भय और क्रोध का मिला-जुला भभका उठने लगा। ऊपर से वातावरण में टपकता अँधेरा- वह खौफ़ज़दा हो गई। पीछे से किसी ने पुकारा, वह चिल्ला पड़ती, यदि पुकारने वाले ने आगे न कहा होता, "साहब ने बुलाया है।" चपरासी रामकलप था। रामकलप जाने लगा, तो उसने कहा, "रुको, मैं भी चलती हूँ।" उसका डर अभी दूर नहीं हुआ था। वह पीछे-पीछे चल रही थी। वह निश्‍चय कर रही थी, "अभी पापा के सामने सारा कुछ बोल दूँगी और कहूँगी, जैसे भी हो कुछ करें।" वह पहूँची, तो पुनीत ने पूछा, "क्यों बेटे कहाँ चल गए थे?" उनकी आवाज़ में अब अशांति नहीं थी। शायद फ़ोन पर अच्छी बातें हुई थीं। "ऐसे ही पापा, लॉन में चली गई थी। पापा..." उसकी गर्दन झुक गई, "मैं इन दिनों बहुत टेंशन में हूँ पापा। पापा, मुझे आपसे कुछ बातें करनी हैं।" "कहो-कहो क्या बात है?" पुनीत ने आत्मीयता से कहा। चपरासी बाहर चला गया। "पापा ऐसा है...?" "पुनीत ने सिगरेट सुलगा ली और लंबा कश खींचकर अपर्णा को सुनना शुरु किया। सुनने के साथ वह अपर्णा के चेहरे को गौर से देख रहे थे। उसके चेहरे पर भावनाओं की आड़ी-तिरछी रेखाओं को साफ़-साफ़ पढ़ा जा सकता था। आवाज़ कभी तेज हो जाती थी, कभी धीमी, गले की नसें फूल उठती थीं। उसने बोलना बंद किया, तो पाया, गला सूख गया है, लेकिन उठकर पानी पीने की हिम्मत नहीं थी। नौकर को बुलाना नहीं चाहती थी। पानी पीने का ख़्‍याल त्याग दिया। वह पुनीत को सवालिया आँखों से देखने लगी। ख़ामोशी छा गई। कमरे का हर हिस्सा दूसरों से कटा हुआ लग रहा था। मालूम होता था, समय ठहर गया है। लगता अपर्णा के शब्द फ़र्श और छत के बीच टँगे हैं। कुछ क्षणों के लिए उस कमरे का अस्तित्व सारे संसार से अलग-अलग-सा हो गया था। पूरे माहौल में भारीपन फैला हुआ था। पुनीत ने सिगरेट जलाकर कहना शुरु किया, " देखो बेटे, वैसे यह तुम दोनों का पर्सनल मामला है।" वह काफ़ी सोचकर-विचार कर बोल रहे थे, "फिर भी चूँकि तुमने मुझसे कहा है, इसलिए कुछ कह रहा हूँ। दरअसल मेरिज के पहले ही तुम्हें इन सब चीज़ों पर सोच लेना चाहिए था। तुमने नहीं सोचा, मुझे इस बात पर हैरत है। दूसरी बात, तुम जो शिकायतें कर रही हो वे ठीक नहीं हैं। लोअर क्लास और मिडिल क्लास की औरतों की तरह ऐसी चीज़ों पर अधिक ध्यान दोगी, तो तुम्हारी लाइफ़ चौपट हो जाएगी। हमेशा के लिए टेन्शन पाल लोगी..." "पर पापा मैं क्या करुँ? मैं इस तरह नहीं रह सकती। परीक्षित...अब क्या कहूँ पापा।" अपर्णा बहुत निरीह लग रही थी। पुनीत कुछ सोचने लगे। एक लंबी साँस छोड़ी, "ठीक है, अगर तुम्हारी इतनी ज़िद है तो तुम्हारी शादी में जो होममिनिस्टर आए थे, उनसे कहकर परीक्षित का ट्रांसफर होमगार्ड में करा देता हूँ। वहाँ न पैसा रहेगा, न पावर। अपने आप दिमाग़ दुरुस्त हो जाएगा। बोलो ठीक है न? लेकिन सोच लो।" अपर्णा ने घबराकर कहा, "नहीं पापा, ऐसा मत करिएगा। परीक्षित ठीक है। बहुत अच्छा है।" पुनीत के होंठों पर सुख और संतोष की मुस्कराहटें खेलने लगीं। उनकी सिगरेट बुझ गई थी। उन्होंने नई जला ली।


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