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कविता

अइया
श्रीरंग


अइया बोझ हो चुकी हैं
उन बहुओं के लिए
जिनकी जचगी में
अछवानी काढ़ा बनाते पिलाते
कभी नहीं थकी
अकेले ही बाँधती रहीं सिढ़ौरा...

अइया सिरदर्द हैं
उन बेटों के लिए
जिनकी पढ़ाई लिखाई परवरिश के लिए
कोई कोर कसर नहीं छोड़ी...

अइया बोरिंग हैं
उन पोते-पोतियों के लिए
जिन्हें घंटों धूप में ले बैठी रहती थी
तेल-मालिस करती
उबटन लगाती
बउडिरियाती रहती थी
टोना-टोटका, नजर उतरवाने के लिए
घंटों सुनाती थी कहानियाँ, लोरियाँ
अक्सर लड़-झगड़ जाती थीं
पड़ोसिनों से...

अइया बीमार हैं
नहीं है उनके पास बुढ़ापे का इलाज
अइया लाचार हैं
नहीं कर सकती कोई काम-काज
नहीं बिन सकती चावल
नहीं डाल सकती आचार-मुरब्बा
नहीं कर सकती झाड़ू-पोछा
नहीं माँज सकती बरतन
नहीं सँभाल सकती बच्चों को...

अइया मोहताज हैं
नहीं चला सकतीं जाँगर
अइया बोझ हैं घर पर
जिसे बनाया था उन्होंने ही
काट कर पेट...

अइया
खाँस नहीं सकतीं
खबर नहीं सकतीं
थूक नहीं सकतीं
कर नहीं सकतीं दो बात
किसी से भी खुलकर
ससुराल से आई
बेटियों से भी बाँट नहीं सकतीं अपना
सुख-दुख
नहीं ले सकतीं पोते-पोतियों के जन्मदिन में

हिस्सा
नहीं बैठ सकतीं मेहमानों के बीच दो मिनट
नहीं रह सकतीं किसी एक बेटे के घर
निर्धारित समय से एक दिन भी ज्यादा...

अइया
विदा हो जल्दी से जल्दी
ताकि किराए पर उठाया जा सके उनका
कमरा
बस यही चाहते हैं घर के लोग...।

 


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