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आलोचना

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ग्रंथावली
भाग 4
भाषा, साहित्य और समाज विमर्श

रामचंद्र शुक्ल
संपादन - ओमप्रकाश सिंह

अनुक्रम

अनुक्रम देशी भाषा की दशा     आगे

मैं उन लोगों में से हूँ जिन्हें देशी भाषाओं को शिक्षा का कार्य बनाने के दावे पर प्रश्न खड़ा करने का कोई कारण नहीं दिखाई देता। इसके विपरीत मैं तो उन भाषाओं को एकमात्र ऐसा भंडार मानता हूँ जिसमें भावी पीढ़ियों के उपयोग के लिए हम विश्वासपूर्वक अपनी अपेक्षाएँ संचित कर सकते हैं। इसके व्यावहारिक परिणाम के रूप में हिन्दी की स्थिति ने कुछ समय पूर्व से मेरा ध्याभन आकृष्ट किया है। लेकिन, जिस विश्वास ने अब तक मेरा धीरज बनाए रखा, वह अटूटने लगा है। आसपास की परिस्थितियाँ व्यापक रूप से इस निष्कर्ष का आधार प्रस्तुत करती हैं कि किसी भी वांछित परिणाम की प्राप्ति के लिए 'न के बराबर' प्रयास किया जा रहा है।

हो सकता है कि इस अन्तिम कथन को सीधे-सीधे निराशावादी दृष्टिकोण के रूप में अथवा हिन्दी के विकास से सम्बन्धित व्यक्तियों को अपमानित करने की चतुर युक्ति के रूप में लिया जाय। लेकिन सूक्ष्मतापूर्वक परखने पर यह धारणा समाप्त हो जाएगी और वास्तविक स्थिति सामने आ जाएगी। इस तथ्य से कुछ ही लोग असहमत होंगे कि भारत की सभी देशी भाषाओं में हिन्दी सर्वाधिक महत्तवपूर्ण है। यह भारतीय जनसंख्या के अत्यन्त सभ्य हिस्से की भाषा है। यदि ऐसा है तो फिर इसके साहित्य की दरिद्रता को कैसे स्पष्ट किया जाय? इस प्रश्न के सन्तोषजनक उत्तर का सूत्र पाने से पहले वर्तमान हिन्दी लेखकों की सामर्थ्य पर एक उड़ती नजर अवश्य डाल लेनी चाहिए। पत्रों 
जहाँ तक साप्ताहिक पत्रों के सम्पादकों की बात है तो सामान्यत: वे ऐसे लोग हैं जिन्होंने नाममात्र की शिक्षा प्राप्त की है या औपचारिक शिक्षा नहीं प्राप्त की है। यही कारण है कि कभी-कभी वे ऐसे विषयों पर पूरी तत्परता (?) और उत्साह से टिप्पणी करते पाए जाते हैं जो शायद ही किसी विवेकशील व्यक्ति के लिए ध्यानन देने योग्य हों या जनता की भलाई से उनका कोई अप्रत्यक्ष सम्बन्ध भी हो। उनके सारहीन कथन या टीका-टिप्पण्श्नियाँ सार्वजनिक भावों की अपेक्षा अधिकतर व्यक्तिगत विचारों से प्रभावित रहती हैं। जब वे किसी उपयोगी उद्यम के विषय में सुनते हैं तो जोर-शोर से उसकी प्रतिकूल आलोचना प्रारम्भ कर देते हैं और सफलता की सम्भावनाओं पर पानी फेर देते हैं। नागरीप्रचारिणी सभा, बनारस द्वारा श्रीदत्ता के इतिहास के अनुवाद के प्रस्तावित प्रकाशन के विरोध में इनके द्वारा मचाए गए हो-हल्ले को इसके अनोखे दृष्टान्त के रूप में लक्ष्य किया जा सकता है। एक बार तो किसी धर्मग्रन्थ की प्रति पुस्तकालय में रखने की अनुमति देने पर भी सभा को इनमें से एक पत्र की नाराजगी झेलनी पड़ी थी। इसके बाद भी सभा पर लगातार अपधर्म के आरोप लगाए गए। मैं समझता हूँ कि उपर्युक्त तथ्य इनके दृष्टिकोण और सही निर्णय करने की इनकी योग्यता का परिचय देने के लिए पर्याप्त हैं।

एक वर्ग धूर्तों का है। यह वर्ग अन्य देशी भाषाओं बंगला, उर्दू, मराठी आदि से पुस्तकों विशेषकर उपन्यासों क़ा अनुवाद करता है और उन्हें निर्लज्जतापूर्वक अपनी रचना घोषित करने की सीमा तक असाधारण छल करता है। ऐसे लोग मूल लेखकों के नामों को दबा देने के लिए लगातार उन उद्धारणों को लुप्त कर देते हैं जिनके अर्थ ग्रहण में वे असमर्थ रहते हैं। इस क्रम में वे दुर्बोधा शब्दों को दूसरे शब्दों से बदल भी देते हैं। इन्हीं पत्रिकाओं में से एक में लगभग साल भर पूर्व एक बंगाली महिला का इससे सम्बन्धित लेख छपा था। हालाँकि यह लेख उनकी नजरों में सही था, पर इसने चारों ओर से निन्दा और उपहास ही झेले। यह भी उल्लेखनीय है कि वस्तुत: यह लेख बंगला रचनाओं और उनसे मिलती-जुलती हिन्दी रचनाओं की सूची-मात्र था। उपर्युक्त लेख तो केवल बंगला की ही रचनाओं तक सीमित था। ऐसे लोगों के हाथों से उर्दू की रचनाएँ भी नहीं बच पाई हैं। इसे निम्नलिखित उर्दू पुस्तकों और (उनसे उड़ाई गई सामग्री से तैयार की गई) हिन्दी पुस्तकों द्वारा समझा जा सकता है। उर्दू रचनाएँ जिन शीर्षकों से हिन्दी में प्रस्तुत हुईं, वे इस प्रकार हैं

मेहरम वासी पूना में हलचल
मुज़ाहरा रमाबाई क़ुँवर सिंह सेनापति
शादी का गम वीर जयमल
उरोज वा जवाल वीर पत्नी
सलीम वा नूरजहाँ नूरजहाँ

बंगला से अनूदित दो अन्य पुस्तकों पर उपर्युक्त लेख में ध्यादन नहीं दिया गया है

बंगला हिन्दी
हम्मीर हम्मीर
चित्रांगदा चित्रांगदा
(रवीन्द्र नाथ टैगोर)

एक दूसरा वर्ग है जो अपने दिखावे में इससे भी दो कदम आगे है। इसमें ऐसे लोग हैं जिनकी शिक्षा असमय ही छूट गई और उसके व्यवस्थित विकास के लिए उन्होंने कभी कोई सच्चा प्रयत्न नहीं किया। उनके द्वारा इस शिक्षा का उपयोग अपने आस-पास के अल्पज्ञ पाठकों पर धाक जमाने के लिए और उन्हें भौंचक्का कर देने के उपकरण के रूप में किया जाता है। वे बड़े यत्न से वैज्ञानिक बहसों में भाग लेते हैं और इस तरह अपनी अयोग्यता ही प्रकट करते हैं। यदि ऐसे बहुमुखी ज्ञानदम्भी व्यक्ति स्वयं को श्रम और अध्य्यन में लगाएँ तो ये कुछ काम के हो भी सकते हैं। लेकिन उनके वर्तमान रवैये को देखकर ऐसी आशा शायद ही की जा सकती है। एक ही व्यक्ति कभी-कभी कवि या उपन्यासकार के रूप में दिखाई देता है और कुछ ही आगे चलकर वह पुरावेत्ता या भाषाशास्त्री के रूप में दिखाई पड़ने लगता है। पुरावेत्ता या भाषाशास्त्री की हैसियत से उसे अनुचित (रूप से) श्रेष्ठता अर्जित करने का और भी अच्छा अवसर मिलता है। परिश्रमी योरपीय प्राच्यविदों द्वारा संगृहीत सामग्रियों का ढेर पाकर वह समय-समय पर उनमें से किसी एकज़ानकारी का ऐसा भाग, जो उसकी तुच्छ बुद्धि में समा सकता है क़ो उड़ा लेने के लिए सदा तत्पर रहता है। शेष को वह अन्य अवसरों की सेंधमारी के लिए रख छोड़ता है। 

(उनके लेखन में) कभी आप स्वतन्त्र प्रत्यय पर टिप्पणी पाएँगे, तो कभी तुलनात्मक व्याकरण पर; ये सभी उसी समृद्ध स्रोत से उड़ाए गए हैं। यह नहीं भूलना चाहिए कि उन्हें इसमें बड़ी सुविधा रहती है। ऐसी पुस्तकों को समझने के लिए अधिक विद्वता की आवश्यकता नहीं होती जो यह बताती है कि वहाँ पड़ा स्तम्भ या अभिलेख फलाँ-फलाँ तथ्यों का साक्ष्य देता है। जरा देखिए कि किस मामूली कीमत पर ये विद्वानों की-सी ख्याति मोल ले लेते हैं! परिणाम यह है कि अध्य यन की उच्चतर शाखाओं मानसिक और नैतिक दर्शनशास्त्र, राजनीतिक अर्थशास्त्र, भौतिकी आदि की उन्नति बाधित होती है; क्योंकि यह बिलकुल स्वाभाविक है कि ऐसी योग्यता वाले व्यक्ति प्रतिष्ठा अर्जित करने के लिए आसान और सुरक्षित रास्ता अपनाएँगे।

विद्वानों के निश्चयात्मक कथनों के भाव या अभिप्राय, निगमनों की सूक्ष्मता और उनके निरूपण की प्रक्रिया को समझने में असमर्थ होते हुए भी वे उनके शोध के परिणामों को आभार व्यक्त किए बिना ही उड़ा ले जाते हैं। एक-दूसरा भारी दोष यह है कि प्राचीन महत्तव के विषय के साथ वे लापरवाही से पेश आते हैं अपनी पहुँच और समझ के भीतर का एक पत्र जुटाकर वे उतावले ढंग से उसका अनुवाद करने लगते हैं। ध्वं स की उत्कण्ठा में वे यह भूल जाते हैं कि उसकी विषयवस्तु को समझने के लिए गहन अध्य यन की आवश्यकता होती है। प्राचीन महत्तव के विषयों पर समय-समय पर प्रकाशित कई तरह की पुस्तिकाएँ इस बात की उदाहरण हैं। इतिहास के देशी या विदेशी प्राचीन भंडार ने विद्वानों की एक पूरी पीढ़ी को उनके काम की सामग्री उपलब्ध कराई है। अत: बुद्धिसम्मत पद्धाति यह होगी कि पहले इस भंडार को सुलभ किया जाए, ताकि अवसर आने पर दूसरों द्वारा अनुमान प्रस्तुत करने से पूर्व ही उस दिशा में बढ़त बनाई जा सके। इस रीति के अनुसार किए गए सर्वाधिक प्रशंसनीय प्रयासों में से नागरीप्रचारिणी सभा के योग्य एवं विद्वान सचिव बाबू श्यामसुन्दर दास के प्रयास सर्वश्रेष्ठ हैं।

कहने का आशय यह नहीं है कि विषय (पुरा विषय) को पूरी तरह से बचाकर अलग रखा जाए, बल्कि समर्थ व्यक्तियों द्वारा ही इसमें हाथ लगाया जाना चाहिए। ऐसे व्यक्ति, जिन्होंने इसे अपनी दृष्टि का विशेष लक्ष्य बनाने के लिए समय तथा श्रम लगाया हो; जो यूनान, रोम, फारस, मिश्र और प्राचीन महत्तव के अन्य देशों के इतिहास पर समान रूप से अधिकार रखते हों; जिनके द्वारा अपने पूर्ववत्तियों की उपलब्धियों को आगे बढ़ाने की आशा की जा सकती हो और जो अपने व्यक्तिगत उद्योगों द्वारा अपने देश के इतिहास के चन्द धाुँधाले पन्नों पर रोशनी डाल सकते होंवे ही इसमें हाथ लगाएँ। वे छात्रा जो अपने एम. ए. के पाठयक्रम में इतिहास विषय लेते हैं, यदि उस भाषा में प्रवीणता अर्जित कर लेते हैं जो निश्चय ही उनकी अपनी भाषा है तथा छात्रा जीवन के समाप्त होने पर अपने अध्य यन को तिलांजलि नहीं दे देते तो वे उपयुक्त लेखक सिद्ध हो सकते हैं। सच तो यह है कि जिन्हें नियमित शिक्षा की बहुत हद तक सुविधा मिली है उन्हें स्वयं द्वारा अर्जित उस वृहदांश का अपना ही शिक्षक भी बनना चाहिए। तभी वे शिक्षा के प्राथमिक तत्तवों से आगे बढ़ पाएँगे। स्कूल या कालेज में वे जो कुछ सीखते हैं उसका महत्तव तब तक नगण्य रहता है जब तक वे आगे के स्वाध्याय से उन्हें विकसित नहीं कर लेते।

अब मैं लेखकों के एक और समूह पर आता हूँ। इसमें कविता, कहानी और निबन्धों के लेखकों के साथ-साथ साहित्य से जुड़े व्यक्त् िभी हैं। मुझे इस बात की प्रसन्नता है कि उनके विरुद्ध कहने के लिए मेरे पास ज्यादा कुछ नहीं है। इस वर्ग के सदस्य अपने क्षेत्र मंर अधिक निपुण हैं और इसलिए उनके कार्यों की पहचान सिद्धन्तों की दृढ़ता तथा व्यवस्थित पद्धाति के कारण है। इसके उपरान्त भी मुझे कुछ टिप्पणी करनी है जो उन्हें अधिक खुश करने वाली नहीं हो सकती है। उनकी रचनाओं में जो एक बड़ा दोष पाया जाता है वह यह है कि उनमें शैलियों की विविधता होती है। शैलियों की अत्यधिक भिन्नता से यह सन्देह उत्पन्न हो सकता है कि क्या वे सम्मिलित रूप से एक ही और समरूप भाषा निर्मित करती हैं? लेखकों द्वारा प्रयुक्त बहुत से संस्कृत या फारसी शब्दों के कारण ये भिन्नताएँ उत्पन्न होती हैं। कुछ ऐसे (लेखक) मिल सकते हैं जो संस्कृत की सम्पूर्ण शब्दावली को अपने लिए सुलभ मानते हैं और संस्कृत के सर्वनामों तक के निर्बाध प्रयोग से नहीं हिचकते। अपने पांडित्य-प्रदर्शन के प्रयास में कभी-कभी वे इतना आगे बढ़ जाते हैं कि प्रचलित संस्कृत शब्दों का प्रयोग न करके, उनके कम प्रचलित पर्यायों का सहारा लेने लगते हैं। संस्कृत के लम्बे सामासिक पदों और अपरिचित फारसी शब्दोंज़ो प्रभाव की सृष्टि करने के लिए कभी कभार साथ-साथ सजा दिए जाते हैंक़ा प्रयोग इसी प्रवृत्ति का दूसरा चरण है। हाल ही में प्रकाशित 'अधाखिला फूल' नामक एक ही पुस्तक में आप व्यापक रूप से भिन्न तीन शैलियाँ पाकर अचम्भे में पड़ जाएँगेसमर्पण में प्रयुक्त पहली शैली अत्यन्त असभ्य किस्म की है, भूमिका में प्रयुक्त दूसरी शैली व्यवहार में स्थापित शैली है और तीसरी पुस्तक की खुद अपनी शैली है जो किसी जटिल विचार के वहन में शायद ही सक्षम हो। दूसरी ओर बनारस के पेशेवर कहानी-लेखक हैं। इनमें से अधिकांश निर्लज्ज अनुवादकों से सम्बन्धित पूर्वप्रचलित टिप्पणियाँ लागू होती हैं। जनता की रुचि भ्रष्ट करने के साथ-साथ ये आर्थिक लाभ के लिए अपनी भाषा की शुद्धता की बलि चढ़ाने के लिए भी सदैव तत्पर रहते हैं। मुझे आशा है कि ये लोग लम्बे समय तक बाधाक तत्तव बने नहीं रह पाएँगे।

विचित्र तो यह है कि कविता भाषा के दो भिन्न रूपोंख़ड़ी बोली और ब्रजभाषा में दिखाई देती है। नागरीप्रचारिणी सभा की एक बैठक में यह प्रश्न उठाया गया कि प्रौढ़ रचनाओं के लिए इन दोनों रूपों में से किसे ग्रहण किया जाए। थोड़े विचार-विमर्श के उपरान्त अनिच्छापूर्वक यह निर्णय लिया गया कि कविता इन दोनों रूपों में लिखी जा सकती है। इन परिस्थितियों में अपनाए जाने योग्य यह सबसे कम निराशाजनक योजना थी। साहित्य की इस विधा के कुंठित विकास का कारण बहुत हद तक इस कार्य के प्रति रुचि का अभाव होना भी है। यह दुखद सत्य है कि इस पर ध्या न रखने वाले ढेर सारे विद्वानों और कुशल व्यक्तियों के रहने के बाद भी उनके द्वारा अब तक कोई ठोस रचना प्रस्तुत नहीं की गई है। साहित्यिक, राजनीतिक, सामाजिक और दार्शनिक निबन्धों के समर्थ लेखकों की आवश्यकता भी बनी हुई है।

अन्तत:, मैं अपने शिक्षित भाइयों का ध्या न उनकी भाषा की शोचनीय दशा की ओर आकर्षित करता हूँ। मुझे उस समय की व्याकुलता से प्रतीक्षा है जब वे मंच पर उपस्थित होंगे और दुनिया को यह दिखा देंगे कि उनके पास भी, उनकी अपनी, एक ऐसी भाषा है जो विचारों की हर प्रणाली के सम्प्रेक्षण के लिए पूर्णत: उपयुक्त है। प्रतिष्ठा अर्जित करने के लिए अपनी देशी भाषा के साहित्य को समृद्ध करने से अधिक विश्वसनीय कोई अन्य साधान नहीं है। श्री रमेशचन्द्र दत्ता जैसे श्रेष्ठ व्यक्ति ने अपनी देशी भाषा के साहित्यिक कार्य में ढेर सारा मूल्यवान समय लगाया है। हमें मिल्टन की इस उक्ति के मर्म पहुँचने की जरूरत है''एथेंस, रोम या आधुनिक इटली तथा प्राचीन यहूदियों की महानतम और श्रेष्ठतम प्रतिभाओं ने अपने देश के लिए जो किया उसे अपनी शक्ति-भर मैं भी, एक ईसाई होने के अलावा, अपने देश के लिए कर सकता हूँ। कभी विदेशों में ख्याति अर्जित करने की परवाह किए बिना, हालाँकि शायद मैं ऐसा कर सकता हूँ, मैं अपने संसार के रूप में इन ब्रिटिश द्वीपों के साथ सन्तुष्ट हूँ।''

क्या हमें अपने पाठकों को यह स्मरण कराने की आवश्यकता है कि आगे चलकर उसका संसार आबाद भूमंडल के चौथाई भाग पर विस्तृत हो गया और उसकी ख्याति भारत तथा बर्मा जैसे दूरस्थ देशों तक पहुँची? यदि मिल्टन अपने 'ब्रिटिश द्वीप' से सन्तुष्ट था तो मुझे कोई कारण नहीं दिखता कि फिलहाल हमें संयुक्त प्रान्त, पंजाब, मध्यद प्रान्त, बिहार और राजपूताना जैसे कहीं अधिक विस्तृत क्षेत्र से सन्तुष्ट क्यों नहीं होना चाहिए।

(द इंडियन पीपुल, 6 जुलाई, 1905)
अनुवादकअलोक कुमार सिंह

('द इंडियन पीपुल' नामक पत्र में प्रकाशित आचार्य शुक्ल के इस लेख पर व्यापक प्रतिक्रिया हुई थी। इसके पक्ष-विपक्ष में अनेक लोगों ने लिखा था। ऐसे ही लोगों में एक थेबी. डी. मलावी। इन्होंने 'द इंडियन पीपुल' में ही 'हिन्दी साहित्य' नामक पत्र लिखकर अपना विरोध दर्ज कराया था। बी. डी. मलावी का पत्र आगे अविकल दिया जा रहा है। पुन: आचार्य शुक्ल ने मलावी के पत्र का प्रत्युत्तार '''हिन्दी साहित्य' पर टिप्पणी'' शीर्षक लेख से दिया था। यह लेख भी आगे अविकल दिया गया हैसम्पादक)

हिन्दी साहित्य
महाशय,

आपके समाचार-पत्र में पिछली 6 जुलाई को तथा 'एडवोकेट' में 30 जुलाई को प्रकाशित देशीभाषा हिन्दी की दशा का मिथ्यानिरूपण करने वाले पत्र ने हिन्दी भाषा के बहुत-से लेखकों और प्रेमियों को पीड़ा पहुँचाई है। ऐसा अशोभनीय और विवेकहीन पत्र श्री शुक्ल जैसे शालीन सज्जन की कलम से आएगा, यह मेरे लिए महान आश्चर्य और दु:ख का विषय है। वह भी विशेषकर तब, जब मुझे बताया गया कि ये सज्जन स्वयं को हिन्दी का हितैषी मानते हैं।

किसी को भी इस सच्चाई से इनकार नहीं है कि स्वर्गीय भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के काल से ही हिन्दी साहित्य निरन्तर उन्नति करता रहा है और वर्तमान परिस्थितियाँ इसके उज्ज्वल भविष्य की पुष्टि करती हैं। पर मुझे यह कहते हुए काफी दु:ख है कि 'कारण धीरे होत है......' वाली कहावत को भूलकर श्री शुक्ल ने अपना धैर्य खो दिया। तर्क की विचित्र पद्धाति से वे इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि हिन्दी शोचनीय अवस्था में पहुँचा दी गई है और इसके कारण हैं हिन्दी साप्ताहिकों के सम्पादक स्नातक नहीं हैं; बंगला एवं उर्दू उपन्यासों के कुछ अनुवादकों ने उनके मूल लेखकों का नामोल्लेख जान-बूझकर नहीं किया; हिन्दी के कुछ सर्वमान्य श्रेष्ठ विद्वानों ने भाषाशास्त्र, तुलनात्मक व्याकरण और पुरातत्व पर ऐसी पुस्तिकाएँ प्रकाशित करवाईं जो शिक्षित वर्ग के लिए तो बोधगम्य थीं किन्तु जनता के एक बड़े समूह के लिए अबोधगम्य थीं; पत्रिकाओं के कुछ सम्पादकों को फारसी शब्दों के आगे-पीछे संस्कृत शब्द सजाने की आदत पड़ी है और अन्तत:; 'अधखिला फूल' के प्रसिद्ध लेखक ने भूमिका में कठिन हिन्दी और पुस्तक के मुख्य भाग में सरल हिन्दी लिखने की धृष्ट ता की।

श्री शुक्ल के कथनानुसार, मैं उनके निश्चयात्मक कथनों के अभिप्राय, निगमनों की सूक्ष्मता और उनके निरूपण की प्रक्रिया को समझने में असमर्थ हूँ। लेकिन उनके तर्कों की धार को न समझ पाते हुए भी मैं उन दोषों पर संक्षिप्त चर्चा करने का प्रयास करूँगा, जिन्होंने मेरे विद्वान मित्र की दृष्टि में हिन्दी की दशा को शोचनीय और शायद हेय भी बना दिया है।

अपने पत्र के तीसरे अनुच्छेद में श्री शुक्ल ने हिन्दी साप्ताहिकों के सम्पादकों को अपनेर् कर्तव्यन के निर्वाह में अक्षम घोषित किया है, क्योंकि वे अल्पशिक्षित हैं और उनमें से कइयों के पास श्री दत्ता की 'हिस्ट्री ऑफ इंडिया' के हिन्दी अनुवाद को समझ पाने की बुद्धि नहीं थी। यदि शिक्षा शब्द अंग्रेजी की शिक्षा तक ही सीमित नहीं है तो मेरी समझ से श्री शुक्ल ने सभी सम्पादकों के चरित्र और उपलब्धियों पर लांछन लगाकर सही नहीं किया है। मेरे मित्र यह याद रखें कि ये सम्पादक हिन्दू समुदाय के रूढ़िवादी हिस्से का प्रतिनिधित्व करते हैं और इस रूप में उन्होंने अवश्य यह सोचा होगा कि ऐसी क्रान्तिकारी पुस्तक के प्रकाशन का विरोध करना उनका कर्तव्ये है। इसके अतिरिक्त, इस प्रकार की बहसें साहित्य के उद्देश्य के लिए क्षतिकारक होने की बजाय अन्तत: प्राय: लाभप्रद सिद्ध होती हैं। इसलिए सदा इनका विरोध ही नहीं किया जाना चाहिए।

अपने पत्र के चौथे, पाँचवें और छठे अनुच्छेद में पंडित ने एक बंगाली महिला का हवाला दिया है जिन्होंने किसी उपन्यासकार के भ्रष्ट आचरण को उद्धाटित करने का वीरांगना-सम स्तुत्य साहस दिखाया था और पंडित के ही शब्दों में चारों ओर से निन्दा और उपहास झेला' था। मुझे ज्ञात हुआ है कि उनका लेख उतना आकर्षक सिद्ध नहीं हुआ और उसने मात्र एक हिन्दी साप्ताहिक का ध्या न आकृष्ट किया था। इसके उपरान्त भी महिला के साथ मेरी पूरी सहानुभूति है और उनके प्रति अनुदार आचरण के जिम्मेदार सम्पादकों की मैं घोर निन्दा करता हूँ। यद्यपि मैं उन पथभ्रष्ट सम्पादकों के साथ नहीं हूँ, फिर भी मैं यह समझने में असमर्थ हूँ कि बंगला और उर्दू उपन्यासों के बिना ये आभार व्यक्त किए गए हिन्दी अनुवाद हिन्दी साहित्य के हितों को कैसे पहुँचाएँगे। क्या इन्होंने पठनीय हिन्दी पुस्तकों के भंडार में योग नहीं किया है और चारों ओर का उपहास झेलने की बजाय उपन्यास के पाठकों द्वारा क्या ये सराहे नहीं गए हैं? इस परिस्थिति में मेरा तो यह मानना है कि इन अनुवादों ने हिन्दी की गति को बाधित करने की जगह इसे एक सराहनीय सीमा तक आगे बढ़ाया है।

अपने पत्र के सातवें, आठवें और नौवें अनुच्छेद में पंडित ने भाषाशास्त्र, पुरातत्व आदि पर पुस्तिकाएँ प्रकाशित करने का साहस करने वाले व्यक्तियों पर अनुचित प्रहार किया है। मेरे विद्वान मित्र बाबू श्यामसुन्दरदास जैसे लब्धाप्रतिष्ठ स्नातकों को ही इन पवित्र विषयों पर विचार करने में समर्थ मानते हैं। यदि कोई अन्य स्नातक, भले ही वह कितना ही अध्य यनशील और विद्वान क्यों न हो, इन विषयों में हाथ डालने को होगा तो उसे एक अपात्र अछूत की तरह झिड़क दिया जाएगा। उसका कार्य भले ही प्रशंसनीय हो, परन्तु अपवित्र घोषित कर दिया जाएगा। लेकिन श्री शुक्ल एकमात्र इस आधार पर ही 'ऐसी वैज्ञानिक बहसों' से घृणा नहीं करते। पहले तो वे उनके प्रकाशन की निन्दा करते हैं क्योंकि वे अल्पज्ञ पाठकों को भौचक्क कर देने के लिए थे; दूसरे, वे योरपीय प्राच्यविदों की पुस्तकों के अनुवाद-मात्र थे; तीसरे, उनका लेखन प्रतिष्ठा अर्जित करने का आसान तरीका होने के कारण् सामान्य बुद्धि के लोगों को उच्चतर अध्य यन जारी न रखने का परामर्श देता है और चौथे कि इन पुस्तिकाओं की विषयवस्तु को समझने के लिए इसके पाठकों को व्यापक अध्यरयन की आवश्यकता होती है।

मैं इन आपत्तियों का यह जवाब देना चाहता हूँ कि इनमें से किसी भी पुस्तिका को पढ़कर यदि स्वयं पंडित कभी भौचक्क रह गए हों तो इन सबका तुरन्त बहिष्कार कर दिया जाए। लेकिन यदि वे प्रारम्भिक ग्रन्थों का अध्यायन करने के कष्ट से गुजरे बिना ही इन पुस्तिकाओं की विषयवस्तु और लाभ को समझने में सक्षम रहे हों तो भले ही ये अनुवाद-मात्र हों, परन्तु मैं आशा करता हूँ कि वे (शुक्ल) हिन्दी की प्रगति में पूरक होने के इनके महत्तव को स्वीकार करेंगे और इनकी प्रतिकूल आलोचना से बाज आएँगे। तीसरी आपत्ति ऐसी बेतुकी है कि अपना खंडन आप ही कर देती है। इस परिस्थिति में कोई भी सन्तुलित व्यक्ति क्या यह कह सकता है कि ऐसी पुस्तिकाओं का प्रकाशन हिन्दी की उन्नति के लिए किसी भी प्रकार से हानिकारक है?

दसवें अनुच्छेद में पंडित कविता, कहानी, निबन्ध तथा उपन्यास लिखने वाले पंडितों को प्रवचन देते हैं। वैसे उनकी कटु निन्दा मुख्यत: शैली की विविधता पर केन्द्रित थी। चूँकि शैली की समस्या अभी तक वर्तमान है, इसलिए श्री शुक्ल का आक्षेप अप्रौढ़ है। 'अधाखिला फूल' एक उत्कृष्ट उपदेशात्मक उपन्यास है और यह ऐसी शैली का नमूना प्रस्तुत करता है जो भारत के एक बड़े जनसमूह के लिए उपयुक्त है। लेकिन श्री शुक्ल के विचार से इस तरह की शैली जटिल विचारों के वहन में असमर्थ है। मैं उन्हें चुनौती देता हूँ कि वे अपनी टिप्पणी की सत्यता को उदाहरणों द्वारा सिद्ध करें। पंडित ने समर्पण की शैली को असभ्य कहना पसन्द किया है क्योंकि वह अत्यधिक संस्कृतिनिष्ठ थी। यदि संस्कृतभाषी व्यक्ति असभ्य थे तब तो इस शैली को उचित ही असभ्य कहा जाना चाहिए, लेकिन यदि वे एक सभ्य जाति के सदस्य थे तो श्री शुक्ल की भ्रामक और वितंडावादी आलोचना की निन्दा होनी चाहिए।

मलावी
(द इंडियन पीपुल, 10 सितम्बर, 1905)
अनुवादकअलोक कुमार सिंह

 


'हिन्दी साहित्य' पर टिप्पणी

महोदय,

इस महीने की 10 तारीख को आपके समाचार-पत्र में प्रकाशित 'हिन्दी साहित्य' नामक पत्र सचमुच अप्रत्याशित था। इस पर विश्वास नहीं होता कि श्री बी. डी. मलावी या उस्ताद (?) जैसे सुस्त व्यक्ति 'विद्वानों' (जैसा कि वे उन्हें कहना पसन्द करते हैं) के बिना किसी तर्क और समझदारी से निर्देशित आचरण को जायज ठहराने के किसी स्वत:र्स्फूहत प्रयास की उनकी जरूरत पूरी कर देंगे।

विद्वान लेखक आरम्भ में अपना विश्वास व्यक्त करते हैं कि अपनी तमाम कमियों के उपरान्त भी हिन्दी सफलता के पथ पर अग्रसर है और बाबू हरिश्चन्द्र के जमाने से ही उन्नति करती आ रही है। क्या मेरे मित्र उनके काल के बाद प्रकाशित ऐसी आधी दर्जन पुस्तकों का भी नाम गिनाएँगे जिन्हें गम्भीर और मौलिक चिन्तन का परिणाम कहा जा सके? यदि वे यह मानते हैं कि किसी एक देश के संस्कार, रीति-रिवाज और प्रवृत्तियाँ हर जगह लागू नहीं होतीं और एक विशेष सामाजिक चरित्रकी प्रत्येक विशेषता दूसरे समाज की तस्वीर में यथातथ्यता के साथ प्रदर्शित नहीं होती हैं तो वे यह भी मानने को तैयार होंगे कि अनुवाद हमारी प्रत्येक आवश्यकता कीर् पूत्ति नहीं करते हैं।

दूसरे अनुच्छेद में उन्होंने जिन दलीलों के लिए मुझे उत्तरदायी ठहराया है, उनका मैं खंडन करता हूँ। वे पूर्णत: बेतुके हैं और मेरे द्वारा प्रयुक्त नहीं किए गए हैं। ऐसा कहा जा सकता है कि काबिल उस्ताद ने उन तथ्यों की अनदेखी कर दी है जिन्होंने मेरे दावे का आधार तैयार किया है। उन्होंने आरम्भिक टिप्पणियों को मेरे मुख्य तर्क के रूप में प्रस्तुत कर दिया है।

मेरे मित्र सम्पादकों का बचाव करने की चेष्टा करते हैं और उनमें महान योग्यता की खोज का स्वांग रचते हैं। सम्बन्धित अनुच्छेद को असावधानीपूर्वक पढ़ने के कारण ही वे यह अनुमान लगाते हैं कि सम्पादकों द्वारा श्री दत्ता के इतिहास के अनुवाद की उपेक्षा के चलते मैंने उन लोगों के प्रति नकारात्मक विचार बना लिए। मैंने तो अपने पत्र में केवल इसके अनुवादित होने के प्रति उनकी अनिच्छा की निन्दा की थी, न कि उस दृष्टिकोण की जिसके आधार पर वे उसमें मौजूद विचारों का मूल्यांकन करते। अब पुस्तक उनके सामने है और वे इसके प्रति अपनी पूर्वधारणाओं को और भी दृढ़ करने के लिए तथा इसके अवगुणों को उजागर करने के लिए पूर्णत: स्वतन्त्र हैं। मुझे इस सूचना के लिए कृतज्ञ होना ही पड़ेगा कि हिन्दी साप्ताहिक मात्र रूढ़िवादी समुदाय के प्रतिनिधि हैं और जनता के प्रति स्वतन्त्र रूप से उनका कोई कर्तव्य् नहीं है।
यहाँ अन्तर्निहित आशय यह है कि उनकी आवाज केवल रूढ़िवादियों की प्रतिध्वेनि के रूप में समझी जानी चाहिए। इस पर कोई चाहे तो कान दे या न दे। यदि इसे सच मान भी लिया जाए जो उन्हें इस धारणा के कारणों का पता लगाने का एक अवसर प्रदान कर रहे हैं कि पुस्तक निश्चित रूप से भ्रमित करने वाली है, उनकी राह में रोड़े अटकाना भी क्या उनके कर्तव्यग का अंग है? दूसरे शब्दों में, क्या यह बहाना भी उन्हें तर्क या सोच-विचार की परिधि से बाहर कर देगा?

काश, यह बचकानी भ्रान्त दलील किसी पाठशाला की कक्षा तक सीमित रही होती!

उनके सम्पादकों की योग्यता के विषय में मैं इससे अधिक कुछ और नहीं कर सकता कि उनके समक्ष 'बंगबासी'एक प्रमुख हिन्दी साप्ताहिक, जो छोटी कक्षा के बच्चों के लिए हँसी-मजाक के विषय प्रस्तुत करता है में प्रकाशित अपने पत्र का अनुवाद रख दूँ (या देखें 'मोहिनी', जिसमें अनुवाद की कमियों को इंगित किया गया है)। यह 'भारतमित्र' की इन निराधार गर्वोक्तियों के जवाब के रूप में भी काम करेगा कि हिन्दी सम्पादक ऐसी किसी चीज में कभी हाथ नहीं लगाते, जिसमें वे पूर्णत: कुशल न हों और यह कि इन 'पत्रों के संचालन में कम-से-कम आधो दर्जन स्नातकों का हाथ है।'

चौथे अनुच्छेद में मेरे विद्वान मित्र रचनाकार का आभार व्यक्त किए बिना और लेखकों की अनुमति प्राप्त किए बिना ही पुस्तकों का अनुवाद कर देने के आचरण को प्रोत्साहित करते जान पड़ते हैं। आशा है कि विद्वान मित्र मुझे यह कहते हुए इन अनुवादों के महत्तव को कम करके ऑंकने की अनुमति देंगे कि शिक्षितों की दृष्टि में इस तरह का व्यवसाय हिन्दी लेखकों को किसी न किसी रूप में निकृष्ट बना देगा और इस क्षेत्र में नए लेखकों को आकर्षित नहीं कर पाएगा। विचित्र बात यह है कि दो महीने तक मेरे पत्रों का अध्य यन करने के बाद भी मेरे आलोचक मेरे मन्तव्य को समझ न सके। मेरे पत्र में कोई ऐसा कथन नहीं है जो 'अध्य यनशील और विद्वान' अन्तरस्नातकों को पुरावशेषों, भाषाशास्त्र आदि के अध्यनयन में जुटने से रोकता है। यह मेरी समझ से बाहर है कि व्याख्या की किस पद्धाति द्वारा मेरे मित्र ने मेरे मन्तव्यों को विवादित बना दिया है। एक ऐसे अनुच्छेद का अनुवाद करना, जिसमें यह सामान्य-सा तथ्य हो कि एक कमरा 15 फुट लम्बा और 10 फुट चौड़ा है, मेरे मित्र की राय में विद्वता की निशानी है। यदि यह ठीक है तो हर स्कूली छात्रा विद्वान है जिसको शिक्षक द्वारा सम्मान दिया जाना चाहिए। मेरे मित्र को यह जान लेना चाहिए कि मौलिक लेखकों को मिलने वाले श्रेय में तथ्यों के अनुवादकों का जरा भी हिस्सा नहीं होता। मात्र दार्शनिक और मीमांसात्मक लेखन के अनुवादक ही, अपनी मानसिक शक्ति के प्रयोग के उचित प्रतिदानस्वरूप, मौलिक चिन्तकों की-सी श्रेष्ठता के थोड़े-बहुत हकदार हो सकते हैं।

अब मैं उनके अन्तिम अनुच्छेद पर आता हूँ। इसमें पहली बार मैं ऐसा दावा पाता हूँ कि हिन्दी की शैली की समस्या अभी तक बनी हुई है। इसका यह अर्थ हुआ कि जिस शैली में समाचार-पत्र, पत्रिकाएँ और अधिकांश पुस्तकें लिखी गई हैं वह किसी भी दूसरी शैली से बदली जा सकती है। इसमें एक तरह से यह भी अप्रत्यक्षत: निहित है कि या तो भारतेन्दु जैसा कोई व्यक्ति कभी हुआ ही नहीं या हिन्दी उस महान व्यक्ति की किसी भी प्रकार से ऋणी नहीं है। हिन्दी गद्य शैली के जन्मदाता के प्रति विद्रोह का मुझे कोई आधार नहीं दिखता। दूसरी जिस बात ने मेरे विद्वान मित्र को अत्यधिक उत्ते जित कर दिया वह है शैलियों की विविधता से सम्बन्धित मेरे कथन के उदाहरण के रूप में मेरे द्वारा 'अधाखिला फूल' की चर्चा। वे मुझे यह प्रदर्शित करके सिद्ध करने की चुनौती देते हैं कि उस पुस्तक की भाषा में कोई जटिल विचार अभिव्यक्त नहीं हो सकते। इसके जवाब में, मैं भी उन्हें इसी तरह की शैली में उनके अपने पत्र का अनुवाद प्रस्तुत करने और मुझे मेरी भूल स्वीकार करा देने की चुनौती देता हूँ।

समर्पण की शैली के विषय में मेरा यह कहना है कि इस तरह की शैली को असभ्य न कहना नितान्त असभ्यता है। मेरे मित्र को यह ज्ञात हो कि संस्कृत भाषियों की स्मृतियों को पलटने के मेरे पास उनसे कहीं अधिक कारण हैं, पर मैं इस मान्यता को स्वीकार नहीं करूँगा कि लगभग पूरा वाक्य संस्कृत में कह लेने के बाद वे अन्त में तमिल या तेलुगू क्रिया का प्रयोग करें। किसी लैटिन वाक्य में अंग्रेजी या फ्रेंच का विधोय घुसेड़ना कितना हास्यास्पद होगा।

(दि इंडियन पीपुल, 28 सितम्बर, 1905)
अनुवादकअलोक कुमार सिंह

 

अपनी भाषा पर विचार 

भाषा का प्रयोग मन में आई हुई भावनाओं को प्रदर्शित करने के लिए होता है।

इससे यह समझना कि संसार की किसी भाषा द्वारा मनुष्य के हृदय के भीतर की सब भावनाएँ ज्यों की त्यों बाहरी सृष्टि में लाई जा सकती हैं सो ठीक नहीं। किन्तु किसी भाषा की श्रेष्ठता निश्चित करने के लिए यह विचार करना आवश्यक होता है कि वह अपने इस कार्य में कहाँ तक समर्थ है अर्थात् हृदयस्थित भावनाओं का कितना अंश वह प्रतिबिम्बित करके झलका सकती है। अभी तक मानव कल्पना में ऐसे ऐसे रहस्य छिपे पड़े हैं जिनको प्रकाशित करने के लिए कोई भाषा ही नहीं बनी है। स्मरण रखिए कि यह बात मैंने भावनाओं (Impressions) के विषय में कही है, विचारों (General notions) के विषय में नहीं।

भाषा की व्यंजक शक्ति दो वस्तुओं पर अवलम्बित है'शब्द विस्तार' और 'शब्द योजना'।

शब्द विस्तार

जिस भाषा में शब्दों की कमी है उसका प्रभाव मनुष्य के कार्य कलाप पर बहुत थोड़ाहै। उस भाषा का बोलनेवाला बहुत सी बातों को जानता हुआ भी अनजान बना रहता है। यद्यपि शब्दों की बहुतायत से भाषा की पुष्टि होती है तथापि कई बातें ऐसी हैं जो उसकी सीमा स्थिर करती हैं। जिस जलवायु ने हमारे स्वभाव और रूपरंग को रचा उसी ने हमारे शब्दों को भी सृजा। ये शब्द हमारे जीवन के अंश समान हैं; इनमें से हर एक हमारी किसी न किसी मानसिक अवस्था का चित्र है। इनकी ध्वमनि में भी हमारे लिए एक आकर्षण विशेष है। निज भाषा के किसी शब्द से जिस मात्र का भाव उद्भूतहोता है उस मात्र का समान अर्थवाची किसी विदेशीय शब्द से नहीं। क्योंकि पहिले तो विजातीय शब्दों की ध्वंनि ही हमारी स्वाभाविक रुचि से मेल नहीं खाती, दूसरे वेविस्तार में हमारे मानसिक संस्कार के नाप के नहीं होते। आजकल हिन्दी की अवस्था कुछ विलक्षण हो रही है। उचित पथ के सिवाय उसके लिए तीन और मार्ग खोले गए हैं एक, जिसमें बिना किसी विचार के संस्कृत के शब्द और समास बिछाए जाते हैं; दूसरा, जिसको उर्दू कहना चाहिए; इनके अतिरिक्त एक 'तृतीय पथ' भी खुल रहा है जिसमें अप्रचलित अरबी, फारसी और संस्कृत शब्द एक पंक्ति में बैठाए जाते हैं। मैं यह नहीं चाहता कि अरबी और फारसी आदि विदेशीय भाषाओं के शब्द जो हमारी बोली में आ गए हैं, जिन्हें बिना बोले हम नहीं रह सकते, वे निकाल दिए जायँ। किन्तु क्लिष्टऔर अप्रचलित विदेशीय शब्दों को व्यर्थ लाकर भाषा के सिर ऋण मढ़ना ठीक नहीं। सहायता के लिए किसी अन्य विदेशीय भाषा के शब्दों को लाना हानिकारक नहीं; किन्तु उनकी संख्या इतनी न हो कि स्थानीय भाषा के आधीन रहकर काम करने के स्थान पर,वे उसी को अधिकारच्युत करने का यत्न करने लगें। अब यहाँ पर प्रश्न हो सकताहै कि अरबी वा फारसी के कौन शब्द हिन्दी में लिए जायँ और कौन न लिए जायँ। मेरी समझ में तो हिन्दी में वे ही अरबी फारसी शब्द लिए जा सकते हैं जिनको वेलोग भी बोलते हैं जिन्होंने उर्दू कभी नहीं पढ़ी है, जैसे ज़रूर, मुक़दमा, मज़दूर। जो शब्द लोग मौलवी साहब से सीखकर बोलते हैं उनका दूर होना ही हिन्दी के लिए अच्छा है।

राजा शिवप्रसाद मुसलमानी हिन्दी का स्वप्न ही देखते रहे कि भारतेन्दु ने स्वच्छ आर्य हिन्दी की शुभ्र छटा दिखाकर लोगों को चमत्कृत कर दिया। लोग चकपका उठे, यह बात उन्हें प्रत्यक्ष देख पड़ी कि यदि हमारे प्राचीन धर्म, गौरव और विचारों की रक्षा होगी तो इसी भाषा के द्वारा। स्वार्थी लोग समय समय पर चक्र चलाते ही रहे किन्तु भारतेन्दु की स्वच्छ चंद्रिका में जो एक बेर अपने गौरव की झलक लोगों ने देख पाई वह उनके चित्त से न हटी। कहने की आवश्यकता नहीं कि भाषा ही जाति के धार्मिक और जातीय विचारों की रक्षिणी है; वही उसके पूर्व गौरव का स्मरण कराती हुई, हीन से हीन दशा में भी, उसमें आत्माभिमान का स्रोत बहाती है। किसी जाति को अशक्त करने का सबसे सहज उपाय उसकी भाषा को नष्ट करना है। हमारी नस नस से स्वदेश और स्वजाति का अभिमान कैसे निकल गया; हमारे हृदय से आर्य भावनाओं का कैसे लोप हो गया? क्या यह भी बतलाना पड़ेगा? इधर सैकड़ों वर्ष से हम अपने पूर्व संचित संस्कारों को जलांजलि दे रहे थे। भारतवर्ष की भुवनमोहिनी छटा से मुँह मोड़कर शीराज और इस्फहान की ओर लौ लगाए थे: गंगा जमुना के शीतल शान्तिदायक तट को छोड़कर इफ़रात और दजला के रेतीले मैदानों के लिए लालायित हो रहे थे; हाथ में अलिफलैला की किताब पड़ी रहती थी, एक झपकी ले लेते थे तो अलीबाबा के अस्तबल में जा पहुँचते थे। हातिम की सख़ावत के सामने कर्ण का दान और युधिष्ठिर का सत्यवाद भूल गया था; शीरीं फरहाद के इश्क ने नलदमयन्ती के सात्विक और स्वाभाविक प्रेम की चर्चा बन्द कर दी थी। मालती, मल्लिका केतकी आदि फूलों का नाम लेते या तो हमारी जीभ लटपटाती थी या हमको शर्म मालूम होती थी। वसन्त ऋतु का आगमन भारत में होता था, आमों की मंजरी से चारों दिशाएँ आच्छादित होती थीं पर हमको कुछ खबर नहीं रहती थी, हम उन दिनों गुले लाला और गुले नरगिस के फिष्राकष् में रहते थे; मधुकर गूँजते और कोइलें कूकती थीं, पर हम तनिक भी न चौंकते थे, अड्डे पर कान लगाए हम बुलबुल का नाला सुनते थे। 

यहाँ पर एक बात हम स्पष्ट रूप से कह देना चाहते हैं। हम हिन्दू हैं, हिन्दुस्तान हमारा देश है, हिन्दी हमारी भाषा है। इस भाषा में अवश्यमेव हिन्दुओं के आचार विचार का आभास रहेगा, इसमें अवश्य उनके प्राचीन गौरव की गंध रहेगी क़ुढ़ने वाले भले ही कुढ़ें। वह सहायता के लिए भरसक संस्कृत ही का मुँह देखेगी। मुट्ठी भर मुसलमानों के लिए हम कदापि अपनी भाषा को लांछित न करेंगे। यदि मुसलमान लोग उसे नहीं समझना चाहते तो न समझें, हमारी कोई हानि नहीं। मुसलमान लोगतो तनिक भी शीन कषफ़ के बाहर न हों और हम भौंदू बने उनके पास खसकते जायँ ऐसी कौन सी आफ़त आई है। यह भी कोई राजनीतिक युक्ति नहीं है कि एक तरफ तो मुसलमान लोग ऐंठे जा रहे हैं, दूसरी तरफ हमारे माननीय लोग अपनी भधुर वक्तृताओं में उन्हें लपेटते जा रहे हैं। यदि कहिए की इस प्रान्त के अधिकांश शिक्षित लोगों की एक भाषा बन गई है उसी को चटपट ग्रहण कर लेने से समय की बचत होगी तो भी ठीक नहीं, क्योंकि वह भाषा एक अस्वाभाविक शिक्षा से बनी है और उसी शिक्षा ही के साथ हवा हो सकती है। यदि आज से हमारे बच्चों के हाथ में खालकबारी के स्थान पर अमरकोशदे दिया जाय और ऍंगरेजी के साथ उन्हें संस्कृत या हिन्दी का अभ्यास कराया जाय तो यही हिन्दी बीस वर्ष के भीतर ही गली गली सुनाई देने लगे। क्या बंगला देश में मुसलमान नहीं हैं? क्या संस्कृत मिश्रित बंगला भाषा के लिए वहाँ राह नहीं निकल गई? क्या छोटे छोटे बंगालियों के बालक उन संस्कृत शब्दों को भधुरता से उच्चारण करते नहीं पाए जाते जिनको सुनकर हमारे मुंशी लोग इतना चौंकते हैं? जबकि देश में राष्ट्रीयता की इतनी चर्चा फैल रही है, जब नागरी को राष्ट्रलिपि और हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने का उद्योग बंगाल और महाराष्ट्र प्रदेशों में भी हो रहा है, उस समय हिन्दी को इन प्रदेशों की भाषाओं से दूर हटना ठीक नहीं वरन् उसको अपने उस अंश की कुछ वृद्धि करनी चाहिए जो उन सब भाषाओं में सम्मिलित (Common) है। यह सम्मिलित अंश संस्कृत शब्दों का समूहहै। 

जब एक बार राजा शिवप्रसाद की मुसलमानी हिन्दी को दबाकर भारतेन्दु की हिन्दी अग्रसर हुई और आज तक बराबर निर्विवाद रूप से स्वीकृत होती आई तब इस फ़ारसीदार हिन्दी की चर्चा फिर कैसे आरम्भ हो गई इसका विचार करना है। इसका दूसरा उत्थान फिर काशी के तिलस्मी उपन्यासों में देख पड़ा जिनकी रचना उर्दूदाँ 'क ख' पहिचानने वालों को भी फँसाने में समर्थ हुई। एक को लाभ उठाते देख दूसरे ने भी उसी मार्ग पर पैर रक्खा वही ऐय्यारी, वही तिलस्म, वही भाषा, वही सब कुछ। कई लोग साहसपूर्वक आगे बढे और उर्दू नावेलों को सामने रख और उन्हें नागरी अक्षरों में उतारकर नाम और दाम कमाने लगे। किन्तु तब तक यह हवा और श्रेणी के लेखकों को नहीं लगी थी। सहसा प्रयाग की सरस्वती के मालिकों का ध्या न सरलता की ओर जा पड़ा; ग्राहक बढ़ाने के हेतु प्रत्रिका को सरल और कौतूहल प्रदायिनी बनाने की चेष्टा होने लगी। इस सरलताका जाज्वल्यमान उदाहरण पहिले पहल 1904 ई. में 'नास्तिक आस्तिक संवाद' प्रकाशित हुआ। इसमें मजाज़, तकष्रीर, दक़ीक़ा, महदूद, ऐब-जोई, हकीर और कोताह बुद्धिक्वआदि शब्दों द्वारा भाषा एकबारगी सरल कर दी गई। उसी में ये वाक्य देख पड़े''ज़िस समय ईश्वर, जिसकी हस्ती की बाबत आपको शंका है, आपकी ज्ञान लब दुर्विदग्धाता को खो देगा...''

कहिए यह भाषा को सरल करना है या उसको और भी कठिन बनाना है। ऐसी भाषा लिखने के पहिले 'करीमुल्लुग़ात' का एक नागरी संस्करण छापना चाहिए। जो लोग केवल हिन्दी वा संस्कृत ही जानते हैं वे इस 'हस्ती' को 'हाथी' समझें या और कुछ। 

यह पत्रिका सरलता के इतना पीछे पड़ी है कि कभी कभी साधारण प्रचलित शब्द भी बिना अरबी टीका के नहीं जाने पाते, देखिए

''यदि वह बात वा राय सर्वथा सच नहीं है, केवल उसका कुछ ही अंश सच है तो भी यदि वह प्रगट न की जायगी ज़ाहिर न की जायेगी।''

''तथापि वे कृतकार्य नहीं हुए उनको कामयाबी नहीं हुई।'' ''यह बात विधि विरुद्ध है ज़ाब्ते के ख़िलाफ़ है।'' जो मनुष्य 'सर्वथा' और 'अंश' को समझ सकता था क्या वह 'प्रगट' को न समझता जो फिर से 'ज़ाहिर' लिखने की जरूरत हुई? इस प्रकार की भाषा लिखना मानो उर्दू वालों को यह कहने का अवसर देना है कि उर्दू इतनी आमफ़हम है कि बिना उसकी सहायता के हिन्दी किसी को एक बात भी नहीं समझा सकती। मेरी जान में तो फ़ौक़ियत, जुहला, मजामीन, मुहक्क़िक़ीन, तमस्खुर आदि शब्द साधारण हिन्दी जाननेवाले लोग नहीं समझ सकते। 

गवर्नमेंट तथा शिक्षा विभाग की अर्भिरुचि का कुछ अंश भी इस प्रवृत्ति का परिचालक है। सरकार कोई निज की स्वतन्त्र सम्मति तो रखती नहीं; जो हाकिमों और नवाबों ने सुझाया वही उसका अटल सिद्धान्त हो गया, उसी पर वह जम गई। यदि कोई और प्रान्त होता तो सरकार को अपनी इस कुरुचि का फल चखाने में क्व आश्चर्य की बात है कि एक महीने पहिले द्विवेदीजी ने नागरीप्रचारिणी सभा द्वारा प्रकाशित 'भौगोलिक परिभाषा' के 'थाह मापक' सूत्र की आलोचना इस प्रकार की थी'''थाह' प्राकृत और 'मापक' संस्कृत! इस तरह का समास, हमने सुना था, नहीं होता।' हम नहीं समझते कि फिर 'कोताह' फ़ारसी और 'बुद्धि' संस्कृत का समास कैसे हो गया।

कुछ देर लगती पर यह सर सैयद अहमद और राजा शिवप्रसाद की जन्मभूमि कब उसको मीठा कहकर बाँटनेवाले लोगों से खाली रह सकती है। 

ऐसे अप्रचलित फ़ारसी शब्दों के बिना हमारा कोई काम नहीं अटकता; क्योंकि उनके स्थान पर रखने के लिए हमें न जाने कितने संस्कृत क्या हिन्दी ही शब्द मिल सकते हैं। हाँ, जिन विचारों के लिए हिन्दी वा संस्कृत शब्द न मिलें उनको प्रगट करने के लिए हम विजातीय शब्द लाकर अपनी भाषा की वृद्धि मान सकते हैं। एक ही वस्तु के लिए अनेक शब्दों के होने से भाषा की क्रिया में कुछ उन्नति नहीं होती। जैसे सूर्य के लिए रवि, र्मात्ताण्ड, प्रभाकर, दिवाकर और चन्द्रमा के लिए शशि, इन्दु, विधा, मयंक आदि बहुत से शब्दों के होने से भाषा की व्यंजक शक्ति में कुछ भी वृद्धि नहीं होती, केवल ध्वानि की भिन्नता वा नवीनता से हमारा मनोरंजन होता है और भाषा में एक प्रकार का चमत्कार आ जाता है जो कविता के लिए आवश्यक है। इन अनेक नामों में से साधारण गद्य में उसी शब्द को स्थान देना चाहिए जो सबसे अधिक प्रचलित है, जैसेसूर्य, चन्द्रमा। 'रवि उदय होता है', 'भास्कर अस्त होता है', 'विधु का प्रकाश फैलता है', ऐसे ऐसे वाक्य कानों को खटकते हैं और कृत्रिम जान पड़ते हैं। हाँ, जहाँ 'प्रचण्ड मार्तण्ड की उद्दण्डता', दिखाना हो वहाँ की बात दूसरी है पर मैं तो वहाँ भी ऐसे शब्दों की उतनी अधिक आवश्यकता नहीं समझता। शब्दालंकार केवल कविता के लिए प्रयोजनीय कहा जा सकता है। गद्य में उसकी कोई विशेष आवश्यकता नहीं है, गद्य में तो उसके और और गुणों के अन्वेषण ही से छुट्टी नहीं मिलती। गद्य की श्रेष्ठता तो भावों की गुरुता और उनके प्रदर्शन प्रणाली की स्पष्टता वा स्वच्छता ही पर अवलम्बित है; और यह स्पष्टता और स्वच्छता अधिकतर व्याकरण की पाबन्दी और तर्कना की उपयुक्तता से सम्बन्ध रखती है। सारांश यह कि आधुनिक शैली के अनुसार गद्य में शब्द और अर्थ ही का विचार होता है, ध्वानि¹ का नहीं।

शब्द योजना 

यहाँ तक तो शब्द विस्तार की बात हुई। आगे भाषा के इससे भी गुरुतर और प्रयोजनीय अंश अर्थात् शब्द योजना पर ध्या न देना है। भाषा उत्पन्न करने के लिए असंख्य शब्दों का होना ही बस नहीं है। क्योंकि पृथक् पृथक् वे कुछ भी नहीं कर सकते। वे कल्पना में इन्द्रिय कम्प द्वारा खचित एक एक स्वरूप के लिए भिन्न भिन्न संकेत मात्र हैं। कोई ऐसा पूरा विचार (Complete notion) उत्पन्न करने के लिए जो मनुष्य की प्रकृति पर कोई प्रभाव डाले अर्थात् उसकी भौतिक वा मानसिक स्थिति में कुछ फेरफार उत्पन्न करे, हमें शब्दों को एक साथ संयोजित करना पड़ता है। 

क्व यहाँ ध्वलनि से मेरा अभिप्राय 'यत्रा वाच्याविशयि व्यंग्य स ध्वेनि:' नहीं वरन् नाद से है। 

जैसे कोई मनुष्य सड़क पर चला जाता है, यदि हम पीछे से उसको सुनाकर कहें कि 'मकान', तो वह मनुष्य कुछ भी ध्याहन न देगा और चला जायगा; किन्तु यदि पुकारें कि 'मकान गिरता है' तो वह अवश्य चौंक पड़ेगा और भागने का उद्योग करेगा। शब्द योजना का प्रभाव देखिए! प्रत्येक मनुष्य का धर्म है कि वह इस कार्य में बड़ी सावधानी रक्खे। बहुत से शब्दों को जोड़ने ही से भाषा उत्पन्न नहीं होगी, उसमें उपयुक्त क्रम, चुनाव और परिमाण का विचार रखना होता है। निश्चय जानिए कि शब्दों के मेल में बड़ी शक्ति है। एक भावुक मनुष्य थोड़े से शब्दों को लेकर भी वह वह चमत्कार दिखला सकता है जो एक स्तब्ध चित्त का मनुष्य चार भाषाओं का कोश लेकर भी नहीं सूझा सकता। कुछ दिन पहिले हमारी हिन्दी की स्थिति ऐसी हो गई थी कि उसका विचार क्षेत्र में अग्रसर होना कठिन देख पड़ता था। बने बनाए समास, जिनका व्यवहार हजारों वर्ष पहिले हो चुका था, लाकर भाषा अलंकृत की जाती थी। किसी परिचित वस्तु के लिए जो जो विशेषण बहुत काल से स्थिर थे, उनके अतिरिक्त कोई अपनी ओर से लाना मानो भारतभूमि के बाहर पैर बढ़ाना था। यहाँ तक कि उपमाएँ भी स्थिर थीं मुख के लिए चन्द्रमा, हाथ पैर के लिए कमल, प्रताप के लिए सूर्य, कहाँ तक गिनावैं। जहाँ इनसे आगे कोई बढ़ा कि वह साहित्य में अनभिज्ञ ठहराया गया अर्थात् इन सब नियत उपमाओं का जानना भी आवश्यक समझा जाता था। पाठक! यह भाषा की स्तब्धता है, विचारों की शिथिलता है और जाति की मानसिक अवनति का चिह्न है। अब भी यदि हमारे कोरे संस्कृतज्ञ पंडितों से कोई बात छेड़ी जाती है तो वे चट कोई न कोई श्लोक उपस्थित कर देते हैं और उसी के शब्दों के भीतर चक्कर खाया करते हैं, हजशर सिर पटकिए वे उसके आगे एक पग भी नहीं बढ़ते। यदि कोई जाल वा धोखे से किसी की सम्पत्ति हर ले तो पंडितजी कदाचित् उसके सम्मुख उसके कार्य की आलोचना इसी चरण से करेंगे'स्वकार्यं साधायेध्दीमान्'। उनकी विचार शक्ति इन श्लोकों से चारों ओर जकड़ी हुई है, उसको अपना हाथ पैर हिलाने की स्वच्छन्दता कभी नहीं मिलती। ऐसी दशा में उन्नति के मार्ग में एक पग भी आगे बढ़ना कठिन होता है। 

इसी प्रकार अनुप्रास से टँकी हुई शब्दों की लम्बी लम्बी लरी इस बात को सूचित करती है कि लेखक का ध्या न विचारों की अपेक्षा शब्दों की ध्वानि की ओर अधिक है। आरम्भ ही में कहा गया कि भाषा का प्रधान उद्देश्य लोगों को भावों व विचारों तक पहुँचाना है न कि नाद से रिझाना जो कि संगीत का धर्म है। शब्दमैत्री वा यमक दिखलाने के उद्देश्य से ही लेखनी उठाना ठीक नहीं; यदि आपकी कल्पना में सद्गुण की कोई मनोहारिणी छाया देख पड़ी हो तो आप उसे खींचकर संसार के सन्मुख उपस्थित कीजिए, यदि आपके हृदय में विचारों के रगड़ से कोई ऐसी ज्योति उत्पन्न हुई हो जिसके प्रकाश में जीव अपना भला बुरा देख सकते हों, तो आप उसे बाहर लाइए; अन्यथा व्यर्थ कष्ट न उठाइए। हम देखते हैं कि इसी रुचि वैलक्षण्य के कारण हमारे हिन्दी काव्य का अधिक भाग हमारे काम का न रहा। वहाँ विचित्र ही लीला देखने में आती है। घनाक्षरी, कवित्ता और सवैया के 'कविन्दों' ने कुछ शब्दों का अंग भंग कर दो? एक ('सु' ऐसे) अक्षरों की अगाड़ी पिछाड़ी लगाकर बलात् और निष्प्रयोजन उन्हें एक में नाथ रखा है। वर्णन शक्ति की शिथिलता के कारण रसों (Sentiments) के उद्रेक के लिए अत्यन्त अधिकता से ध्वकनि का सहारा लिया गया है। ऋंगार रस की कविता में 'सरस' 'मंजु' 'मंजुल' आदि शब्दों के हेतु कुछ स्थान खाली करना पड़ा है''मंजुल म्रूलद गुंजै मंजरीनमंजु मंजु मुदित मुरैली अलबेली डोलैं पात पात।'' कविजी ने न जाने किस लोक में मुरैलियों को पत्तों् पर दौड़ते देखा है। इसी प्रकार जहाँ वीररस की चर्चा है वहाँ द्वित्व और वर्ग का विस्तार है, जैसे''ड़रि डरि ढरि गये अडर डराय ढह ढरढर ढर के धाराधार के धारके'' किन्तु इस 'खडड बडड' के बिना भी वीर रस का संचार किया जा सकता है, इस बात के उदाहरण शेखर कवि का 'हम्मीर हठ', भारतेन्दु की 'विजयिनीविजयवैजयन्ती' और 'नीलदेवी' विद्यमान हैं। आज सैकड़ा पीछे कितने आदमी मतिराम, भूषण और श्रीपति सुजान के कविताओं को अनुराग से पढ़ते तथा उनके द्वारा किसी आवेग में होते हैं? पर वहीं सूर, तुलसी, केशव, रहीम और बिहारी आदि की कविता हमारे जातीय जीवन के साथ हो गई है। उनकी एक एक बात हमारे किसी काम में अग्रसर होने वा न होने का कारण होती है। इस भेदभाव का कारण क्या है? वही एक में शब्दों का व्यर्थ आडम्बर और दूसरी में भावों की स्वच्छता तथा वर्णन की उपयुक्तता। वे 'चटकीले मटकीले' शब्द लाख करने पर भी हमारे हृदय पर अधिकार न जमा सके; निकलकर हवा में मिल जाना ही उनके कार्य का शेष होता है। क्योंकि सृष्टि के नियमानुसार स्वर्गीय पदार्थ ही एक दूसरे में लीन होने को झुकते हैं; जल ही जल की ओर जाता है, इसी प्रकार चित्त की उपज ही चित्त में धंसती है। 

प्रत्येक साहित्य के अर्थालंकार में, प्रत्यक्ष वा अप्रत्यक्ष, उपमा का प्रयोग बहुत अधिक होता है क्योंकि भौतिक पदार्थों के व्यापार, विस्तार, रूप रंग तथा मानसिक अवस्थाओं की स्थिति, क्रम, विभेद आदि का सम्यक् ज्ञान उत्पन्न करने के लिए बिना उसके काम नहीं चल सकता। इसका प्रयोग जान व अनजान में हम हर घड़ी किया करते हैं; छोटे छोटे विचारों को व्यक्त करने में भी हम बिना उसका सहारा लिए नहीं रह सकते हैं, यहाँ तक कि हमारे सब अगोचर पदार्थवाची शब्द आरम्भ में इसी (उपमा) की क्रिया से बने हैं; यह भाषा की बनावट के इतिहास से प्रमाणित है। जब शब्दों का यह हाल है तब फिर इस प्रकार की अपार्थिव भावनाओं का क्या कहना है। उनका अनुभव तो हम पार्थिव पदार्थों ही के गुण और व्यापार के अनुसार करते हैं। अर्थात् भौतिक वस्तुओं के गुण और धर्म को अपार्थिव वस्तुओं में स्थापित करके ही हम आध्यातत्मिक विषयों की मीमांसा करते हैं। साधारण दृष्टान्त लीजिए''दया ने प्रतीकार की इच्छा को दबा दिया।'' ''उसके प्रेम से परिपूर्ण हृदय में प्रिय के दुर्गुणों के विचार की जगह न रही।'' पहिले में भौतिक पदार्थों के गुरुत्व और अपने से हलके पदार्थों को दबाकर उभड़ने से रोकने की क्रिया का आभास है; इसी प्रकार दूसरे में पदार्थों के स्थान छेंकने का धर्म स्थापित किया गया है। बात यह है कि इन नियमों से पार्थिव और आध्याात्मिक दोनों सृष्टियाँ समान रूप से बद्धा हैं। 

उपमा का कार्य सादृश्य दिखलाकर भावना को तीव्र करना है। जिस वस्तु के लिए हम कोई शब्द नहीं जानते उसका बोध उपमा ही द्वारा कराते हैं, जैसे जो मनुष्य हारमोनियम का नाम नहीं जानता वह उसकी चर्चा करते समय यही कहेगा कि वह संदूक के समान एक बाजा है। यदि किसी वस्तु का विस्तार इतना बड़ा है कि हम उसे निर्दिष्ट शब्दों में नहीं बतला सकते तो हम चट उतने ही वा उससे बहुत अधिक विस्तृत अन्य पदार्थ की ओर इंगित करते हैं, जैसे''हरियाली चारों ओर समुद्र के समान लहराती देख पड़ी।'' ''ज्वालामुखी से भाप और राख उठकर बादल के समान आकाश में छा गई।'' हम यह न देखने जायँगे कि समुद्र का विस्तार हरियाली के फैलाव से नाप में न जाने कितना वर्गमील बड़ा है; इसकी हमें कोई आवश्यकता नहीं, यह बात निरीक्षण के समय हमारी दृष्टि की पहुँच के बाहर की है। अतएव जब तक हम विवेचना शक्ति का सहारा न लें, वह हमारी प्राप्त भावनाओं में अन्तर नहीं डाल सकती। निरीक्षण के समय हमारी दृष्टि की पहुँच के भीतर इन दोनों (हरियाली और समुद्र) का अन्त नहीं होता यही इनमें समानता है। यदि किसी महाविशाल पिंड के आकार का परिज्ञान कराना रहता है तो उसकी तुलना हम समान आकार वाले किसी छोटे पदार्थ से करते हैं; तदनन्तर उस छोटे पिंड में उस आकार के गुण धर्म को दिखलाकर हम उनकी स्थापना बड़े पिंड में करते हैं, जैसेस्क़ूलों में लड़कों से कहा जाता है कि ''लड़को! पृथ्वी नारंगी के समान गोल है''; क्योंकि ऐसी उपमा से हमारा कुछ काम नहीं निकलता। पदार्थों के व्यापार, गुण और स्थिति को स्पष्ट करके उनका तीव्र अनुभव कराना उपमा का काम है, और कुछ नहीं। अतएव एक ही वस्तु के लिए पचीसों उपमाओं का तार बाँध देना, उपमा कथन के हेतु ही किसी वस्तु को वर्णन करने बैठ जाना और उससे किसी अंश में समानता रखनेवाले पदार्थों की सूची तैयार करना उचित नहीं है। जैसे प्रभातकालीन सूर्यमंडल को देख यही बकने लगना कि ''यह थाली के समान है'' अथवा ''शोणित सागर में बहता हुआ स्वर्ण कलश है'' वा ''स्वर्गलोक की झलक दिखलाने वाली गोल खिड़की है'' किंवा ''होली की महफिल में रखे हुए लैम्प का ग्लोब है'' यह वाणी का सदुपयोग नहीं कहा जा सकता। मेरा अभिप्राय यह है कि उपमा का प्रयोग आवश्यकतानुसार ही होता है; उसका अनावश्यक और अपरिमित प्रयोग प्रलाप है। अकेले वा पृथक् रूप में वह इस योग्य नहीं कि उसे भरने के लिए हम एक प्रबन्ध वा पुस्तक लिख डालें। यही बात सब अलंकारों के लिए कही जा सकती है। किसी वस्तु को उसकी सीमा के बाहर घसीटना उसको उसके गुण से च्युत करना है। यह बात हमारी हिन्दी कविता में प्रत्यक्ष देखने में आती है। किसी नीतिज्ञ ने अन्योक्तियों ही का कल्पवृक्ष लगाया है; किसी नायिका भेद के भक्त ने अकेली नवोढ़ा ही का आदर्श दिखलाया है; किसी नखसिख निहारने वाले ने 'अलक' और 'तिल' ही पर शतक बाँध है। आप ही कहिए कि इतने संकुचित स्थान में भीतरी और बाहरी सृष्टि के कितने अंश का व्यापार दिखलाया जा सकता है और पाठक का ध्यान बिना ऊबे हुए कब तक उसमें बद्धा रह सकता है।

धर्म वा व्यापार के पूर्णतया प्रत्यक्ष न होने के कारण जब किसी वस्तु की भावना धुधँली वा मंद होती है तब उसको तीक्ष्ण और चटक करने के लिए समान धर्म और गुणवाले अन्य अधिक परिचित पदार्थों को हम आगे रखते हैं। किन्तु काव्य की उपमा में एक और बात का विचार भी रखना होता है। वह यह है कि सादृश्य दिखलाने के लिए जो पदार्थ उपस्थित किए जायँ वे प्राकृतिक और मनोहर हों, कृत्रिम और क्षुद्र नहीं, जिसमें ज्ञानदान के अर्थ जो रूप उपस्थित किए जायँ वे रुचिकर होने के कारण कल्पना में कुछ देर टिकें और हमारे मनोवेगों (sentiments) को उभाड़ें जो हमें चंचल करके कार्य में प्रवृत्त करते हैं। उपमान और उपमेय में जितनी ही अधिक बातों में समानता होगी उतनी ही उपमा उत्कृष्ट कही जायगी। 

(आनन्द कादम्बिनी, ज्येष्ठ से अग्रहायण सं. 1964 वि. 1907 ई.)
[ चिन्तामणि, भाग-3 ]


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