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रचनावली

अज्ञेय रचनावली
खंड : 5
अपने-अपने अजनबी

अज्ञेय
संपादन - कृष्णदत्त पालीवाल


दुकान में काफी भीड़ थी। कई दिन वह बन्द रही थी, आज भी खुली थी तो कोई भरोसा नहीं था कि कितनी देर तक खुली रहेगी। और इसका कौन ठिकाना था कि बन्द न भी हो तो थोड़ी देर में सब माल चुक न जाएगा? सब लोग सहमे-सहमे-से थे, आतंक के वातावरण में प्रकट रूप में कोई ठेलम-ठेल नहीं हो रही थी लेकिन यह भाँपना कठिन नहीं था कि सभी ग्राहकों के लिए उस दुकान में आना या सौदा खरीदने की कोशिश प्राणरक्षा की दौड़ की ही एक मंजिल थी। सभी जानते थे कि जो पिछड़ जाएगा वह मर जाएगा; आगे बढ़कर किसी तरह से खरीदा जा सके खरीद लेने में ही खैरियत है।

दुकान गली में थी। उस गली में जर्मनों का आना-जाना नहीं था, लेकिन शहर पर उनका अधिकार होने के बाद से जो आतंक था उसकी लपट से वह गली भी बची नहीं थी। उसी आतंक के कारण दुकान जब बन्द होती थी तब बन्द होती थी और जब खुलती थी तब खुलती थी। उसी के कारण चीजों के दाम भी बहुत अधिक नहीं बढ़ते थे - माल जब चुक जाता था तब चुक जाता था। पिछवाड़े कहीं कभी लुक-छिपकर चोर-बाजारी होती भी हो तो सामने उसका कोई लक्षण नहीं था। यों चोर-बाजारी जितनी चौड़े में होती है उतनी लुक-छिपकर नहीं होती यह सभी जानते हैं। गली में जोखिम ज्यादा ही होता है।

भीड़ बहुत थी, लेकिन प्रतियोगी भाव के अलावा भी भीड़ में सब अकेले थे। बुझे हुए बन्द चेहरे, मानो घर की खिड़कियाँ ही बन्द न कर ली गयी हों बल्कि परदे भी खींच दिए गये हों; दबी हुई भावनाहीन पर निर्मम आवाजें, मानो जो माँगती हों, उसे जंजीर से बाँध लेना चाहती हों। अजनबी चेहरे, अजनबी आवाजें, अजनबी मुद्राएँ, और वह अजनबीपन केवल एक-दूसरे को दूर रखकर उससे बचने का ही नहीं, बल्कि एक-दूसरे से सम्पर्क स्थापित करने की असमर्थता का भी है - जातियों और संस्कारों का अजनबीपन, जीवन के मूल्य का अजनबीपन।

काले, गोरे और भूरे चेहरे; काले, लाल, पीले, भूरे गेहुएँ, सुनहले ओर धौले बाल, रँगे-पुते और रूखे-खुड्ढे चेहरे। चुन्नटदार, इस्तरी किये हुए और सलवट पड़े कपड़े; चमकीले और कीच-सने, चरमराते या फटफटाते या घिसटते हुए जूते। और चेहरों में, आँखों में, कपड़ों में, सिर से पैर तक अंग की हर क्रिया में निर्मम जीवैषणा का भाव - मानो वह दुकान सौदे-सुलुफ या रसद की दुकान नहीं है बल्कि जीवन की दुकान है

जगन्नाथन् ने जैसे-तैसे कुछ सामान खरीद लिया था। एक बड़ा टुकड़ा पनीर का, कुछ मीठी टिकियाँ, थोड़ी सूखी रोटी। इन्हें अपने सामने रखे वह दीवार के साथ सजी हुई चीजों की ओर देख रहा था कि और क्या वह ले सकता है, कि एकाएक दुकान के पहले ही तने हुए वातावरण में एक नया तनाव आ गया। जगन्नाथन् ने भी मुड़कर उसी ओर देखा जिधर और कई लोग देखने लगे थे।

आगन्तुका के कपड़े कुछ अस्त-व्यस्त थे लेकिन ध्यान उनकी ओर नहीं जाता था, ध्यान जाता था उसके चेहरे और उसकी आँखों की ओर जो कि और भी अस्त-व्यस्त थीं - उसकी आँखों में मानो पतझर के मौसम की एक समूची वनखंडी बसी हुई थी। वह खुली-खुली आँखों से बिखरी हुई दृष्टि से चारों ओर देख रही थी। सभी को देखते हुए उसकी आँखें जगन्नाथन् तक पहुँची और उसे भी उसने सिर से पैर तक देख लिया। उस दृष्टि में कुछ था जिससे एक अशान्त, अस्वस्ति भाव जगन्नाथन् के भीतर उमड़ आया; लेकिन वह न उस दृष्टि को समझ सका न उसके प्रति होनेवाली अपनी प्रतिक्रिया को। यह अपने आप भी दुविधा का कारण होता, लेकिन इसके पीछे जगन्नाथन् ने अर्द्धचेतन मानस से यह भी पहचाना कि लोग आपस में कुछ कह रहे हैं और जो कह रहे हैं उसका विषय यह आगन्तुका ही है। जगन्नाथन् सुन भी रहा है, पर मानो सुने हुए की कोई छाप भी उसके नाम पर नहीं पड़ रही है, केवल वह आस्वस्ति भाव फैलकर उसकी सारी चेतना पर छाया जा रहा है।

एकाएक आगन्तुका ने अपने निचले होंठ से चिपका हुआ सिगरेट अलग किया और जगन्नाथन् के खरीदे हुए पनीर में उसे रगड़कर बुझा दिया, फिर अनमने भाव से सिगरेट को पनीर में ही खोंसकर उसने जगन्नाथन् की ओर देखा।

जगन्नाथन् दंग रह गया। फिर धीरे-से पनीर का टुकड़ा उठाते हुए उसने हारे स्वर से कहा, 'वह देखो तुमने क्या कर दिया है!'

आगन्तुका ने पनीर का टुकड़ा उसके हाथ से ले लिया और फिर उसे फर्श पर गिर जाने दिया। फिर वह एकाएक मुड़कर बाहर की ओर दौड़ी।

कुछ लोग हँस पड़े। पल-भर विमूढ़-सा रहकर जगन्नाथन् भी अपना सामान उठाकर उसके पीछे लपका। पीछे से किसी ने आवाज कसी, 'फाँस लिया!'

एक दूसरी आवाज आयी, उपहास से भरी हुई, 'वह भी तो बड़ा उतावला जान पड़ रहा है। दिन-दहाड़े पीछा कर रहा है।'

बाहर निकलते हुए जगन्नाथन् की चेतना ने इन आवाजों को भी ग्रहण किया। कुछ देर पहले सुनी हुई बातें भी उभरकर उसकी चेतना में आ गयी। उसने जान लिया कि आगन्तुका वेश्या है।

क्या वह लौट जाए? पनीर तो नष्ट हो चुका है। उस स्त्री ने जो किया उसका कारण जानकर भी अब क्या होगा? और वह उसका पीछा कर उसे पकड़ भी पाएगा तो क्या करेगा?

लेकिन वह अपने आप रुक गयी थी। वह बड़े जोर से हाँफ रही थी और उसके चेहरे पर यह ज्ञान स्पष्ट लिखा हुआ था कि जिस गली में वह घुस आयी है वह अन्धी गली है और अब वह बचकर नहीं भाग सकती -उसे अपना पीछा करनेवाले की ओर ही लौटना होगा। पास ही की सीढ़ी पर बैठ गयी और सिकुड़ गयी, जैसे मार खाने के लिए। जैसे कभी कुत्ता दुबककर बैठ जाता है, जब वह निश्चयपूर्वक जानता है कि बच नहीं सकेगा और उसे मार पड़ेगी ही।

जगन्नाथन् ने उसके पास पहुँचकर सधे हुए, मृदु स्वर में पूछा, 'वह तुमने क्या किया - क्या लाचारी थी?'

'मुझे क्या मालूम था कि पनीर है?' स्वर उद्धत था। 'मैं समझी कि यों ही रद्दी कुछ पड़ा होगा।'

इस बात का विश्वास करना कठिन था। फिर भी जगन्नाथन् ने कहा, 'लेकिन जब मैंने तुम्हें दिखाया तब तुम इतना तो कह सकती थीं कि - तुम्हें खेद है? वह मेरा अगले तीन दिन का खाना था। मैं - मैं कोई अमीर आदमी नहीं हूँ।'

स्त्री ने तीखी दृष्टि से उसकी ओर देखा। कुछ बदले हुए स्वर में बोली, 'जरूरी था।'

'क्या जरूरी था?' जगन्नाथन् को सन्देह हुआ कि कहीं यह स्त्री पागल तो नहीं है?

'जरूरी था। मुझे जाना है, मेरी पुकार हो गयी है।'

जगन्नाथन् और भी उलझन में पड़ गया। स्त्री कहती गयी, 'लेकिन तुम तो मेरा पीछा कर रहे थे। तुम तो मुझे मारना चाहते थे - मारते क्यों नहीं? लो, यह मैं हूँ - मारो!'

जगन्नाथन् ने लज्जित स्वर में कहा, 'नहीं, मैं नहीं चाहता था, मैं तो - मैं तो सिर्फ...'

'या कि - या कि तुम भी इसीलिए - वे लोग जो कह रहे थे क्या ठीक कह रहे थे?'

थोड़ी देर जगन्नाथन् प्रश्न नहीं समझा। फिर बाढ़ की तरह उसका अर्थ स्पष्ट हो गया। वह बोला, 'तुम ऐसा सोच भी कैसे सकती हो? मैं जीवन में कभी नहीं गया किसी...'

वह कहना चाहता था कि वह कभी वेश्या के पास नहीं गया। लेकिन 'वेश्या' शब्द पर उसकी वाणी अटक गयी। उस स्त्री के सामने वह उस शब्द को जबान पर नहीं ला सका।

स्त्री ने स्थिर आँखों से उसकी ओर देखकर पूछा, 'तब तुम तो सिर्फ क्या?'

'मैं, मैं - मैं तो - नहीं जानता कि क्या!'

स्त्री थोड़ी देर एकटक उसकी ओर देखती रही और फिर खिलखिलाकर हँस पड़ी। फिर उतने ही अप्रत्यशित ढंग से वह हँसी गायब हो गयी और स्त्री का चेहरा पहले-सा हो आया। व्यथा की एक गहरी रेखा उस पर खिंच गयी। स्त्री ने जेब में हाथ डालकर कुछ निकाला और जल्दी से मुँह में रख लिया। दवा? या कोई नशा?...

'तुम्हारी तबीयत तो ठीक है?'

'अभी ठीक हो जाएगी - अभी हो जाएगी।' स्त्री की बात सुनकर जगन्नाथन् ने तय किया कि वह दवा नहीं थी, नशा ही था।

स्त्री का शरीर कुछ शिथिल हो आया। उसने उपरली सीढ़ी पर कोहनी टेककर पीठ दीवार के साथ लगा दी, फिर बायीं कलाई मोड़कर घड़ी की ओर देखा और शिथिल बाँहें अपनी गोद में गिर जाने दीं।

'क्या बजा है? मैं कुछ देख नहीं पा रही।' उसका स्वर भी बड़ा दुर्बल जान पड़ रहा था।

जगन्नाथन् ने घड़ी देखकर समय बता दिया।

'तुम्हारा नाम क्या है?'

जगन्नाथन् ने थोड़ा अचकचाते हुए कहा, 'जगन्नाथन्!'

'ज - जगन - ज - मैं सिर्फ नाथन् कहूँगी - छोटा भी है, अच्छा भी है। नाथन्, मुझे माफ कर दो। मैंने तुम्हें तकलीफ पहुँचायी है, लेकिन मेरे खिलाफ इस बात को याद मत रखना पीछे याद मत करना। मैं मर रही हूँ।'

'क्यों - तुमने क्या किया है - क्या कर डाला है! अभी तुमने क्या खा लिया?'

'मैंने चुन लिया। मैंने स्वतन्त्रता को चुन लिया।' वह धीरे-धीरे बोली, 'मैं बहुत खुश हूँ। मैंने कभी कुछ नहीं चुना। जब से मुझे याद है कभी कुछ चुनने का मौका मुझे नहीं मिला। लेकिन अब मैंने चुन लिया। जो चाहा वही चुन लिया। मैं खुश हूँ।' थोड़ा हाँफकर वह फिर बोली, 'मैं चाहती थी कि मैं किसी अच्छे आदमी के पास मरूँ। क्योंकि मैं मरना नहीं चाहती थी - कभी नहीं चाहती थी!' फिर थोड़ा रुककर उसने कहा, 'मुझे माफ कर दो, नाथन्! तुम जरूर मुझे माफ कर दोगे। तुम अच्छे आदमी हो। बताओ - अच्छे आदमी हो न?'

जगन्नाथन् ने सीधे होते हुए कहा, 'मैं डॉक्टर बुला लाऊँ?'

'नहीं-नहीं! अब कोई फायदा नहीं है।' उसने कहा, 'अब मुझे छोड़कर मत जाओ। यही तो मैंने चुना है।' फिर मानो कुछ सोचकर उसने जोड़ दिया, 'लेकिन, हाँ दूसरे लोग भी तो होंगे लेकिन उनसे मैं अपने आप कह दूँगी। पर तुम जाओ नहीं!'

क्षीणतर होती हुई उस आवाज में भी अनुरोध की एक तीव्रता आ गयी।

जगन्नाथन् वहाँ से जा नहीं सका। लेकिन वहीं मुड़कर उसने जोर से आवाज लगायी, 'कोई है - मदद चाहिए - कोई है?' फिर स्त्री की ओर उन्मुख होकर उसने पूछा, 'क्या कह दोगी?'

'कह दूँगी कि मैंने चुना, स्वेच्छा से चुना। सब कुछ कह दूँगी। सारी हरामी दुनिया को बता दूँगी कि एक बार मैंने अपने मन से जो चुना वही किया! हरामी-हरामी दुनिया! नाथन् - अच्छे आदमी - मुझे माफ कर दो!'

जगन्नाथन् बड़े असमंजस में था। एक बार मुड़ता कि सहायता के लिये दौड़े, फिर उस स्त्री की ओर देखता जिसका अनुरोध - शायद अन्तिम अनुरोध - था कि वह उसे छोड़कर न जाए। फिर उसे ध्यान आता कि औरत शायद पूरे होश में भी नहीं है, जानती भी नहीं कि क्या कह रही है, और शायद इतना बोध भी नहीं रखती कि वह उसके पास खड़ा है। लेकिन अगर उसे बोध नहीं है तो जगन्नाथन् को तो है कि उसने क्या माँगा था! और शायद जगन्नाथन् का कर्तव्य यही है कि वह जो कुछ कह रही है उसका साक्षी हो अगर वह प्रलय भी है तो भी उसका साक्षी हो - क्योंकि शायद वही उस स्त्री के पास और कहने को रह गया है। और शायद वही कहना ही वह सारवस्तु है जिसके लिए वह जैसा भी जीवन जिया है...

स्त्री फिर रुक-रुककर कुछ कहने लगी। 'कह दो - सारी हरामी दुनिया से कह दो, अन्त में मैं हारी नहीं - अन्त में मैंने जो चाहा सो किया - मरजी से किया। चुनकर किया। मैं - मरियम - ईसा की माँ - ईश्वर की माँ मरियम - जिसको जर्मनों ने वेश्या बनाया -'

जगन्नाथन् ने धीरे से पूछा, 'तुम्हारा नाम मरियम है?'

'हाँ, मेरा नाम मरियम। ईसा की माँ का नाम मरियम। चुनी हुई माँ। जो कभी मर नहीं सकती - जर्मनों की वेश्या। उससे पहले मेरा नाम योके था। वह मैंने नहीं चुना, पर अच्छा नाम है। लेकिन योके मर गयी। मरियम कभी नहीं मरती।'

जगन्नाथन् ने मुड़कर देखा, गली की नुक्कड़ पर कुछ लोग आ गये थे। उसने समझा था मरियम को - योके को - इतना होश नहीं होगा कि उनका आना जाने, लेकिन उसने उन्हें देख लिया और किसी तरह हाथ उठाकर इशारे से बुलाया। दो-तीन आदमी दौड़े हुए पास आये और एक बार कौतूहल से जगन्नाथन् की ओर देखकर स्त्री की ओर झुक गये।

योके ने कहा, 'मैंने अपने मन से चुना है। मैं मर रही हूँ - अपनी इच्छा से चुनकर मर रही हूँ, हरामी मौत।'

उसका स्वर कुछ और दुर्बल हो आया था। जगन्नाथन् को लगा कि उसका शरीर भी शिथिल पड़ रहा है और चेहरे की फीकी होती हुई रंगत में एक हल्की-सी कलौंस आ गयी है। उसे लगा कि योके की पीठ दीवार पर से एक ओर सरक रही है। जल्दी से घुटने टेककर बैठते हुए उसने एक बाँह से उसे सहारा देकर सँभाल लिया मानो उसके स्पर्श को पहचानती हुई योके ने उसकी ओर तनिक-सा मुड़कर कहा, 'मैंने कह दिया - सब हरामियों से कह दिया।' फिर थोड़ा रुककर उसने आयासपूर्वक कहा, 'उससे भी कह दिया - उससे भी।'

इस 'उस' में कुछ ऐसा प्रबल आग्रह था कि जगन्नाथन् ने अवश प्रेरणा से पूछा, 'उससे किससे?'

'पॉल से, उस अजनबी से।'

एकाएक सभी लोग चुप हो गये थे। सभी में कुछ होता है जो पहचान लेता है कि कोई महत्वपूर्ण घटना घटनेवाली है और उसके आसन्न प्रभाव सामने क्षण-भर चुप हो जाता है। उस मौन में योके और जगन्नाथन् मानो बाकी सारी भीड़ से कुछ अलग हो गये थे। योके ने फिर कहा, 'मैंने चुना। हम अजनबी नहीं चुनते, अच्छे आदमी चुनते हैं। मैंने आदमी चुना - अच्छा आदमी। उसमें मैं जियूँगी। नाथन्, मुझे माफ कर दो।'

जगन्नाथन् की बाँह कुछ और घिर आयी और योके का सिर उसने अपने कन्धे पर टेक लिया।

योके ने कहा, 'किया?'

जगन्नाथन् ने उसके कान के पास मुँह से लाकर स्निग्ध भाव से पूछा, 'क्या?' फिर एकाएक उसका प्रश्न समझकर जल्दी से कहा, 'हाँ, योके! किया। माफ किया - पर माफ करने को कुछ है तो नहीं।'

योके ने बहुत ही धीमे, लगभग न सुने जा सकने वाले स्वर में कहा, 'मैंने भी किया। अच्छा आदमी। उसको भी -'

जगन्नाथन् ने पूछा, 'पॉल को?'

एक क्षणिक दुविधा का-सा भाव योके के चेहरे पर आ गया। या कि बेहोशी से पहले के क्षण में उसका मन बहक रहा था? फिर उसने कुछ कहा जिसे जगन्नाथन् ठीक-ठीक सुन नहीं पाया। इतना तो स्पष्ट ही था कि योके ने पॉल का नाम नहीं लिया था; कुछ और कहा था। क्या कहा था, यह जानने का अब कोई उपाय नहीं था, लेकिन साक्षी जगन्नाथन् को एकाएक ध्रुव निश्चय हो आया कि योके ने कहा था : 'ईश्वर को।'

फिर वह एकान्त सहसा विलीन हो गया। जगन्नाथन् ने पहचाना कि वह भीड़ से घिरा हुआ है और उसकी बाँह योके की जड़ देह को सँभाले हुए है।

उसने अनदेखती हुई-सी आँखें लोगों पर टिकाकर कहा, 'वह गयी।'

स्तब्ध भीड़ में केवल एक ही बूढ़े व्यक्ति को सूझा कि हाथ उठाकर रस्मी ढंग से क्रूस का चिह्न बना दे; वह चिह्न सूने आकाश में अजनबी-सा टँका रह गया।


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