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उपन्यास

अथ मूषक उवाच
सुधाकर अदीब


दोपहर में सारा गोपालपुर भाँय-भाँय कर रहा था। तेज लू चल रही थी। गलियों की मिट्टी उड़-उड़कर धूल की शक्ल में छप्परों और खपरैलों पर बरस रही थी। सूखे पत्ते हवा के साथ उड़ते हुए घरों के आँगन में कूड़ा-करकट की भाँति बिखर रहे थे। अधिकांश लोग अपने-अपने किवाड़ बंद करके मुँह छिपाए थे।

रामलाल ओर झोला भइया शहर गए हुए थे। रधिया बकरियाँ चुगाने गई हुई थी। रूपा बैठके में कोयले की इसतरी दहकाने के बाद भीतर रसोई में अपने लिए चाय लाने के वास्ते गई हुई थी।

बिंद्रा ने जब रामलाल का बैठका खुला देखा और डॉक्टर का दवाखाना बंद पाया तो वह ठहर गया। जब उसकी निगाह बरांडे की दीवार से लगी कोयले की दहकती इस्तरी पर पड़ी तो वह वहीं एक खंबे से टिककर भूमि पर बैठ गया।

तभी रूपा एक लोटे में गरम-गरम चाय, ऊपर से कटोरी ढके, लोटे का ऊपरी छोर अपने आँचल से पकड़े हुए बैठके में आई। उसने लोटा-कटोरी कपड़े प्रेस करने वाली मेज पर रख दिया।

''अरे बिंद्रा! ... तुम कब आए?'' बिंद्रा पर नजर पड़ने पर रूपा ने कहा। वह बिंद्रा को नाम लेकर पुकारती थी। बिंद्रा रूपा से चार-पाँच साल छोटा जो था।

''बस भौजी, कुछ ही पल बीते।'' बिंद्रा ने कहा और उसने रूपा को एक भरपूर निगाह से देखा।

''अच्छा ठहरो। पहले तुम्हें भी थोड़ी चाय दे दूँ।'' कहकर रूपा पुनः भीतर गई। आँगन के आले में से उसने वही शीशे का धारीदार छोटा गिलास उठाया जिसमें वह झोला भइया को चाय दिया करती थी। आँगन का छोटा हाथनल चलाकर उसने गिलास को जरा खँगाला और बाहर आकर बिंद्रा के सामने भूमि पर रख दिया। फिर लोटा उठाकर आँचल से पकड़कर ऊपर से गिलास में चाय गिराने लगी।

गोरी तो वह थी ही। उसकी नाक की कील भी हिलने-डुलने से लकदक करती थी। उस एकांत में बिंद्रा से रहा नहीं गया। उसने अचानक रूपा की कलाई पकड़ ली। चाय लोटे से छलककर कुछ नीचे भी गिर गई।

''क्या करते हो? छोड़ो मेरा हाथ...'' रूपा ने विरोध किया। बिंद्रा ने हाथ नहीं छोड़ा। रूपा ने अपनी आवाज को भींचकर मिन्नत के स्वर में कहा - ''कोई देख लेगा!''

''कोई नहीं देखेगा... आज मैं तुम्हारी एक न सुनूँगा।''

तब तक बकरियों के मिमियाने की आवाज सुनाई दी। कबरी बकरी का एक नन्हा छौना हाथ में लिए रधिया वहाँ आ गई।

बिंद्रा शीशे का गिलास मुँह से लगाकर चाय पीने लगा। रूपा गरम इस्तरी उठाकर दूसरी ओर मुँह फेरकर किसी कपड़े पर जल्दी-जल्दी प्रेस करने लगी।

''माँ, बड़ी भूख लगी है। कुछ खाने को दे ना।''

रधिया ने रूपा से कहा। रूपा ने चट से अपनी धोती के सिरे से बँधी गाँठ खोलकर दो रुपए निकाले और रधिया को दिए। कहा -

''अभी खाना तैयार होने में देर लगेगी। तू जा, भूजा के यहाँ से गुड़-चना लेकर खा ले।''

रधिया खुशी-खुशी जाने लगी। ''और सुन'' - रूपा ने पुनः कुछ सोचकर कहा - ''वहाँ से खा-पीकर इरफान चाचा के यहाँ चली जाना और कोयले ले आना।'' यह कहकर उसने एक झोला और कुछ अन्य रुपए रधिया के हाथ में पकड़ा दिए। रधिया चली गई।

''तुम ब्याह क्यों नहीं कर लेते?'' इस्तरी को पुनः कपड़े पर फेरती हुई रूपा बिंद्रा से कहने लगी।

''कौन करेगा मुझ रंडुए से ब्याह? तुम भी भौजी, बस...' बिंद्रा ने कराहकर कहा।

''काहे, रामप्यारी में क्या बुराई?'' कहते हुए रूपा ने अपनी हँसी दबाई और उसका चेहरा लाल हो गया।

''वह राँड! ... वह तो पूरे गाँव की लुगाई है।''

''अच्छा जी! ... औरत करे तो गाँव की लुगाई और मर्द करे तो घर का जमाई?''

रूपा की व्यंगयोक्ति बिंद्रा को घायल कर गई। वह उठ खड़ा हुआ। जाने लगा।

''कहाँ जाता है रे? ... तनी ठहर तो।'' रूपा ने पलटकर कहा।

बिंद्रा सहम गया। सोचा, अब न जाने यह क्या करे?

तभी रूपा ने अपनी बड़ी-बड़ी आँखें उसकी आँखों में अटका दीं और शरारती मुस्कान के साथ बोली - ''तू मेरे भीतर ऐसा क्या देखता है जो रोज-रोज इधर चला आता है?''

बिंद्रा का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। उसे लगा, जैसे उसे किसी ने अंधे कुएँ में से बाहर निकालने के लिए रस्सी का झूला भीतर फेंक दिया हो। उसने बरांडे से बाहर इधर-उधर झाँका। सन्नाटा था। बोला - ''बस भौजी! ... एक तुम्हीं तो हो, जिसे देखकर आज तक जी रहा हूँ।''

''भीतर आ जाओ।'' कहकर रूपा इस्तरी जमीन में खड़ी कर बैठके के अँधेरे कोने में चली गई। बिंद्रा ने बढ़कर बैठके में प्रवेश किया और किवाड़ भीतर से बंद कर लिए।

बिंद्रा का छोड़ा हुए शीशे का गिलास भूमि पर वैसे का वैसा ही रखा हुआ था। उसके पेंदे में थोड़ी सी चाय बची हुई थी। मैंने पहले सोचा कि गिलास में झुककर थोड़ी-सी चाय मैं भी चखूँ। फिर सोचने लगा कि यह चाय जूठी है। जूठी ही नहीं अपवित्र भी है। जूठी तो केवल तब होती जब बिंद्रा के होठों ने उसे छुआ-भर होता। परंतु जिस छुआछूत की भावना के साथ रूपा द्वारा यह चाय बिंद्रा को दी गई, वह जूठी होने से पहले ही एक अपवित्र वस्तु बन गई।

परंतु पवित्रता अथवा शुचिता का बोध क्या मात्र खान-पान तक ही सीमित रहता है? एक व्यक्ति का होंठ यदि किसी पात्र को छू दे तो वह मात्र जूठा हो जाता है और वही होंठ किसी दूसरे व्यक्ति के होठों को, उसकी ग्रीवा को, उसके अंग-प्रत्यंग को छूता रहे तो क्या वह व्यक्ति स्वयं में जूठा नहीं हो जाता?

फिर यह रूपा बिंद्रा के साथ कौन-सा नाटक कर रही है? उधर वह मिसरीलाल और घबडूराम जैसे लोग रामप्यारी के साथ क्या कर रहे हैं? देह के स्तर पर उतरते समय यह तथाकथित जातिगत संस्कार आखिर कहाँ चले जाते हैं?

दरअसल, यह झगड़ा ऊँच-नीच का नहीं है। न ही सवर्ण और अवर्ण का है। यह झगड़ा आदमी और आदमी के बीच का है। मगर पता नहीं लोग इसे आखिर समझते क्यों नहीं?

यदि एक ब्राम्हण अथवा क्षत्रिय किसी अनुसूचित जाति के व्यक्ति के साथ जातिगत विभेद मानता है तो वह तो निंदनीय है ही, किंतु यदि एक धोबी एक चमार से, एक चमार एक भंगी से अथवा एक पासी एक चमार से उसी तरह का भेदभाव बरतता है तो क्या वह कम निंदनीय है?

लोग मनु और अंबेडकर को दोष देते हैं, क्योंकि किसी पर दोषारोपण करना अपेक्षाकृत सरल कार्य है और स्वयं के गरेबान में झाँकना कठिन है। यदि तटस्थ रूप से देखा जाए तो अपने-अपने युग के इन महापुरुषों ने जो कुछ देखा अथवा भोगा उसे अपने विचारों के रूप में लिपिबद्ध कर दिया। कालान्तर में अपने आर्थिक और राजनीतिक स्वार्थों की प्रतिपूर्ति के लिए जिसे जो इबारत उस लिपिबद्ध सामग्री में से अपने लिए मुफीद लगी, उसे ज्यों की त्यों उसने वहाँ से उठा कर उसे समाज की दीवारों पर गहरे अक्षरों में खुदवा डाला। ऐसे ही लोग सामाजिक अस्थिरता के संवाहक बन बैठे।

परिणाम क्या हुआ? विखंडन। बिखराव। सामाजिक संघर्ष।

मेरा मन घृणा से भर उठा। मैंने फैसला कर लिया कि कल ही यह गाँव छोड़ दूँगा। आज ही मैंने घबडूराम को प्रधान के छोटे लड़के मातादीन से बात करते सुना था।

मातादीन अपनी बुग्गी लेकर कल शहर जा रहा है। घबडू भी अपने मिट्टी के तेल के खाली ड्रम लेकर उसके साथ जाने को तैयार है। अच्छा होगा कि मैं भी कल इन्हीं लोगों के साथ गाँव से निकल जाऊँ। बुग्गी याने की बैलगाड़ी। डनलप टायरों से संयुक्त। बधिया बैलों द्वारा खींची जाने वाली एक खुली हुई हवादार गाड़ी। देहात को शहर से जोड़ने वाली एक प्यारी-सी गाड़ी।


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