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उपन्यास

अथ मूषक उवाच
सुधाकर अदीब


एक सूनी डगर पे
खरामा-खरामा
चली जा रही है
मेरी बैलगाड़ी।
न कोई अगाड़ी
न कोई पिछाड़ी
चली जा रही है
मेरी बैलगाड़ी।

कविता के संस्कार मेरे भीतर पिछले जन्म से ही थे, परंतु मूषक-जीवन में पड़कर मैं उन्हें लगभग भूल चुका था। गोपालपुर गाँव में आने के बाद यहाँ के कुछ प्राकृतिक सौंदर्य और कुछ पक्के-कच्चे रहन-सहन को देखकर वे संस्कार मेरे भीतर फिर से पकने लगे और गोपालपुर छोड़ने के साथ ही एकाएक मुझे लगा कि मैं अब भी कविता कर लेने में समर्थ हूँ।

प्रधान का बेटा मातादीन बैल हाँक रहा था। कोटेदार घबडूराम उसके साथ बैठा हुआ गाँव की 'पॉलिटिक्स' हाँक रहा था और मैं मन-ही-मन मिट्टी के तेल के खाली ड्रमों से निःसृत होने वाली मादक गंध सूँघता हुआ कविता हाँक रहा था।

बैलों ने जब तलैया का पुल पार करके घने जंगलों का वह कच्चा रास्ता भी पार करके पक्की सड़क पकड़ी तो उसकी गति स्वयमेव तेज हो गई। बुग्गी में हिचकोले लगने बंद हो गए और वह सड़क पर चलने के बजाय तैरने लगी।

मंद-मंद बयार चल रही थी। बुग्गी चल रही थी। हम सभी चल रहे थे। ऐसे में मेरी आँख लग गई और मैं एक मूषक-स्वप्न देखने लगा।

मैंने देखा कि मैं मक्के के खेतों में विचर रहा हूँ। एक जगह थमकर उस संपन्न खेत में मैंने जुँधरी की प्रचुरता पाई। मैंने जुँधरी के दाने खूब जी भरकर खाए। ठूँस-ठूँसकर खाने के कारण मेरा पेट फूल गया और मेरा चलना-फिरना दूभर हो गया। मेरे नितंब की ओर का शारीरिक भाग विशेष रूप से भारी हो गया। अब मेरा शरीर बिल में समाने लायक भी नहीं रहा। ऊपर से मुझे बेहद प्यास सताने लगी। ...

मैं पानी की तलाश में भटकता हुआ एक जगह पहुँचा। वहाँ पानी तो था, किंतु मुझे लगा कि यदि मैंने पानी पी लिया तो मेरे प्राण निकल जाएँगे। तभी मैंने एक छोटी-सी चिड़िया को वहाँ पानी पीते देखा। उसे अपनी समस्या बताई। चिड़िया मुस्कुराई। उसने मुझे सलाह दी कि मैं बढ़ई के पास जाकर अपने नितंब का कुछ भाग उससे तरशवा लूँ, जिससे कि खायी हुई थोड़ी जुँधरी बाहर आ जाए। मैं मूढ़ चूहा उसके लिए तैयार हो गया। ...

मैं एक बढ़ई के पास पहुँचा। उसे कहा कि वह अपना बसूला उठाए और मेरी समस्या का निदान कर दे। परंतु बढ़ई सुनकर हँसा। उसने मुझे अपने पास से भगा दिया। मुझे बढ़ई पर बड़ा क्रोध आया। ...

अगले ही क्षण मैंने अपने आपको उस अनजान दुनिया के राजा के दरबार में पाया। राजा से फरियाद करके मैंने अपनी समस्या का बखान किया और बढ़ई के असहयोग के लिए उसे प्राणदंड देने की माँग इन शब्दों मे की -

राजा राजा बड्डी मार
बड्डिया न चूतर छोलै
चुतरा न बिल समाय
जुँधरी बहुत खायो
खाए बिना रहा न जाय
पानी पियूँ जीउ जाय।

वह राजा भी मुझ पर हँसा। उसने अपने दरबारियों से मुझ चूहे को अपने दरबार से बाहर खदेड़वा दिया। अब मुझे राजा पर बहुत क्रोध आया। ...

मैंने रनिवास पहुँचकर रानी जी से राजा की शिकायत की ओर ऐसे प्रजाविमुख राजा का परित्याग कर देने की सलाह दी। रानी ने सलाह नहीं मानी। अब मैंने स्वयं को काफी अपमानित महसूस किया। कोई मुझे मामूली चूहा समझकर मेरा तिरस्कार करे, यह मुझे बर्दाश्त कहाँ? ...

मैं एक साँप के पास गया। साँप से मैंने अपनी व्यथा कह सुनाई और उससे प्रार्थना की कि वह उस रानी को डस ले। मगर साँप ने मुझसे कहा कि मैं मूर्खता कर रहा हूँ और उस मूर्खता में वह मेरा साथ नहीं देगा। उस रेंगने वाले कीड़े का यह दुस्साहस देखकर मेरे तन-बदन में आग लग गई। ...

तिलमिलाकर मैं एक लाठी के पास पहुँचा। मैंने लाठी से कहा कि वह उछल-उछलकर उस निकृष्ट कीड़े को मार डाले, परंतु लाठी ने साफ इनकार कर दिया। ...

अब मैंने फैसला किया कि ऐसी बेजान और संवेदनशून्य लाठी को अग्नि के ही सुपुर्द कर देना चाहिए। मैं एक भड़भूजे के भाड़ के पास पहुँचा, जिसमें मक्का-चना इत्यादि भूना जाता था। मैंने उस अग्निकुंड से अपनी रामकहानी सुनाकर उस लाठी को भस्म कर देने की प्रार्थना की। वहाँ भी मेरी प्रार्थना अस्वीकार कर दी गई। ...

अब मैं समुद्र के पास पहुँचा। समुद्र में बड़ी-बड़ी लहरें उठ रही थीं। मैंने उसे निवेदन किया कि वह अपनी कोई विशाल जल-लहरी भेजकर भड़भूजे के भाड़ को बुझा दे। अग्नि का अस्तित्व समाप्त हो जाने पर ही मेरे कलेजे को ठंडक पहुँचेगी। परंतु समुद्र तो जैसे अपने में ही व्यस्त था। वह मेरी क्यों सुनता? मैंने सोचा कि इस मगरूर को भी मजा पड़ेगा। ...

इसके बाद मैंने एक हाथी की शरण ली। उससे अपनी अब तक की आपबीती सुनाई और उस उन्मत्त गजराज से कहा कि वह अपनी सूँड से समुद्र के सारे जल को सोख ले। हाथी ने अपनी लाल-लाल और छोटी-छोटी आँखों से मुझे घूरा। अपने सूप जैसे दोनों बड़े-बड़े कान हिलाए और एक चिंघाड़ मारकर अपने उस उपहास के लिए मेरी ओर अपना एक भारी-भरकम पाँव उठाया। मैं चीखा और जान बचाकर वहाँ से भागा। ...

मार्ग में मुझे एक छोटी-सी चींटी मिली। उस बेचारी ने मुझसे मेरे दुःख का कारण पूछा। अपना दुखड़ा मैंने उसे भी सुनाया। और आश्चर्य! मुझे अंततः अपनी समस्या का हल मिल गया। चींटी अगर हाथी के सूँड़ में घुस जाए तो वह हाथी के मस्तिष्क तक पहुँचकर उसे पागल कर देने की क्षमता रखती है। फिर तो विशालकाय हाथी से कुछ भी कराया जा सकता है। अतएव मैंने चींटी से कहा -

चींटी चींटी हाथी मार
हथिया न समुंदर सोखे
समुंदरा न भार बुतावै
भारवा न लाठी जारै
लाठिया न कीरा मारै
किरवा न रानी डँसे
रानिया न राजा छोड़़ै
राजावा न बड्डी मारै
बड्डिया न चूतर छोलै
चतुरा न बिल समाय
जुँधरी बहुत खायौं
खाए बिना रहा न जाय
पानी पीयूँ जीउ जाय।

मैंने देखा कि मेरी जुगत काम कर गई। चींटी हाथी की सूँड़ में घुस गई। ... हाथी दीवाना होकर समुद्र को सोखने के लिए बढ़ा। ... समुद्र ने त्राहिमाम-त्राहिमाम करके अग्निकुंड को बुझाने का उपक्रम शुरू किया। ... अग्निकुंड ने अपनी एक अग्निशिखा लाठी को भस्मीभूत करने की के लिए लपकाई। ... लाठी घबराकर साँप पर बरस पड़ी। ... साँप ने लाठी से क्षमायाचना की और रानी को काटने को दौड़ा। ...

रानी अपने शयनकक्ष से भयभीत होकर भागी तो सीधी राजा के दरबार में जाकर रुकी। उसने मुझ चूहे की ओर संकेत करके राजा का परित्याग करने की धमकी दे डाली। ... राजा अपनी प्राणप्यारी की उस धमकी के आगे टिक नहीं सका। उसने बढ़ई को आदेश दिया कि वह तत्काल मुझ चूहे की समस्या का निदान करे, नहीं तो उसे फाँसी दे दी जाएगी। ...

बढ़ई ने घिघियाकर अपने बसूले की धार एक पत्थर पर घिसकर तेज की और फिर उसे मेरी फूली हुई पिछाड़ी पर दे मारा। मेरे मुँह से एक हृदयविदारक चीख निकली और एक खून के फौव्वारे से सारा मेरा सारा शरीर लथपथ हो गया। ...

धड़ाम-धड़ाम की आवाज के बीच मेरी आँख खुली। मैंने देखा कि मिट्टी के तेल के खाली ड्रम एक स्थान पर उतारे जा रहे थे। मुझे अब वास्तविकता की अनुभूति हुई। मेरा नन्हा-सा शरीर खून में नहीं बल्कि एक ड्रम में बचे-खुचे मिट्टी के तेल से तर हो रहा था। घबडूराम किसी से कह रहा था कि वह पहले एस.एम.आई. गोदाम से चीनी ले आए फिर लौटते समय मिट्टी का तेल वहाँ से लेगा।

गाड़ी फिर चली और इस बार उसने एक कस्बे में प्रवेश किया। मातादीन और घबडूराम की बातचीत से मुझे विदित हुआ कि यह कस्बा एक तहसील मुख्यालय था, क्योंकि बातों का रुख तहसीलदार, कानूनगो या फिर नायब और एस.डी.एम. साहब के इर्द-गिर्द घूम गया था। एक तो कस्बे का कोलाहल, ऊपर से इतनी दूर का सफर। उन बातों में मुझे कोई रस नहीं आ रहा था, इसलिए मैं उधर की तरफ अपना कान अधिक नहीं दे रहा था।

आखिर में बुग्गी एक भुतही-सी दिखने वाली इमारत के सामने रुक गई। बाहर से देखो तो एक खंडहर। भीतर से देखो तो एक अर्ध-खंडहर। एक बड़े से कमरे में चीनी के बोरों के चट्टे लगे थे। उनके पास एक मेज और चार टूटी कुर्सियाँ डालकर दो आदमी बैठे थे। उनके पास घबडूराम सरीखे पाँच-छह लोग खड़े होकर नोट गिन रहे थे। घबडू भी उनकी जमात में शामिल हो गया। यह एस.एम.आई. अर्थात सीनियर मार्केटिंग इंस्पेक्टर का गोदाम था।

अचानक एक आदमी बाहर की तरफ से भागता हुआ आया। उसने खबर दी कि ''एस.डी.एम. साहब आ रहे हैं।'' सुनते ही वहाँ खलबली मच गई। रुपया-पैसा, कागज-पत्तर मेज पर से समेटा जाने लगा। घबडूराम ने हाथ के नोट फौरन अपनी धोती के फेंटे में कस लिए। अन्य लोग भी खाँसते-खँखारते कमरे के बाहर के आँगन में सरक गए।

जब तक एस.डी.एम. साहब भीतर आते, एक मैला-सा मेजपोश कहीं से खींचकर उस नंगी काली मेज पर बिछा दिया गया था। शिष्टाचार का गुण हमारे यहाँ के लोगों में कूट-कूटकर भरा है। हम जो भी हों, जैसे भी हों, अपने अतिथि का स्वागत करने में कभी पीछे नहीं रहते। कहा गया है कि 'अतिथि देवो भव।' इस पर भी यदि अतिथि हमारे लिए 'शनिदेव' की भाँति हुआ, तब तो उसकी 'वक्र दृष्टि' से बचने के लिए और भी विनम्र रहना आवश्यक है।

मैं भी अपनी दुम उठाकर एक छलाँग में चीनी के बोरों के पहाड़ पर चढ़ चुका था। इस समय पहाड़ की चोटी से मैं वहाँ का सारा दृश्य साफ देख रहा था। एस.डी.एम. एक युवा अधिकारी थे। अगर पहले से उनके आगमन की हवाई सूचना गोदाम में न आती तो मैं उन्हें विश्वविद्यालय का कोई छात्र ही समझता। वह सफेद रंग की एक ढीली-ढाली कमीज तथा हल्के नीले रंग की एक चुस्त जींस धारण किए हुए थे। उनके पीछे लगभग उन्हीं की उम्र का एक अन्य व्यक्ति भी वहाँ घुसा।

एस.डी.एम. साहब आते ही एक कुर्सी पर बैठ गए और अपने साथ के व्यक्ति को उन्होंने आदेश दिया - ''नायब सा'ब! जरा यहाँ की स्टॉक पोजीशन ले लीजिए।''

नायब साहब चीनी के बोरे गिनने लगे। मैं बोरों के पीछे से उतर कर गोदाम के बाहर आ गया। बाहर एस.डी.एम. साहब की जीप एक तरफ खड़ी थी। मैं उस जीप में सवार हो गया।

एस.डी.एम. साहब का सरकारी बँगला बहुत खूबसूरत था। या यों कहें कि जिस जगह वह स्थित था वह जगह बहुत खूबसूरत थी। उस बँगले के अगल-बगल दो और उसी तरह के बँगले थे। एक उस तहसील के मुंसिफ साहब का, दूसरा पुलिस क्षेत्राधिकारी अर्थात सी.ओ. साहब का। मुंसिफ का बँगला बाद का बना था और थोड़ा हटकर बना था। जबकि एस.डी.एम. और सी.ओ. के बँगले पास-पास थे। उन दोनों के गैराज भी एक-दूसरे से सटे हुए थे।

एस.डी.एम. साहब की जीप जैसे ही बँगले के सामने रुकी, एक नौजवान चपरासी भीतर से भागता हुआ आया और उसने गेट खोला। वैसे गेट तो जीप में पीछे बैठा हुआ अर्दली या ड्राइवर भी खोल सकते थे, लेकिन वे पुराने और वरिष्ठ थे। गेट खोलने वाला चपरासी नया उम्मीदवार था। दैनिक भत्ते पर चल रहा था।

साहब ने जीप से उतरते-उतरते उसी चपरासी से, जो लपककर पास आ चुका था, पूछा - ''गयाप्रसाद!... कोई फोन तो नहीं आया था?''

''जी सर! ... डी.एम. सा'ब का आया था।''

''कब?''

''अभी कोई आधा घंटे पहले।''

इस पर साहब ने जीप में साथ आए अपने बुजुर्ग-से अर्दली से कहा - ''हरिसिंह! ... तुम जरा तहसीलदार सा'ब के पास चले जाओ और कहो कि हमसे बात कर लें।''

''अच्छा सरकार!'' कहकर हरीसिंह अपनी पगड़ी सीधी करता हुआ चला गया।

इस तरह मैंने देखा कि आज का अफसर 'सर' और 'सरकार' के बीच का अधिकारी था। नई पीढ़ी का मातहत उसे 'सर' कहकर आधुनिकता के साथ ही ब्रिटिशकालीन परंपराओं का अहसास दिलाता था। जबकि पुरानी पीढ़ी का मातहत 'हुजूर-सरकार' के भारी-भरकम संबोधनों को दोहराकर पुरातन और मुगलकालीन बेशकीमती रवायतों की याद ताजा कराता रहता था। निश्चय ही इनमें से पुराना अंदाज कभी न कभी साहब को मन-ही-मन आहलादित अवश्य करता होगा।

साहब भीतर चले गए थे। मैं भी उनके पीछे-पीछे गैलरी को पार करके बँगले में घुस गया था। वहाँ किचन में से मसालों की खुशबू उड़ रही थी। मैंने उस महक से ही जान लिया कि 'चिकन' भूना जा रहा है। एक चपरासी दीनानाथ उसी में जुटा था। चपरासी गयाप्रसाद बाहर आँगन में धूप में चारपाई पर फैले कचरी-पापड़ों को समेटने में लगा था। भीतर एक बेडरूम में टी.वी. चल रहा था और अर्चना, एस.डी.एम. शैलेश की पत्नी, बिस्तर पर पेट के बल लेटी हुई कोई फिल्मी मैगजीन पलट रही थी।

''आ गए आप? ...'' शैलेश पर दृष्टि पड़ते ही अर्चना ने कहा।

''हाँ ... जरा खाना जल्दी तैयार करा दो। आज कलेक्ट्रेट जाना पड़ेगा।''

अर्चना किचन में चली गई। गयाप्रसाद आँगन में कचरी-पापड़ समेट चुका था। उसने 'मेम सा'ब से कहा कि वह 'भइया जी' को लिवाने के लिए स्कूल जा रहा है। शैलेश बाथरूम में चला गया। मैं बरांडे में रखी एक जालीदार छोटी अलमारी में घुस गया; क्योंकि मुझे मालूम था कि डबलरोटी, बिस्कुट, दालमोठ जैसी खाने-पीने की अटरम-शटरम चीजें ये लोग ऐसी ही जगहों में छिपाकर रखते हैं।

''सरकार! ... तहसीलदार साहब का फोन खराब है। तहसीलदार साहब बाहर खड़े हैं।'' हरिसिंह ने भीतर आकर बताया।

शैलेश ने कहा - ''उन्हें ड्राइंगरूम में बिठा दो।''

मैं जालीदार अलमारी में रखे एक टीन के डिब्बे में, जिसका ढक्कन ठीक से बंद नहीं था, प्रवेश करने में तब तक सफल हो चुका था। इस समय मैं आराम से उसमें रखे बिस्कुटों को कुतरने में मग्न था। साथ ही, वहीं से उचक-उचक कर मैं उस घर के वासियों के कार्यकलाप भी 'वाच' कर रहा था।

शैलेश ने ड्राइंगरूम में जाकर दस मिनट तहसीलदार साहब से बातचीत की और उन्हें विदा किया। इसी बीच वहाँ एक ओर लगी डाइनिंग टेबल पर गर्म खाना अर्चना ने लगा दिया। फ्रिज से ठंडे पानी की बोतलें निकालकर वह भी साथ ही बैठ गई। चपरासी किचन से गर्म-गर्म रोटियाँ सेंककर लाने और देने लगा।

अभी शैलेश का खाना खत्म होने को ही था कि एक चार वर्षीय बालक ने स्कूली ड्रेस में घर में प्रवेश किया। उसने घुसते ही जालीदार अलमारी पर झपट्टा मारा, जिसमें पिछवाड़े के एक छेद से घुसा हुआ मैं एक बिस्कुट खा रहा था। बालक को भी बिस्कुट की तलब लगी थी। मगर यह क्या? अलमारी की कुंडी में तो एक छोटा-सा चुटपुटिया ताला लगा हुआ था। दरअसल, अर्चना ने अपने उस खाऊबीर बच्चे से बिस्कुटों इत्यादि के स्टॉक को बचाने के लिए उसमें ताला बंद करना शुरू कर दिया था, वर्ना अचानक आने वाले मेहमानों को क्या खिलाते?

बच्चा मचल गया और फर्श पर बैठकर हाथ-पाँव पटकने लगा - 'बिस्कुट... बिस्कुट।'' 'भइया जी' के इस हाल से अविचलित गयाप्रसाद उसका भारी-भरकम स्कूल बैग उठाए हुए भीतर घुसा और उनके बेडरूम में चला गया। ये ससुर इंग्लिश स्कूल वाले न जाने क्या पढ़ाते हैं? बस्ते का बोझ तो देखो! अच्छे-खासे इंसान के बच्चे को गधे का बच्चा बना देते हैं।

अर्चना ड्राइंगरूम से दौड़ी-दौड़ी आई और उसने अपने धरती पर मचलते हुए 'हिंदुस्तान के भविष्य' को गोदी में उठा लिया। वह उसे लिए-लिए बेडरूम से एक चाबी निकालकर लाई और उसे गयाप्रसाद के हाथों में देती हुई बोली - ''जा! ... मिड सेफ में से बाबा के लिए दो बिस्कुट निकाल के ले आ। ... मेला लालन ... मेला पालन।''

उधर जैसे ही गयाप्रसाद ने चुटपुटिया ताले में चाबी घुमाई मैं फुर्ती से पीछे के चोर छिद्र से निकल भागा। मैं वैसी कोई गलती नहीं करना चाहता था जैसी कि दुराचारी एवं माया नामक उन चूहा दंपति ने मंत्री जी के 'अपार्टमेंट' में की थी। दरअसल, अभी मैं और जीना चाहता था और दुनिया को देखना चाहता था। मिड सेफ से निकलते ही मैंने गयाप्रसाद और उसकी मालकिन की नजर बचाकर, वाशबेसिन की दीवार से सटकर, बाहर आँगन की तरफ सरपट दौड़ लगाई। उसके बाद आँगन में पहुँचकर मैं नाली के रास्ते पिछवाड़े की बगिया में निकल गया।

बगिया के अंदर, केले और पपीते के पेड़ लगे थे। तरह-तरह के फूल भी खिले थे। माली गुलाबचंद वहाँ बड़ी मेहनत करता था। कानूनगों सदर ने बगिया के बीचोबीच फूस और बाँसों से एक सुंदर-सी गोल छतरी का निर्माण करा दिया था जिसके नीचे शाम के समय अक्सर साहब और मेमसा'ब बैठकर चाय पीते थे। दोपहरिया के समय वह छतरी बँगले के चपरासियों और मालियों के लिए पनाहगार बन जाती थी। इस समय भी उन लोगों की चंडाल-चौकड़ी वहाँ जमा थी और बीड़ियाँ के दौर चल रहे थे।

हरिसिंह कह रहा था - ''आज तहसील में तकावी बट रही है। बड़ी भीड़ लगती है।''

गयाप्रसाद पूछ रहा था - ''तकावी क्या होती है?''

हरिसिंह का कहना था - ''यह लो... गुलाबचंद, अब इस नए चूजे को तुम्हीं समझाओ कि तकावी क्या होती है।''

गुलाबचंद ने कहा - ''तकावी का मतलब है ऐसे किसानों को दी जाने वाली सहायता जिनकी फसल ओला-पानी में मारी गई हो।''

गयाप्रसाद ने फिर पूछा - ''सहायता में क्या बाँटता है?''

हरिसिंह ने कहा - ''रुपया!''

गयाप्रसाद ने पूछा - ''सच्ची? ... क्या तहसील में बड़ी भीड़ है?''

हरिसिंह ने स्वीकारोक्ति में सिर हिलाया।

''वह क्यों?'' इस बार चपरासी दीनानाथ ने पूछा। वह भी नया लड़का था।

''लोगों को मुफ्त खाने की आदत जो है।'' गुलाबचंद ने दार्शनिक भाव से कहा।

''तो तहसील वाले मुफ्त की खिलाते क्यों हैं?'' दीनानाथ का कहना था।

गुलाबचंद से कुछ कहते नहीं बना। इस पर दीनानाथ ने हरिसिंह से पूछा - ''चच्चा... तुम्हीं बताओ।''

''बेटा, जरा पुराना पड़ जा। फिर सब कुछ तू खुद ही जान जाएगा।''

''बताओ न चच्चा! पहेली न बुझाओ।''

''माल-पानी!'' बुढ़ऊ अर्दली हरिसिंह का कहना था - ''सब... माल-पानी का चक्कर है।''

पुलिस क्षेत्राधिकारी श्री त्यागी का बँगला बराबर में ही था। लंच सेशन से फुर्सत पाकर अर्चना वहाँ चली गई। त्यागी जी प्रमोटेड अधिकारी थे। अतः उनकी पत्नी श्रीमती त्यागी अर्चना की आंटी की उम्र की थीं। अर्चना भी श्रीमती त्यागी को 'भाभी जी' के बजाय 'आंटी जी' ही कहती थी। आंटी जी एक अत्यंत हँसमुख एवं मिलनसार महिला थीं। अर्चना की उनसे खूब पटती थी।

श्रीमती त्यागी इस समय बरांडे में एक आराम कुर्सी पर बैठी हुई एक पुलिस के 'फालोअर' अर्थात सेवक से अपने आँगन में अचारदान धूप में रखवा रही थीं। अंग्रेजों ने भी 'इंडिया' छोड़ते समय बड़ी अच्छी-अच्छी परंपराएँ छोड़ी थीं। पुलिस अधिकारियों को फौजियों की भाँति कड़क एवं आत्मनिर्भर होना चाहिए। उन्हें अपना निजी कामकाज स्वयं करना चाहिए। सिविल अधिकारियों की भाँति अगर वह भी चपरासियों की फौज पर आश्रित रहने लगे तो हो चुका 'क्राइम कंट्रोल'। किंतु पुलिस अधिकारियों को समय की बचत के लिए एक सस्ता सहायक दिया गया, जिसे नाम दिया गया - 'फालोअर'। अब फालोअर पारिश्रमिक के नाम पर भले ही हवा फाँके या दैनिक भत्ते के रूप में प्राप्त होने वाले चंद सिक्के अपनी जेब में उठाए-धरे, काम के नाम पर साहब के जूता-पालिश से लेकर तेल-मालिश तक और मेम सा'ब की दी हुई सभी बेगारें मुँह सिलकर पूरी करता है। यही हाल 'ग्रामीण चौकीदार' का भी है, परंतु उसका स्वामी थानेदार है।

अर्चना को देखते ही श्रीमती त्यागी खिल गईं। बोलीं - ''आज बड़ी बिटिया रानी की चिट्ठी आई है दिल्ली से।''

''अच्छा आंटी!... क्या लिखा है? अर्चना ने उत्सुकता से पूछा।

''अगले हफ्ते आ रही है वह... इतवार के दिन''

''सच?... तब तो बड़ा मजा आएगा।'' कहकर अर्चना वास्तव में बड़ी खुश हो गई।

खुश होने की तो बात ही थी। इस छोटी-सी तहसील में 'कंपनी' के नाम पर रखा ही क्या है? न कहीं आ सकते हैं, न कहीं जा सकते हैं। 'शापिंग' करने बाजार जाना चाहो तो सड़ी-सड़ी दुकानें हैं। यहाँ न ढंग का कपड़ा मिलता है और न ही 'मेकअप' का सामान। जब भी कुछ खरीदना चाहो तो जिला मुख्यालय जाओ। और वहाँ भी कितना जाया जा सकता है। बस, अधिक से अधिक महीने में एक या दो बार। ... एस.डी.एम. साहब को तो अपने काम से ही फुर्सत नहीं है। ... खैर, अब आंटी की बेटी आ जाएगी तो कुछ दिन उसके साथ गपशप करके अच्छे कटेंगे। मेरी हम उम्र ही तो होगी। और फिर आंटी भी क्या कम हैं? इस उम्र में भी अभी कितनी सुंदर दिखती हैं! कितना 'मेनटेन' किया हुआ है इन्होंने अपने-आपको! त्यागी अंकल यों ही थोड़ी आगे-पीछे घूमते हैं इनके... अभी तक...।

अर्चना मन ही मन यही सब सोचकर मुस्करा रही थी। सच ही तो है, शहरों में पली-बढ़ी अर्चना जैसी युवती को भला तहसील का अधकचरा और बँधा-बँधाया जीवन आखिर कितने दिन सुखद लग सकता था। वह किसी हमउम्र सहेली से मिलने के लिए जैसे दिन गिना करती थी।

उधर श्रीमती त्यागी ने अचारदानियों को धूप में रखने के बाद फालोअर को अगला काम बताया। बड़े बक्से में कंबल-लिहाफ पड़े थे। आज उन्हें भी धूप दिखा दी जाए तो अच्छा होगा।

फालोअर आदेश का पालन करने लगा और दोनों अधिकारी पत्नियाँ आपस में अपराह्न का वार्तालाप करने लगीं। श्रीमती त्यागी के कहने का आशय था कि आजकल मौसम को न जाने क्या हो गया है! न गर्मियों में पहले जैसी लू चलती है, न वर्षा में जमकर बरसात होती है और न जाड़े में ढंग की शीत लहर चलती है। दशहरे तक सीलिंग फैन हवा देते रहते हैं और सुबह-सुबह कुछ घंटे ही ऐसे होते हैं जबकि चादर ओढ़नी पड़ती है अथवा पंखा हल्का कर देना पड़ता है।

'मौसम' एक ऐसा विषय है कि जब आपको सामने वाले से बात करने का कोई सिरा न मिले तो बड़ी निश्चिंतता के साथ इस विषय पर शुरू हुआ जा सकता है। वर्तमान परिस्थतियों पर थोड़ा-सा ध्यान देकर आप मौसम के बारे में जो कुछ भी कहेंगे वह किसी मौसम विशेषज्ञ के कथन से कम नहीं होगा। वर्तमान में यदि आपने अतीत के कुछ अनुभव भी जोड़ दिए तब तो आप महाज्ञानी कहलाएँगे। और यदि भविष्य की रूपरेखा पर भी आप कुछ टीका-टिप्पणी कर सकें तो आपकी गणना परमज्ञानी से कम की हो ही नहीं सकती।

अर्चना ने पास में रखा टेलीफोन का रिसीवर उठाया और बगल के अपने घर का नंबर डायल किया। टेलीफोन बाहर बरांडे में ही रखा था। उसकी घंटी की आवाज यहीं से सुनाई दे रही थी। थोड़ी देर में उधर से गयाप्रसाद ने टेलीफोन उठाया।

''हेलो!''

''जी मेम सा'ब!''

''बॉबी जगा है कि सो गया?''

''सो गए मेम सा'ब!''

''और साहब?''

''आराम कर रहे हैं।''

''ठीक है।... मेरे सिरहाने बुनाई रखी होगी। उसे ले आओ।''

''बहुत अच्छा मेम सा'ब!''

गयाप्रसाद बुनाई दे गया और दोनों महिलाओं के बीच स्वेटर की नई डिजाइनों पर बातचीत चल निकली। श्रीमती त्यागी अर्चना को महिलाओं की कुछ नई पत्रिकाएँ दिखाने लगीं, जिनमें नई-नई डिजाइनें छपी थीं। फैशनेबल मॉडल्स पर रंग-बिरंगे स्वेटर खूब फब रहे थे। फिर बात मॉडलिंग की दुनिया से होती हुई फिल्मी दुनिया तक जा पहुँची। श्रीमती त्यागी दिलीपकुमार और मधुबाला के किस्से सुनाने लगीं। अर्चना की रुचि गोविंदा, शाहरुख खान, माधुरी दीक्षित और जुही चावल में थी।

जब शैलेश ने अर्चना को बताया कि आज डी.एम. साहब के यहाँ सायं पाँच बजे मीटिंग है तो मेरे कान खड़े हो गए। मैं समझ गया कि इससे अच्छा अवसर जिला मुख्यालय तक पहुँचने का फिर इतने शीघ्र नहीं मिलने वाला था। अतः मैंने भी शैलेश के साथ निकल जाने का निश्चय कर लिया।

दोपहर तीन बजे शैलेश ने जिला मुख्यालय के लिए प्रस्थान चाहा। उसी समय सूचना मिली के अल्लापुर में कुछ गड़बड़ है। उसे तथा सी.ओ. साहब को तुरंत वहाँ बुलाया जा रहा था। सी.ओ. साहब त्यागी जी भी आ गए। उन्होंने शैलेश से पूछा कि वह कहाँ जा रहे हैं? शैलेश ने बताया कि डी.एम. साहब के यहाँ एक आवश्यक बैठक है, जिसमें सभी एस.डी.एम. बुलाए गए हैं। इधर कुछ समय से डी.एम. साहब काफी चिंतित रहने लगे थे। अल्पबचत और परिवार कल्याण कार्यक्रम में उनका जिला बहुत पिछड़ रहा था। ऐसी बैठकों में शैलेश और अन्य अधिकारी सहमे हुए जाते थे। वहाँ उन्हें निर्देश कम और खिंचाई का सामना अधिक करना पड़ता था।

अब ऊपर से यह नई मुसीबत। अल्लापुर। दोनों अधिकारी साथ-साथ वहीं के लिए रवाना हो गए। कानून और व्यवस्था का नियंत्रण प्रशासनिक कार्यों में सबसे प्राथमिक कर्त्तव्य होता है। शैलेश अपनी जीप स्वयं ड्राइव करने लगा। बराबर की सीट पर त्यागी जी बैठ गए। उन्होंने अपनी पी-कैप उतारकर जीप में सामने की होरीजोंटल रॉड में फँसा दी। इधर मैं मूषक ड्राइवर और अर्दली के साथ पीछे की तरफ उनकी टाँगों के निकट सीट के नीचे दुबककर बैठ चुका था।

पीछे-पीछे त्यागी जी की जीप भी उनके ड्राइवर ने चार राइफलधारी सिपाहियों के साथ हाँक दी। चौराहे के बाद की पुलिया को पार करते ही दोनों सरकारी जीपों ने एक पतली किंतु पक्की सड़क पकड़ ली। खेतों-खलिहानों, बागों और ऊसर मैदानों का सिलसिला शुरू हो गया।

सामने से आता हुआ हर साइकिल-सवार हम पर दृष्टि पड़ते ही सड़क छोड़ देता। हाकिमों की गाड़ियों का असर इक्के-तांगे वालों पर भी खौफनाक ढंग से पड़ता। वह सड़क की पटरी को भी छोड़कर इस तरह अपने बाएँ भागते कि यदि इस प्रक्रिया में उन्हें खाई-खंदक में फादना पड़े तो भी कोई गम नहीं। प्राइवेट बसों और टैक्सी-टैंपों वाले, जो सवारियों को भूसे की तरह भरकर चल रहे होते थे, बड़े अदब से अपनी गाड़ी कच्चे में उतारकर धूल के चंदन से साहब लोगों का मानो स्वागत करते। आखिर इन्हीं की कृपा से तो उनकी रोजी रोटी चल रही थी।

लगभग आधे घंटे की दौड़ के बाद अल्लापुर आ गया। वह एक छोटा-सा कस्बा था। कस्बे के जिस सिरे से हमारी गाड़ियों ने प्रवेश किया उसी सिरे पर अल्लापुर का पुलिस थाना था। थाने के गेट पर ही थानाध्यक्ष जामवंत यादव मिल गए। उन्होंने दोनों अधिकारियों को सैल्यूट किया और बताया कि -

''सर! ... दस कदम आगे चौराहे पर ... एक रामलीला रथ खड़ा है।''

मुझे थानाध्यक्ष महोदय के द्वारा इतने इत्मीनान के साथ कहे गए शब्दों को सुनकर लगा कि मानो आगे वह कहेंगे के 'आइए सर!' आपको रामलीला की रथ-यात्रा का शुभारंभ करना है। जनता बड़ी बेसब्री से आपका इंतजार कर रही है।''

मगर बात कुछ और थी। थानाध्यक्ष यादव जी कह रहे थे - ''रामलीला कमेटी वाले राजगद्दी का रथ इधर मुसलमानी इलाके में निकाल लाए हैं। मुसलमान इसी का विरोध कर रहे हैं।''

''विरोध क्यों कर रहे हैं? क्या ऐसा पहली बार हो रहा है?'' शैलेश ने पूछा।

स्वर को और भी कोमल बनाते हुए थानाध्यक्ष ने कहा - ''जी सर!... ये पहली बार है।''

''क्या त्योहार रजिस्टर में इसका कोई तजकिरा है?''

''जी नहीं। उसमें तो कुछ साफ नहीं लिखा है। पर कस्बे के लोगों का कहना है कि यह रथ इधर पहले कभी नहीं लाया गया। यह पहली मर्तबा है कि...''

''वो तो ठीक है। पर पहले तू ये बता कि फिर ये रामरथ यहाँ आया कैसे? ... जब ये रथ यहाँ आया उस वक्त तू कहाँ था जामवंत?'' अब सी.ओ. साहब त्यागी जी ने जरा गर्म होकर थानाध्यक्ष की बात काटी।

''सर! मैं तो सुबह ही दबिश में निकल गया था पंचौली गाँव... वहाँ से लौटा तो ये नजारा पाया। ... दरोगा जी हरिमगन सिंह को रामलीला स्थल पर मन्दिर में लगा भी गया था मगर... अब क्या कहें सर? आप तो सारी बात जानते ही हैं।'' उसके चेहरे पर यह कहते हुए एक रहस्यमय भाव उभरा।

''अच्छा चलो, मौका दिखाओ।'' कहकर त्यागी जी जीप से उतर लिए। शैलेश ने भी ड्राइविंग सीट छोड़ दी। वे पैदल ही चौराहे की ओर बढ़ लिए। शैलेश ने अपने अर्दली को इशारा किया। वह गाड़ी में से साहब का 'हेलमेट' निकालकर उनके पीछे-पीछे हो लिया।

चौराहे पर पीठ किए हुए एक रथ खड़ा था। एक बैलगाड़ी को सजाकर उस पर चौकी रखकर और वितान तानकर उसे रंगबिरंगे रथ की शक्ल दी गई थी। सजी हुई चौकी पर चार छोटे-छोटे बच्चे राम-सीता-लक्ष्मण और हनुमान जी के वेश में बैठे हुए थे। रथ का जुआ दो लकड़ियों पर टिका हुआ था और उसमें नथे हुए बैल खोल लिए गए थे।

वह रथ इस समय बीच चौराहे पर विवाद का केंद्र बना हुआ खड़ा था। चौराहे से उस ओर की सड़क पर ढाई-तीन सौ मुसलमानों का हुजूम हाथों में लाठियाँ लिए मजहबी नारे लगा रहा था। इधर रथ को चारों ओर से घेर चार-पाँच सौ हिंदुओं का समूह भी उग्र स्वर से धार्मिक नारे लगा रहा था। इन लोगों में से कुछ के हाथों में लाठियाँ थीं और अधिकतर लोग हाथ में लकड़ियों के चैले या सूखी हुई डालें लिए हुए उछल-कूद कर रहे थे। पास ही में जो एक लकड़ी की टाल थी, वहीं से आनन-फानन में यह सर्वसुलभ प्रहार सामग्री जुटा ली गई थी।

ईश्वर और अल्लाह के बंदे इस प्रकार एक-दूसरे के आमने-सामने थे और उनके बीच मात्र सौ गज का फासला था। बस, 'यलगार हो' या 'आक्रमण' कहने भर की देर थी।

वहाँ पहुँचते ही शैलेश ने कमान सँभाल ली। उसने रथ के निकट खड़े होकर पहले दोनों पक्षों को डपटकर खामोश कराया। फिर कहा कि - ''इस तरह से उत्तेजित होने से किसी समस्या का हल नहीं हो सकता। दोनों पक्षों की शिकायत सुनी जाएगी। इसके लिए दोनों तरफ के पाँच-पाँच नेता तत्काल थाने पर पहुँचें। ... बाकी लोग अपने घरों को प्रस्थान करें। किसी को भी कानून को अपने हाथ में नहीं लेने दिया जाएगा। सख्त कार्यवाही होगी...।''

इस पर दोनों और की भीड़ फिर से नारे लगाने लगी। इस बार त्यागी जी लोगों को खामोश कराने लगे। परंतु भीड़ की उत्तेजना बढ़ती गई। तब शैलेश पुनः गरजा। उसने लोगों से दो मिनट के भीतर वहाँ से तितर-बितर हो जाने को कहा। नारे और तेज हो गए। दोनों ओर के समूह ललकारते हुए आगे बढ़े। तब भीड़ में से दोनों ओर कुछ नेता उभर आए। वे अफसरों का कड़ा रुख देकर उत्तेजित भीड़ को समझाने लगे और लोगों को पीछे धकेलने का प्रयास करने लगे।

नारे गगनभेदी हो गए। पुलिस बल का घेरा और निकट सरक आया। शैलेश ने हेलमेट चढ़ाया। त्यागी जी ने भी पी-कैप की जगह सिर पर हेलमेट धारण किया। पुलिस वालों ने जमीन पर अपनी लाठियाँ पटकीं। सामने की भीड़ के पृष्ठ भाग से उछलकर दो-तीन ईंट-पत्थर सामने गिरे और 'लाठीचार्ज' के आदेश के साथ पुलिस और पी.ए.सी. ने उस 'गैरकानूनी मजमे' पर हमला बोल दिया।

'तड़ातड़' और 'धपाधप' की आवाज के साथ सरकारी लाठियाँ बरस पड़ीं और उनके साथ ही वहाँ एकत्रित जनसमूह में भगदड़ मच गईं। मिनटों में वह चौराहा ही नहीं पूरी सड़क खाली हो गई। धन्य हो लाठी रानी! तुम्हारी लीला अपरंपार है। जब तक तुम खामोश रहती हो लोग बोलते हैं और जब तुम बोलती हो फिर दूर-दूर तक कोई सुनने वाला नजर नहीं आता।

अल्लापुर में एक अघोषित कर्फ्यू लागू हो गया। पुलिस की जोरदार गश्त चालू हो गई। लोग घरों में दुबक गए। जिनके दरवाजे भिड़ने में देर लगी वहाँ पुलिसवालों ने विकट मुहावरेदार शब्दावली का प्रयोग करते हुए पदप्रहार किए।

विवादित रथ को खींच-खाँचकर पास के एक मंदिर में पहुँचा दिया गया। वहाँ कुछ पुलिस लगा दी गई। उसके बाद शैलेश और त्यागी जी दोनों थाने में उस रात रुक गए। उन्होंने वायरलेस से उच्चाधिकारियों को स्थिति के नियंत्रण की सूचना दी। सूचना का ढला-ढलाया-सा मजमून था - ''स्थिति तनावपूर्ण किंतु नियंत्रण में है।'' उधर से निर्देश मिला कि - ''अग्रिम आदेशों तक वहीं बने रहें।''

अगली सुबह जब दोनों जीपें पुनः जिला मुख्यालय के लिए रवाना हुईं तो मेरी अपनी यात्रा का अग्रभाग शुरू हुआ।


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