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उपन्यास

अथ मूषक उवाच
सुधाकर अदीब


पोपटलाल की आत्मदाह की धमकी और अधिवक्ता संघ के प्रस्तावित रास्ता रोको आंदोलन को ध्यान में रखकर जिला प्रशासन ने हर प्रकार के जुलूस, धरना, प्रदर्शन व अन्य आंदोलनों को निषिद्ध करके धारा 144 लागू कर दी।

नगर के चप्पे-चप्पे पर सुबह से ही पुलिस और होमगार्डों की टुकड़ियाँ तैनात कर दी गईं। कचहरी प्रांगण और आसपास भारी संख्या में पी.ए.सी. बल भी लगाया गया। अधिकारीगण मुख्य मार्गों और महत्वपूर्ण चौराहों पर स्वयं सतर्क दृष्टि रखने लगे।

सादे लिबास में खुफिया पुलिस भी अधिवक्ता संघ भवन और कचहरी प्रांगण में क्रियाशील हो गई। उस तिकोनिया पार्क में भी कई पुलिस के जवान अपने डंडों के पास धूप सेंकने लगे, जिसमें आजकल अलग-अलग किस्म की प्रतिमाओं की स्थापना का विवाद चल रहा था।

वकील कब संघ भवन से निकलकर सड़क पर बैठ जाएँगे - कोई नहीं जानता था। इसी तरह पता नहीं किस दिशा से अचानक नमूदार होकर पोपटलाल आत्मदाह कर बैठेगा - यह भी एक पहेली-सा अधर में लटका था। वस्तुतः पोपटलाल ने जिस दिन अखबार वालों को आत्मदाह-विषयक बयान दिया था उसी दिन से वह भूमिगत हो गया था। पुलिस वालों ने उसे निवास-स्थान और विभिन्न ज्ञात-अज्ञात समूहों के अड्डों पर, समाचार छपने के बाद से, लगातार कई बार छापे मारे थे, परंतु सारे प्रयास विफल रहे और पोपटलाल गिरफ्तार नहीं किया जा सका। उसके अन्य साथियों से भी उसके विषय में काफी पूछताछ की गई, किंतु उसका कोई सुराग नहीं मिल सका। पोपटलाल की धमकी से अधिकारियों को चक्कर और पुलिस वालों को पसीना आ गया था।

अधिवक्ता संघ की बैठक संघ भवन में दोपहर बारह बजे तक चलती रही। पुलिस बल, मजिस्ट्रेट, सी.ओ. सभी बाहर सड़क पर प्रतीक्षारत रहे। बिना कामकाज प्रतीक्षा करने में अक्सर भूख लग जाया करती है। ऐेसे में मूँगफली और अमरूद के ठेलेवालों की बन आई। अच्छा-खासा क्रय-विक्रय हुआ और बैठे-ठाले की उदरपूर्ति।

साढ़े बारह बजे संघ भवन के प्रांगण में जिंदाबाद' और 'मुर्दाबाद' के नारे बुलंद हुए। लोगों ने देखा कि अधिवक्तागण का जुलूस कचहरी में निकलकर चहलकदमी करने लगा। टंडन साहब सबसे आगे थे। मगर वह चल कम रहे थे और धकियाए ज्यादा जा रहे थे। बहुमत का निर्णय शिरोधार्य।

नारे बुलंद होते गए - ''जो हमसे टकराएगा, चूर-चूर हो जाएगा।'' मगर कोई पुलिस वाला वकीलों से टकराने के 'मूड' में नहीं था। ''डी.एम. एस.पी. की हठधर्मी नहीं सहेंगे-नहीं सहेंगे।'' किसी ने नया नारा दिया। उसे हाथोंहाथ लिया गया। जुलूस आगे बढ़ता गया। सर्द माहौल में गर्मी बढ़ती गई।

इस प्रकार, कानून के व्याख्याता न्यायालयों को घेरने वाली सड़कें नापने लगे और कानून के रक्षक उनको घेरकर हतप्रभ-से साथ-साथ चलने लगे। यह जुलूस पूरी कचहरी में घूमा। अधिकारियों ने उस समय मौके की नजाकत को देखते हुए हस्तक्षेप नहीं किया। किंतु ज्योंही जुलूस कचहरी के मुख्य गेट से बाहर मार्ग की ओर बढ़ा, मजिस्ट्रेट और पुलिस के अधिकारीगण दलबल सहित उनके सामने दीवार बनकर खड़े हो गए।

वहाँ थोड़ी-बहुत हुज्जत के बाद उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। सामने रोडवेज की तीन-चार बसें लगा दी गईं। वकील लोग नारे लगाते हुए उनमें स्थान ग्रहण करने लगे।

इधर यह कार्यक्रम चल ही रहा था कि दूसरे गेट से पचास-साठ वकीलों का एक अन्य समूह मुख्य सड़क पर निकल गया और बीच सड़क पर जाकर बैठ गया। अधिकारीगण चकित होकर उस ओर दौड़े। मार्ग में जाम लगने लगा। वकीलों को सड़क से उठने के लिए समझाया-बुझाया जाने लगा। वे नारे लगाते रहे और डी.एम. को वहाँ बुलाने की माँग करते रहे।

अंततः पंद्रह-बीस मिनट की कशमकश के बाद उन दोनों ने भी गिरफ्तारी दे दी। एक पी.ए.सी. का ट्रक मँगाया। कुछ लोग उसमें चढ़े। मगर कुछ ने पी.ए.सी. वाहन में जाना अपनी तौहीन समझी। उनके लिए एक और रोडवेज की खाली बस मँगाई गई। अवशेष वकील उसमें चढ़े।

पोपटलाल आम तौर पर धोती-कुर्ता और सदरी पहनता था। उसके चेहरे की घनी दाढ़ी उसकी प्रमुख पहचान थी। कंधे पर हरदम लटकने वाला एक भूदानी झोला, पैरों में कपड़े के जूते और उन पर पिंडलियों तक चढ़े हुए खाकी रंग के लंबे पुलिसिया मोजे उसके व्यक्तित्व के मानो अभिन्न अंग थे।

आत्मदाह की घोषणा के बाद पोपटलाल ने सरकारी तंत्र को छकाने की हरसंभव तैयारी की थी। सबसे पहले उसने अपने घर से अपना जरूरी सामान एक अटैची में भरा और अपने एक मित्र के विश्वसनीय संबंधी के घर रातोरात शरण ली। वहाँ उसने अपना नेता वाला हुलिया पूरी तरह बदल दिया। उसने वर्षों से पली हुई अपनी दाढ़ी-मूँछे मूँड़ डालीं। सिर के अधपके बालों पर मेहँदी का खिजाब लगा लिया।

अभियान वाले दिन उसने धोती-कुर्ता की जगह पैंट-कोट पहना। कपड़े के जूतों की जगह चमड़े के जूते कसे। पूर गले का ऊनी स्वेटर पहना और सिर पर एक बंदर टोपी लगाई। आज सुबह तड़के से ही कोहरा घना था। पोपटलाल एक साइकिल पर सवार होकर कचहरी के लिए निकल पड़ा। रोज दफ्तर जाने वालों की भीड़ में मिलकर वह भीड़ का ही एक-एक हिस्सा बन गया।

साइकिल पर टँगे एक झोले में उसने मिट्टी के तेल ही एक बोतल रख छोड़ी थी। सिगरेट तो वह पीता ही था। आराम से एक सिगरेट सूतता हुआ वह कचहरी के पिछवाड़े वाले गेट से साढ़े दस बजे दाखिल हुआ। किसी का ध्यान उसकी ओर नहीं गया। उस गेट पर तैनात पुलिस वाले भी आपस में बतियाते हुए हथेली पर खैनी मलते रहे।

पोपटलाल घूमकर पहले वकीलों के 'शेड्स' की तरफ गया। फिर आसपास का एक नजारा लेकर पुनः कचहरी के पृष्ठ भाग में चला गया। अपनी साइकिल उसने पाकड़ के पेड़ के निकट दीवार से सटा दी और थोड़ी दूर पर सिर के नीचे हथेली रखकर कचहरी के मैदान में लेट गया। कोहरा अब तक पूरी तरह छँट चुका था और गुनगुनी धूप निकल आईं थी। पोपटलाल चुपचाप पड़ा-पड़ा धूप सेंकने लगा। उसके पास थोड़ी-थोड़ी देर में आकर उसका एक खास मित्र बच्चीसिंह आसपास का आँखों देखा हाल सुनाने लगा।

''अब पुलिस की गाड़ियन के पास रोडवेज की बसें आय गईं हन। वकील लोगन की मीटिन चलता बा...''

''अब मजिस्ट्रेट साहबौ आय गै। झल्लूस पुलिस वाले रोके हन। कहा-सुनी होत बा...''

''बस-बस, अब तू जा और अपने आदमियों को बुला ला।'' कहते हुए पोपटलाल उठा और अपनी साइकिल की ओर बढ़ा। अब तक वहाँ और भी कई साइकिलें खड़ी हो चुकी थीं।

बच्चीसिंह आनन-फानन में गया इस बार जब वह लौटा तो उसके साथ दो आदमी और थे। पोपटलाल उन दोनों आदमियों के साथ पैदल ही मंगू चायवाले की दुकान की ओर बढ़ गया। बच्चीसिंह ने पोपटलाल की साइकिल सँभाली और एक ओर को निकल गया।

पोपटलाल और उसके साथी घूम-फिरकर आराम से मंगू की दुकान के भीतर पड़ी बेंचों पर बैठ गए और चाय सुड़ुप करने लगे। थोड़ी देर में ही बच्चीसिंह तेजी से वहाँ आया। उसने दुकान के बाहर साइकिल खड़ी की और हाँफते हुए उन्हें बताया कि ''वकील लोग रोडवा जाम कर दिहिन।''

सुनते ही पोपटलाल और उसके दोनों साथी हरकत में आ गए। उनमें से एक ने बच्चीसिंह से कहा - ''अब तू ये साइकिल पकड़ और यहाँ से फूट ले। ... बड़ी देर से तेरी सूरत देख रहे होंगे सब।'' साइकिल पर टँगा झोला लेकर वे तीनों एक ओर चल दिए। बच्चीसिंह दूसरी ओर छूमंतर हुआ। तीनों लोग कचहरी के पृष्ठ भाग में स्थित मैदान में पहुँच गए और वहाँ पर यत्र-तत्र लेटे-बैठे वादकारियों के बीचोबीच जाकर खड़े हो गए।

पोपटलाल ने एक झटके के साथ अपने सिर से बंदर टोपी खींचकर उतार ली। उस टोपी को अपनी उँगली पर सुदर्शन चक्र की भाँति घुमाता हुआ अचानक किसी मदारी की तरह वह जोर-जोर से कहने लगा -

''हाँ तो भाई लोगों! अब वक्त आ गया है इस गूँगे-बहरे प्रशासन को इकझोरने का। आज से तीन दिन पहले मैंने याने कि पोपटलाल ने दादा साहब की प्रतिमा कचहरी में लगवाने को लेकर इस भ्रष्ट प्रशासन को यह चेतावनी दी थी कि अगर हमारी माँग नहीं मानी गई तो मैं इसी कचहरी में आत्मदाह करूँगा। मगर अफसोस... किसी के कान में जूँ तक न रेंगी ... अब प्रशासन इसका परिणाम भुगते।''

पोपटलाल ने हाथ में नचाती बंदर टोपी नीचे गिरा दी। झोले में से मिट्टी के तेल की बोतल निकाली। उसका ढक्कन खोलकर थोड़ा तेल टोपी पर छिड़का। जेब से माचिस निकालकर एक तीली सुलगाई और टोपी में आग लगा दी। टोपी सुलगने लगी।

आसपास ऊँघते हुए लोगों को एकाएक विद्युत करंट सा लगा। वे उठ-उठकर खड़े होने लगे और पीछे हटने लगे। वहाँ से गुजरते दूसरे लोग भी ठिठकने और उधर मुड़-मुड़कर देखने लगे।

''आज समय आ गया है इस हिजड़ी और नपुंसक व्यवस्था को सबक सिखाने का। इसलिए अब मैं अपने आपको आप सबके सामने... आग के हवाले करता हूँ'' - कहकर पोपटलाल नाटकीय ढंग से उछल-उछलकर उस बोतल का तेल अपने कपड़ों पर छिड़कने लगा।

वहाँ खड़े लोगों में भगदड़ मच गई। कुछ हिम्मत वाले वहाँ टिके रहकर पोपटलाल के दोनों साथियों को ललकारने लगे - ''अरे, यह क्या कर रहे हो तुम लोग? ... उसे रोको।''

लेकिन वे दोनों आदमी जड़वत अपनी जगह पर खड़े रहे।

पूरी बोतल खाली करके पोपटलाल ने काँपते हाथों से माचिस की एक तीली सुलगाई। वह नहीं जली। उसने पुनः सुलगाने की कोशिश की। तीली टूट गई। फिर उसने दूसरी तीली निकाली। वह भी उसके हाथ से छूट गई। फिर तीसरी। फिर चौथी। माचिस ने जैसे जलने से इंकार कर दिया। पोपटलाल वास्तव में जलना नहीं चाहता था, इसलिए उसकी माचिस भी आखिरी मौके पर मानो सील गई।

तभी कुछ पुलिस वाले एक दरोगा के नेतृत्व में उस ओर भागकर आते दिखे। उनके डंडे हवा में लहरा रहे थे। वे गले से इस प्रकार की आवाजें निकाल रहे थे जैसे किसी जंगल में हाँका लगा रहे हों। उन्हें देखकर पोपटलाल का एक साथी भाग खड़ा हुआ, लेकिन दूसरा साथी वहीं खड़ा रहा।

उसी समय न जाने किस दिशा से बच्चीसिंह साइकिल दौड़ाता हुआ आया। उसने पोपटलाल को 'लिफ्ट' देनी चाही और नजदीक पहुँचकर चीखकर कहा - ''पोपट, भाग! ... पु-पु-पु-पुलिस!''

लेकिन पोपटलाल अपनी जगह से नहीं हिला। वह आत्मसमर्पण की मुद्रा में आ गया। किंतु उसके पास खड़े दूसरे साथी ने अचानक एक लाइटर अपनी जेब से निकाला और उसे पोपटलाल के शरीर से छुआ दिया। पोपटलाल हक्का-बक्का हो कर जलने लगा और उसे जलाने वाला वह व्यक्ति वहाँ से भाग छूटा।

पुलिस वाले तब तक बिलकुल निकट पहुँच गए। दरोगा ने जलते हुए पोपटलाल को धक्का देकर जमीन पर गिरा दिया। वह उसे जमीन पर रोल करके आग पर काबू पाने का प्रयास करने लगा। एक पी.ए.सी. वाले ने झटपट अपने गले के दोनों ओर पहना जाने वाला 'बॉडी प्रोटैक्टर' उतारा और उससे पोपटलाल के शरीर को कवर करने का भरसक प्रयास करने लगा। कुछ दूसरे जवान आसपास से मिट्टी उठाकर पोपटलाल पर झोंकने लगे। किसी तरह आग पर काबू पा लिया गया।

उधर भागते हुए बच्ची सिंह की साइकिल के पहिए में एक होमगार्ड ने दौड़कर अपना डंडा घुसेड़ दिया। बच्ची सिंह भहराकर गिर पड़ा। तब कई होमगार्डो ने जमीन पर गिरे हुए बच्चीसिंह की लाठियों से जमकर तुड़ाई कर डाली।

तभी भागते हुए पोपटलाल के दोनों साथियों ने पलटकर एकबारगी कुछ ईंटों की बौछार की। उससे पुलिस के दो जवान घायल हो गए। एक पी.ए.सी. वाले के चेहरे पर एक ईंट लगी और उसकी नाक से रक्त की धार फूट निकली। तब तक और पुलिस आ गई। अपने साथियों को चोट खाया देखकर सारा पुलिस बल बेकाबू हो गया और उसने बिना किसी आदेश की प्रतीक्षा किए कचहरी में चारों ओर धावा बोल दिया। ...

अब तो जहाँ जो मिला उसे पुलिस और पी.ए.सी. के डंडों का अकारण शिकार बनना पड़ा। सब तरफ हाहाकार मच गया। दे डंडा! दे डंडा! मार स्साले को! कोई बचकर जाने न पाए। ...

टंडन साहब के मुंशी जी गिरधारी लाल भी पिट गए। उन्हें काफी चोटें आईं। एक कलाई की हड्डी भी टूट गई। इन सब घटनाओं के बीच मैं मासूम मूषक टंडन साहब की कार के नीचे अपनी दुम दबाए खड़ा-खड़ा थरथर काँपता रहा।

देखते ही देखते सारी कचहरी कंपाउंड में पुलिस ही पुलिस बिखर गई। जवानों के बूटों की चरमराहट। चंद कउवों की काँव-काँव। शेष सब सन्नाटा। मैं क्या करूँ? मेरी कुछ समझ में नहीं आ रहा था। अब मैंने पुनः लुकते-छिपते उस बेजान-सी कचहरी में यहाँ-वहाँ चक्कर मारना शुरू कर दिया। आसपास के मार्गों पर जहाँ-तहाँ खून के छींटे। भगदड़ में छूटी हुई चप्पलें। लावारिस पड़ी हुई साइकिलें। बस, यही नजारा था।

मैं लौट-फिरकर दोबारा एकांत में खड़ी टंडन साहब की कार के निकट पहुँचा। उसी समय वहाँ एक रिक्शा आकर रुका। उस पर से संजय और मनोज उतरे। संजय ने रिक्शा के पैसे चुकाकर जेब से चाभी निकाली। उससे कार की ड्राइविंग सीट की ओर का दरवाजा खोला और दूसरी तरफ का दरवाजा खोलकर मनोज को बैठाया। मैं भी जल्दी से कार में चढ़ गया। कार चल पड़ी।

संजय और मनोज की बातों से मुझे विदित हुआ कि जब उन्हें कचहरी में लाठीचार्ज होने और उसमें कई लोगों के घायल होने की सूचना मिली तो उन्हें टंडन साहब की तुरंत फिकर हुई। संजय ने फौरन कोतवाली फोन मिलाया। वहाँ से उसे कोई सही जानकारी नहीं मिली। फिर उसने मनोज को अपने साथ लेकर जैसे ही कचहरी के लिए प्रस्थान करना चाहा, उन्हें एक परिचित वकील साहब रास्ते में मिल गए। उन्होंने बताया कि टंडन साहब इत्यादि आंदोलनकारी वकील पहले ही गिरफ्तार होकर पुलिस लाइन ले जाए गए हैं। इस पर दोनों मित्र भागकर पुलिस लाइन पहुँचे। वहाँ उन्हें टंडन साहब गिरफ्तारशुदा सभी वकीलों के साथ सकुशल मिल गए।

टंडन साहब ने अपनी जेब से कार की चाभी निकालकर संजय के हवाले की और उसे कचहरी में खड़ी कार ले आने को कहा। उन्होंने यह भी निर्देश दिया कि वे लोग पहले अस्पताल होते जाए। किसी ने खबर दी है कि शायद मुंशी जी घायल हो गए हैं।

जिला अस्पताल का इमरजेंसी वार्ड भी एक अजीब चिड़ियाघर था। ऐसा प्रतीत होता था, वहाँ इंसानों के बजाय भाँति-भाँति के जानवर बसते थे। बिना सींग और दुम के। नर्सें और वार्ड ब्वाय सब भावशून्य। डॉक्टर यंत्रचालित। मरीज भगवान भरोसे।

मरीजों के पलंग पर बिछी हुई चादरें लगता था किसी गढ़ैया में धुलवाकर बिछाई गई थीं। उनका रंग सफेद के बजाय मटमैला था। थूकदानों में गंदगी और रूई के टुकड़े तैरते हुए जुगुप्सा उत्पन्न करते थे। फर्श चिपचिपा। दीवारें उनींदी-सी। सारे बेड कराहते या बेहोश मरीजों से भरे पड़े थे। चार बेड एक कोने में पलंग के अभाव में फर्श पर ही बिछे हुए थे। कहीं दुर्घटना में घायल मरीज। कहीं लाठी का घायल। कहीं जहर खाया हुआ कोई प्रेमी युवक। कहीं दहेज में जलाई गई कोई बहू।

आज के लाठीचार्ज में गंभीर रूप से घायल नेता बच्चीसिंह, मुंशी गिरधारी लाल, मुंशी करीमुल्ला, पान वाला रमेसुर, चाय वाला मंगू और उसके यहाँ काम करने वाला एक नया लड़का भोला, मुवक्किल हरिप्रसाद, मुवक्किल फकीरचंद, मुवक्किल शाकिर अली, मास्टर सरजूप्रसाद, साइकिल स्टैंड वाला कन्हैया, फाउंटेन पेन की फेरी लगाने वाला राजू गुप्ता इमरजेंसी वार्ड में भर्ती थे। दर्जनों हलके-फुलके घायल व्यक्ति अस्पताल में 'फर्स्ट एड' कराकर वहाँ से पहले ही चले गए थे। पुलिस की ओर से भी तीन घायल जवान वहाँ भर्ती कराए गए थे। आत्मदाह में झुलसे हुए पोपटलाल को पुलिस की देखरेख में लखनऊ मेडिकल कॉलेज रवाना किया जा चुका था।

हेड मेट्रन ने वहाँ आकर सभी नर्सों को सूचना दी कि मंत्री जी आने वाले हैं। फिर तो वहाँ जैसे कोई रणभेरी बज उठी। नर्सें और वार्ड ब्वाय एकाएक चुस्त हो उठे। उनके व्यवहार में सजगता और शालीनता की एक रेशमी लहर-सी दौड़ गई। एक जमादार तेजी के साथ इमरजेंसी वार्ड के फर्श पर फिनाइल का फटका मारने लगा। मरीजों को उठा-पकड़कर नई धुली एवं झकाझक सफेद चादरें बिछाई जाने लगीं। थूकदानों की गंदगी ठिकाने लगाकर उन्हें स्वच्छ रूप से स्टैंडों पर लगाया जाने लगा। चिकित्सा अधीक्षक घूम-घूमकर स्वयं सबको हिदायतें देने लगे।

देखते ही देखते वहाँ का जैसे नक्शा ही बदल गया। अब चिकित्सा अधीक्षक दूसरे वार्डों की ओर निकल गए। डॉक्टरों की एक टीम फिर से मरीजों का मुआयना करने लगी। उनका हालचाल पूछने लगी। बाहर की ओर अस्पताल में नालियों के आसपास चूना छिड़का जाने लगा।

लगभग आधे घंटे बाद मंत्री जी ने इमरजेंसी वार्ड में प्रवेश किया। उनके साथ मुख्य चिकित्सा अधिकारी, जिलाधिकारी, पुलिस अधीक्षक और डॉक्टरों का एक दल चल रहा था। इस बीच इमरजेंसी वार्ड से सभी मरीजों के नाते-निश्तेदार बाहर किए जा चुके थे। केवल बेहोश पड़े मरीजों के पास या जिन्हें 'ड्रिप' लगी थी, एक-एक 'अटेंडेंट' रहने दिया गया था।

मैंने देखा कि मंत्री जी जैसे ही वार्ड में आए उनके पीछे वार्ड का प्रवेश द्वार बंद कर दिया गया। वहाँ अस्पताल के दो कर्मचारी मजबूती से खड़े हो गए। वे किसी को भी भीतर आने से रोकने लगे। बाहर से दरवाजा खटखटाने की आवाज आईं। दरवाजा नहीं खोला गया।

इसी बीच एक डॉक्टर ने बाहर किसी काम से जाना चाहा तो बाहर से दरवाजा ठेलकर तीन-चार पत्रकार भीतर घुसने का प्रयास करने लगे। उनमें से एक के हाथ में कैमरा भी था। बाहर खड़े कुछ पुलिस वाले भी उन्हें भीतर आने से रोकने लगे।

''अरे भाई हमें जाने दीजिए। ... देखते नहीं हम प्रेस वाले हैं'' उनमें से एक फोटोग्राफर बोला। मगर किसी ने उसकी एक नहीं सुनी। तब वह चिल्लाया - ''मंत्री जी! देखिए, आपके राज में ये क्या हो रहा है? ... ये पुलिस वाले हमें रोक रहे हैं। ... आप इन्हें ...''

मंत्री जी ने पलटकर देखा। प्रेस वाले जानकर उन्होंने हाथ से इशारा किया कि उन्हें आने दिया जाए। तब वह घचड़-मचड़ शांत हुई और सभी पत्रकार भीतर आ गए।

मंत्री जी एक-एक बेड के पास जाकर मरीजों का हालचाल पूछने लगे और अपनी सहानुभूति व्यक्त करने लगे। वह मुंशी गिरधारी लाल के पास भी रुके, जिसके दाहिने हाथ में अब तक प्लास्टर बँध चुका था और सिर पट्टियों में लिपटा था। बाईं आँख के नीचे एक सूजा हुआ नीला निशान था।

उसी समय कहीं से एक फलों की टोकरी प्रकट हुई। उसमें संतरे भरे हुए थे। एक वार्ड ब्वाय उसे दोनों हाथों से पकड़े हुए था। मुख्य चिकित्सा अधिकारी ने उसमें से दो संतरे उठाए और मंत्री जी के हाथों में मंद मुस्कान के साथ थमाए। मंत्री जी ने संतरे मरीज की ओर बढ़ाए। मरीज ने अपने बाएँ हाथ में लेने का प्रयास किया। संतरे काफी बड़े थे। अतः दोनों संतरे एक साथ एक हाथ से पकड़ने में मरीज को कठिनाई हुई, क्योंकि उसका दाहिना प्लास्टरयुक्त हाथ गर्दन से झूलती हुई पट्टी में लटका था। उसने बाएँ हाथ को प्लास्टर वाले हाथ की बाहर निकली उँगलियों से मिलाया और किसी तरह दोनों संतरे ले लिए।

प्रेस फोटोग्राफर ने कैमरे का बटन दबाया। 'क्लिक' की आवाज हुई, परंतु कैमरे का 'फ्लैश' नहीं चमका। उसने कहा - ''एक मिनट।'' और मंत्री जी को उँगली उठाकर जरा ठहरने का संकेत किया। मंत्री जी और सभी अधिकारीगण चित्रवत से पत्रकारों की ओर देखते लगे। अस्पताल में समय जैसे एक पल को ठहर गया।

प्रेस फोटोग्राफर ने शीघ्रतापूर्वक पैंट की जेब से दो छोटे सेल निकालकर कैमरे में बदले। कैमरा फिर से आँखों पर सेट किया। साथ के एक पत्रकार ने मरीज के हाथों से वे दोनों संतरे वापस लेकर मंत्री जी को थमा दिए। मंत्री जी पुराने थे। इशारा समझ गए। एक्शन रिप्ले। उन्होंने संतरे पुनः मरीज के हाथों में देते हुए कैमरे की ओर देखा। कैमरे का 'फ्लैश' इस बार चमका। फोटोग्राफर ने 'थैक्यू' कहा और फलों के वितरण का सिलसिला अगले मरीज की तरफ चालू हो गया।

मेरा मन घोर अवसाद से भर उठा। एक नाली के रास्ते मैं उस वार्ड से निकल भागा। हे भगवान! यह मैं कहाँ फँस गया हूँ? ... कैसी दुनिया है यह? ... अब मुझे यहाँ नहीं रहना है। तो फिर किधर जाऊँ? ... भीतर से आवाज आई-कहीं भी। और मैं बेतहाशा भागने लगा।

भागता गया। भागता गया। भागने के अलावा फिलहाल मुझे कुछ और सूझ नहीं रहा था। सर्दियों में शाम छह बजे तक पूरी रात घिर आती है। एक जगह जरा थमकर मैंने म्यूनिस्पेलिटी की फट गई 'वॉटर लाइन' से बहता पानी पिया। फिर चल पड़ा।

अब मेरे दिमाग ने दुबारा काम करना शुरू कर दिया था। मैं सोच रहा था कि यह भी एक विचित्र युग है। इसमें शहर गाँवों पर पल रहे हैं और गाँव शहरों में मर रहे हैं। शहर जो सभ्यता और संस्कृति के जीवंत केंद्र होने चाहिए, मनुष्य की अंधी महत्वाकांक्षाओं और स्वार्थपरताओं में घिरकर मुर्दाघर बनते जा रहे हैं। यहाँ जीवितों का सम्मान कोई नहीं करता। चाहे कितना बड़ा महापुरुष कोई जीते-जी क्यों न हो, मरने के बाद ही उसकी याद आती है। और तब उसे मूर्ति की शक्ल में चौराहे-चौराहे खड़ा करने की होड़ लग जाया करती है। ...

जनसुविधाओं के लिए यहाँ यंत्र तो हैं, परंतु जिस तंत्र द्वारा वे संचालित होते हैं उसे मंत्र देने वाला कहीं खो गया है। एक दिशाहीन भटकाव व्यक्ति को पीसे डाल रहा है। एक अदद मसीहा की तलाश जारी है। ...

मेरे कानों में रेलवे इंजन की आवाज सुनाई दी। शायद मैं अब तक मालगोदाम के निकट पहुँच गया था।


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