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उपन्यास

अथ मूषक उवाच
सुधाकर अदीब


हीरालाल पहली बार चुनाव में जीते थे और पहली बार में ही मंत्री बना दिए गए। इस मामले में वह दूसरे राजनीतिज्ञों से अधिक भाग्यशाली थे। वैसे तो पूर्व में भी वह दो बार चुनाव लड़े थे, किंतु दोनों बार हार गए थे। यहाँ तक कि उनकी जमानत भी जब्त हो गई थी। लेकिन इस बार की बात ही कुछ और थी। जिस तरह सागर में एक लहर आती है और दूसरी जाती है, इस बार उनके दल की लहर थी। गरीबी हटाओ की लहर। लोकतंत्र बचाओ की लहर। राष्ट्रीय एकता और अखंडता की लहर। धर्मप्रेरित राजनीति की लहर। जातिगत समीकरणों की लहर। ऐसी ही एक लहर में हीरालाल के दल ने पिछले सभी चुनावी समीकरणों को ध्वस्त करते हुए विजयश्री हासिल की थी।

स्वतंत्रता-प्राप्ति के तश्चात कई दशकों तक मतदाता की हालत एक ही प्रकार का मिक्सचर बार-बार पीने वाले मरीज जैसी रही। लेकिन अपने स्वास्थ्य-लाभ की दिशा में आशाजनक प्रगति न देखकर अब वह पहले से अधिक जागरूक हो चुका है। अब वह सभी दवाइयों को एक-एक करके परखनली में डालकर परखने की स्थिति से गुजर रहा है।

मतदाता की इसी प्रयोगधर्मिता की बदौलत इस बार हीरालाल का राजनीतिक दल सत्ता में आ गया और हीरालाल के विगत दीर्घ अनुभवों, संघर्षों, अद्भुत संगठन-क्षमता तथा पार्टी के हितों के प्रति उनका सर्वोच्च समर्पण भाव देखकर आलाकमान ने उन्हें मंत्री-पद सौंप दिया, और वह भी सीधा कैबिनेट स्तर का।

हीरालाल को प्रारंभ में केवल खेल-कूद विभाग दिया गया, परंतु जब शपथ ग्रहण के पश्चात वह पहली बार अपने चुनाव-क्षेत्र में गए तो उन्हें यह अहसास हुआ कि उनकों सौंपे गए विभाग में वह आकर्षण उनके समर्थकों को नजर नहीं आ रहा था कि जो आना चाहिए था। यही नहीं, उनके विरोधी इसे लेकर उनकी खुलेआम खिल्ली भी उड़ा रहे थे। यहाँ तक कि इसी कारण उनके अपने परिवार के सदस्य भी कोई बहुत खुश नहीं थे। फलतः हीरालाल शुरू के दो-तीन महीनों तक बड़े ही अनमने भाव से खेल-कूद विभाग का कार्यभार देखते रहे।

उधर जैसे ही मंत्री जी को राजधानी में एक सुसज्जित आवास आवंटित हुआ उनके बँगले पर सुबह से शाम तक मिलने वालों का ताँता बँधने लगा। एक आदमी तो चौबीसों घंटे टेलीफोन की घंटी सुनने पर लगा रहता। टेलीफोन घनघनाते ही वह संपर्ककर्ता को संक्षिप्त से संक्षिप्त उत्तर देता और जब उधर से बोलने वाले की बात उसके पल्ले नहीं पड़ती तो वह टेलीफोन का रिसीवर मंत्री जी के पी.आर.ओ., पी.ए. अथवा किसी को भी पकड़ा देता।

मंत्री जी चाहे बाथरूम में हो, चाहे बेडरूम में उनके घर का ड्राइंगरूम, बाहर का बरांडा और बँगले का लॉन इत्यादि उनके चुनाव-क्षेत्र तथा प्रदेश के विभिन्न जनपदों से आने वाली जनता से खचाखच भरा रहता। यहाँ तक कि जब मंत्री जी अपने बँगले से विधानसभा अथवा सचिवालय के लिए प्रस्थान करते तब भी उनकी कार में कई क्षेत्रीय लोग जबरदस्ती ठुँस जाते।

एक दिन तो हद हो गई। बहुत देर से उनके सिर पर लगभग डेढ़ सौ व्यक्ति सवार थे। मंत्री जी को आज विधानसभा में अपने विभाग से संबंधित विधायकों के प्रश्नों का उत्तर देना था। इसलिए उन्हें आज विशेष जल्दी थी। किसी प्रकार भीड़ से अपना जी चुराकर जैसे ही वह अपनी लाल बत्ती की गाड़ी में बैठने को हुए करीब आधा दर्जन ढीठ किस्म के आदमी उनकी गाड़ी में उनसे पहले घुस गए। अब मंत्री जी के लिए ही बैठने की जगह नहीं रही।

उन्होंने उन लोगों के हाथ जोड़े और अपने बैठने के लिए जगह माँगी। कार से कोई आदमी उतरने का तैयार नहीं हुआ, ऊपर से उन्हें यह सुनने को मिला - ''नाहीं उतरब। ... का एही खातिर तुमका मंतरी बनावा है हम लोगन ने?'' बेचारे मंत्री जी के पास इस बात का कोई जवाब नहीं था। लिहाजा वह उनमें से ही एक आदमी की गोद में बैठ गए और कार चल पड़ी। मंत्री जी का गनर भी बाहर खड़ा खड़ा टापता रह गया।

हीरालाल को सिगरेट-शराब या अन्य किसी नशे का शौक नहीं था। अलबत्ता वह रोज रात्रि में भोजन से पूर्व 'मृत संजीवनी सुरा' नामक एक औषधि का सेवन अवश्य करते थे। एक आयुर्वेदाचार्य ने उन्हें यह सलाह ही थी कि ''इस औषधि में बड़े कीमती तत्व विद्यमान हैं और यह पाचन क्रिया में भी बड़ी सहायक है। आप इसके सुरूर पर न जाएँ, बल्कि इसके अन्य गुणों से लाभ उठाएँ।''

हीरालाल का पी.आर.ओ. नीलकांत अच्छा लड़का था। गोरा-चिट्टा एवं हृष्ट-पुष्ट। वह हीरालाल की बड़ी सेवा करता था। यह सेवा वह आज से नहीं बल्कि पिछले लगभग दस वर्षों से करता चला आ रहा था। जिन दिनों हीरालाल राजनीति में कड़ा संघर्ष कर रहे थे इस पढ़े-लिखे बेरोजगार नौजवान ने उनकी बड़ी सहायता की थी। वह उनके हर दुःख और सुख में साए की तरह साथ लगा रहा। दिन-भर उनके निर्देशों पर नीलकांत यहाँ-वहाँ भागता और रात्रि में उनकी चप्पलें उठाने से लेकर 'मृत संजीवनी सुरा' की खुराक बनाने तक में उनका साथ दिया करता था।

यह नीलकांत ही था जिसने मंत्री-पद के अदब-कायदों को हीरालाल द्वारा शपथ-ग्रहण करने के पश्चात उनसे भी पहले सीख लिया। कुल मिलाकर हीरालाल नीलकांत की प्रतिभा एवं योग्यताओं से आकंठ प्रभावित थे और इसीलिए वह नीलकांत की सलाह के बिना एक कदम भी चलने से पूर्व दस बार सोचते थे।

नीलकांत ने जब यह देखा कि क्षेत्रीय मतदाताओं की उद्दंडता दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है तो उसने उससे निबटने की भी तकरीब खोज ली। उसने हीरालाल को परामर्श दिया कि - ''इस तरह तो आप एक दिन ढेर हो जाएँगे। अगर आपको कुछ हो गया तो फिर भाभी जी और प्रभावती का क्या होगा?''

प्रभावती मंत्री जी की तेजी से सयानी होती बिटिया का नाम था जिसके हाथ यथाशीघ्र पीले करने की चिंता आजकल उन्हें खाए जा रही थी। उन्होंने मृत संजीवनी सुरा की दूसरी खुराक लेते हुए कहा - ''पर किया क्या जाए...?''

''आप उसकी फिकर मुझ पर छोड़ दीजिए...। अगर आप मेरी एक बात मानें तो मुझे एक आइडिया आया है।''

''वह क्या?''

''मैंने आपके नाम से गोमती किनारे के बहुखंडी भवन में चौदहवें तल पर एक फ्लैट रिजर्व करा लिया है।''

''मगर यह बँगला...?''

''ओहो... गोली मारिए इस बंगले को। यह समझिए कि अब से हाथी का ऊपरी दाँत रहेगा यह बँगला...।''

''और भीतरी दाँत...?''

''गोमती किनारे वाले फ्लैट को आप भीतरी दाँत के रूप में इस्तेमाल करेंगे।''

''वह कैसे?''

''देखिए... सुबह से शाम तक आप अपने बँगले से ही आते-जाते हैं और जनता को दर्शन देते हैं। ... शाम अकसर स्टेट गेस्ट हाउस और दूसरी जगहों पर जरूरी कामों में गुजर जाती है। ... देर रात जब आपको फुर्सत मिले तो चुपचाप अपने गोमती किनारे वाले फ्लैट पर चले जाया करेंगे और वहीं रात्रि-विश्राम करेंगे। ... सूर्योदय से पूर्व आप उठ ही जाते हैं। अतः तब तक वापस बँगले पर लौट आना हितकारी रहेगा।''

''हाँ, यह ठीक है'' - कहकर हीरालाल ने चुटकी बजाई और अगले ही दिन से उनका निजी साजो सामान बड़े ही एहतियात के साथ गोमती किनारे वाले फ्लैट पर पहुँच गया। परंतु उस सामान के साथ उनके परिवार का सामान वहाँ नहीं गया।

जिस समय हीरालाल को उनके परिवार सहित बँगले पर छोड़ने के बाद उनकी कार गोमती वाले फ्लैट पर आकर झटके से रुकी, ड्राइवर की सीट के नीचे सोते हुए मेरी आँख उसी समय खुल गई। मैंने देखा कि गाड़ी में उस समय दो ही व्यक्ति थे। एक मंत्री जी का ड्राइवर और दूसरा उनका गनर।

ड्राइवर ने कार की डिक्की खोलकर मंत्री जी की अटैची बाहर निकाली और उसे गनर के हाथों में थमाकर कार को एक किनारे लगाने लगा। गनर ने अटैची और पीछे की सीट पर पड़ा कुछ अन्य सामान समेटा और उस बहुखंडी भवन का रुख किया। मैं भी कार से फुदक कर उतर गया और गनर के कदमों के पीछे-पीछे हो लिया। गनर एक लिफ्ट में सवार हो गया। मैं भी उसके पीछे लिफ्ट के एक कोने में दुबककर खड़ा हो गया। लिफ्ट चौदहवें तल पर रुकी। हम दोनों लिफ्ट से बाहर आ गए। गनर ने उस फ्लोर के एक साइड में बने एक फ्लैट के दरवाजे के 'की होल' में चाबी घुमाई। दरवाजा खुल गया। गनर ने फ्लैट में प्रवेश किया। मैं भी उसके पीछे हल्लू-हल्लू फ्लैट में घुस गया।

कुछ देर में गनर मंत्री जी का सामान रखकर और उनका फ्लश लैटरीन इस्तेमाल करके फ्लैट से बाहर निकल गया और मेरा वहाँ एकछत्र साम्राज्य कायम हो गया। अब मैं सीधा हीरालाल के बेडरूम में घुसा और उसके बिस्तर पर चढ़कर अपनी टाँग पर टाँग रखकर लेट गया। अरे क्या हुआ अगर आज मैं केवल एक चूहा था। आखिर था तो मैं हीरालाल का बचपन का दोस्त ही। यही सब सोचते-सोचते मेरी पुनः आँख लग गई।

नींद की हालत में मुझे मूषक-वाणी सुनाई दी। एक चुहिया किसी चूहे से कह रही थी -

''नहीं-नहीं, मुझे मत छेड़ो... मुझे तुम्हारी सूरत से भी नफरत है।''

चूहा भी उसी मातृभाषा में कह रहा था -

''ऐसी क्या भूल की है मैंने जो तुम मुझसे इतनी नाराज हो?''

चुहिया कह रही थी -

''कल डबलरोटी कुतरते हुए तुमने मेरे लिए जरा भी नहीं छोड़ी। तुम्हारे जैसा लालची चूहा मैंने और कहीं नहीं देखा।''

''अच्छा, तो यह नाराजगी है। लो मैं वायदा करता हूँ कि आगे से ऐसी कोई शिकायत नहीं मिलेगी तुम्हें। ... अब तो मान जाओ!''

''नहीं... कभी नहीं...'' कहते हुए चुहिया का स्वर और भी ऊँचा हो गया।''

यह सब कुछ पहले मुझे स्वप्नवत लगा, किंतु जब मेरी तेज घ्राणेंद्री में मूषकगंध भी समाविष्ट हो गई तो मेरी आँख खुल गई। मैंने पलंग ने नीचे झाँका तो वास्तव में एक काले रंग का मोटा चूहा एक भूरे रंग की चुहिया के पीछे भागता हुआ मुझे नजर आया। भागते-भागते वे दोनों बेडरूम से ड्राइंगरूम में चले गए। मैं पलंग से छलाँग मारकर उतरा तथा ड्राइंगरूम की ओर दौड़ा। वहाँ पहुँचकर मैंने देखा कि सोफासेट के पीछे दीवार में दो बिल बने थे। एक छोटा बिल और एक उसी के बराबर में बड़ा बिल। चुहिया भागकर अपने छोटे बिल में जा घुसी तथा वह चूहा भी उसमें घुसने की नाकाम कोशिश करने लगा। वह इतना मोटा था कि उसका वहाँ घुस पाना असंभव था।

तभी द्वार पर 'की-होल' के खटकने की ध्वनि आई और वह चूहा कूदकर बराबर वाले अपने बड़े बिल में घुस गया।

दरवाजा खोलकर शीघ्रतापूर्वक नीलकांत अंदर आया और मंत्री जी की अलमारी खोलकर उसने उनके लिए कुछ कपड़े और रुपए-पैसे एक सूटकेस में भरे और बाहर जाने को हुआ। इतने में ड्राइंगरूम में रखे टेलीफोन की घंटी बजी। नीलकांत ने रिसीवर उठाया और कहा -

''हैलो!... कौन, सेठ धर्मचंद जी? नमस्कार-नमस्कार। ... मंत्री जी तो बाहर जा रहे हैं।''

''कहाँ?'' उधर से पूछा गया।

''नैनीताल।''

''कब तक वापस लौटेंगे?''

''तीन दिन बाद।''

नीलकांत ने रिसीवर रख दिया और फ्लैट को ताला मारकर निकल गया। नीलकांत के वहाँ से जाते ही वह मोटा चूहा अपने बिल से निकला और उस चुहिया के बिल को खोदने लगा।

''कोई फायदा नहीं मोटू!...'' भीतर से चुहिया ने कहा - ''मैंने इस बिल की दीवारों को फौलाद का बना दिया है। अब अगर तुम जैसे सौ चूहे भी इसके बाहर अपना सिर पटकें तो इसे नुकसान नहीं पहुँचा सकते।

यह सुनकर मोटा चूहा गुस्से से पलटा और उसकी आँखें मेरी आँखों से चार हो गईं। मेरा एकछत्र साम्राज्य तो इस फ्लैट में उसी क्षण समाप्त हो गया था जिस क्षण मेरी दृष्टि धमाचौकड़ी मचाते इन चूहा-चुहिया पर पड़ी थी। किंतु मुझे देखकर उस मोटे चूहे को लगा होगा कि यह बिन बुलाया मेहमान अचानक कहाँ से आ टपका?

जो भी हो, उस चूहे की आँखों में और भी खून उतर आया और उसने एक क्षण का विलंब किए बिना मुझ पर बिना किसी भूमिका के हमला बोल दिया। मैंने अपने बचाव के, जितने भी पैतरे हो सकते थे, आजमाए। लेकिन अपने से दो गुना भारी प्रतिद्वंद्वी के आगे भला मेरी क्या चलती? मोटू चूहे ने मुझ पर जूडो और कराटे के ऐसे-ऐसे वार किए कि मैं लहूलुहान हो गया।

अंत में अपने बचाव का काई उपाय न देखकर मैं भागकर बड़े वाले बिल में घुस गया। उस वक्त मैं यह भूल गया कि यह मेरे दुश्मन का ही घर था। वहाँ आकर मोटू चूहे ने मेरी और भी कुटाई की। मैं वहाँ से उसकी गिरफ्त से किसी तरह छूटकर बाहर भागा और इस बार बगल के उस चुहिया के बिल में घुस गया।

उस छोटे बिल में आकर मेरी जान में जान आई। मेरा सिर तेजी से दुख रहा था। मैंने देखा कि वह चुहिया अपने घास के बिछौने पर लेटी हुई आराम से एक पनीर का टुकड़ा कुतर रही थी। मुझे देखते ही वह भय से अपनी जगह से उछल पड़ी। मैंने उससे कहा - ''डरो नहीं... मैं तुम्हें... कोई नुकसान नहीं... प... हुँ... चा... ऊँगा।''

- और मैं वहाँ गिरकर बेहोश हो गया।

जब मुझे होश आया तो मैंने पाया कि वह खूबसूरत चुहिया मेरे चेहरे पर झुकी हुई पानी के छींटे मार रही थी। आँखें खुलने पर जब मैंने उसको देखा तो वह शरमाकर अपनी पलकों को बार-बार झपकाने लगी। मुझे कुछ अजीब-सा लगा। मैं तत्काल उठ बैठा। इससे पहले कि वह चुहिया मुझे कुछ कहे, मैं फौरन उस बिल से बाहर निकल गया।

बाहर निकलकर मुझे सबसे पहले अपने लिए एक अलग सुरक्षित बिल की आवश्यकता महसूस हुई, क्योंकि उसके बिना हीरालाल के इस फ्लैट में जिंदा रह पाना मुझे टेढ़ी खीर नजर आया। लेकिन बिल खोदने के लिए समय चाहिए था। ऊपर से मोटू चूहे के द्वारा दुबारा हमला किए जाने का भी भय आसन्न था। इसलिए मैंने कूटनीति से काम लिया।

मैं दुबारा उस चुहिया के बिल में गया। मैंने उससे प्रार्थना की कि वह कुछ घंटे मोटू चूहे के बिल में जाकर उसे वहीं रोके रखे ताकि तब तक मैं हीरालाल के बेडरूम में जाकर अपने लिए एक सुखद एवं सुरक्षित बिल का निर्माण कर सकूँ। इस पर चुहिया ने मोटू की नीच हरकतों की याद दिलाकर शंका व्यक्त की। मैंने चुहिया से कहा कि - ''फिकर न करो... लड़ाई के दौरान मैंने भी उस चूहे को जगह-जगह ऐसा काटा है कि तुम्हारा अधिकांश समय तो उसकी तीमारदारी में ही बीत जाएगा।'' चुहिया को मेरी बात समझ में आ गई।

सारी रात मैं अपनी चोटों की परवाह किए बिना हीरालाल के बेडरूम में अपने साइज का एक बिल खोदता रहा। सुबह तक वह बिल बनकर तैयार हो गया। और मैं उसमें लेटकर सुस्ताने लगा।

उस दिन से वह चुहिया मेरे बिल में बेरोकटोक आने-जाने लगी। कभी वह मेरे लिए किसी खाद्य सामग्री का कोई टुकड़ा ले आती और कभी दूसरा। यदि मैं खाने से इन्कार कर देता तो वह हठ करके वहीं बैठ जाती और मेरे बिल से जाने का नाम ही न लेती। मैं यथासंभव उस चुहिया के सम्मोहन से बचने का प्रयत्न करता, परंतु वह मेरा पीछा ही न छोड़ती। लेकिन मैं भी कोई कम उस्ताद नहीं था। किसी न किसी तरह से उससे अपना पीछा छुड़ा ही लेता।

एक के बाद एक कर मंत्री जी के उस फ्लैट में दिन बीतते गए। मैं अपने स्वनिर्मित शरणस्थल में पड़ा-पड़ा यह सोचा करता कि उस दुष्ट एवं दुराचारी चूहे और मुझ सदाचारी चूहे में कितना अंतर है? और इस नादान चुहिया को क्या कहूँ? इसे तो सिवाय दुम उठाकर आगे-पीछे नाचने और दीदे मटकाने के और कुछ भी नहीं आता। क्या माया ने इसकी बुद्धि भरमा रखी है या कि यह स्वयं कोई माया है?

इस तरह के विचारों के उतार-चढ़ाव से हम तीनों चूहों का नामकरण स्वतः ही हो गया।

- मैं, सदाचारी चूहा।

- वह, दुराचारी चूहा।

- उसके साथ वाली, माया चुहिया।

जब माया चुहिया ने यह अच्छी तरह समझ लिया कि उसकी दाल मेरे साथ गल नहीं सकती। तो उसने हारकर दुराचारी चूहे के साथ अपना घर बसा लिया। उसी दिन से माया दुराचारी के घर में रहने लगी। मैंने भी अपने गरीबखाने में यह सोचकर चैन की साँस ली कि चलो किसी तरह इस बला से गला छूटा।

मेरे सात्विक विचार अब और भी दृढ़ हो चले। साथ ही, आत्मालोचन की प्रवृत्ति भी मैं नहीं छोड़ सका। मैं सोचने लगा कि ऋषि-मुनियों ने काम-क्रोध-लोभ-मोह इन चारों को नरक के पंथ बताया है।

'काम' पर तो मैं विजय पा ही चुका हूँ। 'माया' का कोई भी काम-बाण मुझे घायल नहीं कर सका।

'क्रोध' मुझे जन्म से ही नहीं आता। 'दुराचारी' से युद्ध करते समय भी मात्र आत्मरक्षा का भाव ही मेरे मन में उठा था। उसके प्रति क्रोध का भाव मेरे मन में कभी नहीं आया।

'लोभ' भी मैं नहीं करता, क्योंकि यह मेरे संस्कारों में ही प्रायः रच-बस गया है कि मैं भूख लगने पर ही खाता हूँ। मेरा भोजन यदि कोई देख-भर ले तो छूटते ही यही कहेगा कि ''ये चूहा खाने के लिए नहीं जीता, बल्कि जीने-भर के लिए खाता है।''

अतएव नरक के ये तीन पंथ तो मैंने बंद कर रखे हैं, किंतु 'मोह' नामक इस चौथे पंथ का मैं क्या करूँ? कामेश्वर पंडित के वाद्ययंत्र में जन्म से लेकर गंगा-स्नान तक मुझे मोह नहीं व्याप सका। परंतु जब से मैंने वहाँ स्नान करते हुए अपने पूर्वजन्म के सखा 'हीरा' को देखा है, यह मूषक-हृदय न जाने क्यों उसके प्रति दिनोंदिन आसक्त होता जा रहा है। उस दिन उसने यद्यपि कितनी निष्ठुरता से मुझे गंगा की धारा में बहा देना चाहा, तथापि मेरा हृदय उसकी ओर जरा भी कठोर नहीं होने पाया।

क्या बाल्यकाल के संस्कार इतने प्रबल होते हैं? क्या सच्ची मित्रता में छिपा प्रेम इतना शक्तिशाली होता है कि वह जन्म और पुनर्जन्म के अंतर को भी नहीं मानता?

यद्यपि हीरालाल आज मानव से अतिमानव बन चुका है और मैं अपनी युवावस्था में किसी भयंकर दुर्घटना का शिकार होकर मानव-देह त्यागकर अब मूषक बना बैठा हूँ, फिर भी अपने पुराने मित्र से मोह का नाता मैं क्यों नहीं तोड़ पा रहा हूँ?

कितनी विचित्र बात है! एक तो चूहे के शरीर में आकर मेरी आत्मा वैसे भी इस संसार में नरक के अनुभव कर रही है। ऊपर ये यदि मोहपथ पर मेरे पग इसी प्रकार चलते रहे तो इस योनि से छुटकारा मिलने के समय क्या मुझे विधि के विधान के अनुसार साक्षात नरकगामी नहीं होना पड़ेगा?


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