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उपन्यास

अथ मूषक उवाच
सुधाकर अदीब


प्रदेश में चमड़ा उद्योग का विस्तार तेजी से हो रहा था। आवश्यकता को देखते हुए इसका मंत्रालय भी अलग से सृजित हो गया था तथा इसे मुख्यमंत्री जी ने अपने ही पास रख छोड़ा था। हीरालाल के पास सिर्फ खेलकूद मंत्रालय था और वह विभिन्न खेलों एवं कूदों की प्रतियोगिताओं का उद्घाटन करते-करते अब तंग आ चुके थे।

एक दिन कैबिनेट मीटिंग के समापन के बाद उनसे न रहा गया और उन्होंने मुख्यमंत्री जी के कार्यालय कक्ष में पेश होकर अपनी व्यथाकथा कह सुनाई। मुख्यमंत्री जी मुस्कुराए। कुछ ही दिनों बाद कैबिनेट का विस्तार हुआ और हीरालाल को 'खेलकूद' के साथ 'चमड़ा उद्योग' भी दे दिया गया।

हीरालाल को तो इसी दिन की प्रतीक्षा थी। अगले ही दिन उन्होंने चमड़ा उद्योग से संबंधित उच्चाधिकारियों की एक बैठक बुलाई और नए विभाग के कामकाज का जायजा लिया। अब खेलकूद विभाग की पर्याप्त जानकारी हीरालाल को हो ही चुकी थी। इसलिए उन्हें चमड़ा उद्योग के अधिकारियों को भी प्रगति की समीक्षा के उपरांत आवश्यक निर्देश देने में कोई कठिनाई नहीं हुई।

सचिव ने उनकी सहायता के लिए कुछ बिंदुओें पर एक सारगर्भित नोट बनाकर रखा था। उस पर एक निगाह डालने पर हीरालाल को कुछ संतोष नहीं हुआ और उन्होंने उस टाइपशुदा नोट को एक किनारे रख दिया। उसके बाद एक लंबा-चौड़ा भाषण फ्री-स्टाइल में दे डाला।

कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक राष्ट्र की एकता और अखंडता पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने मनुष्य के चमड़े से लेकर गाय-भैंस के चमड़े और उसकी उपयोगिता का वर्णन करते हुए, एक ऐसा 'प्रोजेक्ट' शुरू करने के दिशा-निर्देश दिए, जिसमें कि पशुओं के चमड़े की गुणवत्ता सुधारने के लिए उनके चारे-पानी की किस्मों में भी क्रांतिकारी सुधार लाया जाए...

सचिव ने उन्हें बीच में ही धीरे से टोका - ''सर!... आप पशुपालन विभाग से संबंधित 'प्वाइंट' कह रहे हैं।''

''तो क्या हुआ?... यह 'मैटर' तुम पशुपालन विभाग को 'रेफर' कर देना।'' - कहकर कर हीरालाल पुनः शुरू हो गए।

उन्होंने अपना आशय और भी स्पष्ट किया कि वह चाहते हैं कि चारे-पानी की किस्मों में व्यापक परिवर्तन किए जाएँ ताकि भविष्य में चमड़ा उद्योग को 'सप्लाई' किया जाने वाला चमड़ा 'एक्सपोर्ट क्वालिटी' का बन जाए... और उस चमड़े की खपत न केवल अपने देश व प्रदेश में हो बल्कि विदेशों से भी उसकी डिमांड आने लगे...।

मंत्री जी के भाषण के इस अंश को सुनकर अधिकारीगण बगलें झाँकने लगे और विभागीय सचिव ने उनके कान में मुँह लाकर पुनः धीरे से कहा - ''सर! ... अब आप खेलकूद के ही नहीं, चमड़ा उद्योग के भी मंत्री हैं।''

''सो तो है। फिर?...''

''कृपया वह लिखित नोट पढ़ लें तो बेहतर... ''

इस पर मंत्री जी ने और भी धीरे से कहा - ''मगर मैं तो अपना भाषण समाप्त कर चुका हूँ।''

''कोई बात नहीं सर!... अगली बार सही।''

- सचिव ने कहा और बैठक समाप्त हो गई।

हीरालाल को लगा कि वाकई कहीं कुछ गड़बड़ हो गई है और उन्होंने तब से यह नियम बना लिया कि आगे से वह जहाँ भी बोलेंगे सचिव द्वारा बनाए गए नोट्स को लेकर ही बोलेंगे। उन्होंने ऐसा किया भी और धीरे-धीरे यह उन्हें काफी सुविधाजनक लगने लगा। पहले यह क्रम विभागीय बैठकों और विधानसभा प्रश्नोत्तरों तक ही सीमित रहा। फिर उन्हें इसकी आदत-सी पड़ गई। यहाँ तक कि वह इसका प्रयोग जनसभाओं में भी करने लगे। नीलकांत उनके ऐसे भाषण कुछ जान-पहचान के लेखकों एवं मित्रों की सहायता से पहले ही तैयार करा लेता था। यदि हीरालाल जी को समय रहा तो वह इन लिखित प्रतियों पर दृष्टि डाल लेते थे। यदि समय न रहा तो कागजों को सामने रखकर मंच से सीधे-सीधे पढ़ दिया करते थे।

लेकिन मनुष्य अपनी भूलों से ही बहुत कुछ सीखता है। अपने चुनाव-क्षेत्र में एक बार हीरालाल जी ने एक बहुत बड़ी जनसभा को संबोधित किया। वह नीलकांत द्वारा तैयार कराया गया भाषण सभामंच से पढ़ने लगे। पन्ने पर पन्ने पलटते गए और भाषण चालू रहा। जब उन्हें बोलते-बोलते करीब डेढ़ घंटे हो गए तो पब्लिक हूटिंग करने लगी। फिर भी मंत्री जी पूरा भाषण दृढ़तापूर्वक पढ़ते गए। इस बीच उन्होंने दो बार पानी पिया। परंतु वह भाषण रावण की आँत की तरह खत्म होने को न आता था। हूटिंग और विकट हो गई। मंत्री जी ने उसकी परवाह न की। बस पढ़ते गए - पढ़ते गए।

अंततोगत्वा जनता का धैर्य समाप्त हो गया और सड़े अंडों एवं टमाटरों की बौछार मंच पर होने लगी। बेचारे हीरालाल किसी तरह बचते-बचाते भागकर मंच के पीछे उतरे और अपने पी.ए. पर बरस पड़े - ''यह क्या वाहियात भाषण थमाया था तुमने?''

पी.ए. ने हकलाकर जवाब दिया कि ''क्षमा करें सर!... आ... आपको गलती से टाइप्ड भाषण की चारों प्रतियाँ... थमा दी गई थीं... आप उन्हीं को बारंबार...।''

भारी हंगामे के बीच मंत्री जी राजधानी वापस आ गए।

रात्रि के ग्यारह बजे थे। हीरालाल बाथरूम में था। नीलकांत ड्राइंगरूम में कुछ फिल्मी पत्रिकाएँ पलट रहा था। दुराचारी चूहा तथा माया चुहिया भी अपने बिल में हँसी-मजाक कर रहे थे। मैं इस समय हीरालाल के पलंग के नीचे चहलकदमी करता हुआ उससे पुनः भेंट करने की अनेक प्रकार की योजनाएँ बना रहा था।

हीरालाल ने 'मृत संजीवनी सुरा' की पहली खुराक बाथरूम में शावर के नीचे नहाते हुए ग्रहण कर ली। वह गुनगुनाता हुआ आज बड़ी देर तक नहाता रहा। गर्मी बहुत थी, इसीलिए शायद उसका जी कर रहा होगा कि आज वह सारी रात नहाए।

नहा-धोकर उसने तौलिए से अपना बदन रगड़ा। वह तौलिया भी बड़ा सुंदर और फूलों के डिजाइन से युक्त था। फिर उसने जी भरकर सुगंधित टेलकम पाउडर अपने ऊपर छिड़का।

अभी वह तौलिया लपेटकर बाथरूम से बाहर आया ही था कि टेलीफोन की घंटी बनजे लगी। हीरालाल ने अपनी गोदरेज की अलमारी खोली और एक कंघा निकालकर अपने सिर बचे-खुचे बालों पर घुमाने लगा।

टेलीफोन की घंटी बजती रही। हीरालाल समझ गया कि नीलकांत कहीं बिना बताए बाहर निकल चुका था। अतः उसने खुद ही निकलकर बाहर का दरवाजा बंद कर दिया और टेलीफोन का रिसीवर उठाया।

''हेलो!'' हीरालाल ने कहा।

''हाय!'' उधर से कोई बोली।

''आप कौन?'' हीरालाल ने हतप्रभ होकर कहा।

''कोई भी समझ लो।'' उधर से ढिठाई से उत्तर मिला।

''आप अपना नाम तो बताइए!''

''नाम में क्या रखा है? बस, यों समझ लो कि... हम भी आपकी एक सेविका हैं।''

''फिर भी नाम बताने में क्या हर्ज है?''

''ओह नो डार्लिंग! नाम इतनी आसानी से नहीं बताऊँगी।... बड़ी मुश्किल से आज कम्मो से तुम्हारा फोन नंबर मिला है।''

''कम्मो?... कौन कम्मो?''

''कम्मो यानी कि कामिनी!... याद नहीं? अभी पिछले संडे तो तुम्हें मिली थी?

''नहीं-नहीं! मैं किसी कामिनी-वामिनी को नहीं जानता।''

यह कहकर हीरालाल ने फोन रख दिया। उसके सद्यःस्नात चेहरे पर स्वेदबिंदु उभर आए थे। अपने बेडरूम में दुबारा आने पर उसने 'मृत संजीवनी' की बची-खुची खुराक एक साँस में हलक से नीचे उतार ली और 'धम्म से' अपने बिस्तर पर गिर पड़ा। उसकी पलकें मुँदने लगीं। तभी उसे लगा कि उसकी अलमारी के पट खुले हैं वह अंतिम बार एक झटके से उठा और अलमारी बंद करके फिर सो गया।

मैंने उसके कान के पास जाकर कुछ कहना चाहा, परंतु हीरालाल तब तक खर्राटे लेने लगा था। बेचारा हीरा! वह यह जान ही नहीं सका कि इस बीच कब दुराचारी और माया किसी नवीन स्थान पर 'हनीमून' मनाने के इरादे को लेकर उसकी अलमारी में प्रवेश कर गए थे।

अगली सुबह वही हुआ जो होना था। हीरालाल ने जैसे ही वह अलमारी खोली दुराचारी और माया बिजली की-सी फुर्ती से उसमें से निकलकर बाहर भाग गए। हीरालाल ने अपना सिर पीट लिया। उन दुष्टों ने उसके खादी के कई वस्त्रों और करेंसी नोटों को जगह-जगह से कुतर डाला था।

हीरालाल ने नीलकांत को उसी समय आदेश दिया कि - ''इस घर में बहुत चूहे हो गए हैं। आज जहर की गोलियाँ बनाकर अवश्य डाल दी जाएँ।''

मैंने तो हीरा की बात सुन और समझ ली, परंतु दुराचारी और माया उसे नहीं समझ सके। मैंने उन दोनों को आने वाले खतरे से सावधान करना चाहा, लेकिन वे अपने बिल के भीतर राग-रंग में इस कद मस्त थे कि उन्हें मेरी आवाज सुनाई नहीं पड़ी। परिणामस्वरूप जिन आटे की जहरीली गोलियों को मैंने नहीं खाया उन्हीं का प्रेमपूर्वक भोग उन चूहा-दंपति ने लगा लिया। इस प्रकार, कुछ ही समय में वे दोनों भगवान को प्यारे हो गए।

मैं उन दोनों मूषकों की अकाल मृत्यु पर फूट-फूटकर रोया और उनके शवों के आस-पास मँडराकर घंटों शोक मनाता रहा। आखिर वहाँ उनका मेरे सिवाय और था ही कौन?

इस बीच वहाँ बूटों की चरमराहट हुई। यह हीरालाल और नीलकांत ही थे। मैं उन मरे हुए चूहों के बीच एक तीसरे मृतक चूहे का अभिनय करता हुआ लेट गया।

तब हमें बड़ी बेदर्दी के साथ उठाकर एक गटर के भीतर फेंक दिया गया।


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