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उपन्यास

अथ मूषक उवाच
सुधाकर अदीब


चमार टोले के मोड़ पर रामलाल धोबी का मकान था। शहर में उसका अच्छा कारोबार होने के कारण उसने अपने मकान के बाहर की दो कोठरियों को पक्का बनाने में कामयाबी हासिल कर ली थी। एक कोठरी में वह धुले हुए कपड़ों पर इस्तरी करता था और बगल की दूसरी कोठरी उसने अपने मित्र डॉ. झोलाराम अशांत को किराए पर दे रखी थी। इस कोठरी में डॉक्टर का दवाखाना था। लाल-नीली-पीली गोलियाँ। कुछ रंग-बिरंगी शीशियाँ। एक डॉक्टरी आला तथा कुछ अन्य चिकित्सा संबंधी आवश्यक साजोसामान।

प्रतिदिन सुबह आठ बजे से दस बजे तक डॉक्टर अपने दवाखाने में बैठते थे। दस बजे जब वह दवाखाने को ताला लगाकर शहर की ओर प्रस्थान करते तो वह अशांत जी के नाम से जाने जाते। शाम को मुँहअँधेरे जब चमारटोले में वह पुनः लौटते तो वहाँ सबके बीच 'झोला भइया' बन जाते। चमार टोले में वह सर्वप्रिय थे। एक तरह से वह वहाँ के निवासियों की जीवनीशक्ति थे। प्रेरणास्रोत थे।

यद्यपि उनके विरोधियों का कहना था कि वह पहले स्वास्थ्य विभाग में एक मामूली कर्मचारी थे। दस वर्ष की राजकीय सेवा में ही उन्होंने डॉक्टरी की कोई फर्जी सनद हासिल की। सरकारी दवाएँ चोरी से बाजार में बेंची। फिर एक गबन के मामले में नौकरी से निकाले गए। उन पर मुकदमा चला स्वास्थ्य विभाग के अनुभवों ने उन्हें पेट की खातिर 'झोला डॉक्टर' बना दिया और मुकदमे के चक्कर में वह नीति-अनीति तथा राजनीति के 'अनुसंधानकर्ता' बनते चले गए।

आज इतवार का दिन था। शहर में थाना, कोर्ट-कचहरी, कार्यालय सब बंद थे। नौकरीपेशा लोगों के लिए आराम का दिन था। झोला भइया के लिए भी यह फुर्सत का दिन था। आज रामलाल शहर नहीं गया था। झोला भइया का दवाखाना आज दोपहर में भी खुला हुआ था। वह और रामलाल दोनों वहाँ अकेले थे। रामलाल एक बेंच पर पसरा पड़ा था औरा डॉक्टर उस पर झुककर उसकी आँखों में कोई दवा डाल रहे थे।

रामलाल कह रहा था - ''उसके बाद झोला भइया! ... उन लोगों ने मुझे पानी में से घसीटकर खूब मारा। मैंने कहा, मारो नहीं, तो उनका सरगना कहने लगा कि अब से तालाब के मालिक बाँसगाँव वाले ठाकुर जोरावर सिंह हैं और अगर दुबारा उस तरफ रुख किया तो जान से मार दिए जाओगे।''

''और बस... तुमने उन हराम के जनों के पैर छू लिए होंगे?'' डॉक्टर ने कहा। वह आँख की दवा अलमारी में रखकर अपने हाथ को रूई के एक टुकड़े से साफ करने लगे।

''नहीं झोला भइया! ... पैर तो हमने नहीं छुए। पर हम कर भी क्या सकते थे? हम अकेले थे और वो चार। इसलिए चुपचाप अपनी लादी समेटकर वहाँ से चले आए।''

ये बातें अभी चल ही रही थीं कि उसी समय चमार टोले से कल्लू, घीसू और शंकर भी वहाँ आ गए। डॉक्टर का दवाखाना भर गया और वह डॉक्टर से पूरी तरह सबके 'झोला भइया' बन गए।

''तो तुम ठाकुर जोरावर सिंह का नाम सुनकर डर गए।'' उन्होंने बात आगे बढ़ाई।

''हाँ!'' रामलाल ने कहा।

''और तुम वहाँ से दुम दबाकर भाग आए?''

''नहीं... यह बात नहीं है।''

''यह बात है कोई बात नहीं है।'' डॉक्टर ने शब्दों को लगभग चबाते हुए कहा और फिर उनका धाराप्रवाह भाषण शुरू हो गया -

''जोर जोरावर सिंह में नहीं, उसके नाम में है। खून उसके भी शरीर में लाल रंग का ही दौड़ता है और तुम्हारी रगों का खून भी लाल रंग का है। लेकिन ब्राह्मण-ठाकुर का नाम सुनते ही वह रंग नीला पड़ जाता है। दोष तुम्हारा नहीं। दोष इस मनुवादी व्यवस्था का है, जिसने तुम्हें जन्म से कायर बना दिया है। इतना कायर कि सौ-सौ जूता खाने के बाद भी तुम्हारी आँखें नहीं खुलतीं। अरे, जो आदमी अन्याय को चुनौती नहीं दे सकता वो क्या आदमी है? गीदड़ है गीदड़। बल्कि उससे भी गया-गुजरा।''

''इसी से तो अपने झोला भइया ने अपना चुनाव निशान शेर रखा है।'' ... शंकर ने बात को बीच में ही काटते हुए झोला भइया की तारीफ और अपने सामान्य ज्ञान का परिचय एक साथ प्रस्तुत कर दिया।

बात अब गाँव की राजनीति से लेकर खेत-खलिहान और जमीन के पट्टों तक चल निकली और अंततः लौट-फिरकर उसी चिरपरिचित विषय पर आ टिकी जो उनके लिए सबसे बड़ा काँटा भी था और एक सबसे बड़ी चुनौती।

- ग्राम-प्रधान मिसरीलाल शुकुल और उसका आभामंडल।

ब्रिटेन में आम नागरिकों का एक प्रिय 'टापिक' है क्वीन एलिजाबेथ और उनके कुटुंब का राजसी रहन-सहन। इसी भाँति गोपालपुर गाँव के आम आदमियों के लिए आलोचना-प्रत्यालोचना का एक अति सहज कथानक था मिसरीलाल और उसका पारिवारिक जीवन।

डॉक्टर का दवाखाना अब एक चौपाल में तब्दील हो चुका था और इस समय वहाँ वही पुरानी चाशनी बघारी जा रही थी। मिसरीलाल के तीन लड़के थे। वही मिसरीलाल, जिसके पूर्वज कभी भीख माँगते थे, चोरी-ठगी और तिकड़म के जरिए देखते ही देखते एक दिन गाँव का परधान बन बैठा। ...

जब उसके लड़के जवान हुए तो गाँव की बहू-बेटियों की आबरू सुरक्षित नहीं रह गई। अलबत्ता उन्होंने मिसरीलाल की शह पर डकैती डालने का कारोबार अपने गाँव से दूर-दराज के न जाने कितने इलाकों में फैला रखा था। ...

बड़ा-लड़का कालीप्रसाद तो पक्का डकैत था। यद्यपि वह डकैती रात के समय डालता था, किंतु दिन के समय अपने बाप का आतंक आसपास के क्षेत्रों में फैलाने में उसकी बड़ी मदद करता था। ...

छोटा लड़का मातादीन भी छिपा रुस्तम था। वैसे उसे कभी किसी मामले में कोई पकड़ नहीं पाया था और मिसरीलाल के सैकड़ों एकड़ के नामी-बेनामी खेतों की देखभाल में वही आगे रहता था। ...

परंतु उसका सबसे होनहार पुत्र मँझला बेटा भवानी शुक्ला निकला। भवानी में जन्मजात प्रतिभा थी अथवा इसमें भी मिसरीलाल की कोई चाल थी कि उसने भवानी को प्रारंभ से ही खूब पढ़ाया। खूब पढ़ाया। अच्छी से अच्छी शिक्षा प्राप्त करने हेतु शहर भेजा। फिर इलाहाबाद विश्वविद्यालय में बी.ए. में दाखिला कराया। बी.ए. की परीक्षा उधर भवानी ने पास की और इधर मिसरीलाल ने घूसपात देकर भवानी की भर्ती पुलिस में करा दी। ...

जिस दिन भवानी शुक्ला सब-इंस्पेक्टर के पद पर चुना गया वह दिन मिसरीलाल के खानदान के लिए सबसे बड़ी खुशी का दिन था। प्रधान जी ने सारे गाँव में मिठाइयाँ बँटवाईं। ''इतनी खुशी तो बकौल शंकर - ''पड़ोस गाँव के ठाकुर जोरावर सिंह ने भी नहीं मनाई थी जब उसका लड़का डिप्टी कलट्टरी में भर्ती हुआ था। मिसरीलाल का कहना था कि डिप्टी कलट्टरी भी क्या नौकरी है ससुरी? जो रूआबदाब दरोगाई में है वह भला कलट्टरी में कहाँ?''

''रुआबदाब! स्साला ...'' कल्लू के मुँह से निकला - ''यह तो शुरू से ही रुआबदाब का भूखा है। हम चाहे मरें या जिएँ, मगर इस चिड़ीमार का रुआब और रुतबा न जाने पाए। अब तो इस गाँव में डकैत और पुलिस एक ही घाट पानी पीते हैं। बाम्हन की जात और कुत्ता की बरात।''

''कौन साला हमारे मालिक को कुत्ता बोला?'' तभी वहाँ एक आवाज हवा में गूँजी। यह आवाज बिंद्रा की थी जो बगल में रामलाल धोबी के बैठके में प्रधान जी के इस्तरी किए कपड़े लेने आया था।

''चुप बे बाम्हन के कुत्ते!'' इधर से कल्लू ने भी ललकार कर कहा।

शंकर और घीसू भी मुड़कर बिंद्रा को घूरने लगे।

इस पर बात बढ़ गई। दोनों ओर से गालियों का आदान-प्रदान खुलकर होने लगा। शोर-शराबा सुनकर रूपा धोबन भी बाहर आ गई। बिंद्रा था तो अकेला, मगर एक तो उन तीनों चमार नवयुवकों से तगड़ा था। दूसरे, खुद भी चमार था। रूपा के बाहर आते ही उसके चौड़े कंधो और बाँहों में स्थित मछलियाँ और भी फड़कने लगीं। वह लट्ठ लेकर ललकारकर आगे बढ़ा। किंतु तब तक रामलाल धोबी सामने आ गया और बोला - ''क्या करता है रे बिंद्रा? मैं कहता हूँ, चला जा। मेरे घर के सामने ये खून-खराबा ठीक नहीं।''

उधर डॉक्टर झोलाराम ने भी उन नवयुवकों को रोका। नतीजा यह हुआ कि बिंद्रा जिस तेजी से गालियाँ बकता हुआ आगे बढ़ा था उसी तरह बकता-झकता वापस लौट गया। डॉक्टर के दवाखाने की सभा भी विसर्जित हो गई। कल्लू, घीसू और शंकर भी वहाँ से अपने चमार टोले की ओर चले गए।

अब वहाँ डॉक्टर और रामलाल ही शेष रह गए। रामलाल इस समय तर्क के जोश में था। उसने कहा - ''कुछ सुना तुमने झोला भइया? बिंद्रा बातों-बातों में तुम्हारी जन्मकुंडली की जानकारी भी जता गया।''

''क्या जानता है वह मेरे बारे में और? और क्या जानता है तू मेरे बारे में?'' अब तक लगभग शांत रहे डॉक्टर का दबा हुआ आक्रोश उजागर होने लगा।

किंतु रामलाल का उत्साह इससे भी ठंडा नहीं पड़ा। उसने कहा -

''अब इसमें गरम होने की क्या बात है? अगर बिंद्रा दिन-रात पंडितों का नमक खा-खाकर उनकी ओर से गुर्राने लगा है तो इसमें बुराई क्या है? मैं तुम्हारे बारे में कितना जानता हूँ इससे तुम्हें क्या? क्या तुम अपने बारे में सब कुछ नहीं जानते? बालपन से तुम्हें देख रहा हूँ। मुझे न समझाओ।''

''क्या न समझाऊँ? ... अच्छा छोड़ो। जरा तुम्हीं समझा दो।'' डॉक्टर ने गंभीर बनते हुए कहा।

''झोला भइया! क्यों मेरा मुँह खुलवाते हो? ... तुम दिन-रात पंडितों को कोसते-गरियाते नहीं थकते हो। पर तुम काहे भूल जाते हो कि वह कोई पंडित ही था, जिसने गाँव की पाठशाला में तुम्हें पढ़ाया। शहर के कालेज में भी कई पंडितों ने तुम्हें पढ़ाया होगा। पंडितों और ठाकुरों के खेतों में ही तुम्हारे लोगों को काम मिलता है। उनके घरों में शादी-ब्याह के अवसरों पर भी तुमसे सेवा ली जाती है। भोजन-अनाज-कपड़ा बदले में मिलता है। तुम्हारे घरों में जब शादी-ब्याह होता है तो वे लोग भी जाकर रुपया-कौड़ी से तुम्हारी मदद करते हैं और असीस देते हैं।''

''बहुत खूब रामलाल! झाड़े रहो। ... आज तो लगता है कि बयार ही मिसरी लाल शुकुल के घर से चल रही है।'' डॉक्टर ने कोई सीधी प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करते हुए इतना ही कहा और फिर चुप लगा गया। वह किसी गहरे सोच में डूबने ही वाला था कि रूपा धोबन फिर से बाहर आई और उसने आँखों ही आँखों में रामलाल धोबी से कुछ इशारा किया। रामलाल जाने लगा। डॉक्टर ने उससे कहा - ''रामलाल! भौजी से कहो, आज क्या चाय नहीं पिलाएँगी?''

रूपा को चाय पीने का बड़ा शौक था। दिन-भर में जब तक दो लोटा चाय, सुबह की चाय के अतिरिक्त, वह पी न लेती उसकी देह में जैसे जान ही न आती। जिस समय बिंद्रा, कल्लू और उसके साथियों के बीच बोलचाल भर शुरू हुई थी, रूपा ने चूल्हे पर चाय का पानी चढ़ाया भर था।

रामलाल के भीतर आते ही रूपा ने आँगन के एक कोने में खड़े होकर पैंतरा बदला और अपना बायाँ हाथ कमर पर रखकर दायाँ हाथ हवा में नचाते हुए कहा - ''क्यों जी? ... तुमसे किसने कहा था कि चमारों के झगड़े में बीच में कूदो?''

''अरे मेरी रानी! ज्रा आहिस्ता बोल।'' रामलाल ने अपने दोनों हाथ जोड़कर अपने माथे से चिपकाए।

''नहीं!... पहले जान ल्यो। तुम इन सबके चक्कर में नहीं पड़ोगे, वरना हमसे बुरा कोई ना होगा। हाँ...।''

ताकीद करती हुई रूपा रसोई में चली गई। उसने जल्दी-जल्दी चूल्हे से चाय उतारकर एक लोटे में छानी। फिर आँगन के आले में रखा एक शीशे का छोटा-सा धारीदार गिलास उठाया और उसे पानी से खँगालकर उसमें चाय उँडेली। इस प्रक्रिया में शीशे का वह गिलास भूमि पर रखा रहा और गर्म चाय का लोटा रूपा के हाथों में झूलता रहा।

''और मेरी चाय?'' रामलाल ने पूछा।

''तुम पहल इसे ले जाकर डाक्टर को दो। पीछे से तुम्हारा गिलास मैं बैठके में रख आऊँगी।'' रूपा ने कहा।

थोड़ी देर में डॉक्टर झोलाराम अशांत शीशे के गिलास में और रामलाल एक पीतल के गिलास में चाय पी रहे थे।

दोपहर के दो बजने को थे। दवाखाने के सामने से भैंसों और बकरियों का एक झुंड गुजरा। उनके पीछे-पीछे श्यामू और रधिया भी हँसते-खिलखिलाते हुए वहाँ आ गए। श्यामू ने 'चाचा-चाचा' कहकर डॉक्टर से मीठी गोली के लिए कुछ पैसे माँगे। डॉक्टर ने कुछ पैसे निकाल कर दिए। श्यामू ने रधिया का हाथ पकड़कर कहा -

''तू भी चल! दोनों साथ-साथ खाएँगे।''

और दोनों वहाँ से चले गए। डॉक्टर के मुँह से निकला - ''कितनी प्यारी जोड़ी है दोनों की! इनका ब्याह हो जाता तो कैसा लगता?''

रामलाल चुप रहा।

डॉक्टर खुद तो कुँआरा था, मगर उसका बड़ा भाई बिसेसर शादीशुदा था। वह चमार टोले का मुखिया था और श्यामू उसी का बेटा था। जबकि रधिया रामलाल और रूपा की एकमात्र कन्या थी।

दवाखाने में एक अजीब-सा सन्नाटा पसर गया। काफी देर तक डॉक्टर और रामलाल में से कोई कुछ न बोला। आखिर में डॉक्टर ने ही उस मौन को तोड़ा। उसने रामलाल से कहा -

''कुछ देर पहले तुम ब्राह्मणों और क्षत्रियों का बड़ा बखान कर रहे थे। तो अब मेरी भी सुनो।... हमारे घर की कोई चमारन जब तक इनके ब्याह में डुग्गी नहीं पीटती, इनके पुरखे इनके स्वर्ग से आशीर्वाद देने इनके घर के कोहबर में नहीं आते हैं। परंतु ब्याह के भोज में यह तथाकथित ऊँची जात वाले लोग अलग पंगत में बैठतें हैं और हम नीच जात वालों की अलग पंगत लगाई जाती है।... हमारे घरों में स्त्री-पुरुष इनके घरों पर मांगलिक कार्यों के अवसर पर दिन-रात काम करते और खटते हैं, परंतु जब हमारे यहाँ शादी-ब्याह होता है तो बाबूसाहब लोग महज खानापूरी करने आते हैं। बस आए, और गए। उनके लिए हमारे घर का तो पानी भी जहर है। और इनके घर की स्त्रियाँ? वे तो हमारे घर झाँकने भर को भी नहीं आतीं। और सुनोगे?''

''बस करो। अब रहने भी दो।'' रामलाल ने कहा और कुछ सोचता हुआ वहाँ से चला गया।

डॉक्टर ने भी दवाखाना बंद करके उसमें ताला डाल दिया और चमार टोले का रुख किया।

रामलाल और रूपा आँगन में अपनी-अपनी चारपाइयों पर लेटे थे। रधिया रूपा से लिपट कर सो रही थी। आँगन में चाँदनी बिखरी हुई थी। फलतः हर चीज साफ-साफ दिखाई देती थी। एक कोने में कुछ बकरियाँ ऊँघ रही थीं। दूसरे कोने में बैसाखनंदन दीवार से लगा हुआ अपना खरहरा बदन रगड़ रहा था।

रूपा अस्फुट शब्दों में कुछ स्वगत संभाषण कर रही थी। एकाएक उसने रामलाल की ओर करवट ली और फुफकार कर बोली - ''मैं कहती हूँ, तुम्हारी अकल पर क्या पत्थर पड़ गए हैं? डॉक्टर ने कही तो कही तुमने सोची भी कैसे?''

''अरे रानी! ... अब खतम भी करो।'' रामलाल आजिजी से बोला।

''कैसे खतम कर दूँ? तुम्हें तो आगे-पीछे कुछ सूझता नहीं है। न धरम की परवाह है न बिरादरी की। हम धोबी हैं और वह लोग चमार। न हमारा छुआ वो खाते हैं और न उनका छुआ हम। फिर श्यामू और रधिया का ब्याह कैसा? ... सुनो जी, बिरादरी से हुक्का-पानी बंद हो जाएगा तो कोई थूकने भी न आएगा हमारे मुँह पर। इसलिए कान खोलकर सुन लो, अगर वह चमारों का लौंडा फिर कभी इस घर में आया तो मुझसे बात मत करना। और इस रधिया की बच्ची का तो मैं गला ही दबा लूँगी।''

रामलाल ने एक साँस खींची और रूपा से कहा - ''लेकिन डॉक्टर तो चमार होकर हमारे हाथ का छुआ खाता है।''

''खाता है तो कौन अहसान करता है। कुँआरे मरद का मान कैसा? उसकी जोरू होती तो देखती कि कैसे किसी धोबन के हाथ का छुआ वह मुँह लगाता? ... और उसे हमारे वोट भी तो चाहिए।''

''वोट तो प्रधान जी भी माँगते हैं। पर हमारा छुआ तो वह नहीं खाते?''

''उससे क्या? वह पंडित जी हैं। जिमींदार हैं। हम उनकी परजा हैं।''

स्त्री सामाजिक प्रश्नों के प्रति पर्याप्त संवदेनशील होती है, किंतु जब वह भावना से संचालित होती है तब वह तर्क-कुतर्क को पुरुष के लिए छोड़ देती है। रूपा कुछ देर चुप रही और पति के प्रतिवाद की प्रतीक्षा करती रही। परंतु बदले में उसे रामलाल के खर्राटे सुनाई दिए। वह मन मसोसकर रह गई।

मैंने एक बार रामलाल और एक बार रूपा को देखा। फिर मैं भी एक जमुहाई लेकर रधिया की एक बकरी के पेट में छुपकर सो गया।

इस तरह मुझे उस गाँव में कई दिन बीत गए। सुबह से शाम तक मैं शाकाहारी लोगों और मांसाहारी जानवरों की निगाहें बचाकर यहाँ से वहाँ तक आवारागर्दी करता फिरता था। चाहे वह ग्राम-प्रधान का घर हो चाहे रामू धोबी का। चाहे घबडूराम का दवाखाना। चाहे किसी का ओसारा हो, चाहे कोई खलिहान। गाँव की चौपाल से चमार टोला तक सब कुछ मेरे लिए एक जैसा था।

इन दिनों में मैंने यहाँ बहुत कुछ देख लिया था। जैसे किसी कुएँ में भाँग घोल दी जाए, जातिवाद पूरे गाँव में एक नशे की भाँति पूरी तरह से परिव्याप्त हो चुका था। घर-घर में आजकल जात-बिरादरी की चर्चा आलू, लौकी, तरोई की भाँति होने लगी थी। लोगों के बीच-भेदभाव की खाईं दिन-प्रतिदिन चौड़ी होती जा रही थी। परिस्थितियाँ इतनी विकराल होती जा रही थीं कि 'जातिगत भेदभाव' 'जातिगत वैमनस्य' का रूप लेता जा रहा था और यह कब बढ़कर 'जातियुद्ध' का रूप ले लेगा कुछ कहा नहीं जा सकता था।

मिसरीलाल और झोला भइया जैसे लोग एक जमाने में अपने भाग्य के निर्माता स्वयं हुआ करते थे, आधुनिक राजनीति में केवल शतरंज का मोहरा मात्र बनकर रह गए थे। महत्वाकांक्षाओं की शतरंज बिछी थी और उन पर खेल का संचालन करने वाले लंबे हाथ कहीं और थे।

दिन के उजाले में बड़ी-बड़ी बातें करने वाले लोग रात के अँधेरे में इधर-उधर मुँह काला करते फिरते थे। ऐसी कितनी कहानियाँ थीं, जो गन्ने के खेतों और जंगलों में शुरू होती थीं और वहीं खत्म हो जाती थीं।

गाँव की गलियों में खड़ंजे तो बिछे थे, पर उन पर जल-निकासी की समुचित व्यवस्था नहीं होने के कारण हरदम काई-कीच का साम्राज्य फैला रहता था। गोबर के घूरों और यहाँ के विकास की योजना से जुड़े मस्तिष्कों में एक अद्वितीय साम्य था। गाँव में विकास-कार्य के लिए जो पैसा आता था वह कितनी तेजी से खर्च हो जाए, यही सबकी चिंता का प्राथमिक कारण था और मूल कारण भी। पैसा कहाँ और कैसे खर्च हो जिससे अधिकाधिक ग्रामवासियों को लाभ पहुँचे - इसकी चिंता किसी को न थी।

जो अफसर आते थे उन्हें गाँव के किनारे के प्राथमिक स्कूल में बैठाया जाता था। वहाँ प्रधान जी के घर से सोफा और कुर्सियाँ लाकर बिछाए जाते थे। प्रधान जी की दरी लगती थी। प्रधान जी का फूलदान लगता था और प्रधान जी के प्लेट-प्यालों में मिठाई-नमकीन का प्रबंध होता था। लोग भी प्रायः वही आते थे, जिन्हें प्रधान जी आने देना पसंद करते थे। अगर कहीं कोई भूला-भटका व्यक्ति चमार टोले या अन्यत्र से वहाँ आ भी पहुँचा तो जल्दी मुँह नहीं खोलता था। झोला भइया भी प्रायः ऐसे अवसरों पर गोल रहा करते थे। वह अफसरों को दर्शन देने अथवा करने के बजाय उनके साथ दरखास्तबाजी पर अधिक विश्वास करते थे।

अब रहा प्राथमिक स्कूल। उसकी तो चर्चा करना ही व्यर्थ है।


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