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यात्रावृत्त

बीसवीं शती का गोलोक
अज्ञेय


बाईस घंटे में मुझे प्रायः आठ सौ मील की यात्रा करनी है। बिजली के इंजिन से चालित रेलगाड़ी के लिए 37 मील प्रति घंटे की रफ्तार बहुत अधिक नहीं है, लेकिन इन आँकड़ों का उल्लेख यही बताने के लिए कर रहा हूँ कि आराम से रेलगाड़ी में बैठ जाने के बाद, इतनी लंबी यात्रा की बात सोचकर समय काटने के उपायों के बारे में सोचना स्वाभाविक हो जाता है। यह तो ठीक है कि नया देश है - मैं बहुत-सा समय खिडक़ी से बाहर झाँकने में बिताऊँगा ही - और यहाँ सब रेलें बिजली से चलती हैं इसलिए धुएँ की भी चिंता नहीं है। लेकिन बाईस घंटे बाहर ताकते रहना तो असंभव है। इस यात्रा में प्रायः बाईसों घंटे का प्रकाश रहेगा, फिर भी! मैं स्टाकहोम से उत्तर, ध्रुव प्रदेश की ओर दौड़ा जा रहा हूँ, मध्य जून का मौसम है जब ध्रुव-मंडल में चौबीसों घंटे दिन रहता है। स्टाकहोम में प्रायः दो घंटे की रात रहती है। लेकिन वहाँ से पाँच बजे चलकर 'रात' होते न होते तो मैं उस सीमा के और निकट पहुँच जाऊँगा जहाँ रात होती ही नहीं।

अपने साथ स्वीडन के संबंध में जो परिचय-पुस्तकें रख ली थीं, उन्हें उठाकर उलटने-पलटने लगा। आरंभ में ही जो आँकड़े दिए गए थे उनसे ज्ञात हुआ कि स्वीडन की कुल भूमि का आधे से अधिक (54.5 प्रतिशत) वन-भूमि है और प्रायः 12 प्रतिशत गोचर-भूमि या चरागाह। देश की आबादी का घनत्व प्रति वर्गमील 43 जन है। दूध और मक्खन की खपत प्रति व्यक्ति क्रमशः 210 सेर और 11 सेर वार्षिक है, अर्थात औसत से प्रत्येक व्यक्ति प्रतिदिन 9 छटाँक दूध और 1/2 छटाँक मक्खन का सेवन करता है। क्रीम और पनीर आदि इससे अलग हैं।

स्वाभाविक था कि इन आँकड़ों के आधार पर एक आधुनिक गोलोक की कल्पना करने लगूँ जिसमें असंख्य काम-धेनुएँ मुक्त भाव से वन-प्रदेशों और हरियालियों में विचरण करती फिरती हैं, और जहाँ-जहाँ उनके पैर पड़ते हैं वहाँ समृद्धियाँ पनप उठती हैं। सुना था कि सात आकाशों के पार जो गोलोक है उसमें कभी अँधेरा नहीं होता, इससे उत्तरी स्वीडन में भी उत्तरायण के दिनों गोलोक की कल्पना करना और भी स्वाभाविक था।

मैं कभी पुस्तकों के पृष्ठ उलटता हुआ और कभी बाहर के बदलते हुए दृश्य देखता हुआ अगले दिन तीसरे पहर अपने लक्ष्य पर पहुँच गया। आबिस्को का 'टूरिस्ट केंद्र' यद्यपि था यथानाम ही, तथापि उसकी सब व्यवस्था विद्यार्थियों के हाथ में थी जो उन दिनों ग्रीष्मावकाश के कारण इधर-उधर घूम रहे थे और अपने भरण-पोषण के लिए ऐसे स्थानों की व्यवस्था में आवश्यकतानुसार परिश्रम का दान देते थे। बड़े डायनिंग-रूम में, जिसमें वेटर नहीं थे और स्वयं-सेवा का ही विधान था, जहाँ-तहाँ दूध और दही के भरे हुए जग रखे थे। होटल में रहने वाले इच्छानुसार पानी, दूध अथवा दही पी सकते थे - जब, जितनी बार, जितना चाहें।

आधुनिक गोलोक की कल्पना इससे और पुष्ट हो आई। लेकिन जग से दूध ढालते समय सहसा ध्यान आया कि इतनी लंबी यात्रा में कम-से-कम आरंभिक अंश हरियाली के प्रदेश में से गुजरा था, मैंने कहीं भी गाय या बैल नहीं देखा। यह कैसा गोलोक है जिसमें गाय अदृश्य रहती है?

आबिस्को में तो नहीं, पर वहाँ से स्टाकहोम लौट जाने के बाद दक्षिणी स्वीडन की यात्रा में मैंने इस विषय में जिज्ञासा प्रकट की थी। यह विशेष रूप से इसलिए कि गोचर प्रदेश मुख्यतया दक्षिणी स्वीडन में ही है। जिज्ञासा शांत करने लायक उत्तर तो वहाँ भी नहीं मिला। उलटे मुझसे ही भारत की परिस्थिति के विषय में अप्रत्याशित प्रश्न पूछ गए। एक ने पूछा : ''सुना है आपके देश के शहरों में साँड़ फिरते हैं। मुझे एक मित्र ने बताया था कि बनारस में शहर के एक चौक में साँड़ों की लड़ाई देखी थी। क्या यह सच है?'' मुझे याद आया कि स्वीडन में तो नहीं, इंग्लैंड में कहीं-कहीं मैंने देखा था कि जहाँ साँड़ रखा जाता है वहाँ आस-पास लंबी-चौड़ी चरागाह छोड़कर उसके बाहर मजबूत दीवार या बाड़ लगा दी जाती है, और जहाँ-तहाँ चेतावनी के नोटिस टाँग दिए जाते हैं... एक दूसरे व्यक्ति ने पूछा : ''आपके यहाँ, सुना है, गायें शहरों में, बल्कि लोगों के घरों में रहती हैं और चराने के लिए सड़कों पर छोड़ दी जाती हैं - बल्कि खूँद-खूँदकर कचरा खाती हैं। क्या यह बात ठीक है?'' और एक दूसरे ने इस प्रश्न के साथ जोड़ दिया : ''लेकिन यह कैसे हो सकता है - भारत में तो गाय पूज्य मानी जाती है। है न?''

जिज्ञासा का उत्तर इन प्रश्नों से नहीं मिला, लेकिन उत्तर कहाँ से मिलेगा इसका कुछ संकेत तो मिल ही गया। देश की 12 प्रतिशत भूमि गोचर-भूमि है और वह शहरों से अलग ही रखी जाती है। वहाँ गायें स्वच्छता और स्वच्छंदता से रहती हैं; और वहीं दुहा जाकर दूध शहर में पहुँचता है। यह तभी संभव हो सकता है जबकि वितरण का संगठन बहुत अच्छा हो; वितरक संस्था के मुख्य कार्यालय में और दो एक संग्रह और वितरण केंद्रों में जाकर समझ लिया कि वह संगठन वास्तव में बहुत विस्तृत और कुशल है। अन्य प्रकार के सहकार-संगठनों की बात अनंतर करूँगा, लेकिन दूध की सहकारी संस्था का उल्लेख यहाँ कर देना अप्रासंगिक न होगा। पूर्वीय मध्य स्वीडन की जिस दुग्ध सहकार संस्था का केंद्र स्टाकहोम में है, उसके 30,000 गोपालक सदस्य हैं। इसकी विभिन्न डेरियाँ प्रतिदिन 20 लाख किलोग्राम दूध का संग्रह करती हैं। इन्हीं डेरियों में कृमि-नाशन के बाद दूध बोतलों में अथवा मोम लगे कागज के पात्रों में बंद करके बिक्री के लिए भेजा जाता है, अथवा क्रीम और पनीर निकालने के लिए प्रयुक्त होता है। इन डेरियों से प्रतिवर्ष 1 करोड़ 20 लाख किलोग्राम (प्रायः सवा तीन लाख मन) मक्खन और 1 करोड़ किलोग्राम पनीर तैयार होता है।

वहाँ पर अपने देश की गोधन-संबंधी चर्चा कुछ प्रीतिकर नहीं थी। गोधन-संबंधी सुधार और उन्नति का उल्लेख भी कुछ विशेष अर्थ न रखता जबकि उस उन्नति के बाद की स्थिति भी स्वीडन की दृष्टि से शोचनीय होती है। मन-ही-मन सोचता रहा कि इन प्रश्नों में कितना अचिंतित और अज्ञात व्यंग्य है: ''आपके देश में साँड़ छुट्टे फिरते हैं?'' ''आपके देश में गाय कचरा खाती है?'' ''किंतु आपके यहाँ तो गाय पूज्य मानी जाती हैं।''

ठीक ही तो है। जहाँ मनुष्य गाय को नहीं खाता वहाँ गाय मनुष्य को खाती है -और मनुष्य अच्छा भोजन नहीं है इसलिए उसको खाकर भी भूखी रह जाती है। गाय क्योंकि पूज्य है इसलिए उसको पालने वाला निर्धन व्यक्ति उसको भी भूखों मारता है और उसके साथ स्वयं भी भूखों मरता है; और अपने को यही सोचकर सांत्वना दे लेता है कि गाय को भूखों रखने के कारण वह पाप-भागी नहीं है क्योंकि वह स्वयं भी तो भूखा है। वास्तव में जब तक हमारी गो-संबंधी भावना में परिवर्तन नहीं होता तब तक स्थिति में कोई सुधार भी नहीं हो सकता और उस दिशा में किया जाने वाला सब प्रयत्न बालू की दीवार है। गोधन का संवर्धन तो तभी हो सकता है जब हम उसे धन मानें; अर्थात भावना को एक ओर रखकर उसे आर्थिक नियमों के अधीन मान लें। माताओं की वृद्धि नहीं की जाती, न सुधार होता है, और माताओं की नस्ल के बारे में कुछ कहना तो निरा दुर्विनय है!

स्टाकहोम अत्यंत साफ-सुथरा शहर है। इतना साफ कि उसकी सफाई आँखों में चुभे। लेकिन यह कहने में मुझे थोड़ा संकोच होता है कि स्थापत्य दृष्टि से वह सुंदर भी है। वास्तव में स्टाकहोम का स्थापत्य नवीन प्रवृत्तियों के अध्ययन के लिए उपयोगी भले ही हो, कुछ-एक विशिष्ट इमारतों को छोड़कर सुंदर प्रायः नहीं है। आरामदेह वह हो सकता है, क्योंकि वह जिस सिद्धांत पर आधारित है वह सुविधा-प्रधान ही है, सौंदर्य-प्रधान नहीं। बल्कि वह सौंदर्य को सुविधा की उपज मानता है। जो वस्तु या उपकरण जिस काम के लिए हो, उस काम के अधिक-से-अधिक अनुरूप होना ही उसका सौंदर्य है,-उपकरणवाद (फंक्शनलिज्म) का यह सिद्धांत सन् 1930 के लगभग जर्मनी और फ्रांस से स्वीडन आया और फिर यहाँ स्वतंत्र रूप से विकसित होता रहा। नगर-निर्माण और स्थापत्य में इस सिद्धांत का खंडन तो कठिन है, लेकिन अपनी ओर से यह स्वीकार करने में मुझे कोई संकोच नहीं कि अपनी संवेदन-पद्धति को अभी तक उसके अनुरूप नहीं ढाल सका हूँ। उपकरण को सुविधाजनक उपकरण अवश्य होना चाहिए, लेकिन उपकरण होने मात्र से वह सुंदर हो जाता है, यह अभी तक नहीं मान पाया हूँ और समझता हूँ कि लोक-शिल्प के इतिहास से जो उदाहरण उपकरणवादी देते हैं, वे उनकी युक्तियों का पूरा समर्थन नहीं करते। कोई भी उपकरण और सुंदर बनाया जा सकता है, बिना उसकी उपयोगिता कम किए हुए। किसी भी उपकरण को अधिक उपयोगी बनाया जा सकता है, बिना उसकी सुंदरता बढ़ाए हुए। मैं नहीं जानता कि उपयोगिता की दृष्टि से स्टाकहोम का पुराना नगर अपने समय की आवश्यकताओं की पूर्ति अधिक अच्छी तरह करता था, लेकिन फिर भी मानता हूँ कि वह नए नगर से कहीं अधिक सुंदर है। मैं ही नहीं, स्वयं स्वीडी लोग भी इसे मानते हैं, और विदेशी को सगर्व वह दिखाते हैं। नवीनता के पोषक भी, जो नए नगर-भवन पर गर्व करते हैं, कम-से-कम उतना ही गर्व पुरानी नगरी पर भी करते हैं।

स्थापत्य के विशेष सुंदर न होने पर भी स्टाकहोम के अनेक भाग बहुत ही सुंदर हैं, जिसका मुख्य कारण मालार झील है। वह सर्पिल और घुमावदार झील नगर के विभिन्न खंडों में विभिन्न आकार लेती है-कहीं नहर सी सँकरी, कहीं सरोवर-सी गोल और कहीं उपसागर-सी फैली हुई। बीच-बीच में चट्टानी टीले अथवा वन-खंड उसके सौंदर्य को और बढ़ा देते हैं। बंदरगाह से एक ओर का तटवर्ती प्रदेश तो सुरक्षित राष्ट्रीय उद्यान बना दिया गया है, और इसमें सड़कों के आस-पास हरियालियों में बिखरे हुए कहवाघर और भोजनालय बहुत ही आकर्षक हैं। प्रवास के पहले दिन अपने आतिथेय के साथ इस प्रदेश में घूमकर ऐसे ही एक रेस्तराँ में भोजन किया था। आतिथेय को अपनी नई जर्मनी गाड़ी दिखाने का भी चाव था, लेकिन मैं तो उसी तन्मय भाव से बाहर के दृश्य देख रहा था जिसके लिए अँग्रेजी मुहावरा 'रबर की गर्दन घुमाना' बहुत ही उपयुक्त है। रेस्तराँ का नाम लिंडगार्डन (नींबू का बाग) तो सार्थक था ही, बरामदों के बाहर और अनेक मालंचों पर सजे हुए विलायती फूलों का रूप और सौरभ भी रमणीय था। पैंजी और नैस्तर्शम, कार्नेशन और हाइड्रेंजिया - ये फूल भारत में भी होते हैं, लेकिन यहाँ उनका रंग-रूप और आकार सभी और थे - हाइड्रेंजिया के गुच्छ तो फूलगोभियों से भी बड़े! और आस-पास पाँगुर और लीलाक के पेड़ फूल रहे थे- लीलाक के फूल कुछ-कुछ महानिंब (बकायन) के फूल से मिलते हैं, लेकिन उससे अधिक सुगंधित होते हैं; और ऊदे के अलावा गुलाबी और सफेद रंग के भी होते हैं।

अपने आतिथेय का उल्लेख कर ही दिया है तो दो-एक बातें उनके विषय में और कह दूँ। आतिथ्य के लिए वह व्यस्त तो थे ही, मैंने उनके लिए एक समस्या और उपस्थित कर दी थी जिसे उन्होंने बड़े ही आकर्षक सहज भाव से स्वीकार कर लिया। स्वीडिश इन्स्टीट्यूट नामक संस्था के एक मंत्री होने के नाते विदेशों से आने वाले सभी प्रकार के अध्येताओं के स्वागत और उनके लिए आवश्यक प्रबंध का काम वह करते रहे थे। यूनेस्को से संबद्ध होने के कारण मेरे स्वीडन-प्रवास का प्रबंध भी उनकी संस्था को सौंपा गया था। ऐसी संस्थाओं के लिए प्रबंध की एक स्वयं-चालित रूढ़ि-सी बन जाती है। लेकिन मेरे बारे में कठिनाई यह थी कि मैं उस संस्था का पहला लेखक-अतिथि था! मुझसे पहले जो अध्येता आते रहे, उन सबकी रुचि दूसरी दिशाओं में थी : कोई इस्पात का कारखाना देखना चाहता था तो कोई जन-विद्युत् की व्यवस्था, कोई पूर्वनिर्मित (प्री-फैब्रिकेटेड) घरों का अध्ययन करने आया था तो कोई समाज-कल्याण के कानूनों का, कोई कागज बनाने के कारखाने देखना चाहता था तो कोई सहकार संघ का केंद्रीय कार्यालय। लेकिन मैं - मैं लेखकों से मिलना चाह रहा था! और वह अभी तक सोच नहीं पाए थे कि मेरे लिए क्या व्यवस्था उन्हें करनी चाहिए। केवल इतना उन्होंने किया था (स्वयं-चालित रूढ़ि का प्रताप!) कि मेरे समवयस्क कुछ लेखकों से भेंट की व्यवस्था कर दी थी। मैंने यह बताया कि यूनेस्को के केंद्र पैरिस में भी ऐसी ही समस्या उठी थी, और इसलिए मुझे वहाँ 15 दिन अधिक रुकना पड़ा था कि उनके विशेषज्ञों से पूछकर अपना कार्यक्रम स्वयं निश्चित कर सकूँ। इस सूचना से उन्हें बड़ी सांत्वना मिली और उनका बोझ प्रत्यक्ष ही कुछ हल्का होता जान पड़ा। दबे स्वर से मैंने यह भी सुझा दिया कि मिलने के लिए समान वय का ध्यान रखना उतना आवश्यक नहीं है जितना समान रुचि अथवा जिज्ञासाओं का - 'समानशीलव्यसनेषु सख्यम्'। पहले ही दिन यह स्पष्टीकरण हो जाने से अनंतर बहुत लाभ हुआ, क्योंकि इस प्रकार मैं युवतर लेखकों से भी मिल सका। बल्कि कई दृष्टियों से उनसे मिलना अधिक शिक्षाप्रद हुआ।

पहले दिन मैं विद्यार्थियों के एक होटल में ठहरा था - एक छात्रावास में जो कि ग्रीष्मावकाश में विद्यार्थियों द्वारा होटल के रूप में चलाया जा रहा था। किंतु दूसरे दिन मेरे लिए दूसरी जगह व्यवस्था कर दी गई। यह दूसरा होटल प्राइवेट होटल था - कुल आठ कमरे - और पहाड़ी की ढाल पर बनी हुई पाँच मंजिलों की इमारत में पाँचवी मंजिल पर था। (निचली मंजिलों में एक क्लब और एक रेस्तराँ भी था।) यह होटल 'लेखकों का होटल' प्रसिद्ध था। कुछ ऐसी परंपरा थी कि स्टाकहोम आने वाले विदेशी लेखक यहीं ठहरते या ठहराए जाते थे। होटल का खाता देखने पर अनेक प्रसिद्ध नाम मुझे मिले, यह भी ज्ञात हुआ कि स्ट्रिंडबर्ग भी कभी वहाँ रहे थे।

होटल से स्टाकहोम का और मालार झील के विभिन्न जलाशयों का विहंगम दृश्य दिखता है। बल्कि अपने छज्जे से ही मैं सूर्योदय से सूर्यास्त तक का पूरा आकाश देख सकता था। क्योंकि यह छज्जा इमारत के कोने पर बना हुआ था। पश्चिम की ओर मालार के एक पुल के आगे नगर-भवन सांध्य आकाश की पृष्ठिका के कारण बहुत अच्छा लगता था।

होटल पहाड़ की ढाल पर था, पाँच मंजिलें उतर करके समतल भूमि पर नहीं पहुँचते थे बल्कि वहाँ से बहुत नीचे उतरकर सड़क अथवा ट्राम की लाइन मिलती थी। पटरी से उतरने में इससे प्रायः दस मिनट का समय लगता, और आती बार कर्री चढ़ाई चढ़नी पड़ती। इसलिए नगर के इस खंड में आने के लिए बाहर एक सार्वजनिक लिफ्ट लगा हुआ था जिससे प्रायः 200 फुट सीधे चढ़-उतर सकते थे। यह लिफ्ट उपयोगी तो था ही, नगर के लिए एक विशेष आकर्षण इसलिए भी था कि ऊपरी खंड से पहाड़ी तक बना हुआ पुल, स्टाकहोम का विहंगम दृश्य देखने के लिए उत्तम स्थान था। सूर्योदय और सूर्यास्त, नया और पुराना नगर, बंदरगाह और आने-जाने वाले जहाज, नीचे दौड़ती और बल खाती हुई ट्राम और मोटरें, सभी यहाँ से देखी जा सकती थीं। मैं आते-जाते सदैव इस पुल की मुँडेर पर झुके हुए लोगों को देखा करता था। इतना ही नहीं, आने-जानेवालों की सुविधा के लिए पुल पर ही एक कहवाघर था जो वहीं खड़े-खड़े या छोटी कुर्सी पर बिठाकर चाय-काफी और उपहार दे सकता था।

इस पुल और इस लिफ्ट की एक और भी उपयोगिता थी जिसका पता लिफ्ट की एक चालिका से लगा। (अधिकतर स्त्रियाँ ही लिफ्ट चलाती थीं; केवल रात के तीसरे पहर ही ड्यूटी पुरुष करते थे।)

चालिकाएँ लिफ्ट पर आने-जानेवाले प्रत्येक व्यक्ति का चेहरा बड़े ध्यान से देखा करती थीं, यह मैं लक्ष्य कर चुका था। स्वीडन जैसे विनयशील देश में ऐसे देखे जाना कुछ असमंजसकर भी था। एक दिन साँझ को लिफ्ट के ऊपर जाने पर पाया कि लिफ्ट का तत्काल प्रयोग चाहने वाले व्यक्ति वहाँ नहीं है, तो चालिका से थोड़ी देर बातचीत करता रहा। यह पहले भी सुना था कि आत्महत्या करना चाहनेवाले प्रायः वहाँ आते हैं - 200 फुट की यह कूद आत्महत्या का अमोघ उपाय है! चालिका ने बताया कि वह हर चेहरे को इसीलिए ध्यान से देखती है - कि कहीं यह आत्म-जिघांसु का चेहरा तो नहीं है? ''कभी-कभी यह भी सोचती हूँ कि अगर कोई आत्महत्या करना ही चाहेगा, तो अब क्या उसे मैं रोकूँगी?''

इस 'अब' पर मेरा ध्यान टिक गया। मैंने पूछा : ''क्या पहले भी आपने कभी किसी को रोका है?''

चालिका ने बताया कि एक बार एक व्यक्ति उसके सामने ही कूदने के लिए मुँडेर पर चढ़ रहा था तो उसने पीछे से उसकी कमर पकड़ ली; किंतु भरसक बाधा देने पर भी वह उसे कूदने से रोक न सकी - जकड़ छुड़ाकर वह गिर ही गया। बाधा का केवल इतना ही असर हुआ कि जहाँ कूदने से वह लिफ्ट से दूर खुले स्थान में गिरता, वहाँ कूदने की बजाय गिरने के कारण वह अधबीच बिजली के तारों के एक जाल पर गिरा, और फिर तारों के टूट जाने से नीचे - किंतु कम वेग से। फलतः वह तत्काल मरा नहीं - उसे अस्पताल ले जाया गया, जहाँ टूटी हुई हडि्डयों और बिजली से जल जाने के घावों के कारण आठ दिन के मर्मांतक कष्ट के बाद उसकी मृत्यु हुई।

''तब से मैं हर चेहरे को बड़े ध्यान से देखती हूँ। इसलिए नहीं कि जान लूँ कि वह आदमी मरना चाहता है या नहीं; केवल इसलिए भी कि मैं समझ सकूँ कि इसके मरना चाहने पर मुझे बाधा देनी चाहिए या नहीं।''

थोड़ी देर हम दोनों चुप रहे। फिर उसने मानो स्वगत कहा : ''कोई कैसे जान सकता है कि दूसरे का दुख कितना गहरा है? और जानकर कैसे उसमें दखल दे सकता है?''

लिफ्ट का प्रयोग तो मैं इसके बाद भी बहुत दिनों तक करता रहा। लेकिन चालिका की कही अंतिम बात मेरे मन में बार-बार उदित होती रही - विशेषकर उसका उत्तरार्द्ध - और जानकर कैसे उसमें दखल दे सकता है?

क्योंकि यह 'दखल न देना' स्वीडी जीवन दर्शन में एक महत्व का स्थान रखता है - उनके स्वातंत्र्य-पूजन का एक अंग है। दखल न देने का दर्शन पेरिस में भी पाया जाता है। अपवाद-रूपी किसी-किसी व्यक्ति में वह मानवीय सहानुभूति का रूप भी हो सकता है और मैं जानता हूँ कि पेरिस में ऐसे भी लोग हैं जो बिना एक-दूसरे के जीवन में दखल दिए एक-दूसरे की सहायता करते हैं। लेकिन पेरिस का दखल न देने का दर्शन मुख्यतः संवेदना की अनुपस्थिति का दर्शन है - मानव के प्रति मानव की उदासीनता का। स्वीडन में यह दोनों से अलग आधार पर खड़ा है - मानव के प्रति मानव के सम्मान पर, व्यक्ति की अखंड सार्वभौम सत्ता पर। इस विशेष दृष्टिकोण के अनेक उदाहरण सुने भी और देखे भी। लेकिन इस संबंध में अपने कुछ अनुभवों का वर्णन अलग से करना ही अच्छा होगा।

एक छोटे कस्बे के बाहरी मुहल्ले की एक सड़क; सड़क के किनारे दीवार पर टँगा हुआ लेटरबक्स। सहसा आँख लेटरबक्स पर नहीं, उसके नीचे कुटि्टम भूमि पर टिक जाती है। वहाँ एक चिट्ठी और उसके ऊपर कुछ पैसे रखे हैं। स्थिति समझ में आ जाती है : बिना टिकट की चिट्ठी और पैसे इस विश्वास के साथ रखे गए हैं कि डाकिया स्वयं टिकट लगाकर चिट्ठी ले जावेगा।

राजधानी की ट्रामगाड़ी। पिछले द्वार से सवारियाँ चढ़ती हैं, अगले दो द्वारों से उतरती हैं। क्रमशः आगे बढ़ती हुई वे बीच में बैठे कंडक्टर से टिकट ले जाती हैं। भीड़ बहुत है, प्रगति धीरे हो रही है, कुछ लोगों को जल्दी उतर जाना है - वे टिकट कैसे लेंगे? अचानक दीखता है, उतरने के द्वारों के पास छोटी-छोटी पेटियाँ लगी हुई हैं - लोग उतरते हुए उनमें पैसे डालते जाते हैं। पेटियों पर लिखा है - "आपको टिकट लेने की सुविधा न हुई हो तो किराया यहाँ डालते जाइए''।

एक मामूली स्टेशन। आप गाड़ी से उतरे हैं। मध्यवित्ती भारतवासी हैं, इसलिए प्रायः आवश्यकता से अधिक असबाब लेकर यात्रा करने के आदी हैं, यद्यपि इतना सीख गए हैं कि बिस्तर ले जाना आवश्यक नहीं है। कुली कहीं दीखते नहीं। आप बगल में एक बंडल और दोनों हाथों में एक-एक सूटकेस तौलते हैं कि एक मधुर स्वर कहता है - "एक मुझे दीजिए" - और आपके कुछ कहने से पहले एक सुरूप, सुवेश व्यक्ति आपके हाथ से एक सूटकेस ले लेता है - "बस तक जावेंगे?'' बस पर पहुँचकर वह आपको धन्यवाद देने का अवसर न देकर कहता है - "हमारे देश में आपका प्रवास सुखद हो यह मेरी हार्दिक कामना है'' - और चल देता है।

एक और स्टेशन। रात के ग्यारह बजे का समय; थोड़ी देर बाद आपकी गाड़ी आने वाली है। आप सूने प्लेटफार्म पर टहल रहे हैं कि अचानक देखते हैं, जिस होटल में आप दो दिन ठहरे थे उसी में टिके हुए आठ-दस स्वीडी व्यक्ति आपकी ओर आ रहे हैं। क्या ये भी उसी गाड़ी से जानेवाले है, या किसी को लेने आए हैं? नहीं; ये सब आपको विदा करने आए हैं। ''आप बाहर से आए हुए हमारे अतिथि हैं; पराए देश में जाकर यह अनुभव करना कि हम अजनबी या पराए हैं अच्छा नहीं लगता। हम चाहते हैं कि आप इस देश को अपना घर समझें और आपको गाड़ी पर पहुँचाने आए हैं - इस कामना के साथ कि आपका हमारे मध्य में आना फिर हो।'' रात के ग्यारह बजे और बिना किसी संस्था की प्रेरणा के, निजी सौजन्यवश, यह शिष्टाचार! अतिथि सत्कार की उज्ज्वल परंपराएँ कई देशों में हैं और आतिथ्य की अतिरंजित परिभाषाएँ भी कई जगह मिलती हैं। सभ्यता की अनेक परिभाषाएँ हैं, और संस्कृति की तो और भी अधिक। किंतु सभ्यता यदि व्यक्ति की स्वतंत्रता का निर्वाह करते हुए एक सुगठित और सुव्यवस्थित समाज के रूप में रहने की कला का नाम है, तो जिस देश में ये छोटे-छोटे किंतु स्मरणीय अनुभव मुझे हुए वह संसार का कदाचित् सबसे अधिक सभ्य देश है। और अगर मानवता का शील-संस्कार जिससे वह सहज और निरायास भाव से वैसा आचरण करता है जो दूसरे मानव के लिए सुखकर, प्रीतिकर या कल्याणकर है, और इसे दूसरे पर बोझ भी नहीं बनने देता-अगर ऐसा शील-संस्कार संस्कृति में कुछ भी महत्व रखता है तो निःसंदेह स्वीडन एक अत्यंत पुष्ट संस्कृति-संपन्न देश है।

ये घटनाएँ यों असाधारण नहीं हैं, किंतु उनका किसी देश के साधारण दैनंदिन जीवन का अंग होना ही उन्हें असाधारण बनाता हैं नहीं तो इक्के-दुक्के नीतिवान या शालीन व्यक्ति किस देश में नहीं मिलते? स्वीडन में और भी मार्के की बात यह है कि नैतिक मूल्य का निर्वाह आधुनिकतम वैज्ञानिक प्रगति के साथ-साथ होता है। औद्योगिक उन्नति, आर्थिक संपत्ति, विस्तृत व्यापार, व्यापक शिक्षा - इनके साथ-साथ विनय का विकास होता है और समाज के हर स्तर पर होता है। यों स्तर वहाँ इतने नहीं हैं जितने भारत में या दूसरे अनेक पूर्वी अथवा मध्यपूर्वी देशों में, क्योंकि स्वीडन साथ ही सबसे अधिक समाजवादी देश भी है। वहाँ वाद पर उतना मुखर आग्रह भले ही न हो, व्यवहार पूरा है। यह अत्यंत विकसित व्यक्ति-स्वातंत्र्य और उसके साथ-साथ इतना व्यापक सामाजिक सहयोग - यही स्वीडन का अचरज है और यही मानव-जाति के भविष्य के लिए आशा का संकेत।

किसी देश अथवा समाज के साधारण अथवा जातिगत चरित्र को उसकी भौगोलिक स्थिति का परिणाम मान लेना एक प्रकार के नियतिवाद को जन्म देता है। ऐसा भौगोलिक नियतिवाद मुझे अमान्य है। किंतु स्वीडी चरित्र की विशेषताओं को उसकी देशगत स्थितियों के संदर्भ में अवश्य देखा जा सकता है। विरल आबादी वाले ऐसे प्रदेश में, जहाँ वनों, सरोवरों और पर्वतों का बाहुल्य है, जहाँ गर्मी-जाड़ों में दिन और रात का अंतर इतना अधिक होता है कि कुछ महीने दिन काटे नहीं कटता और कुछ महीने रात मानो अंतहीन हो जाती है, जिसमें बहुधा गाँव या अकेले घर महीनों तक बर्फ से घिर अथवा दबकर बाकी संसार से अलग हो जाते हैं, बसने वाले लोगों का ऐसा स्वभाव पाना कुछ अद्भुत नहीं है। अलग अकेले रहने का अभ्यासी अगर चिंतनशील, अल्पभाषी या मृदुभाषी, एकांतप्रेमी और दूसरे के काम में हस्तक्षेप न करनेवाला हो जाता है, तो क्या आश्चर्य है? स्वीडन में एक ही झील के एक ही घाट पर सैलानियों द्वारा मछली के शिकार के लिए या दो-एक दिन की छुट्टी बिताने के लिए कोई मालिक-मकान दो-चार बँगले बनवाता है तो इसका ध्यान रखता है कि वे एक-दूसरे को न दीखें, एक-दूसरे के परिदृश्य में, एकांत में अथवा मनोवांछित ढंग से समययापन में बाधक न बनें। यह नहीं है कि (लारेंस के शब्दों में) 'सभ्य मानव को मानव की बू असह्य हो गई है।' बल्कि यह इस बात का प्रमाण है कि ऐसा नहीं हुआ है, और न साधारण स्वीडी चाहता है कि कभी हो। इंग्लैंड में एक बार देखा था, गर्मियों में अपने अलग ढंग से होटलों के वातावरण से मुक्त रहकर छुट्टियों के कुछ दिन 'निजी पारिवारिक वातावरण में' बिताने के लिए लोग अपनी-अपनी मोटरों के पीछे कारवाँ-ठेले जोतकर निकले, तो एक ही सागर-तट पर एक ही विशाल 'कैरावान-पार्क' में 6,000 ठेले पंक्तियाँ बाँधकर खड़े हो गए! पार्क में मोटर और ठेले खड़े करने की जगह थी; प्रत्येक अपने अद्वितीय ढंग से, निर्बाध रूप से, छुट्टी बिताने के लिए एक ही मैदान में जुटे हुए 6,000 पंक्तिबद्ध परिवार! मानो छुट्टी बिताने के युद्ध के लिए महाप्रांगण में सेनाएँ जुटी हों!

यह कहना इंग्लैंड के साथ दोहरा अन्याय होगा कि प्रांगण में जुटे हुए सब लोग वास्तव में ऐसा 'अवकाश संग्राम' चाहते हैं। इंग्लैंड की आबादी कहीं घनी है, और वहाँ वैसे एकांत विश्राम के लिए स्थान भी नहीं है जैसा स्वीडन में संभव है। किंतु जो कुछ संभव है उसका पूरा उपयोग वहाँ नहीं होता, जबकि स्वीडन में जो व्यक्ति अवकाश या विश्राम के लिए दौड़ता है वह केवल अपने कार्यस्थल या परिचित परिवेश से दूर नहीं जाता बल्कि जन-मात्र से दूर जाता है।

शिक्षित और संपन्न देश में ऐसे एकांत-प्रेम से, विशेषतया जब उस संपन्नता के साथ-साथ स्वतंत्र वैज्ञानिक चिंतन कई विश्वासों को दुर्बल कर देता है, इसकी संभावना बनी रहती है कि व्यक्ति एक आध्यात्मिक शून्य का अनुभव करे। इसके दुष्परिणाम स्वीडन में देखे जा सकते हैं। एकांत में और अति मात्रा में मद्य-सेवन वहाँ की एक सामाजिक समस्या है। मद्य के कारण ही नहीं, अन्य कारणों से भी एकांत से घिरे हुए कुछ व्यक्तित्व वहाँ विकृत हो जाते हैं। यह शायद भौतिक समृद्धि का अनिवार्य दंड है। किंतु इन विकृत परिणामों को छोड़ भी दें तो भी लक्षित होता है कि स्वीडी लोगों में कहीं गहरे में एक उदासी अथवा चिंतनशील निरानंद का भाव होता है। कदाचित् इसी अति-गंभीरता अथवा अंतरोन्मुख उदासी के कारण दक्षिणी जातियों के लोग उन्हें मनहूस या बुद्धू मानते हैं। उदाहरणतः फ्रांस में प्रायः ही स्वीडियों में विनोद की कमी की चर्चा होती है। फ्रांस का साहित्यकार जहाँ बातचीत में सदैव दूसरे को चमत्कृत करने, प्रभाव डालने, वाचिक और आंगिक अभिनय द्वारा मुग्ध और अभिभूत करने में यत्नशील रहता है, स्वीडन का लेखक वहाँ ग्रहण करने, चुपचाप बैठकर या सागर-तट अथवा वन-खंडी में घूमते हुए चिंतन करने का अभ्यासी है। फ्रांसीसी कलाकार एक कुशल नट है, अविराम अपने करतब दिखाता है और आपकी ओर से प्रशंसा चाहता है। वह सतर्क है कि आप उसके अभिनय कौशल के कायल हों। उसके लिए यह मानो बड़ी पराजय होगी कि वह जो पार्ट अदा कर रहा है उसे आप उसका सच्चा रूप समझ लें! यह दूसरी बात है कि जो अभिनेता सोते-जागते कभी भी रंगमंच छोड़ता ही नहीं, उसका सच्चा रूप आप क्या मानें! किंतु यही तो फ्रांसीसी कलाकार आपको बताना चाहता है : वह आपके सामने बैठकर अपना रूप-अपने अनेक रूप देखता है, आपको सम्बोधन करके अपनी बात-अपनी अनेक बातें सुनता है। इसके विरुद्ध स्वीडी लेखक कम बोलता है; अपने गंभीरतम विश्वासों और मान्यताओं की चर्चा प्रायः नहीं करता, किंतु जब करता है तो शिशुवत् निश्छल भाव से। आपके सामने आकर वह आपकी बात सुनता है, गुनता है, यदि सहमत नहीं होता तो आपकी बात गाँठ बाँधकर रख लेता है कि फिर एकांत में किसी झील-झरने के किनारे बैठकर सोचेगा।

और मजे की बात यह है कि फ्रांस का बौद्धिक व्यक्ति तो उत्तर के साहित्यकार को बुद्धू और मनहूस समझता ही है, उत्तरी साहित्यकार भी सहज ही इस मूल्यांकन को स्वीकार लेता है! मुझसे एकाधिक बार स्वीडी लेखकों ने ऐसा कहा। 'फ्रांस का लेखक प्रतिभाशाली है, हम लोगों में तो कोई प्रतिभा नहीं है।' ''वी आर नॉट ब्रिलिएंट लाइक द फ्रेंच, वी आर डल पीपल।''

किंतु आभ्यंतर विवेचन को छोड़कर सतह को ही देखें। स्वीडन में शिक्षा का प्रसार आश्चर्यजनक है। शिक्षा सभी स्तरों पर निःशुल्क या लगभग निःशुल्क है। कई जिलों में प्रारंभिक और उच्च विद्यालयों में भी विद्यार्थियों को दोपहर का भोजन स्कूल की ओर से बिना मूल्य दिया जाता है - बिना इसका विचार किए कि किस विद्यार्थी की आर्थिक स्थिति कैसी है। सन् 1955 में सात लाख विद्यार्थियों को ऐसा बिना मूल्य भोजन मिलता रहा। (स्वीडन की कुल जनसंख्या सात करोड़ है)

विश्वविद्यालयों में शिक्षा राज्य की ओर से निःशुल्क दी जाती है किंतु राज्य विश्वविद्यालयों का नियंत्रण नहीं करता और वे अपनी स्वतंत्रता की रक्षा के बारे में अत्यंत सतर्क है। बल्कि विश्वविद्यालयों की स्वतंत्रता अध्ययन-स्वातंत्र्य और विचार-स्वातंत्र्य के आंदोलन की ही एक पहलू है। स्वीडन के प्राचीन विश्वविद्यालय सत्रहवीं शती में स्थापित हुए और उस समय धर्म-शिक्षा उनके पाठ्य-क्रम का अंग थी ही। अनंतर धर्म-विश्वास संबंधी आंदोलन के साथ-साथ अध्ययन और अनुशीलन की स्वतंत्रता का प्रश्न जुड़ गया। विश्वविद्यालयों की स्वतंत्रता का आंदोलन इसका एक पहलू था। आचार्यों की नियुक्ति के संदर्भ में राज्य और विश्वविद्यालयों का एक ऐतिहासिक संघर्ष भी हुआ, जिसमें वैज्ञानिक अनुशीलन की स्वतंत्रता का सिद्धांत जयी हुआ। स्वीडी समाचार-पत्रों की स्वतंत्रता भी यहाँ कानून द्वारा सुरक्षित है। स्वीडियों का दावा है कि इस स्वतंत्रता को सुरक्षित रखने का सबसे प्राचीन विधान स्वीडन का है। वर्तमान कानून में भी किसी प्रकार के नियंत्रण का निषेध है, और युद्ध-काल में भी समाचार-पत्रों पर सेंसर नहीं नियुक्त किया जा सकता।

विश्वविद्यालयों में शिक्षा निःशुल्क होती है, इसका अर्थ यही है कि विश्वविद्यालय विद्यार्थियों से कुछ नहीं लेते। किंतु प्रत्येक विद्यार्थी के लिए किसी विद्यार्थी संगठन का सदस्य होना आवश्यक होता है, और ये संगठन चंदा लेते हैं। ऐसे संगठनों के नाम अधिकतर प्रादेशिक होते हैं और वे 'राष्ट्र' कहलाते हैं। विद्यार्थी-जीवन के अनेक पहलू इन संघों अथवा राष्ट्रों के सहकारी अनुशासन में रहते हैं। संघ ही छात्रावास चलाते हैं और विद्यार्थियों के रहने की व्यवस्था करते हैं, सहकारी आधार पर विद्यार्थियों के काम की चीजों की दुकानें चलाते हैं, विद्यार्थियों के लिए चिकित्सालय चलाते हैं, नौकरी दिलाने के लिए उद्योग करते हैं; और यहाँ तक कि सदस्यों के बेकार रहने पर उन्हें वृत्तियाँ भी देते हैं अर्थात् बेकारी-बीमा की व्यवस्था करते हैं। और ये छात्र संगठन स्वयंसेवी और स्वायत्त होते हैं। विश्वविद्यालय उनमें कोई हस्तक्षेप नहीं करता; केवल माँगे जाने पर परामर्श देने की व्यवस्था कर सकता है। उदाहरणतया सहकारी संस्था को चलाने के लिए किसी अर्थ-शास्त्रज्ञ की आवश्यकता होने पर विश्वविद्यालय से इस संबंध में सहयोग माँगा जा सकता है।

विश्वविद्यालय सभी ग्रीष्मावकाश के लिए बंद थे; केवल उपसाला के प्राचीन विश्वविद्यालय में जाना हुआ - वह भी इसलिए कि कुछ लेखकों से मिलना था जो स्थायी रूप से वहीं रहते थे।

किंतु सिगतुना का लोक-संस्कृत महाविद्यालय खुला था। बल्कि ग्रीष्मावकाश में तो वहाँ विशेष हलचल होती है, क्योंकि अवकाश में बाहर के लोग भी वहाँ अतिथिशाला में आकर रहते हैं। उपसाला से मैं सिगतुना जाकर उसी अतिथिशाला में ठहरा। यह संस्था लोक-संस्कृति के अध्ययन के लिए और लोक-कला तथा लोक-शिल्प की रीतियों के पोषण और प्रचार के लिए कार्य करती है। यहाँ की गायक-मंडली से मैंने अनेक स्वीडी लोकगीत सुने; और कुछ फीते पर रेकार्ड करके साथ ले आया। उन दिनों अयनोत्सव (मिड-समर फैस्टिवल) भी था, इसलिए स्वीडी लोक-नृत्य भी देखने को मिले जिसमें न केवल विद्यालय के छात्र और छात्राएँ सम्मिलित होती थीं, बल्कि आसपास की बस्तियों के अनेक कृषक और नागरिक भी। प्रतिदिन विधिवत् इंद्र-ध्वज (मे-पोल) की प्रतिष्ठा होती थी और उसके आस-पास पिंडीबद्ध नृत्य होता था। नृत्यों के विभिन्न प्रकार थे। मंडलाकार नृत्य होने पर भी कुछ को नटन (डांस) कहा जाता था और कुछ को अटन (वॉक)। सारे यूरोप में ऐसे अनेक लोक-नृत्य प्रचलित हैं, जिनको वॉक कहा जाता है - उन्हें विशिष्ट करने के लिए उनके साथ विदेश का नाम जुड़ा हुआ हो सकता है। मेरा अनुमान है कि भारत में भी ऐसा ही परंपरागत अंतर रहा - 'नट्' अथवा 'अट्' धातु से बने हुए विभिन्न नाम कदाचित् इस भेद को सूचित करते हैं कि कुछ नृत्य अभिनयप्रधान थे और वाचिक तथा आंगिक अभिनय के द्वारा किसी पद की व्याख्या करते थे; जबकि कुछ दूसरे नृत्य, गीत के साथ होने पर भी, सहज आनंदाभिव्यक्ति के नृत्य होते थे। मैं नहीं जानता कि यह अनुमान कहाँ तक तथ्यसंगत है, न यही कि भाषा-तत्व के विद्वान इसके बारे में क्या कहेंगे; किंतु इतना अवश्य है कि इस प्रकार का भेद लोक-नर्तक के मन में भी रहा और शास्त्रीय परिभाषा करनेवाले नाट्य-शास्त्र-विशारदों के मन में भी।

दूर-देशीय अतिथि होने के नाते मुझे संस्था देखने की पूरी सुविधा तो दी ही गई, प्रतिदिन, भोजन के समय अध्यक्ष की मेज का साझा करने का सम्मान भी मिला। पश्चिम में भोजन का समय ही वार्तालाप का उत्तम समय माना जाता है, इसलिए यह अवसर मेरे लिए विशेष उपयोगी हुआ क्योंकि प्रतिवार अध्यक्ष के साथ दो-एक और लेखक-अतिथियों से भी बातचीत हो जाती और पश्चिम की साहित्यिक और सांस्कृतिक परंपरा अथवा उनकी विशेष समस्याओं पर कुछ प्रकाश मिलता या किसी नए दृष्टिकोण से परिचय होता। मध्य-काल में धर्म और कला का जो संबंध-विच्छेद हुआ, ईसाई चर्च ने कलाकार का जो बहिष्कार कर दिया उसके परिणामों पर बहुत चर्चा होती रही। अध्यक्ष महोदय का दृढ़ विश्वास था कि कलाकार को अविश्वास्य मानकर कला के प्रति उदासीन हो जाने में चर्च ने जो भूल की थी उसके कुप्रभाव दोनों पर पड़े और अब धर्म-संस्थाओं को फिर से यह उद्योग करना चाहिए कि उनमें और कलाकारों में सामीप्य हो - धर्म-संस्थाओं को रचनाशीलता का योग मिले और कृतिकार फिर से श्रद्धा से अनुप्राणित हो। निरी श्रद्धाहीनता को मैं भी कोई रचनात्मक शक्ति नहीं मानता हूँ, यद्यपि वैज्ञानिक जिज्ञासु-बुद्धि का कायल हूँ। फिर भी अध्यक्ष महोदय की भावना का सम्मान करते हुए भी मैं उनकी योजनाओं को व्यावहारिक नहीं मानता था - भारत जैसे देश में भी नहीं, स्वीडन जैसे देश की तो बात ही क्या! किंतु ऐसे वार्तालाप का उद्देश्य सहमति नहीं होता, विचारोत्तेजन ही होता है।

लेखक, चिंतक, अध्यापक, सभी तो ग्रीष्मावकाश के लिए शहर से या अपने साधारण निवासों से दूर भागे हुए थे - कोई जंगल में, कोई सागर के किनारे, कोई मछेरों के झोंपड़ों में तो कोई गड़रियों के काठ-बँगलों में। 'चार दिनाँ की चाँदनी' में ही धूप के आकर्षण से सब लोग ऐसे स्थानों को चले गए थे जहाँ दिन-भर (और कितना लंबा दिन !) कछुए अथवा मगरमच्छ की तरह धूप में पड़े-पड़े दिन काटे जा सकें। क्योंकि फिर लंबी अँधेरी रात में सभी को अपने-अपने शहर लौटकर काम में लग जाना होगा। ...योजना बनाकर किसी से मिलना संभव नहीं था, क्योंकि किसी का पता पाना ही कठिन था। कोई अचानक ही मिल जाए तो मिल जाए। ऐसे ही केंद्रों में जाना उपयोगी हो सकता था जहाँ उस समय में लोगों के होने की संभावना हो। सिगतुना के बाद दक्षिणी स्वीडन के मुल्श्वे नामक स्थान में हाकिनसास ('गरुड़-नासा') की संस्था में जा पहुँचा, जहाँ मेरे पुराने परिचित मार्टिन आलवुड समाज-विज्ञान के एक शोध-केंद्र का संचालन करते हैं और वह ग्रीष्मकालीन विद्यालय भी चलाते हैं। मार्टिन से मेरा परिचय प्रायः बीस वर्ष पहले से था जब वह भारत आए थे और कलकत्ते में मेरे साथ रहे थे। वह मूलतः उत्तरी इंग्लैंड के निवासी थे किंतु उनके पिता यहाँ अँग्रेजी शिक्षक होकर आए थे और यहीं बस गए थे। इसी केंद्र में उनकी नार्वेयी पत्नी श्रीमती इंगा आल्वुड से परिचय हुआ और प्रवासी चीनी लेखक और शिक्षक ह्वाङ्ग त्सु-यू तथा उनकी जर्मन पत्नी से भी - और अनेक हँसमुख विद्यार्थी युवकों और युवतियों से भी और एक सर्वथा अनौपचारिक शिक्षा-पद्धति से भी। मार्टिन तथा विद्यार्थियों के अनुरोध पर विद्यालय में एक-दो भाषण भी दिए और कहानियाँ भी सुनाई, फिर मार्टिन के अध्ययन-कक्ष में बैठकर उनके भारत के तथा अपने स्वीडन के अनुभवों का विनिमय करता रहा।

लौटकर फिर स्टाकहोम के अपने परिचित होटल में स्थान पाया। लिफ्ट से अब भी उसी प्रकार लोग आते-जाते थे और लिफ्ट की चालिका अब भी उतने ही ध्यान से उनके चेहरे देखा करती थी। किंतु होटल में टिक जाने के बाद एक नया अनुभव हुआ।

सवेरे नाश्ते के बाद परिचारिका ने पूछा : ''क्या आपको कुछ कष्ट दे सकती हूँ ?'' मैंने कहा, ''बताइए ?''

''आप मेरी हस्ताक्षर-पुस्तक में हस्ताक्षर कर देंगे ?''

मैंने हँसकर कहा : ''सहर्ष ।''

''और साथ कुछ लिख भी देंगे ?''

मैंने कहा : ''अच्छी बात है, आप कापी मुझे दे दीजिए; मैं लिख रखूँगा।''

वह कापी ले आई। कापी नहीं थी, मेरी अभ्यस्त छोटी-बड़ी 'आटोग्राफ बुक' भी नहीं थी। एक बड़ा-सा एलबम था। उस होटल में इस परिचारिका के रहते जो-जो देशी-विदेशी साहित्यकार वहाँ टिके थे (और यह मैं कह चुका हूँ कि वह होटल साहित्यकारों का अड्डा था) - उन सभी के उसमें न केवल हस्ताक्षर और संदेश थे, बल्कि स्टाकहोम में रहते हुए उनके भाषणों या भेंट के जो भी संवाद समाचार-पत्रों में छपते रहे उनके कटिंग भी। पन्ने उलटते हुए मुझे आश्चर्य हुआ जब मैंने देखा कि मुल्श्वे के समाचार-पत्रों में मेरे वहाँ जाने के संबंध में जो संवाद और (निश्चय ही मार्टिन का दिया हुआ) जीवन-वृत्त छपा था, उसके भी कटिंग उस एलबम में लगे हुए थे। मैंने यथास्थान कुछ लिखकर हस्ताक्षर तो कर ही दिया, तीसरे पहर कापी लौटाते समय चिढ़ाते हुए स्वर में पूछा : ''लेकिन मेरा फोटो तो समाचार-पत्रों में नहीं छपा, उसका आप क्या करेंगी ?''

उसने हँसकर कहा : ''अभी तो आप स्टाकहोम में हैं।'' अर्थात् अभी तो इसकी संभावना है कि आपका फोटो अखबार में छप जाए! यों समाचार-पत्रों में ऐरे-गैरे अनेकों के फोटो छपते रहते हैं और मेरा फोटो छप जाना भी नितांत असंभव तो नहीं था, लेकिन स्वीडन की विनयशीलता का आभारी हूँ कि यहाँ वैसा नहीं हुआ। स्टाकहोम से विदा होने से पहले मैंने स्वयं ही अपना एक फोटो एलबम के लिए उसे दे दिया। भविष्य में जो भारतीय लेखक वहाँ जावें तो उस होटल में ठहरें, वे चाहें तो इस संकेत से लाभ उठा सकते हैं!

मैंने ऊपर कहा कि स्वीडन संसार का सबसे अधिक समाजवादी देश है - कि समाजवाद के आदर्शों का व्यावहारिक रूप वहीं सबसे अधिक देखा जाता है। निःसंदेह ऐसे समाजवादी व्यवहार के लिए देश का समृद्ध होना आवश्यक है, और वहाँ की वन-संपत्ति, खनिज संपत्ति और जल-विद्युत शक्ति की दृढ़ भित्ति के कारण स्वीडन की समृद्धि बढ़ती ही जाती है; किंतु वास्तव में समाजवादी व्यवस्था का विकास वहाँ के सहकारिता-आंदोलन के कारण ही होता रहा है। सहकारिता सिद्धांत पर अमल वहाँ उन्नीसवीं शती से ही होता रहा, पर सन् 1930 से यह आंदोलन देशव्यापी हो गया और अब तो इसके विभिन्न पहलुओं के आँकड़े चकित कर देनेवाले हैं। डेरी संघ की सदस्य-संख्या अढ़ाई लाख से अधिक है; मांस-विक्रय संघ की प्रायः तीन लाख और कृषि संघ की प्रायः डेढ़ लाख। कृषि संघ क्रय और विक्रय दोनों का काम सँभालता है; खेती की पैदावार बेचता है और कृषक के लिए बीज, खाद, चारा, औषधि आदि प्राप्त करता है। इतना ही नहीं, सदस्यों की शिक्षा-प्रशिक्षा में भी वह योग देता है, सूचना-पत्रिकाएँ और साहित्य भी प्रकाशित करता है - यहाँ तक कि कुछ भारतीय कृति-साहित्य भी उसने प्रकाशित किया है। (यदि वह भारत का उत्तम साहित्य नहीं है तो इसका उत्तरदायित्व उसे परामर्श देनेवाले भारतीयों पर ही है : उसने तो सुंदर प्रकाशन किया है...)

यह सहकार सिद्धांत अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र में भी लागू होता है : स्कैंडिनेविया के चारों देश आपस में ऐसा सहयोग करते हैं। एक देश के संघ के सदस्यों को दूसरे देशों के संघ भी वही सुविधा देते हैं जो स्वदेशीय संघ देता; इसके अलावा अंतर्देशीय क्रय-विक्रय भी इनके द्वारा होता है। यह आपसी सहयोग देशों के सहजीवन का उत्तम और प्रेरणाप्रद उदाहरण है। स्वेच्छापूर्वक सहयोग पर आधारित यह समाजवादी समाज कैसे इतनी व्यवस्थापूर्वक चलता है, कहीं रगड़ या अटक उसमें क्यों नहीं पैदा होती, इसकी पड़ताल करने चलें तो लौटकर फिर एक जानी हुई बात पर आ जाना पड़ेगा : कि समता उसी समाज में होती है जो स्वतंत्र हो, और समाज वही स्वतंत्र होता है जिसका अंग व्यक्ति स्वतंत्र हो, और अपने स्वतंत्रता के उपभोग के लिए ही सामाजिकता का वरण करता हो। सब सामाजिक संपर्कों और संबंधों की मूल प्रेरणा है व्यक्ति की आध्यात्मिक स्वतंत्रता की खोज।

किंतु आधुनिक गोलोक में गो-दर्शन? हाँ, गोलोक की यात्रा का मेरा वृत्तांत अधूरा ही रह जाएगा यदि अंत में यह न कहूँ कि वहाँ से लौटने से पहले गायें मैंने देखीं- खुली हरियाली में खड़ी वैसी वात्सल्य-भरी आँखोंवाली गायें, जिन्होंने गोपद-परिक्रमा द्वारा पृथ्वी-प्रदक्षिणा का फल पाने की कल्पना को जन्म दिया होगा - जैसी गायों के लिए कालिदास ने 'पयोधरीभूतचतुःसमुद्रा गोरूपधरा इवोर्वी' की उत्प्रेक्षा की थी। अगर मुझसे किसी गाय ने यह भी कहा कि -

'न केवलानां पयसां प्रसूतिमवेहि माँ कामदुग्धां प्रसन्नाम्'

और न यह अनुग्रह ही प्रकट किया कि

'प्रीतास्मि ते, पुत्र! वरं वृणीष्व'

तो इसका कारण यह भी हो सकता है कि बीसवीं शती की सुरभि अथवा नंदिनी मानव भाषा नहीं बोलती, और यह भी कि मैं ही गुरु-गो-भक्तिविहीन होने के कारण अपात्र समझा गया। जो हो, इस गोलोक-यात्रा से लौटकर यह मान लेने को तैयार हूँ कि कालिदास ने अगर ताम्र-लोहिता 'प्रभा पतंगस्य' को पल्लववर्णा 'मुनेश्च धेनु:' के समकक्ष ही ठहराया तो कोई अनर्थ नहीं किया

'सञ्चारपूतानि दिगंतराणि कृत्वा दिनांते निलयाय गंतुम्।

प्रचक्रमे पल्लवरागताम्रा प्रभा पतङ्गस्य मुनेश्च धेनु:॥'


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हिंदी समय में अज्ञेय की रचनाएँ



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