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कहानी

उसे बुद्ध ने काटा
मधु कांकरिया


मुझे ठीक से याद नहीं आ रहा कि मेरी उससे क्या क्या बातें हुई थी। मैं तो उसके होने को ही देखती रहती थी जो धीरे धीरे नहीं होता जा रहा था। वह जिंदा था मगर उस तरह जिंदा नजर नहीं आ रहा था जैसे वह कभी जिंदा नजर आया करता था। पिछले कई महीनों से उसके जीवन से जीवन जा रहा था। बीते वक्त की उदासियाँ उसे चूस चबा रही थी। जीने में उसकी दिलचस्पी निरंतर कम होती जा रही थी। वह सबसे कटता जा रहा था। खुद से, अपने आस-पास से, दीन दुनिया से। और यदि अब भी कुछ न किया गया तो मामला खतरे के जोन में पहुँच सकता है।

यह मैं समझ रही थी।

पर मामला तब तक सचमुच खतरे के जोन में पहुँच चुका था। मैंने सोचा था कि कश्मीर की हवाएँ उसके भीतर के साँय साँय करते खालीपन को भर उसे जीवन की ओर लौटाने में कामयाब हो जाएगी। मैंने सोचा था कि प्रकृति उसे खंड-खंड खंडित और धवस्त होने से बचा लेगी। पर मैं गलत थी। जब भीतर की क्यारी ही सूख गई हो, पौधा ही मर गया हो तो बाहरी सुंदरता क्या खाक बचाएगी?

कहानी उसी मरते हुए पौधे की और उस समय की जब इस देश की पटकथा देश के नौजवान नहीं, मेहनतकश सपूत नहीं, किसान नहीं, मजदूर नहीं, जवान नहीं, नेता नहीं वरन कुछ कोरपोरेट घराने लिख रहे थे।

बहरहाल मैं कभी उसे सोनमर्ग की घाटियों तो कभी गुलमर्ग की वादियों के बीच ले जाती। कभी पहलगाँव तो कभी नारायण नाग की वादियों में घुमाती कि महसूस करे वो मस्त बहारों को' जीवदायी हवाओं को, आसमान छूते विराट पर्वतों को। सदियों से बहते, चाँदनी छिटकते दुग्ध धवल झरनों को। यह रूहानी सौंदर्य मेरी आत्मा को जगाने लगता कुछ इस कदर की मेरी आँखे डबडबा जातीं। हाथ अनायास जुड़ जाते - तू सचमुच है! जब मैं खुद इस कदर भाव-विह्वल थी। हरियाली देखते देखते खुद हरियाली बन गई थी तो क्या कुदरत की इस करामात का असर उस पर नहीं होगा? जीवन की यह गुनगुनी धूप क्या उसकी आत्मा पर लगी फफूँदी को दूर नहीं कर देगी? यही सोच मैं पूछती उससे 'तुम कहते हो न कि क्या है मेरे होने का अर्थ? तो खोजो कुदरत के इस कमाल के बीच, तारों भरी इस रहस्यता के बीच' पर्वतों की इस विराटता के बीच अपने होने का अर्थ?' मैं कहती 'ध्यान से सुनो इन चिड़ियों की चहचहाहट को, झरनों को, हवाओं और पत्तों की सरसराहट को....' पर उसकी आँखों की खिड़की में तो इतना धुआँ भरा हुआ था, उसके कानों में इतना शोर भरा हुआ था कि वह न कुछ देख पाता और न ही किसी महीन ध्वनि या तरंग को पकड़ ही पाता था। बस अपने खोल में ही बंद पोटली सी पड़ी रहती उसकी काया। मुझे लगता मैं अपने बेटे नहीं वरन किसी अजनबी के साथ हूँ जो किसी भी हालत में तैयार नहीं जिंदगी का साथ निभाने को। पर फिर भी मैंने हथियार नहीं डाले। मैं पूरी शक्ति के साथ लग गई कि जागे उसमे जीवन। मैं सुनाती उसे सृष्टि के रहस्य और अमरता की कहानी। ठीक वैसे ही जैसे कभी सुनाई थी शिव ने पार्वती को अमरनाथ की गुफा में। मैं सुनाती उसे महाभारत की कहानी कि कैसे हताश और भ्रमित हुए अर्जुन में श्री कृष्ण ने वह शक्ति भर दी कि फड़क उठा वह। पहाड़ पर सैलानियों को घुमाते घोड़े वालों को दिखाते हुए मैं शब्दों का महल खड़ा कर देती 'देखो इनकी अटूट जिजीविषा को, मुट्ठी भर अनाज के बदले ये दुनिया को ठेंगे पर रखने की कूबत रखते हैं। मैं जी जान से लगी थी की क्या कुछ करूँ, क्या गाऊँ-रोऊँ की उसकी आत्मा पर लगा सारा कीचड़ धुल जाए और वह फिर तरोताजा हो जाए सृष्टि की पहली सुबह सा। गंगा की गंगोत्री सा। आखिर माँ हूँ मैं उसकी, मुझे पहुँचना ही होगा आत्मा के उन अँधेरे तहखानों तक जहाँ जिंदगी ने डरा रखा है उसे।

पर ऐसा कुछ भी नहीं हो पाया। उसने तो जैसे सन्नाटे को ही ओढ़ बिछा लिया था इसीलिए मेरी किसी भी बात का,यहाँ तक कि दार्शनिकता में पगे सूत्रों का भी उस पर कुछ असर नहीं हो पाया जैसे कि अपने श्रवेंद्रियों के दरवाजे के बाहर उसने बोर्ड लटका दिया हो' नो एन्ट्री 'और मेरा कहा उसके घायल व्यक्तित्व से टकराकर लौट कर मेरे पास ही वापस आने को अभिशप्त हो।कई बार मुझे महसूस होता की प्रकृति भी अकेले को और अकेला और भरे हुए को और भर देती है। क्या इसीलिए इस देश के ऋषि मुनियों ने सर्वोत्तम प्राकृतिक सौंदर्य के बीच वैराग्य और मौत का वरण किया? ...स्वामी विवेकानंद, स्वामी रामतीर्थ, महाप्रभु चैतन्य... जाने किन किन के नाम जेहन में कौंधते और डर की ठंडी लहर मेरे भीतर उतर जाती। नहीं बनने देना है मुझे उसे विवेकानंद और रामतीर्थ। बस मेरा बेटा ही बना रहे वह।

पर वह तो तुला था खून खच्चर करने पर।

उफ! क्यों नहीं हो जाता है वह पहले की तरह?क्यों इतना अज्ञेय हो रहा है वह?

क्या इसी का नाम है इनसान!

बंदरों की तरह उछल कूद करते विचार और लहरों की तरह उठती-गिरती स्मृतियाँ!

'ममा, यह क्या पहन रखा है तुमने?' किसी जाँच अधिकारी की तरह सिर से पैर तक ताकते हुए पूछा था उसने। मैं भौंचक कहीं कुछ उल्टा तो नहीं पहन लिया, कोई ठिकाना नहीं मेरा भी। पर नहीं सब ठीक ठाक ही था।

'ठीक ही तो पहना है। साड़ी ऐसे ही तो पहनी जाती है। आज क्या पहली बार देख रहा है मुझे?'

'साड़ी हिंदुस्तानी और ब्लाऊज पाकिस्तानी, यह क्या मैचिंग है?' काली जीन्स पर लाल-काली टॉप जिस पर लिखा था 'बीइंग ह्यूमन' और जो थोड़ी ऊपर चढ़ गई थी, उसे नीचे खींचते हुए बोला वह।

'बाप रे तू एमबीए है या मैच मेकर। अरे भाई साड़ी नई है, ब्लाऊज थोड़ा घिसा पिटा है तो क्या हुआ क्या फर्क पड़ता है। थोड़ा ज्ञान बघारते हुए मैंने इतना और जोड़ दिया कि महत्वपूर्ण यह नहीं है कि मैंने क्या पहना है, महत्वपूर्ण यह है कि मैं क्या सोचती हूँ। महान चित्रकार एम.एफ. हुसैन तो अमेरिका जैसे देश में भी नंगे पैर आर्ट गैलरी चले जाते थे। क्योंकि वे होने में विश्वास करते थे दिखने में नहीं।'

लेकिन वह तो मेरी काया-कल्प करने पर तुला था, इसलिए मेरी किसी भी बात का जवाब न देते हुए अपनी ही पतंग उड़ाता रहा,

- 'फर्क पड़ता है माँ, तुम्हारा बेटा एमबीए है, कंजूमर प्रोडक्ट में दुनिया की सबसे बड़ी मल्टी नेशनल का ब्रांड मैनेजर। अपने हाथों को उसने बड़ी कंपनी के अनुपात में ही फैलाया - सोचो तुम ही यदि इस प्रकार कॉमन मैन दिखोगी तो लोग मेरे बारे में क्या सोचेंगे।' उसके माथे पर सिलवटें साफ दिख रहीं थी।

- 'अच्छा ही सोचेंगे। सादा जीवन उच्च विचार की अवधारणा क्या शून्य से टपकी है? फिर मैं किसी और के विचारों की मोहताज नहीं हूँ।'मन किया यह भी जोड़ दूँ कि 'तुम लोग जीन्स पहनते हो मानवीय विचारों की पर उड़ते हो अमानवीय आसमान में' पर मैं उन क्षणों किसी भी प्रकार की कटुता इस संवाद में नहीं लाना चाहती थी क्योंकि उन क्षणों को मैं एक गौरवशाली माँ की हैसीयत से भी जी रही थी, इसलिए चुप्पी मार गई।

- 'तुम भी अम्मा' वह बच्चों की तरह निरीह दिखने लगा था। 'देखो मैं तुम्हारे लिए क्या लाया हूँ।'

आँखें चौड़ी हो गई थी मेरी। चप्पल से लेकर माथे की बिंदी तक सब ब्रांडेड। एकाएक नजर घड़ी पर पड़ी। प्लास्टिक की थोड़ी बड़ी सी काली कलूटी चमकती घड़ी। मैं फिर झल्ला पड़ी - यह घड़ी नहीं पसंद मुझे।

- तो कैसी पसंद है?

उसे संतुष्ट करने की गरज से कहा, 'मुझे सुनहले बेल्ट की घड़ी पसंद है।'

वह खिलखिला कर हँस पड़ा, शेंपू किए खुशबूदार बालों पर नजाकत से हाथ फेरते हुए कहने लगा वो 'मेरी बुद्धु अम्मा' यह है रेडो की घड़ी। जानती हो कितने की है? कितने की? उसकी आँखें बड़ी कीमत के अनुपात में ही खिंचती जा रही थी ।

- 'पर मुझे जरुरत नहीं ब्रांड की। घड़ी का काम है समय बताना जो मेरी घड़ी बखूबी मुझे बता ही देती है। जानते हो मेरी सहेली के पास दस घड़ियाँ हैं फिर भी वह समय पर नहीं पहुँचती। खैर यह बता क्या तारीफ है तुम्हारी इस लाडो घड़ी की?

हुलसित होकर कहने लगा वो, 'लाडो नहीं, रेडो घड़ी। अम्मा इसकी सबसे बड़ी तारीफ है कि यह कभी भी पुरानी नहीं दिखती, कितना भी इसे तोड़ो पटको इस पर निशान नहीं पड़ते। आज जैसी दिख है न यह, आज के पाँच साल बाद भी यह वैसी दिखेगी, क्या कहते हैं तुम्हारी हिंदी में एवर ग्रीन को?

- 'चिर युवा' कहा मैंने और सिर्फ उसका मन रखने के लए मैं घड़ी को उलट पुलट कर देखती रही और सोचती रही कि ग्लैमर और चकाचौंध के पीछे भागती इस पीढ़ी के वायरस कहीं मुझे भी संक्रमित न कर दें। इतना असर तो मुझ पर भी होने लगा है कि अकेले में चाहे जो मन किया डाल लिया पर इसके साथ जब भी जाती हूँ ड्रेस के प्रति सजग हो ही जाती हूँ। वह मस्त मलंग फकीराना अंदाज ग्रहण ग्रसित हो ही चुका है। न सिर्फ कपड़ों के प्रति सजग हो गई हूँ वरन यह भी चेक कर लेती हूँ की कहीं चप्पल तो बहुत घिस नहीं गई है। सुड़क सुड़क कर चाय पीने और बिना चम्मच दाल-भात खाने की आदत तो इसके जवान होते ही खुद ब खुद भाग खड़ी हुई। अब क्या मेरे जींस भी बदलेगा यह? कई बार कह चूका है - 'ममा, अपना हेयर स्टाइल बदलवाओ। ममा प्लीज, मेरे कहने से एक बार अपना फेसिअल करवा लो। एक बार तो मुझे ब्यूटी पार्लर के वाउचर गिफ्ट में दिए - 'ममा, पैसे तो लग ही चुके हैं। अब चली भी जाओ। हँसी आ गई मुझे उसकी कच्ची चालाकी पर। सोचता है की ऐसा कहने से अम्मा चली ही जाएगी। एक बार उसने अपने कुछ मित्रों को घर पर खाने के लिए बुलाया तो फिर पीछे पड़ गया - अम्मा अपने हेयर डाई करवा लो। चश्मे का फ्रेम तो उस दिन खुद ही जाकर ले आया था। दुखी होकर अंत में मैंने कह ही दिया था - ऐसा कर मेरे जीन्स तो अब बदल नहीं सकते, तू अपनी माँ ही बदल ले, न रहेगा बाँस न बजेगी बाँसुरी।

उसी दिन मैंने ध्यान नहीं दिया और उसके सामने ही पेटीकोट से (क्योंकि साड़ी नायलॉन की थी) चश्मा पोंछ लिया तो फिर वह निराश हो गया, उसी शाम मेरे लिए ढेर सारे टिसू पेपर ले आया - 'ममा इनसे पोंछो अपना चश्मा।'

उन्हीं दिनों एक बार उसने ऑफिस जाते जाते हड़बड़ी में मुझसे पेन माँगा, वह इतनी हड़बड़ी में था कि मैंने उसे वही पेन थमा दिया जो मेरे सामने था, पता नहीं गर्मी से या क्या कारण हुआ (यह भी उसी के साथ होना था) कि बिना ढक्कन के उस बॉल पेन की स्याही लीक कर गई। उसी दिन शाम को वह मेरे लिए फिशर का स्पेस पेन लेकर हाजिर हो गया - इससे लिखो मामा, यह न कभी लीक करेगा और न ही इसकी कभी स्याही ही खत्म होगी।'

- अरे यह कैसा पेन की इसकी स्याही ही कभी खत्म नहीं होगी।

मैंने पेन उलट पुलट कर देखा तो आसमान से गिरी, उस अदने की कीमत आठ हजार रुपये थी।

सफलता की छाया में तिर तिर तैरता वह बोलता जा रहा था, 'ममा यदि कभी इसकी स्याही खत्म भी हो गई तो कंपनी इसका दाम वापस दे देगी।

मैं झुँझला पड़ी, क्यों पसंद करता है यह ऐसी चीजें जो अक्षय हों? उस दिन घड़ी लाया तो ऐसी जो चिर-युवा हो, आज पेन लाया तो ऐसी जिसकी स्याही कभी खत्म न हो। क्या ऐसी सोच प्रकृति के विरुद्ध नहीं? क्या यह अति की ओर लुढ़कना नहीं?

लेकिन इन सब नोंक-झोंक के बावजूद वे हमारे गुनगुनी सुबहों और रेशमी शामों वाले घरेलू दिन थे। ये वे दिन थे जब हमें धरती और जीवन दोनों से ही कोई शिकायत नहीं थी। क्योंकि हम जिंदगी से जुड़े हुए थे। हम जिंदगी के एन बीचोंबीच थे।

और उसके बाद ही माला के मनकों की तरह सब कुछ बिखरता गया। उसका प्रमोशन हुआ और कंपनी ने उसे अंतर्राष्ट्रीय टीम में डाल दिया। अब धरती पर चलने की बजाय वह आसमान में उड़ने लगा था। दौलत में तैरने लगा था। संसार के सभी देशों में उसकी कंपनी के मुख्य कार्यालय थे। उसे कभी विएतनाम जाना पड़ता, कभी पेरिस, कभी जर्मनी तो कभी स्पेन। हम खुश होते कि बेटा उन्नति कर रहा है। जिन देशों के नाम भर हमने सुने, बेटा उन विदेशी आसमानों को छूकर आ रहा था।

करीब डेढ़ साल बाद वह भारत आया तो भी सिर्फ दो दिनों के लिए। इन दो दिनों में भी उसने पाँच राज्यों में उड़ान भरी। सुबह का नाश्ता दिल्ली में लिया, लंच मुंबई में तो शाम का खाना चेन्नई में। हमारे घर भी वह ठहरा था महज दो घंटे पैंतालिस मिनट के लिए। रात ढले वह जब तक आया मेरी प्रतीक्षा लहूलुहान हो चुकी थी। भोर-भोर ही उसकी उड़ान थी। बस कुछ लम्हों के लिए ही झपकी ले वह उठ गया था। विशेष तो कुछ था नहीं उसके लिए करने को, बस चाय ही अपने हिस्से आई थी। सुबह-सुबह ही उसके लिए इलाइची की खुशबूदार चाय बनाई थी। लेकिन वह चाय भी वह पी नहीं पाया था। चाय गर्म ज्यादा थी, उसके पास समय कम था। वहीं किसी काम से मैंने उसका किट बैग खोला तो हैरान रह गई। उसमे चावल, दाल, दलिया, आटा आदि के छोटे छोटे पैकेट थे, छोटी सी प्लास्टिक की पैक मसालेदानी थी जिसमे हल्दी, मिर्च, धनिया, जीरा और अमचूर भरा हुआ था। एक छोटा सा कूकर भी था। यह क्या? मुझे लगा जैसे मैंने चावल दाल और मसालों के पैकेट को नहीं वरन साँप, बिच्छुओं को छू लिया है, बिना घी, तेल के क्या यह उबला खाना खता है? मैंने पूछा तो वह उखड़ गया, सामान को जोर जोर से सूटकेस में पटकते हुए, चीखती आँखों से मुझे देखते हुए बोलने लगा 'ममा, मेरा माइक्रो मैनेजमेंट मत करो' वह जब भी झुँझलाता अंग्रेजी पर उतर आता था। मेरा रुआँसा चेहरा देख वह फिर थोड़ा नरम पड़ा, शायद मेरे दुख से दुखी भी हुआ, मेरे कंधे पर हाथ रख समझाने लगा, - ममा मैं यहाँ से सीधा मेड्रिड (स्पेन) जाऊँगा, वहाँ शाकाहारी भोजन नहीं मिलता, 1975 तक तो वहाँ शाकाहारी खाना बैन तक था। अब बैन तो नहीं है, फिर भी शाकाहारी खाना कहाँ खोजूँगा, खाने के अलावा भी दुनिया में बहुत काम हैं। इस कारण मैं चार पाँच दिन का खाने का सामान साथ रखता हूँ कि कहीं नहीं मिले तो पकाकर खा लूँ।

- इतना सा दाल चावल चल जाएग पाँच दिन? जानती थी अधिक जिरह पसंद नहीं जनाब को विशेषकर उन बातों पर जहाँ उसका कद छोटा लगे। टाई की गाँठ ठीक करते हुए वह सचमुच झल्ला पड़ा, 'चिल ममा, ट्राई टू अंडरस्टैंड, ब्रेड, चीज, मक्खन, नुडल्स वगैरह तो हर जगह मिल ही जाता है, एक टाइम उससे निकल लेता हूँ।

ध्यान से देखा मैंने, ब्रेड, चीज और मक्खन खा-खा कर उसका वजन बढ़ रहा था। शरीर पर हर कहीं अतिरिक्त चर्बी नजर आ रही थी। सामने के बाल काफी उड़ गए थे। पीछे भी छोटा सा चाँद निकल आया था। कम सो पाने की वजह से आँखों के नीचे काली झाइयाँ दिखने लगी थीं। हे भगवान यह कैसी जिंदगी है, कमाना राजा की तरह, पर खटना गधों की तरह और खाना भिखारियों की तरह!

जाते जाते फिर पूछ बैठी थी मैं, 'अब कब आओगे?' जाने किस ख्याल में खोया था वह कि जवाब दिया चार सौ करोड़। क्या? चार सौ करोड़ दिन के बाद। यह क्या कहा? वह शर्मा गया, 'सॉरी ममा, मेरे दिमाग में कुछ और चल रहा था। अरे ममा, मैं अपनी कंपनी के सबसे बिकाऊ प्रोडक्ट का ब्रांड मैनेजर हूँ। इस कारण मेरे दिमाग में सेल्स का आँकड़ा घूम रहा था। मैं कहना चाह रही थी कि जिंदगी को लेकर इतनी लापरवाही ठीक नहीं पर मैं कुछ कहती इसके पहले ही वह यह जा वह जा।

आज ताना दे रहे हैं वे दिन... वे लम्हे। रह रह कर कोंच रहे हैं मुझे की मैंने तभी क्यों नहीं आगे बढ़कर रोक लिया उन्हें? तब वे मेरी पहुँच से इतने दूर भी न गए थे।

साल भर बाद वह फिर आया भारत पर तब तक शायद सुर बिखर चुके थे। खुबसूरत सा कुछ था उसमे जो सदा के लिए मर गया था। तोड़-फोड़ उसके भीतर शुरू हो चुकी थी। यूँ बाहर से सब कुछ सामान्य ही लग रहा था। पर एक माँ की सतर्क निगाह से कुछ भी बचा नहीं रहा था। काफी थका थका, बिखरा-बिखरा और उदास दिख रहा था वह। फेसबुक, आइ पैड, तेज म्यूजिक, दोस्त, गर्ल फ्रेंड, होटल, रेस्तराँ, पार्टी, आना-जाना, पीना-पिलाना सब सिरे से गायब थे। ऑफिस से आते ही लैप टॉप पर या तो डेटा विश्लेषण करता या गुमसुम बैठा जाने क्या क्या सोचता रहता। एक बार तो मैंने उसे गीता के साथ साथ बुद्ध के 'एथ फोल्ड पाथ' पर कुछ पढ़ते हुए देखा। मुझे ताज्जुब हुआ। हमेशा रंगीनियों, रोशनियों और चकाचौंध में उड़ने वाला गीता में क्या खोज रहा है?

क्या मुझे भ्रम हुआ है? कैसे टटोलूँ उसे? यद्यपि अपनी जिंदगी में मुझे गीता ने हमेशा ही सँभाला था, पर उस दिन उसका बुद्ध और गीता की शरण में जाना जैसे मुझे किसी तूफान के संकेत देते से लगे। उसकी गहरी उदासी, उसकी थकावट, चेहरे की उड़ती रंगत, बढ़ता वजन सब जैसे चीख चीख कर कह रहे थे कि ये वो लहरें हैं जो तूफान पूर्व ही आती हैं।

रात मैंने उसके माथे पर हाथ फेरते हुए कहा 'चलो कहीं घूमने चलते हैं, कुछ मौज-मस्ती करते हैं?'

उसकी आँखों में वेदना का समुद्र लहराया। माथे पर उग आए पसीने को कुर्ते की बाँह से पोंछते हुए उसने धीरे धीरे अपने को खोला जैसे कोई खोलता है धीरे धीरे सावधानी से घाव पर बंधी पट्टियों को, 'ममा क्या तुम्हें नहीं लगता कि हर चीज का कोटा बंधा होता है। मौज मस्ती का भी। ममा मुझे लगता है कि मैंने मौजमस्ती का अपना कोटा शायद पूरा कर लिया है। शायद मैंने अपने हिस्से से कुछ ज्यादा ही ले लिया है। बुद्ध ने कहा था कि 'एवरी थिंग इन एक्स्सस इज पोइजन '(जरूरत से ज्यादा हर चीज जहर है) तो ममा, मेरे पास तो सभी कुछ एक्सेस (अतिरिक्त) है। चर्बी ज्यादा, पैसा ज्यादा, खर्च ज्यादा, रफ्तार ज्यादा, घूमना ज्यादा, काम ज्यादा, तनाव ज्यादा, प्रेशर ज्यादा, हो हल्ला ज्यादा। अब तुम्ही बताओ माँ इतने एक्सेस का भार यह मशीन कैसे सँभाले। बोलते बोलते वह खिड़की से आसमान की ओर ताकने लगा था,अब वह मेरे साथ नहीं था।

उन जलते क्षणों लगा जैसे बुद्ध हमारे घर के आँगन में करुणा की मूर्ति बनकर नहीं वरन आतंक बन कर उतरे हैं उस पर कोढ़ में खाज यह कि उसी समय जाने कैसे तो याद आया कि एक 21 वर्षीय लड़के ने आत्महत्या कर ली थी, वह हर दिन नेट पर बैठा रहता था। सुसाइड नोट में उसने लिखा था 'सब कुछ जान गया हूँ' अब देखने को क्या बचा है' तो क्या इसका भी कोटा पूरा हो गया? नहीं बचा कुछ?

इसीलिए पीले पड़ते जा रहे हैं उसके पत्ते। कुछ करना होगा! काश कर पाती मैं उसके मन की खुदाई। पकड़ पाती उस जीवन को जो हर रोज निकल रहा था दबे दबे पाँव बाहर।

मेरा चिंतित चेहरा देख शायद उसे भी लगा कि कुछ ज्यादा ही बोल गया है वह। इस कारण मुझे आश्वस्त करने के लिए बिना बात ही जोर जोर से हँसने लगा, झूठ-मूठ की खाने की फरमाइशें करने लगा।

पर हर दिन ही कुछ न कुछ ऐसा होता रहता कि भरोसा फिर अनाथ हो जाता। सुख-शांति का गला दब जाता। कई बार आधी आधी रात तक उसके कमरे की बत्ती जली रहती, कई बार रसोई में भी खट-पट की आवाजें आती रहती। एक रात वह नींद में बड़बड़ा रहा था - दो सौ करोड़-दो सौ करोड़! एक दिन उसके कमरे में झाड़ू लगाते वक्त बाई ने कागज के कई मुड़े टुडे टुकड़े दिए। कुछ टुकड़ों पर कुछ डेटा लिखे हुए थे, कुछ पर एकाध पंक्ति लिखकर फेंक दिया गया था, एक टुकड़े पर लिखा हुआ था 'ज्यों ज्यों बड़ा हो रहा हूँ अशांतियाँ भी बड़ी हो रहीं हैं। एक और टुकड़े पर लिखा था, 'करूँ ना करूँ? सेल्स टारगेट पूरा तो किसी प्रकार कर दूँगा पर इससे अधकटी गर्दन वाली बकरियों की तरह कई जिंदगियाँ बाँ बाँ कर उठेंगी। क्या करूँ? क्या यही चाहा था मैंने कि बैल बन जाऊँ? लगता है सेल्स टारगेट को पूरा करते करते मैं भी एक दिन कंपनी का बैल बन कर दम तोड़ दूँगा। और मेरे चारों तरफ बिखड़े होंगे आँकड़े ही आँकड़े'। उस टुकड़े को पढ़ मैं तो जैसे जिंदा ही चिता पर चढ़ गई थी। क्यों लिखा उसने 'दम तोड़ दूँगा, क्या चल रहा है उसके भीतर? यह कंपनी तो उसकी उसकी ड्रीम कंपनी थी। फिर क्या हुआ?

दिन भर मैं गीली लकड़ी की तरह सुलगती रही। स्वप्नों के पंख नोचती रही। दम रोक कर उसके आने का इंतजार करती रही। उस दिन भी वह और दिनों की तुलना में घर जल्दी ही आ गया था। मैं फिर परेशान हो उठी। क्या ऑफिस का काम सँभल नहीं रहा उससे? क्या तबियत ठीक नहीं? क्यों आ गया इतनी जल्दी? इतने जतन से बनाए खाने को भी उसने छूया भर 'ममा, भूख नहीं।' आवाज का यदि कोई चेहरा होता है तो यह तय था कि उस दिन उसका चेहरा बहुत कातर और गमगीन था। मेरे भीतर जैसे खतरे की घंटी बजी 'यह ठीक नहीं 'उसके हाथों पर हाथ फेरते हुए मैंने कहा 'मुझे लगता है तू काम करते करते बहुत थक गया है, चल कहीं घूम आते हैं, इस शहर से बाहर।'

वह हँस पड़ा, एक बेजान बिलखती हँसी, 'ममा, सारी दुनिया तो घूम चूका हूँ, पिछले पाँच सालों से घूम ही तो रहा हूँ। अब घूमने में क्या आकर्षण बचा है मेरे लिए, ममा इतना तेज दौड़ा पर पहुँचा कहीं नहीं' बोलते बोलते उसकी आवाज बिखरने लगी थी। मन पर पट्टियाँ बंध गई मेरे। क्या कुछ नहीं बचा? क्या सब कुछ देख भोग लिया इसने 29 साल के इस जीवन में? इसीलिए जब भी शादी की बात मैं करती हूँ किसी न किसी बहाने टाल देता है वह मुझे? कभी कहता, अब जमाना शादी का नहीं 'लिव इन रिलेशन' का है तो कभी कहता, ममा कंपनी टिककर बैठने दो तो सोचूँ। एक बार एक लड़की को लेकर मैं पीछे ही पड़ गई तो हाथ छुड़ा कर भागा। बाद में उसका एसएमएस आया - मुझमें सुख भोगने कि न इच्छा रही न ताकत। मैं ठंडा हो चुका हूँ।

ओह नो! सारी रात स्वप्नों के पंख झड़ते रहे।' उसके अलग, मेरे अलग, क्यों लिखा उसने 'सुख भोगने की न इच्छा रही न ताकत। क्या नौकरी के तनाव और सेल्स टारगेट ने मार डाला है उसे? आशंका के साँप डंसते चले गए। पिछले दिनों मेरी सहेली के डॉक्टर पति ने कहा था 'क्या बताएँ तेज रफ्तार की जीवन शैली और आधुनिक जीवन के तनाव युवकों में नपुंसकता बढ़ा रहे हैं। तो क्या यह भी? भगवन न करे! क्या होगा अति और गति में जीने वाली इस पीढ़ी का? न यह खुद जीएगी न जीने देगी।

मुझे लगा सारे उत्पात की जड़ यह नौकरी है, जिसे पाने के लिए कभी उसने धरती-आसमान एक कर दिया था। सोलह-सोलह घंटे पढ़-पढ़ कर खुद को गला ही डाला था। वही नौकरी आज उसका खून चूस रही थी। उसका छरहरापन, उसकी ताजगी, उसके सुंदर केश, उसका व्यक्तित्व, उसकी आत्मा यहाँ तक कि उसकी हँसी तक उससे छीन चुकी थी। कई बार मुझे सोचना पड़ जाता था की वह अंतिम बार कब हँसा था। (शायद नौकरी के शुरुआती महीनों में) बहरहाल जख्म खाए उसके वजूद की मलहम पट्टी करते हुए मैं बोली, 'छोड़ दे तू यह चाकरी, खा रही है यह तुझे कोई दूसरी नौकरी ढूँढ़ ले जहाँ कुछ तो सकून मिले।

परमहंसी मुद्रा में वह बोला, 'नौकरी बदलने से दुनिया नहीं बदल जाएगी ममा, हर जगह यही हाल है जहाँ भी जाऊँगा टारगेट, मुनाफा, रेड मारना, तिकड़म, झूठ और फरेब मेरा पीछा नहीं छोड़ेगा। इसलिए सवाल यह नहीं है कि मैं इस कंपनी में रहूँ या दूसरी कंपनी में, सवाल यह है कि मैं नौकरी में रहूँ या नहीं, कहते कहते उसने फिर बुद्ध को कोट किया। पहली बार मैंने बुद्ध को कोसा, खुद शांति की खोज में घर-बार छोड़ कर जंगल में चले गए। और आनेवाली पीढ़ियों को भागने का रास्ता दिखा गए। कहीं सचमुच ही उसने नौकरी छोड़ दी तो क्या होगा? मेरा बूता नहीं कि उसे बैठ कर खिला सकूँ। अभी तो इसके लिए ठीक ठाक लड़की का जुगाड़ भी नहीं कर पाई हूँ कि कहीं टिक कर रहे तो बात आगे बढाऊँ। पर इतना तय था कि मेरी शंका सही है, यह खुश नहीं। यह सचमुच अशांत है, तभी उसे बुद्ध याद आ रहे हैं।

शाम मैंने फिर उसमे हवा भरने की चेष्टा की, 'बेटा, जिंदगी से यूँ डरा नहीं जाता, सींगों से पकड़ उसका मुकाबला किया जाता है'

'हूँ' वह मुस्कुराया बुद्ध की तरह। मैं काँप उठी मलेरिया के रोगी की तरह।

सुबह सी सुबह। लेकिन वह अभी तक नहीं उठा था। शायद रोज की तरह जगा जगा ही सोया था या एक रात के भीतर ही जाने कितनी रातें बिता रहा था वह। रात उसने कपड़े भी नहीं बदले थे, मोजे तक नहीं उतारे थे। ऑफिस के कपड़ों में ही सिकुड़ कर सोया हुआ था। रात ठंड लगी होगी तो बिस्तर की चद्दर ही ओढ़ कर सो गया था वो। मन में फिर टीस सी उठी - कितना बदल रहा है वह! भीतर से। बाहर से। थोड़ी चिंता और ढेर सारे दुख के साथ लौटने लगी कि तभी एकाएक नजर गई, सीने के पास उलटी पड़ी उसकी डायरी पर। यूँ अमूनन मैं नहीं पढ़ती किसी की डायरी, पर इन दिनों उसकी बेचैनियों और उदासियों ने पढ़वा लिया मुझसे उसकी डायरी। कौन जाने यह डायरी ही ले जाए मुझे उसके अँधेरे तहखानों तक। पर वह डायरी तो जैसे रोशनियों से लिखी हुई थी। उसने लिखा था - एक राजा था। उसकी चार पत्नियाँ थीं। पहली पत्नी के पास वह कभी झाँकता तक नहीं था। दूसरी को वह सिर्फ पारिवारिक समारोहों में ले जाता था। तीसरी को दूसरी से थोड़ा ज्यादा समय देता। उसकी जिम्मेदारी थी उसकी प्रोपर्टी की देख रेख करना। उसको सँभालना, आगे बढ़ाना। उसका अधिकांश समय चौथी बीवी के साथ ही गुजरता। मौज-मस्ती में, घूमने-फिरने में, नौका बिहार में, नृत्य-मदिरा में। एक बार राजा मरणासन्न हुआ। ...अकेले इस धरती से जाना। अकेले रहने की आदत नहीं। उसने अपनी चौथी पत्नी से कहा - तुम भी मेरे साथ चलो, सती हो जाओ। उसने कहा - यह कैसे हो सकता है महाराज, मेरी तो सारी जिंदगी ही मौज-मस्ती और भोग विलास में बीती है। मेरा मन अभी भरा नहीं है। अतृप्त कामनाओं के साथ मैं कैसे मरूँ? फिर राजा ने अपनी तीसरी पत्नी की ओर देखा। उसने भी टका सा जवाब दे दिया - महाराज,मेरा कार्य अभी पूर्ण नहीं हुआ है। इस बीच कितनी ही प्रोपर्टी मैंने खरीदी है। जिनका भुगतान करना है। कितनी ही प्रोपर्टी मैंने बेची है जिनका भुगतान अभी आना है। मेरा कार्य अभी अधूरा है। मैं कैसे जा सकती हूँ? निराश राजा ने अपनी दूसरी पत्नी की ओर ताका - तुम चलो मेरे साथ। उसने भी अपनी असमर्थता दिखाई - महाराज, आपने तो मुझे एक ही कार्य सौंपा, परिवार को सँभालने का। मेरा कार्य अभी पूर्ण नहीं हुआ है, मैं कैसे जाऊँ? निराश और अवसन्न राजा का जीवन के यथार्थ से परिचय हो चुका था। वे सर झुकाकर चिंता और पश्चाताप में डूबे हुए थे कि तभी उनके सामने एक औरत आई। उसने उन्हें कहा, 'महाराज मैं आपके साथ चलने को तैयार हूँ।' राजा भौंचक, यह कौन? तभी उस युवती ने अपना परिचय दिया - महाराज, मैं आपकी पहली पत्नी हूँ। आपने तो कभी मेरे द्वार झाँका तक नहीं पर मैं जाऊँगी आपके साथ। यह पहली पत्नी ही आपकी आत्मा है, विवेक है। जिसके पास आप शायद ही कभी फटकते हैं।

लेकिन उसी डायरी के दूसरे पन्ने पर भी कुछ लिखा था जो शायद रोशनी से नहीं आँसुओं से लिखा हुआ था। जहाँ मन, शरीर और आत्मा का दर्शन नहीं वरन उसके जीवन की कुछ तल्ख सच्चाई थी। उसने लिखा था 'काश! मैंने वह सब न देखा होता' उसके बाद कुछ लिखकर काट दिया गया था। कुछ जगह खाली छोड़ दी गई थी। डायरी के पन्ने की तरह शायद उसके दिमाग में भी बहुत कुछ आड़ा-तिरछा चल रहा था। नीचे की तरफ लिखा था 'पहली डुबकी में कहाँ समझ पाया था। कि जिंदगी कहीं ओर है। ...अब समझ पाया हूँ जब गले तक धँस गया हूँ कि अरबों खरबों का हमारा व्यापार झूठ और सिर्फ झूठ पर टिका हुआ है, खूबसूरत बनाने के झूठे वादों पर। पर अब नहीं होता मुझसे यह सब। शर्म आती है मुझे अपने पर। लोग मर रहे हैं। किसान आत्महत्या कर रहे है। गाँव के गाँव उजड़ रहे हैं और हमारी टीम अपनी सारी ताकत और उर्जा इस बात पर लगा रही है कि कैसे युवतियों को गोरापन बेचा जाए। कैसे उन्हें खूबसूरत दिखने का स्वप्न बेचा जाए। कैसे गाँव के लोकल निर्माताओं और छोटे मोटे उत्पादकों से उनका धंधा छीन लिया जाए जिससे हमारे लिए मैदान साफ हो। बॉस कहते हैं कि तुम सोचना छोड़ दो, अच्छा बनने में समझदारी नहीं है, दूसरे का बोझ हम क्यों उठाएँ? धारा के विरुद्ध हम क्यों चलें? हमें नौकरी में रहना है तो हर हाल में कंपनी को प्रॉफिट कमा कर देना होगा चाहे कपट से, अनैतिकता से या फिर अधर्म से। पर मैं सोचना कैसे छोड़ दूँ? मेरा सोचना ही तो यह साबित करता है कि मुझमे और जानवर में सिर्फ दो पैरों का ही अंतर नहीं है।

दूसरे दिन भोर-भोर ही उठ गया था वह। आजकल बेटे को खो देने का जाने कैसा तो खौफ कीड़े की तरह घुस गया है भीतर कि सुबह उठते ही पाँव अनायास ही उसके कमरे के दरवाजे की ओर चल पड़ते हैं। देखा वह जमीन पर आसन बिछा पद्मासन की मुद्रा में कुछ जाप रहा था। सारी चेतना कानों पर लगा मैं उसे सुनने लगी। होठों की दरारों से फूट रहा था कुछ, ॐ क्रांति-ॐ क्रांति जैसा ही कुछ जाप रहा था। मुझे लगा मैंने गलत सुन लिया है। ॐ शांति को मैं ॐ क्रांति क्यों सुन रही हूँ? नहीं मैं कहीं भी गलत नहीं थी। मैंने सही ही सुना था। मेरे रोम रोम ने सुना। वह सचमुच 'ॐ क्रांति-ॐ क्रांति' ही बुदबुदा रहा था। उफ कितना कन्फ्युजड है मेरा बेटा। कभी आत्मा की बात करता है तो कभी क्रांति की। कभी बुद्ध की बात करता है तो कभी युद्ध की। खिड़की से आती नरम धूप की उजास में फिर ध्यान से देखा उसका चेहरा। दो दिन की बढ़ी हुई दाढ़ी। हलकी सिलवटों से भरा कुर्ता। थोड़ा मैला पड़ा पायजामा। कानों के पास चाँदी के कुछ तार। पर इसके बाबजूद कितना निरीह, पवित्र, उदास, सच्चा और सात्विक दिख रहा था वह।

कन्फ्युजड वह है या मैं हूँ? अशांत वह है या मैं हूँ? समझ नहीं पाई।

जाप से उठा तो परम शांत दिख रहा था। पूछूँ न पूछूँ का असमंजस। कहीं कुछ ऐसा न कह बैठे जिसे सुन न पाऊँ मैं। पर पूछ ही लिया आखिरकार।

- ॐ शांति की जगह ॐ क्रांति क्यों जाप रहा था तू? उसने आश्चर्य से मेरी ओर देखा जैसे चोरी पकड़ी गई हो, फिर एकटक मेरे चेहरे की ओर देखता रहा। मैंने फिर कुरेदा, बोलते क्यों नहीं? उसने कहा, देखो, देखते देखते तुम्हारे बाल कितने सफेद हो गए हैं, मैं झल्लाई, टालो मत, यह मेरे सवाल का जवाब नहीं। वह हँसा। सोच की धूप-छाँव लहराई पल भर के लिए उसके उदास और खामोश चेहरे पर। फिर गिरे कुछ शब्द आहिस्ता आहिस्ता जैसे पतझड़ में गिरते हैं पत्ते पेड़ों से - रही होगी देश को शांति की जरूरत कभी पर आज देश को है क्रांति की जरूरत।

क्या कहा? क्रांति? खुदाया! कल तक ऊपर से नीचे तक जो साहब था आज एकाएक क्रांतिकारी कैसे बन गया? क्या पूछूँ उससे? पर कहीं झल्ला गया तो जिस तरह आज कल चिड़चिड़ा हो गया है वह। हिम्मत की आखिरकार, आज क्रांति की बात एकाएक तुम्हारे दिमाग में आई तो कैसे? पपड़ी पड़े होठों पर जीभ फेरते हुए कहा उसने, 'ममा, आजकल सब कुछ अजीबोगरीब हो रहा है, दिलचस्प ख्याल और विचार मेरे बॉस हो रहे हैं जो स्वप्न तक में मेरा पीछा नहीं छोड़ते हैं। कल स्वप्न देखा की दुनिया से पानी खत्म हो गया है और लोगबाग सिर्फ कोक और पेप्सी पी रहे हैं। मैं स्वप्न में ही घबड़ा गया की अब हमारा साबुन कैसे बिकेगा क्योंकि बिना पानी लोगबाग कपड़े कैसे धो पाएँगे? कपड़े नहीं धुलेंगे तो हमारा टारगेट कैसे पूरा हो पाएगा?

ओह नो! जाने कितने हार्सपावर का करेंट लगा कि लगा चक्कर खाकर गिर पडूँगी। सफलता के हाई वे पर खडे इस लड़के को कभी बुद्ध तो कभी क्रांति क्यों याद आ रही है। वह जहाँ था कितने पहुँच पाते हैं वहाँ तक, पर बिडंबना यह थी कि वह वहाँ नहीं था जहाँ वह था और सच्चाई यह थी कि सच होते हुए भी मन मानने को बिलकुल तैयार नहीं था कि वह वहाँ नहीं है। फिर भी दुखी नहीं होने के तर्क ढूँढ़ते हुए मैंने मन से गुहार लगाई, मन मेरे तू उदास मत हो क्योंकि जो क्रांति की बात करते हैं वे जीने और दुनिया को बदलने की बात भी करते है, वे दुनिया को छोड़ने की बात नहीं करते हैं। नहीं अभी सब कुछ शेष नहीं हुआ है। अभी भी बहुत कुछ बचा हुआ है उसके अंदर। नहीं तो वह क्रांति की बात नहीं करता। पर इसका और क्षरण नहीं हो इसके लिए जरूरी है कि मैं उसे दूर ले जाऊ यहाँ से।

लेकिन इस बीच क्या कुछ घट गया था कि जिंदगी की चहक हाथों से एकदम छूट गई थी। कश्मीर कालाहांडी बन गया था। थोड़ा बहुत जो भी बचा खुचा था वह भी रिस गया था। सोच के भी सोच नहीं पाई कि वह जिंदगी से भयभीत था, थका हुआ था, निराश था या जिंदगी के सत्य को जान गया था

बुद्ध के काटे का जहर उस पर फैलने लगा था।

बंशी की तरह बजता दर्द और लहर दर लहर चली आती स्मृतियाँ। शाम का वक्त था। डूबते सूरज की उदास होती रोशनी में मन यूँ भी फड़फड़ा रहा था जैसे सदियों के जमा दुख मन पर धावा बोलने वाले हों। गमगीन सी उस दिन भी बालकनी से भीगे कपड़े उठा ही रही थी कि तभी उसके बॉस का फोन मेरे मोबाइल पर, 'नमस्ते आंटी' सब ठीक तो है। मैं अचकचाई, उसने मुझे क्यों फोन किया? 'हाँ-हाँ सब ठीक है।' वह थोड़ा असहज हुआ दरअसल आंटी, आई मीन आंटी, अमित को कहिए कि एक बार ऑफिस आ जाए। नए मार्केटिंग मैनेजर को कुछ डेटा चाहिए। कितनी बार उसे फोन किया पर उसका मोबाइल हमेशा स्विच ऑफ मिला।'

- रुकिए-रुकिए आपको जरूर कुछ गलतफहमी हुई है, शायद गलत फोन लग गया है, मेरा बेटा तो रोज ऑफिस जा रहा है। मैंने बीच रस्ते ही उसे रोक दिया।

पर उसने तो मेरा तर्पण ही कर डाला - गलतफहमी मुझे नहीं शायद आपको हुई है, आंटी। कश्मीर जाने के लिए उसने जो छुट्टियाँ ली उसके बाद तो वह ऑफिस आया ही नहीं। उसकी आवाज थोड़ी तन गई थी।

- यह कैसे हो सकता है? वह तो रोज ऑफिस के समय घर से निकलता है। मैं बौखलाई, क्या बकवास कर रह है वह? क्या दिन में ही चढ़ा ली?

वह कच्चा पड़ा, आंटी मैं आपसे गलत क्यों कहूँगा? लेकिन कई दिनों से मैं देख रहा हूँ कि वह जरा अपसेट है। उसके सेल्स टारगेट हाँफ रहे हैं, पूरे नहीं हो रहे। क्या कोई परेशानी है? कोई प्रेम-व्रेम का चक्कर तो नहीं है, हमारे यहाँ ही साल भर पहले एक सीनियर मैनेजर ने हमारी प्रतिद्वंद्वी कंपनी की एक लड़की के प्रेम में पड़कर दिमागी संतुलन खो दिया था। क्योंकि कंपनी के कानून के अनुसार इस नौकरी के रहते वह उससे शादी नहीं कर सकता था। उसे नौकरी या छोकरी दोनों में से एक को छोड़ना था। वह न नौकरी छोड़ पा रहा था न छोकरी तो उसने दिमाग को ही छोड़ दिया

ओह नो! क्षण भर में ही घूम गया उसका उस दिन का 'ॐ क्रांति', मैं ढह गई। बिगड़ी बातों को पटरी पर लाने की मेरी आखिरी और थकी थकी कोशिश में लिजलिजी सी आवाज निकली - देखो ऐसा बिलकुल नहीं है, अपसेट तो वह जरूर है, कभी-कभी ऐसा सब के साथ हो जाता है पर प्रेमिका के चलते नहीं, बुद्ध के चलते। शायद बीते हुए कल के चलते ऐसा हो गया है 'कुछ दिन बीत जाने दीजिए सब ठीक हो जाएगा। - दरअसल जबसे उसने बुद्ध को पढ़ा है। वह ऐसा हो गया है। उसे बुद्ध लग गया है। मैं उससे बात करूँगी। आई ऍम वेरी स्योर यह बुद्ध का साइड इफेक्ट है

क्या कहा आंटी बुद्ध? बुद्ध?

और वह ठहाका मारकर हँसता रहा फिर किसी प्रकार खुद पर काबू पाते हुए कहा उसने, आंटी, उसे बुद्ध-वुद्ध कुछ नहीं लगा है और यह बुद्ध का नहीं टारगेट का साइड इफेक्ट है। यह भी हो सकता है कि उसका मेंटल डिसऑर्डर हो गया हो क्योंकि वह सोचता बहुत है। उससे कहिए आंटी कि वह सोचना छोड़ दे, नहीं हो तो आंटी आप उसे किसी अच्छे साईक्रियाटिस्ट को दिखा दीजिए।


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