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कविता

अखबारी आदमी
अनंत मिश्र


वह चीखता ऐसे है
जैसे छप रहा हो
और जब हँसता है
तो उसे मशीन से
अखबार की तरह
लद-लद गिरते देखा जा सकता है,
वह इकट्ठा होता है
अपने वजूद में बंडल का बंडल
सबसे आँख लड़ाती बेहया
औरत की तरह
वह इतना प्रसिद्ध होता है कि
दिन भर में ही
पूरा-पूरा
फैल जाता है
आबादी पर,
अगले दिन वह फिर
हँसेगा, चीखेगा, गाएगा
फर्ज करेगा
और दोहराएगा, घोषणा करेगा
आदमी अखबारी है
अखबार में छपा रहना चाहिए
उसका प्यार।

 


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