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कविता

अथ दोहा शिक्षावली-इष्टै बंदना
मुंशी रहमान खान


दोहा

गुरु पद पंकज नाय सिर उर धर ईश्‍वर ध्‍यान।
हाथ जोरि विनती करहुँ देहु बुद्धि बल ज्ञान।। 1
धर्म सहित पुस्‍तक रचहुँ सुनिए कृपानिधान।
तुव प्रसाद यह पूर्ण हो दीजौ यहि वरदान।। 2
धर्म विरुद्ध बहु कार्य लख, अस मन कीन्‍ह विचार।
देहुँ सीख दोउ धरम हित जो सहाय करतार।। 3
यासे मैं विनती करहुँ हे प्रभु करुणा नाथ।
जो अनुचित लेखनि लिखै शक्ति घटै मम हाथ।। 4
जो अक्षर भूलौं कहीं हे प्रभु दीनदयाल।
करि निज कृपा दीन पर शीघ्र करैयो ख्‍याल।। 5
जौन लिखौं सब होय फुर झूठ न आवै पास।
करियो ईश सहाय यहि पूजै मन की आस।। 6

 


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