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संस्मरण

संवाद
अज्ञेय

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अनुक्रम संवाद : रमेश चंद्र शाह     आगे

* [डॉ. रमेशचन्द्र शाह और अज्ञेय के बीच यह संवाद मार्च 1985 में दिल्ली में हुआ। टेप की प्रतिलिपि को प्रकाशनीय रूप देने के लिए उसका यत्किंचित सम्पादन अज्ञेय द्वारा किया गया।]


शाह : ‘चौथा सप्तक’ की भूमिका में आपने कवि के लिए एक ‘मास्क’ अथवा ‘पर्सोना’ की जरूरत पर बल दिया है, बल्कि सच्चाई को प्रस्तुत करने के लिए उसे (मुखौटे को) अनिवार्य माना है। जहाँ तक मेरी जानकारी है, यह आग्रह इस तरह आपके पहले के काव्य-चिन्तन में नहीं मिलता। तो समसामयिक रचना से आपके असन्तोष का वह कौन-सा आधार था स्पष्ट करें जिससे इस पर ज्यादा बल देने की या इस रूप में बल देने की जरूरत पड़ी?

अज्ञेय : मैं समझता हूँ कि एक तो काव्य के बारे में जो चिन्तन हुआ उसका सहज विकास था यह। यह बात यहाँ तक ले जाकर मैंने नहीं कही, पर कैसे यहाँ तक पहुँचती है यह तो पहले जो कुछ कहा है उस पर विचार करने से स्पष्ट हो जाएगा। छायावाद के बारे में मेरी जो धारणा थी उसमें यही बात मैंने कही थी कि उससे पहले का, गुप्तजी के समय तक का, काव्य एक विशेष अर्थ में निर्व्यक्तिक था और उसमें व्यक्ति के स्वर के लिए, कवि के व्यक्तित्व के लिए कोई गुंजाइश ही नहीं थी। छायावाद के कवियों ने पहले-पहल कविता में कवि के व्यक्तित्व के लिए जगह बनायी। उनकी कविता में कवि की आत्मा भी व्यक्त हो सकती है, जबकि उससे पहले यही था कि कवि को जहाँ तक हो सके अदृश्य किया जाए और कविता में रीति बोले या कथा-वस्तु अगर हो तो वह बोले-कवि भरसक उसमें न प्रकट हो। पन्तजी ने तो इसीलिए स्पष्ट शब्दों में इस बात की शिकायत की थी कि ‘कविता के लिए उससे पहले भाषा ही कहाँ थी?’ उनका आशय यह नहीं था कि पहले कविता नहीं थी, लेकिन जिस तरह की कविता वह कहना चाहते थे, जिस में कवि का व्यक्तित्व बोले, उसके भाव भी व्यक्ति की भावनाओं के रूप में ही प्रकट हो सकें, उसके लिए भाषा नहीं रही थी। भाषा का संस्कार ऐसा हो गया था कि उस तरह की बात कुछ अटपटी या अनकहनी लगती थी। उन्होंने भाषा में व्यक्ति के स्वर के लिए जगह बना दी और वही उसका सहज स्वर हो गया-इस हद तक कि यह प्रश्न उठने लगा कि इसमेंं ‘मैं’ कुछ जरूरत से ज्यादा बोलता है। कविता को जो कुछ छायावाद से मिल गया था, उसको छोड़े बिना अगर फिर से ऐसी सम्भावना बनानी है कि इस ‘मैं’ से बड़ा और भिन्न भी कुछ बोल सके, तो क्या उपाय करना होगा? कवि न केवल स्वयं बोले बल्कि दूसरे को भी बुलवा सके-यह कैसे सम्भव होगा? यह सोचे तो फिर नये सिरे से पुराने साहित्य की भी एक पहचान बनती है, क्योंकि उसमें भी एक चेहरा बोलता रहा, उस काव्य में जो चरित्र आते थे उनमें बहुत-से ऐसे थे कि उनकी मार्फत कवि अपनी ही बात कहता था। राधा और कृष्ण तक के बहाने से, उनके निमित्त से,कवि अपनी भावनाएँ भी प्रकट करता था। यानी जो शुद्ध धार्मिक काव्य है उससे अलग, भक्ति और रीति काव्य में बहुत-सा ऐसा था जिसमें कवि अपनी भावनाएँ, अपने भाव, अपने अनुभव प्रकट करता था, लेकिन राधाकृष्ण को या किसी और चरित्र को निमित्त बना कर। तो उससे मेरे सामने यह बात स्पष्ट हुई कि बड़ी बात-अपने से बड़ी बात कहने के लिए, अपने से अलग एक चेहरे की भी आवश्यकता हो सकती है। फिर मैंने यह भी पहचाना कि नाटक में भी तो बराबर यही होता है। और यहाँ तक कि नाटक में यदि कभी कोई महाशक्तिमंच पर आती है तो वह चेहरा पहन कर आती है, जबकि साधारण मानवीय चरित्र अपने मानवीय रूप में भी आ सकते हैं। एक ही नाटक में आप देखेंगे कि कोई बड़ी शक्ति आती है तो वह चेहरा पहन कर आती है और बाकी लोग साधारण मानवीय चेहरा लेकर ही अभिनय में प्रवृत्त होते हैं। तो इससे यह बात और स्पष्ट हो गयी कि चेहरे की उपयोगिता होती है।

इस सन्दर्भ में एक विदेशी रचना का, आधुनिक रचना का विदेशी प्रसंग भी मेरे मन में उभर रहा है। इसलिए मैं जानना चाहता हूँ कि आप का विचार क्या है। जैसे निर्व्यक्तिकता का आदर्श : कि कवि को स्वयं बहुत नहीं बोलना चाहिए? और अच्छी आत्माभिव्यक्ति भी-और एक तरह से काव्य को वस्तुपरकता और आत्मपरकता का द्वैत भी-हल करने की दिशा में दो विचार इस शताब्दी के अँग्रेज़ी काव्य में आये। एक तो एलियट का ‘आब्जेक्टिव कोर्रिलेटिव’ वाला सिद्धान्त था-कि अपने से बाहर, अपनी जीवनी से बाहर, अपने जीवनगत अनुभव से बाहर या किसी स्थिति की, किसी नाटकीय परिस्थिति की, किसी कहानी की कल्पना करें और उसके जरिये आप अभिव्यक्ति करें। और दूसरा जो है एक तरह से एलियट से बहुत ही भिन्न किस्म के आधुनिक कवि थे-येट्स-उनका : उन्होंने ‘मास्क’ की अवधारणा की। लेकिन इन दोनों में दार्शनिक दूरी बहुत है-एलियट के और येट्स के बीच में, ‘मास्क’ और ‘आब्जेक्टिव कोर्रिलेटिव ‘ के बीच में। येट्स में तो ‘फोक बायोग्राफी’ का बड़ा महत्त्व है, उसकी अपनी ‘सब्जेक्टिविटी’, उसके अपने व्यक्तित्व का बहुत महत्त्व है। तो ‘मास्क’ की अवधारणा से उसकी यह बात नहीं कटती, जब कि एलियट की स्पष्टता निर्व्यक्तिक आदर्श है। तो मैं यह जानना चाह रहा था कि जब आपने आज के कवियों की रचना को देखते हुए और उनके प्रति एक आलोचनात्मक रवैया अख्तियार करते हुए उनकी कविता से या उनके रचना-दर्शन से असन्तोष अनुभव करते हुए जब इस प्रतिमान को सुझाया तो इसमें किस तरह की मुक्ति या किस तरह से बदलाव की क्या उम्मीदें, क्या अपेक्षाएँ आपकी थीं-कि रचना इस तरफ़ जानी चाहिए।

देखिए, आपने जो नाम लिये दोनों ही अपनी-अपनी जगह ठीक हैं, दोनों उपयोगी भी हो सकते हैं। अगर आपका आग्रह ऐतिहासिक वस्तु पर है या आपकी दृष्टि इतिहास को महत्त्व देती है-जैसा कि मैं समझता हूँ कि एलियट ने दिया-तो आप वस्तु-जगत् में ऐसा सम्बन्धकारक खोजते हैं जो कि आब्जेक्टिव कोर्रिलेटिव है, उसके निमित्त से आप अपने ऐतिहासिक रूप को सामने लाते हैं, ऐतिहासिक निर्व्यक्तिक रूप को। इसलिए आपको वस्तु-जगत् में ऐसे सम्बन्धों की खोज उपयोगी जान पड़ती है, आवश्यक भी जान पड़ती है, उसके माध्यम से आप अपनी बात कहते हैं। दूसरी तरफ़ जहाँ तक दृष्टि में संस्कृति पर ज्यादा जोर है-ऐतिहासिक अस्मिता पर नहीं, सांस्कृतिक अस्मिता पर-वहाँ उस आब्जेक्टिव या कि वस्तुत: कोर्रिलेटिव का महत्त्व नहीं है; वहाँ पर मास्क ज्यादा उपयोगी है। क्योंकि सांस्कृतिक वस्तु तो बाहरी होती ही नहीं, वह आभ्यन्तर ही रहती है, इसलिए वह तो चेहरा माँगती है। जो बाहरी वस्तु है, उसके लिए एक बाहरी सम्बन्धकारक भी खोजना पड़ सकता है या उपयोगी हो सकता है; वही आब्जेक्टिव कोर्रिलेटिव है। और मैं समझता हूँ कि एलियट और येट्स की दृष्टि में यह बुनियादी भेद है भी। येट्स में कहीं ज्यादा संस्कृति की चेतना है, सांस्कृतिक अस्मिता की चिन्ता है और इतिहास की नहीं है; जब कि एलियट को उतनी ही ज्यादा इतिहास की चिन्ता है।

मैं समझता हूँ कि आपकी यह बात काफ़ी विचारोत्तेजक है और मुझे सही भी लग रही है। लेकिन यहाँ पर फिर मेरे मन में यह सवाल पैदा होता है कि, जैसा आपने देखा होगा, इधर साहित्य के विचारकों में एक प्रवृत्ति लक्षित की जा रही है। आधुनिक रचना के इस पूरे दौर से ही उनको सन्तोष नहीं मिलता, उसके कारण चाहे कुछ भी हों, जायज या नाजायज कारण। उनका यह कहना है कि रचना के पिछले चालीस वर्ष जो हैं यह एक तरह का विचलन, मुख्यधारा से विचलन है और उससे पहले-नयी कविता, प्रयोगवादी कविता से पहले-हिन्दी कविता सही दिशा में चल रही थी। उनके मत से वह बड़ा सही काव्य था, लेकिन इसको जो बौद्धिक दिशा दी गयी या आधुनिक दिशा दी गयी वह सही नहीं थी। और उसका जो आतंक हुआ या जो प्रभाव पड़ा वह एक तरह से एक विचलन ही है, कविता का स्वाभाविक विकास नहीं हुआ, वह उससे कुंठित हुआ। अब सन्तुलन फिर से सही करने की बात की जा रही है। और मजे की बात यह है कि इस नये आग्रह में, इसके चिन्तन में एक तो आपके द्वारा अभी प्रस्थापित दोनों चीज़ों के-इतिहास और संस्कृति के-किसी के पक्ष या विपक्ष में तर्क नहीं है-न तो सांस्कृतिक अस्मिता के पक्ष में कोई ठोस तर्क सामने आ रहा है और न उस तरह से इतिहासविद्ध रचना-दृष्टि जो एलियट की चिन्ता थी। एलियट वाली तो उनके लिए और भी उपेक्षणीय है, और भी गलत है; क्योंकि इतिहास की चिन्ता तो उनको है, लेकिन वैसी नहीं है जैसी एलियट की है। तो इस प्रसंग में, इस आरोप या नये आग्रह के सामने आप कुछ कहना चाहेंगे?

पता नहीं इसके बारे में क्या कहा जा सकता है क्योंकि इस तरह का चिन्तन बहुत ज्यादा संगत या प्रासंगिक नहीं है। एलियट और येट्स तो दोनों कवि हैं और कविता से उनका बहुत गहरा सरोकार है, कविता की उनको चिन्ता है। जिन लोगों की बात आप करते रहे हैं उनके ऐतिहासिक चिन्तन में कविता की चिन्ता उनको बहुत कम है। एक वैचारिक तारतम्य की चिन्ता तो उनको है, लेकिन उसमें कविता कहाँ तक बचती है इसकी चिन्ता उनको नहीं है। बल्कि यह भी कह सकते हैं कि उसकी बहुत ज्यादा समझ भी उनकी नहीं है। और बहुत-सी चीज़ें जिनकी ये लोग प्रशंसा भी करते हैं, उनमें बहुत कम ऐसी चीज़ें हैं जिनको कविता माना जा सकता है। यहाँ तक कि कुछ अच्छे कवियों की चीज़ें भी वे चुनते हैं तो जो उनका वास्तविक काव्य है उसको एक तरफ़ कर देते हैं और केवल जो स्वयं उनके विचार या मत-वाद से मेल खाता है उसी की प्रशंसा करते हैं।

यह तो खैर है। अभी आपने रीति-काव्य की बात कही। मुझे याद आता है बहुत शुरू में भी आपने यह जो एक तरह से प्राप्ति की समस्या है, रचने की समस्या है इसी के प्रसंग में, कवि-कर्म की दृष्टि से, व्यावहारिक पक्ष की दृष्टि से ऐसा महसूस किया था कि रीति-काव्य से भी कुछ सीखा जा सकता है। लेकिन अगर कथ्य के पक्ष को लिया जाए, संवेदन के पक्ष को लिया जाए तो रीति हमसे बहुत दूर जान पड़ती है। उसकी मानसिकता से, मनोभूमि से किसी तरह की सहानुभूति स्थापित करना बड़ा कठिन है। इससे जो प्रश्न का रूप मेरे मन में बनता है यह है कि क्या विगत युग की किसी ऐसी कविता या साहित्यिकता से आज का रचनाकार कुछ सीख सकता है जिससे कि उसका मानसिक तादात्म्य बिलकुल भी न हो, जिससे वैचारिक शिल्पी के रूप में सही, कुछ सीख सकता है?

सहानुभूति न हो सके? अगर आप तादात्म्य के लिए मानसिक पक्ष पर जोर दे रहे हैं तब तो उससे हो सकता है जिससे सहानुभूति तो नहीं है, लेकिन जो तर्क की दृष्टि से समान्य जान पड़ता है। बात यह है कि हम जब ‘रीति युग’ की बात करते हैं तो एक बात भूल जाते हैं या एक ही पक्ष पर हमारा आग्रह रहता है। रीतियों में से केवल एक रीति पर-जिसको यहाँ पर बात स्पष्ट करने के लिए दरबारी रीति भी कह सकता हूँ-दरबारी रीति पर हमारा सारा जोर रहता है। लेकिन रीति तो लोक-साहित्य में भी काम करती है-इसके बावजूद कि लोक-साहित्य का उस तरह कोई व्यक्तिगत रचयिता नहीं माना जाता।

किसी सीमा तक रीति परम्परा का एक अंग भी है-उसका साधन भी है। हाँ, उस रीति से निश्चय ही सीखा जा सकता है, उसकी पहचान भी बनी रहनी चाहिए। बल्कि हर नया आन्दोलन भी, आरम्भ में चाहे जितना विद्रोही भाव ले, जितना रीति-विरोधी मुद्राएँ अपनाये, धीरे-धीरे वह एक रीति गढ़ता है, फिर वह रीति ऐसी हो जाती है कि उसमें जड़ता आ जाती है, फिर उसके विरुद्ध आन्दोलन होता है। आज भी जो लिखा जा रहा है उसमें बहुत-सा ऐसा है कि या तो नयी रीति गढऩे में योग दे रहा है या रीति के अनुकूल चलने का प्रयत्न कर रहा है। वहाँ भी अपने निजी अनुभव की या कि वैसे गहरे तादात्म्य की कमी उसमें है, लेकिन रीति का निर्वाह करने का प्रयत्न है क्योंकि उससे सामाजिक स्वीकृति मिलने की आशा उसको होती है।

एक यह भी मेरे मन में प्रश्न उठता है कि साहित्य की जो भी रचनात्मक विधाएँ आज के युग में सक्रिय हैं, क्या ऐसा कहा जा सकता है-या ऐसा कहा जा सकता था-कि उपन्यास और निबन्ध ज्यादा सामाजिक विधाएँ हैं और कविता और कहानी ज्यादा आन्तरिक, ज्यादा निजी विधाएँ हैं; कि इसलिए उनसे अपेक्षाओं का धरातल भी एक जैसा नहीं हो सकता है। पहली बात तो यही कि क्या आप ऐसा मानते हैं?

आपको यहाँ टोकूँ जरा। आप कहानी को कविता से जोड़ रहे हैं और उपन्यास से अलग कर रहे हैं, यह किस आधार पर?

‘फार्म’ के आधार पर। मुझे लगता है कि कहानी अधिक कलात्मक विधा है और उसकी यह बड़ी भारी सीमा भी है।

या तो आप तीनों को अलग-अलग मान लें-उपन्यास से कहानी को तो अलग करें, लेकिन फिर कविता के साथ उसको कैसे जोड़ते हैं?

कविता के साथ इसलिए जोड़ता हूँ क्योंकि कहानी को एक प्रसंग विशेष, क्षण विशेष पर बहुत एकाग्र करना होता है। एक कौंध सरीखी लपट-सी उसमें...

लेकिन फ़र्क़ यह है कि कहानी में जरूर कुछ घटित होना चाहिए, जबकि कविता में कुछ घटित नहीं होता, कविता स्वयं घटित होती है।

हाँ, इतना अन्तर तो है ही। सिर्फ रचना-प्रक्रिया की दृष्टि से मुझे ऐसा लगा कि शायद ‘पर्सनल से’, कहानी और कविता ज्यादा निकट की चीज़ें हैं: और उपन्यास, नाटक शायद ज्यादा...

पर्सनल ऐसे तो जरूर कविता के निकट होता है। कहानी उधर भी हो सकती है और दूसरे छोर पर उपन्यास के निकट भी जा सकती है।

चलिए, यह मैं मान लेता हूँ। तो मैं यह पूछ रहा था कि जैसे कविता की या कि साहित्य मात्र की दो प्रकार की अपेक्षाएँ हैं-जितनी भी परिभाषाएँ हैं उनको मिला कर देखो तो दो प्रकार की अपेक्षाएँ सामने आती हैं। सारी परिभाषाओं का सार जो निकलेगा यह निकलेगा कि साहित्य जीवन की आलोचना है। एक तो यह निकलता है, दूसरे यह निकलता है कि नहीं, साहित्य एक छिपे हुए जीवन का, जीवन के उस मर्म का जो कि जीवन जीते हुए नहीं देखा जा सकता न अनुभव किया जा सकता है-कि साहित्य उस मर्म का उद्घाटन करता है; जीवन के हार्द में जो जीवन-प्रक्रिया है, उसका जो स्वरूप है उसको उद्घाटित करता है। तो ऐसा माना गया, जैसा मैंने कहा, कि ये दो ज्यादा सामाजिक विधाएँ हैं, ज्यादा समाज-निर्भर विधाएँ हैं, उपन्यास और कहानी। और कविता जो है वह जीवन के छिपे हुए मर्म को उद्घाटित करने वाली या अज्ञात का पता देने वाली है। क्या आप ऐसा मानते हैं।

और उसके साथ जुड़ा हुआ छोटा-सा प्रश्न यह कि क्या आप ऐसा समझते हैं कि आधुनिक रचना में यह बात काफ़ी दूर तक अप्रासंगिक हो गयी है और एक तरह से उलट कर कविता वह धर्म निभाने लगी है और उपन्यास यह धर्म निभाने लगा है?

लेकिन क्या आप ऐसा नहीं सोचते कि इस तरह का विभाजन तर्क की सुविधा के लिए किया जाता है? क्योंकि वास्तव में तो ‘जीवन की आलोचना’ और ‘जीवन के किसी गहरे मर्म का उद्घाटन या प्रकाशन’, ऐसा तो नहीं है कि एक से दूसरा बिलकुल बहिष्कृत हो जाता है। दोनों साथ चलते हैं। असल में मानव की चेतना कितने स्तरों पर एक साथ काम करती है इसकी अहम उपेक्षा करें तभी इस तरह का विभाजन आत्यन्तिक जान पड़ता है; नहीं तो लगातार हम गहराई में देखते हुए आलोचना भी कह रहे होते हैं और आलोचना कर रहे होते समय भी गहराई में देख रहे होते हैं। एक समय हमारा ध्यान एक तरफ़ केन्द्रित होता है या दूसरी तरफ़ केन्द्रित होता है, लेकिन प्रक्रिया में तो सभी चीज़ें साथ चलती रहती हैं। हम जीते भी हैं, और जिये हुए को याद भी करते हैं, और अर्थ भी खोजते हैं, जो अर्थ हमें मिलता है उसकी आलोचना भी करते हैं-आलोचना के आधार पर अर्थ खोजते हैं और खोज के आधार पर आलोचना करते हैं। ये इतनी ज्यादा साथ-साथ चलने वाली क्रियाएँ हैं कि विचार करने के लिए, सुविधा के लिए, हम उनको अलग करते हैं, लेकिन वास्तव में तो वे उतनी अलग नहीं होतीं। यह बात मैं आपकी मानता हूँ कि इस प्रकार की विचार की दो धाराएँ रहीं-एक जिसमें एक पक्ष पर बल दिया गया, दूसरी जिसमें दूसरे पक्ष पर बल दिया गया, लेकिन आत्यन्तिक रूप से ये अलग हैं नहीं। एक हद तक उनकी उपयोगिता है, बस। इतना ही मुझे लगता है। यह तो मैं नहीं मान सकता कि ऐसा उपन्यास नहीं हो सकता, या नहीं होता या नहीं होना चाहिए, जो कि गहराई से जीवन के ऐसे किसी मर्म का उद्घाटन करना चाह रहा हो जो साधारणतया हमारे सामने नहीं आता; या कि दूसरे पक्ष में काव्य जीवन की आलोचना न कर रहा हो।

क्या दो-टूक ऐसा सवाल सार्थक होगा कि आज आपको सबसे ज्यादा सम्भावनाएँ या सबसे ज्यादा जीवन्तता किस विधा में दिखाई देती है-हिन्दी में ही?

एक तो इसका सामान्य उत्तर है-कि सम्भावना सिद्धान्तत: हमेशा काव्य में ज्यादा जान पड़ती है। दूसरे यह होता है कि समय-समय पर समाज की जैसी अवस्था होती है या कि समाज के संवेदन का जो स्तर होता है, या कि किसी समय के जो रचनाकार होते है उनकी प्रवृत्ति जिधर होती है उससे अन्तर पड़ता है। इस दृष्टि से मुझे लगता है कि इस समय नाटक में कुछ नया काम भी हो रहा है और कुछ यह अनुभव भी सभी कर रहे हैं कि नाटक की सम्भावनाओं का पूरा उपयोग नहीं किया जाता रहा। पिछली दो तीन पीढिय़ों में तो उधर ज्यादा जोर है, उसमें विकास की भी ज्यादा सम्भावना है।

लेकिन अभी थोड़ी देर पहले पिछले प्रश्न में, आपने नाटक को भी शायद उपन्यास के साथ रख दिया था। जबकि मैं तो सोचता हूँ कि अगर नाटक को दूसरी तरफ़ रख कर-काव्य के साथ जोड़ कर विचार करें तो मुझे लगता है कि उसमें बहुत अधिक सम्भावनाएँ हैं जिनका उपयोग लगभग नहीं किया गया।

यही प्रश्न उठता है कि ऐसा क्यों नहीं हुआ। नाटक तो लिखे गये-बहुत सारे नाटक लिखे गये लेकिन किसी ने भी-जबकि यह सही है कि ‘अन्धा युग’ चाहे जिस कोटि का पद्य-नाटक हो, वह मंचित होकर सफल तो हुआ-लेकिन तब से क्यों नहीं जरूरत समझी गयी ‘पोएटिक ड्रामा’ की? जो कि निश्चित रूप से कविता में भी, नाटक में भी, एक गुणात्मक अन्तर उपस्थित करता-अगर पद्य-नाटक या गीति-नाटक में रचना होती तो। इसका कोई कारण आपके ध्यान में आता है कि ऐसा क्यों नहीं हुआ होगा? पहली बात तो यह कि हिन्दी में शुरूआत में नाटक का जितना आकर्षण था-शुरू-शुरू में नाटक बड़े आकर्षण का केन्द्र था, भारतेन्दु का सबसे ज्यादा उत्साह, सब से ज्यादा सर्जनात्मक ऊर्जा उसी में झलकती है-नाटक की शुरूआत तो बड़ी उत्साहपूर्ण थी, लेकिन उसके बाद तो बिलकुल चौपट हो गया नाटक ही।

देखिए, अगर आप भारतेन्दु के समय के नाटक की बात कर रहे हैं तो उसको संस्कृत की नाट्य-परम्परा के सन्दर्भ में देखना चाहिए या कि पारम्परिक नाटकके साथ देखना चाहिए। भारतीय नाट्य-परम्परा में यथार्थवादी नाटक का कभी महत्त्व नहीं रहा। एक-आध नाटक ऐसा हो सकता है जिस में कि नाटककार इस तरफ़ गया हो-मुद्राराक्षस जैसा या एक हद तक मृच्छकटिक जैसा भी-लेकिन यथार्थ जो दीखता है उसके पीछे जो ज्यादा गहरा कोई आशय छिपा हुआ रहता है उसको प्रकट करने या उसका उन्मेष करने की ओर नाटककार का ध्यान रहा। मैं समझता हूँ कि समकालीन नाटक-और शायद पूर्वी परम्पराओं से प्रभावित पश्चिमी परम्परा से वापस प्रभावित होता हुआ नाटक-फिर इस ओर थोड़ा आकृष्ट हुआ है कि यथार्थ की यथार्थवत् प्रस्तुति का आग्रह छोडक़र भी चला जा सकता है। बल्कि नाटक में कभी यह प्रयत्न होता ही नहीं कि चीज़ों को विश्वसनीय रूप में यथार्थवत् प्रस्तुत किया जाए। और ब्रेष्ट ने ही शायद इस बात पर पश्चिम में पहले-पहल इतने जोरों से आग्रह किया कि हम तो यह बोध मिटने ही नहीं देना चाहते हैं कि जो आप देख रहे हैं वास्तव में घटित नहीं हो रहा, यह नाटक ही है। तो यह पहचान पश्चिम में यथार्थवादी नाटक की प्रतिक्रिया के रूप में प्रकट हुई, लेकिन उनको प्रेरणा पूर्वी परम्पराओं से मिली थी-चीन की, या जापान की या भारत की परम्परा से। और क्यों कि उन्हें इधर से प्रेरणा मिली, इसलिए यहाँ का जो उस समय यथार्थवादी नाटक पर आग्रह करनेवाला भारतीय नाटककार था, उसने एक बार फिर उस अपनी परम्परा की ओर देखना भी गवारा किया। और अभी व्यवहार में यह बात नहीं उतरी है कि आप नाटक को ‘दृश्य काव्य’ मान कर कविता के निकट ला सकते हैं; लेकिन सिद्धान्तत: यह बात मानी जाती है, और लोग इसका कुछ अनुभव भी करने लगे हैं। शायद यही कारण है कि अभी वास्तव में काव्य-नाटक फिर से प्रकट नहीं हुआ है, होना चाहिए। अन्धा युग भी सफल तो हुआ, लेकिन उसमें भी जो उसकी वस्तु है-महाभारत से ली गयी-उसमें इतनी शक्ति है कि वहाँ नाटक के काव्य-रूप का भी उपयोग हो रहा है इस बात की ओर कम ध्यान था; उससे आगे क्या सम्भावनाएँ बनती हैं इसकी ओर भी बहुत कम ध्यान था। धर्मवीर भारती ने भी उससे आगे फिर नाटक नहीं लिखा, और दूसरे लोगों ने भी नहीं। बल्कि पुराना-वस्तु से भी-जिसमें इस तरह का शक्ति संचय होता है जिसका उपयोग किया जा सकता है-लेकर कम ही लिखा। उससे पहले तो कुछ लोगों ने लिखे थे-खंडकाव्य लिखे थे या छोटी नाटिकाएँ लिखी थी, ऐसे खंडकाव्य जिनका मंचीय रूपान्तर बड़ी आसानी से हो सकता था, लेकिन उसके बाद यह नहीं हुआ। शायद कठिनाइयों में एक कारण भाषा से सम्बद्ध भी है। प्रसाद की भाषा हम लोग अब स्वीकार नहीं करते क्योंकि वह साहित्यिक भाषा है, बोल-चाल की भाषा नहीं है। यह ज़रूरी नहीं है कि मंच की भाषा आज की बोल-चाल की भाषा ही हो, लेकिन अगर आप वस्तु की दृष्टि से भी बिलकुल नया कुछ कर रहे हैं तो फिर यह प्रयत्न होता है। एक चीज़ नयी कर रहे हैं तो उसके लिए जो चीज़ उतनी नयी नहीं है, परिचित है, उसको आधार बनाया जाए-सभी कुछ अपरिचित हो जाएगा तो और अधिक कठिनाई होगी। इसलिए भाषा में तो आग्रह यह रहता है कि आज की बोल-चाल के निकट रहे और वस्तु में कुछ उड़ान भी भरते हैं। जबकि अगर वैसी वस्तु है तो वह माँग करती है कि भाषा भी उसके अनुकूल होनी चाहिए। इससे थोड़ा डरते हैं लोग, हालाँकि कोई कारण नहीं है। मेरा तो जैसे पाठक में विश्वास है वैसे ही रंगमंच के दर्शक में भी विश्वास है कि उसको आप साथ ले चल सकते हैं और वह इस साहस-यात्रा में आपके साथ चलने को तैयार होगा; आपमें इतना सामथ्र्य होना चाहिए कि आपको साथ ले चल सकें।

लेकिन एक बात तो है। जैसा आपने कहा, इधर नाटक में काफ़ी नयी रचना हो रही है, लेकिन जो भी नयी रचना हो रही है नाटक में, उसमें जिसे आप यथार्थवादी कह रहे हैं वही प्रवृत्ति प्रमुख है। इसलिए इस नाटक-बहुलता से नाटक का या यथार्थ का भी कोई खास भला नहीं हो रहा है। इसी के साथ एक बात यह भी पूछना चाहूँगा कि क्या आप समझते हैं कि नाटक को अब भी संस्कृत की नाटक-परम्परा की दृष्टि से देखना चाहिए? यथार्थ के प्रति जिस प्रकार का दृष्टिकोण वहाँ था-गैर-यर्थावादी ढंग से यथार्थ को उजागर करना-क्या आप मानते हैं कि भारतीय मानस या साहित्य के साथ अब भी उसका सम्बन्ध वैसा ही है? या कि हिन्दी में संस्कृत की परम्परा से भिन्न एक-दूसरे प्रकार का मानस हो गया है, अधिक यथार्थवादी मानस-उसकी यथार्थ को देखने की या साहित्य में यथार्थ को ग्रहण करने की दृष्टि ही बदल गयी है?

ऐसा तो मैं नहीं मानता हूँ। मानव-स्वभाव इतना नहीं बदल गया है इसके बावजूद कि...

मानव-स्वभाव नहीं सांस्कृतिक स्वभाव।

नहीं, मैं नहीं समझता कि वह इतना बदला है। बात सन्दर्भ में ही रखिए। यह तो मान लेता हूँ और यह देखता भी हूँ कि बहुत-सी चीज़ों पर तो यथार्थवादी आग्रह है क्योंकि सांस्कृतिक मूल्यों में उस तरह का बदलाव आया है। लेकिन अप्रकट या अप्रकाशित ही सही, इस तरह की माँगें व्यक्ति में हैं-और दबकर उनमें शायद एक शक्तिका संचय कुछ अधिक हो गया है-जो अधूरी रह जाती है और जिनको इस तरह का नाटक पूरी कर सकता है। आपने कहा कि इधर जो नाटक लिखे जा रहे हैं वे सब यथार्थवादी आग्रह के अनुरूप ही हैं। एक तो यह बात ध्यान में रखिए कि नाटक की परम्परा विशेष रूप से हिन्दी में लगभग मिट ही गयी थी। एक तो पहले नाटक को फिर से समाज में कोई स्थान दिलाना है, जो अब फिल्म और टी.वी. की प्रतियोगिता में आसान काम नहीं है। यह नहीं है कि फिल्म या टी.वी. नाटक की आवश्यकता को बिलकुल मिटा दे सकते हैं; लेकिन इस काम को कठिन वो जरूर बना देते हैं। फिर यह भी है कि उसको फिर से स्थापित करने के लिए आपको शायद ऐसा भी करना हो-या कम से कम यह तर्क आकर्षक जान पड़े-कि पहले जो सामान्य फिल्म देखने वाला है और जो सम्भाव्य नाटक देखने वाला हो सकता है, पहले उसकी रुचि को ध्यान में रख कर आप वास्तविकता को या कि जीवन के बहिरंग को प्रस्तुत करें जिसके सहारे वह आगे बढ़ सकता है, और जिस दूसरे प्रकार के नाटक की बात हो रही है (जो यों भी अल्पसंख्यक और ज्यादा संस्कारी दर्शक के काम का हो सकता है), उस पर बाद में ध्यान देंगे। लेकिन मैं समझता हूँ कि ऐसा सोचना ठीक नहीं है, दोनों साथ ही साथ चलने चाहिए। यह मान कर भी कि उस तरह के संस्कारों वाला व्यक्ति समाज में अल्पसंख्यक होगा, लेकिन समाज की मूल्य-दृष्टि की स्थापना में उसका महत्त्वपूर्ण योग होता है और कुछ साहस करके आगे बढऩे की प्रवृत्ति भी उसमें ज्यादा हो सकती है। इसलिए उसकी संख्या कम होने के कारण ही उसको इतना हेय नहीं मान लेना चाहिए। तो काव्य-नाटक के लिए जगह है और यह लिखा जाना चाहिए, लिखा ही नहीं प्रस्तुत किया जाना चाहिए, ऐसा मैं मानाता हूँ।

अब इस बात को थोड़ा-सा एक दृष्टान्त की मदद से देखें। उन दो-चार नाटकों में जिनमें यह महसूस किया जा सकता है कि यथार्थ से उस तरह का सम्बन्ध बना, गैर-यथार्थवादी नजरिये से-जो सिर्फ सतही यथार्थवादी नाटक नहीं है-जैसे ‘हयबदन’-उनसे भी एक दूसरी तरह का असन्तोष मन में होता है। आप को ऐसा लगता है कि यहाँ ‘बैताल पच्चीसी’ की उस कहानी के साथ वैसा सीधा सम्बन्ध नहीं है, बल्कि एक अप्रत्यक्ष सम्बन्ध है। यों तो कहा जा सकता है कि यह स्वाभाविक ही है; कि हम बहुत-सी अपनी चीज़ों को अगर ज्यादा प्राणवान सभ्यता से परावर्तित हो गए रूप में ग्रहण करते हैं तो इस में बुरा क्या है? उस तरह से उसमें बुरा कुछ नहीं है। लेकिन एक रचनाकार के लिए, एक नाटककार के लिए आखिर ‘हयबदन’ नाटक देखने वाला भी उसके प्रति किस तरह से प्रतिक्रिया करेगा? वह शायद एकाएक दोनों का सम्बन्ध ही न देखे-ज़रूरी नहीं है कि उसको अतीत की उस कहानी की याद उस सन्दर्भ में आये ही। क्या आप नहीं समझते कि ‘हयबदन’ की समस्या मनोवैज्ञानिक स्तर पर ‘रेड्यूस’ हो गयी है, जबकि मूल कहानी की टैकार ज्यादा है।

मूल कहानी की बात आप कहते हैं तो उसके और हयबदन के बीच एक सीढ़ी तो और है-और वह भी पश्चिमी सीढ़ी है।

वही मैं कह रहा था। ‘ट्रांसपोज्ड हेड्स’ के जरिये ही मैं बात कर रहा हूँ।

लेकिन उससे क्या होता है? जिसको आप सीधा सम्बन्ध कहते हैं, साहित्य से तो वैसे सीधे सम्बन्ध कभी बनते नहीं हैं। अगर कभी सीधा सम्बन्ध बनता भी है तो उससे परे उसके जो अकल्पित, अप्रत्याशित और शायद अपूर्वानुमेय प्रभाव होते हैं वही तो ज्यादा महत्त्व रखते हैं। कोई प्रभाव किस-किस तरह काम करेगा, यह बहुत कुछ तो ग्रहीता पर निर्भर करता है, उसके समाज पर निर्भर करता है। तो इसकी इतनी अधिक चिन्ता क्यों होनी चाहिए कि सीधा प्रभाव हो या सीधा सम्बन्ध बने?

देखिए, यह दो स्तरों पर ‘डेरिवेशन’ हो जाता है। जिस प्रकार का सम्बन्ध किसी भी ‘मिथ’ से आप जोड़ते हैं तो वह क्यों जुड़ता है? आपको अपनी आत्म-स्थिति की कोई परिभाषा या कोई स्पष्टतर व्याख्या या कोई उजाला मिल सकता है इसीलिए तो...

न, न; यह कारण नाकाफ़ी है। जुड़ता इसलिए है कि एक तो आपको सीधा सम्बन्ध दीखता है। दूसरे उसके साथ-साथ बहुत-से स्वयं अपने में अलक्षित या कम से कम अनभिव्यक्त प्रश्नों के साथ उतने ही अनभिव्यक्त उत्तर या कि अलक्षित आयाम जो कि कथा में या पुराण-वस्तु में हैं वे भी जुड़ते जान पड़ते हैं। तो एक स्तर पर जो प्रकट है उसका प्रकट वस्तु से सम्बन्ध होता है। दूसरे स्तर पर एक पहचान उभरती है कि इसके नीचे मुझमें कुछ छिपा हुआ था जो कि इस कथा के पीछे छिपे हुए के साथ अपना सम्बन्ध बना रहा है। वह सम्बन्ध ठीक-ठीक क्या है, उसको हम सीधे-सीधे शब्दोंमें नहीं कह सकते; लेकिन जानते हैं कि एक और स्तर पर सम्बन्ध बन रहा है। और उसकी शक्ति असल में वही है, और वहीं पर है।

क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि लिखे हुए शब्द की बजाय बोले हुए शब्द के प्रति ही आज भी हमारी जनता, साधारण पढ़े-लिखे लोग भी ज्यादा संवेदनशील हैं? क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि जिसे कहते हैं ‘लिटरेरी कल्चर’, साहित्यिक संस्कृति, साहित्य के प्रति ज्यादा रुझान, ज्यादा व्यसन-वैसा आज भी नहीं हो पाया है?

एक हद तक तो हमेशा ऐसी स्थिति रही है। मेरा खयाल है कि कोई नयी बात अगर है तो यही है कि हम एक बार फिर से पहचान रहे हैं इस बात को। नहीं तो पढ़े-लिखे व्यक्तियों में भी हमेशा वाचिक अभिव्यक्ति का महत्त्व रहा है।

आपकी नजर में क्या यह सम्भव है कि कोई आदमी समाजवादी भी हो और जीवन-जगत के प्रति अत्यन्त धार्मिक दृष्टिकोण रखना भी उतना ही अनिवार्य पाये? क्या इसमें परस्पर विसंगति नहीं है?

विसंगति तो हो सकती है। लेकिन विसंगति हो हमेशा सम्भव है न! ऐसा होना सम्भव है, यह तो हम प्रत्यक्ष ही देख रहे हैं-क्योंकि अधिकतर समाजवादी तो ऐसे ही हैं। और उतनी गहरी विसंगति भी तो नहीं है-कुछ एक विशेष प्रकार के समाजवादियों को छोडक़र। समाजवादी होना ज़रूरी तौर पर धर्म से कटे हुए होना है, यह तो सिद्ध नहीं होता। लेकिन समाजवादी के मूल में अगर भौतिकवाद हो और उस भौतिकवाद के मूल में अनीश्वरवाद हो, तब तो यह सवाल उठ सकता है।

मैं इसी सवाल को दूसरे रूप में रखूँ। क्या समाजवादी होना एक ‘नो-मैन्स लैंड’ में होना नहीं है। अगर समाजवाद की उसकी तार्किक परिणति पर ले जाते हैं तो वह माक्र्सवाद या कि कम्युनिज़्म हो जाता है। उसका एक धर्म जैसा तन्त्र है और उसी अनिवार्यता के साथ वह उसको लागू करता है। तो मुझे लगता है कि जो कम्युनिस्ट होता है उसको एक प्रकार के धार्मिक भावावेग का और ‘कमिटमेंट’ का भी लाभ मिल जाता है और उसकी शायद धार्मिक वृत्ति भी कुछ सन्तुष्ट हो जाती होगी।

अब आप उसको उसका लाभ कहिए या कहिए कि उसके जिस तरह के पूर्वग्रह होते हैं, या कि असल में तो उसकी कमजोरी है इस तरह का धार्मिक मताग्रह, वह भी उसके काम आ जाता है। इस अर्थ में तो उसको लाभ मिल जाता है। या कि वह उसका उपयोग कर लेता है; इसके लिए एक बहाना या रास्ता पा लेता है कि उतना ही कट्टर मताग्रह भी बना रहे जो कि मतवाद के साथ होता है और साथ ही साथ बुद्धि का,तर्क का आग्रह भी निभ जाए। लेकिन समाजवादी के जो मूल्य हैं उनके लिए जरूरत तो नहीं है कि आप ईश्वर को या आत्मा को अमान्य करें। क्यों ज़रूरी है? यह भी ज़रूरी नहीं है कि उसकी मार्क्सिस्ट परिणति ही हों।

साहित्य में भी जितना समाजवाद प्रतिफलित हुआ है उसका दृष्टान्त अगर आप लें तो बर्नाड शॉ में, या कि ‘1984’ के लेखक तक को लें-ऐसा एकाएक नहीं कह सकते कि यह धार्मिक दृष्टि...

हाँ इतना जितना राजनीतिक समाजवाद इतिहास का आधार लेकर प्रतिफलित हुआ है, वह एक है। लेकिन अगर आप देखें कि किन लोगों ने वैसा जीवन जिया और समता के आदर्श निबाहे, तो आप पाएँगे कि उनमें सन्त लोग बहुत थे।

हाँ, यह बात तो है। लेकिन अब यहीं पर बुनियादी सवाल खड़ा होता है कि क्या समाजवाद की मूल प्रेरणा इतिहासवाद से ही नहीं निकलती है? अगर नहीं निकलती है तो फिर आप यह कह रहे हैं कि इतिहास को बहुत महत्त्व न देने वाली जो परम्पराएँ हैं उनमें भी समाजवाद का एक नया चिन्तन, एक भिन्न प्रस्थान प्रकट हो सकता है।

हाँ, यही कह रहा हूँ कि ऐसा हो सकता है। और समाजवाद के जितने भी मूल्य हैं वे सब वहाँ से भी सिद्ध हो सकते हैं, उस आधार पर भी एक समतावादी समाज सिद्ध किया जा सकता है और जिया जा सकता है, ऐसा समाज जिसमें कि सरकार की पीठिका नगण्य हो या कि क्रमश : अधिकाधिक नगण्य होती जाए।

इस पर फिर मेरे दिमाग में यह सवाल, प्रतिप्रश्न पैदा होता है कि क्या यह समाजवाद की नयी कल्पना या नया आधार, दर्शन जो प्रस्तुत होगा, वह कहीं पश्चिम में जैसे समाजवाद के शुरू के जो चिन्तक थे, जिनको ‘यूटोपियन’ कहते थे, यह क्या उधर जाएगा? या उससे किस तरह से भिन्न होगा?

आप कह लीजिए। आज हम जिस दुनिया में जी रहे हैं उसमें समता पर आधारित समाज तो एक यूटोपियन कल्पना ही है। ऐसा कोई समाजवादी देश नहीं है जहाँ पर कि वास्तव में वैसी समता होती हो, वैसी स्वाधीनता होती हो, जिसकी उन लोगों ने कल्पना की थी। सिद्धान्तत: समाजवादी भी उनकी बात तो करते हैं लेकिन ऐसे ही भविष्य में करते हैं। तो भविष्य में ऐसा हो जाएगा जब कि हमारी सारी प्रवृत्तियाँ उसके विरुद्ध हैं-यह तो एक तरह का यूटोपियन चिन्तन है ही। उनलोगों को आप यूटोपियन कहते हैं क्योंकि उनकी कल्पना का देश कहीं नहीं है। देश तो आपकी कल्पना का भी कहीं नहीं है, पर आप का दावा है कि एक काल्पनिक काल में वह जरूर वास्तविक होगा। स्वप्न-काल वैज्ञानिक है, स्वप्न-देश काल्पनिक, यह कहने का क्या आधार है? लेकिन अपने देश में गाँधी जी ने जिस तरह का चिन्तन किया था और उनके बाद उसी दिशा में थोड़ा-बहुत विचार हुआ और पश्चिम में इधर परिवेश को लेकर या इकालाजी की समस्याएँ उठा कर जिस तरह का चिनतन हुआ है वह भी एक हद तक आप कह सकते हैं कि यूटोपियन है। पर मूल्यों की अवधारणा करनेवाला मानव आदर्श क्यों नहीं गढ़ सकता?

लेकिन पहले वाले ‘यूटोपियनिज़्म’ से तो वह भिन्न होगा ही। तो क्या इसमें वास्तविक परिस्थितियों की चुनौती है?

उससे तो भिन्न है। और उसके साथ यह आशा भी है, यह बोध भी है कि यद्यपि अभी तक यह एक कल्पना है लेकिन अगर हम इस कल्पना को साकार करने की तरफ़ अपना प्रयत्न नहीं बढ़ाते तो क्रमश: हमारी अवस्था हीन और हीनतर ही होती जाएगी।

क्योंकि आखिर गाँधीजी की जो रामराज्य वाली कल्पना थी वह खाली एक धार्मिक ‘सेंटिमेंट’ नहीं था। उनके शेष कर्म से मिलाकर देखने के लिए एक प्रेरणाप्रद विचार तो था ही। यह तो दूसरे चिन्तकों का, जो अपने को चिन्तक समझते हैं उनका दायित्व है कि वे अपने को विकसित करें। तो आपको समाजवादी चिन्तक ऐसे लगते हैं कि उन्होंने गाँधीजी के विचार को या गाँधीजी की दिशा के विचार को भारतीय परिस्थितियों के मुताबिक, सामाजिक समता के विचार को विकसित किया हो आज की बौद्धिक जटिलताओं के बीच में-सांस्कृतिक जटिलताओं के बीच में -सांस्कृतिक जटिलताओं के बीच में?

मुझे तो यह लगता है कि आपने जिन यूटोपियनों की बात की-उस समय के यूटोपियन और उस समय के अनार्किस्ट, जो अराजकतावादी थे, अब आज फिर से वे तो नहीं आएँगे। लेकिन आज चिन्तन की जो नयी दिशा है वह भी कुछ अनार्किस्ट नहीं तो कम से कम राज्य-विरोधी तो है ही और उस हद तक यूटोपियन भी है। एक तो बात यह है कि आप भविष्य की कल्पना करके उसके आधार पर वर्तमान को बदलते हैं तो यह यूटोपियन मार्ग ही है। और वर्तमान का संकट देखकर आप एक भविष्य की कल्पना करते हैं और हमेशा वर्तमान पर आग्रह करते हुए ही यह सोचते हैं कि हमें ऐसा भविष्य नहीं चाहिए, ऐसा चाहिए- तो हमारा वर्तमान में कुछ दूसरी तरह का प्रयत्न होता है। और मैं समझता हँ कि आज इकालाजी को लेकर जो चिन्ता है वह वर्तमान परिस्थिति में से ही निकली हुई चिन्ता है।

इसके अलावा क्या आपको ऐसा नहीं लगता है कि यह जो ‘यूटोपियनिज़्म’ है या कि भविष्य की कल्पना करने की आदमी की मूल किस्म की प्रवृत्ति है, उसके दो रूप हो सकते हैं-एक तो वह जो कि इतिहास को महत्त्व देने वाला रूप है और दूसरा वह जो अनैतिहासिक मानसिकता या अनैतिहासिक दृष्टि का भी ‘यूटोपियनिज़्म’ हो सकता है, यानी हेनरी मूर जैसा ‘यूटोपियन’ या प्लेटो जैसा ‘यूटोपियन’। उसके भीतर दूसरी चिन्तनात्मक या कार्मिक सम्भावनाएँ हो सकती है, और रामराज्य जैसा जो कान्सेप्ट है उसकी दूसरी प्रवृत्ति भी हो सकती है।

अब बातचीत तो साहित्य से ही शुरू हुई थी और साहित्यिक समस्याओं की ही चर्चा हम लोग कर रहे थे। फिर एकाएक हम लोग वैचारिक समस्या में खास तौर पर राजनीति में चले गये। तो इन दोनों को मिलाते हुए इसका समापन किया जाए। इस परिस्थिति का क्या कारण है कि राजनीति में जो दल या जो दर्शन सब से कम फलवान सिद्ध हुआ या सब से कम जिसकी जड़ बन पायी, साहित्य में उसका एक घटाटोप-सा दिखाई देता है?

कैसे?

जैसे यही कि आज जो भी पत्रिकाएँ-पहली बात तो यही कि बुरे सेंस में विकेन्द्रीकरण हो गया है, कोई पत्रिकाएँ नहीं हैं, कोई केन्द्रीय रुचि की या ऐसी पत्रिका जिसमें छप कर आदमी को यह लगे कि किन्हीं साहित्यिक मानकों के आधार पर उसकी रचना को स्वीकार किया गया है या कि जिसमें छपना युवा लेखक के लिए उस तरह का सन्तोष दे सके। लेकिन जो भी पत्रिकाएँ आपके पास हैं, आज कोई भी पत्रिका उठा कर देखिए तो उसमें जिस प्रकार के यथार्थवादी आग्रह काम कर रहे हैं-हर लेखक कहीं न कहीं माक्र्सवाद के आतंक में है या उसके प्रभाव में लिख रहा है। अब यह वास्तविकता है कि नहीं पता नहीं, लेकिन ऐसा भ्रम तो आखिर खड़ा हो ही जाता है। लेखकों के ही संगठन भी-(पहले हुए भी होंगे, लेकिन एक प्रकार से यह ‘रिसर्जेंस’ ही है) प्रगतिशील संगठन, जनवादी संगठन, लेखकों के और संगठन भी-एक तरह से राजनीतिक पार्टी के ‘विंग’ की तरह ही बन रहे हैं। तो एक ऐसी स्थिति सामने है कि लगता है इसको अगर साहित्य का प्रमाण माना जाए तो किसी बाहर के आदमी को ऐसा भ्रम हो सकता है कि जैसे कि देश में सबसे प्रचलित, लोकप्रिय और प्रभावी राजनीतिक-दर्शन ‘कम्युनिज़्म’ ही है।

देखिए, उनका तो चिन्तन यही है कि संघर्ष के अनेक मोर्चे है जिनमें एक मोर्चा लेखन वाला है; उनको भी मोर्चे की तरह से संचालित करना है। इसका भी उपयोग उनके उन्हीं उद्देश्यों के लिए करना है जो कि साहित्यिकउद्देश्य नहीं है। तो वे जो कर रहे हैं वह उनके दर्शन के भीतर तो समझ में आता है। आप नये लेखक की बात सोचें जो उस दर्शन से परिचित नहीं है या उसका मानने वाला नहीं है; तो वह भी कुछ उधर झुकता है तो इसलिए नहीं कि उसकी वास्तविक सहानुभूति उधर होती है। उसे कोई रास्ता नहीं मिलता, और इस तरफ़ दीखता है कि ‘अगर मैं इसके साथ जुड़ जाऊँ तो सफलता का या लोगों के सामने आ जाने का एक उपाय यहाँ से मिल सकता है और यहाँ से मुझे अभिव्यक्ति का एक माध्यम भी मिल जाएगा और थोड़ी-बहुत प्रशंसा भी मिल जाएगी’, तब... इस समय तो यही हो रहा है। सम्भव है कि बाद में यह प्रभाव उसके चिन्तन पर भी पड़े-या इससे उलटा भी हो-लेकिन पहले सफलता पाने के लिए या कि लोगों का ध्यान आकृष्ट करने के लिए एक उपयोगी और तात्कालिक रास्ता उसको इधर दीखता है। कह सकते हैं कि यह तो उसके द्वारा एक परिस्थिति का उपयोग है और इस संगठन के द्वारा उसकी प्रतिभा का उपयोग है। यह दो-तरफ़ा दोहन तो हो रहा है। साहित्य के लिए यह कोई बहुत स्वस्थ स्थिति नहीं है, यह तो स्पष्ट है। स्वस्थ स्थिति वह होती है जिस में कुछ-एक पत्रिकाएँ नहीं तो कम से कम एक पत्रिका ऐसी हो जिस का यह दावा हो कि साहित्य के अमुक मानदंड हैं-इस तरह का पत्र बहुत अधिक तो नहीं, लेकिन थोड़ा-सा अनुदार तो होगा ही क्योंकि उसको प्रतिष्ठित परम्पराओं पर आग्रह करना है-एक ऐसी पत्रिका हो और लोग मानते हों कि यह प्रतिष्ठित पत्रिका है; और दूसरी तरफ़ अनेक छोटी-छोटी पत्रिकाएँ ऐसी हों जो इसके विरुद्ध आग्रह कर रही हों कि नहीं, ये प्रतिमान अब पुराने पड़ गये हैं और हमें उनको बदलना चाहिए, और लगातार उस पर सब तरफ़ से छोटे-मोटे आक्रमण भी करती रहें और ऐसी नयी रचनाएँ प्रस्तुत करती रहें जो उनके विद्रोह का समर्थन करें। साहित्य के लिए यह स्वस्थ स्थिति होती है कि एक तरफ़ प्रतिमान हो, प्रतिमानों का एक आग्रह हो; और उसके विरुद्ध अधैर्य भी हो। वह तनाव सर्जनात्मक होता है। जब वैसे प्रतिमान कोई रहें ही नहीं और विरोध का हल्ला हो तब तो एक तरह की अराजकता होती है जो कि स्वस्थ नहीं है। वैसी अराजकता की स्थित में हम आ गए थे। और उसमें यह एक दूसरा अनुशासन आया है जो कि बाहर का अनुशासन है, राजनीति का अनुशासन है; जो इस परिस्थिति का उपयोग अपने राजनीतिक हित के लिए कर रहा है। यह तो स्वस्थ स्थिति नहीं है, वास्तविक स्थिति जरूर है। और अगर लोग समझ सकते हैं कि ऐसा हो रहा है तो नया लेखक भी शायद यह समझ सकता है कि उसका इस्तेमाल दूसरों के साहित्येतर उद्देश्यों के लिए किया जा रहा है और उसके प्रति सतर्क हो सकता है। लेकिन आज लोग जल्दी में तो रहते ही हैं और उनको जल्दी कुछ न कुछ परिणाम चाहिए। यह स्थिति तो है ही।

खालिस समाजशास्त्रीय कारण ज्यादा प्रमुख है बनिस्पत इस शुद्ध राजनीतिक कारण के? आपके उत्तर से ही इसी से लगा प्रश्न मेरे मन में बन रहा है। वह यह कि क्या आप ऐसा नहीं समझते कि ज्यादा फलदायक या स्वस्थ जीवन-दर्शन वह होगा जिसमें कि सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्रों में तो विकेन्द्रीकरण को स्वाभाविक मान लिया जाए, उस पर बल दिया जाए; लेकिन धर्म में और साहित्य में किसी सीमा तक केन्द्रीकृत होना सबसे ज्यादा अच्छा हो?

विकेन्द्रीकरण को भी स्वाभाविक मानना कठिन है और केन्द्रीकरण भी एक सीमा तक ही है। दोनों ही प्रवृत्तियाँ समाज में काम करती रहनी चाहिए। एक केन्द्र का बोझ भी होना चाहिए और विकेन्द्रित काम के लिए गुंजाइश भी होनी चाहिए, उसके लिए संघर्ष की भी गुंजाइश होनी चाहिए; संघर्ष भी होते रहना चाहिए। जैसा मैंने कहा, एक ऐसा पत्र हो या कहिए कि ऐसा प्रतिष्ठान भी हो जो प्रतिष्ठित मूल्यों पर आग्रह करे और दूसरी तरफ़ उसके विरुद्ध आन्दोलन भी हो, अधैर्य भी हो। यानी एक केन्द्रीय प्रवृत्ति भी हो ओर एक विकेन्द्रीकरण का आग्रह भी हो। यह तो स्वस्थ स्थिति है। समाज में इस तनाव का रचनात्मक परिणाम होता है।

हाँ, ये दोनों प्रवृत्तियाँ साथ-साथ चलनी ही चाहिए। क्या आप ऐसा नहीं सोचते कि जो आप साहित्य के बारे में कह रहे हैं वही कहीं भारत की राजनीतिक परिस्थिति पर, उसके आदर्श या यथार्थ पर लागू होता है?

हाँ, वह भी है। हमारे समूचे इतिहास में यह चीज़ रही है और इनके बीच का जो तनाव रहा है उसकी रचनात्मक सम्भावनाएँ रही हैं।

उदाहरण के लिए जो कुछ स्वातन्त्र्य-पूर्व युग में घटित हुआ, सत्याग्रह युग में या उससे पहले भी, क्या ऐसा नहीं लगा कि देश के मन में ही बहुत वास्तविक और स्वाभाविक कारणों से एक विभाजन, था, बहुत ही सत्य, बहुत ही सच्चा-एक विविधता थी या कह लीजिए एक आत्म-विभाजन था। जीवन की नयी सम्भावनाएँ, रचनाशीलता, किसी को पश्चिम के नये चिन्तन की तरफ़ जाने में दिखायी देती थी-सिर्फ पश्चिम के तर्क से नहीं बल्कि समूचे संसार के तर्क से, प्रगति के तर्क से-और उसी मानस के अन्दर कहीं अपनी जड़ को पकडऩे की और बह न जाने की, अपने सांस्कृतिक और आध्यात्मिक और धार्मिक मूल्यों पर जोर देने की जरूरत भी महसूस हो रही थी। तो क्या राजनीति में इस प्रकार का ध्रुवीकरण सम्भव था? कि जैसे एक नेहरुई पार्टी होती, एक गाँधी वाली पार्टी होती जिनका स्पष्ट ध्रुवीकरण हो सकता-और इस धु्रवीकरण से ही एक ऐसी राजनीतिक उथल-पुथल होती, हमारे मानस की जो वास्तविकता थी उसी के मुताबिक हमारी राजनीतिक गतिविधियाँ भी चलतीं और दलों का इतना बिखराव नहीं होता? मेरे कहने का मतलब यह है कि जो ‘पार्लियामेंटरी डेमोक्रेसी’ का एक ‘माडल’ हमने उठाया और सही कारणों से उठाया, इसके व्यवहार की भी तो नकल की जा सकती थी-कि दो पार्टियों से कैसे बढिय़ा चलता है। तो वैसा क्यों नहीं हुआ होगा-याकि अब ऐसी कोई सम्भावना आपको दीखती है-इस नये सबक के बाद?

सम्भावना तो अब नये सबक के बाद दीखती है-लेकिन इसको सबक अभी कैसे कहें जब तक कि इसका प्रमाण नहीं है कि वह सीख लिया गया है! लेकिन संकेत तो उसका यही है कि यह चीज़ सीखनी होगी। तो अगर सीखें-जब जनता पार्टी का शासन हुआ तब भी एक अवसर था कि यह शिक्षा ग्रहण की जाती; लेकिन वह सबक नहीं सीखा गया-तो अब भी आशा की जा सकती है।

आपको ऐसा नहीं लगता कि गाँधीजी के अलावा या गाँधीजी के साथ-साथ और भी जो कुछ चिन्तन राजनीति में सक्रिय लेागों ने किया पिछले पचास वर्षों में-लोहिया, अच्युत पटवर्धन, आचार्य नरेन्द्र देव, जयप्रकाश नारायण या एम.एन.राय भी, तो उनके विचारों का एक पुनर्मूल्यांकन जैसा करने की जरूरत है?

पुनर्मूल्यांकन करने की जरूरत है। उसको सन्दर्भ में रखकर देखने की भी जरूरत है। और विशेष रूप से यह जो केन्द्रीकरण का या केन्द्रोन्मुखता का आग्रह था और जो केन्द्र विमुख या विकेन्द्रित स्वायत्त जीवन का आग्रह था, इन दोनों के बीच जिस तरह का सन्तुलन बना रहा-महाभारत के समय से ही देखें तो वही स्थिति रही कि एक तरफ़ आग्रह था कि एक शक्तिशाली केन्द्र होना चाहिए और दूसरी तरफ़ यह था कि जो विकेन्द्रित और स्वायत्त समाज है उनकी स्वायत्तता भी बनी रहनी चाहिए। कृष्ण को अगर एक राजनीतिक कूटनीतिक व्यक्ति के रूप में देखें तो भी यह स्पष्ट होता है कि वह भी यही कर रहे थे-एक तरफ़ समाज में केन्द्रीकरण भी कर रहे थे और दूसरी तरफ़ ऐसी स्थितियों से बच भी रहे थे जिनमें कि टकराहट हो। भारत के इतिहास में सबसे रचनात्मक प्रभाव इसी चीज़ का रहा है कि इन दो के बीच जो तनाव है उसका सही उपयोग किया जाए और इस तनाव को मिटा कर किसी एक पक्ष की सम्पूर्ण विजय न होने दी जाए।

मेरा खयाल है यह सही बात है।

तो आपकी इस बात से मैं यह अर्थ ग्रहण करूँ कि न केवल हमारे निकट इतिहास के अनुभव का ग्रहण और मूल्यांकन बल्कि इतिहास या साहित्य का भी बहुत तात्कालिक सन्दर्भों में और बड़ी निपट सांस्कृतिक आवश्यकता की प्रेरणा से अध्ययन होना चाहिए?-न केवल निकट इतिहास का बल्कि जिसे हम ‘मिथ’ कहते हैं उसका भी?

हाँ, उस स्तर तक हो सकता है और उसमें यही पाएँगे कि एक तरफ़ इसमें अनेक केन्द्रीय समाज और संसार की कल्पना है और उसका सफल व्यवहार है; और दूसरी तरफ़ यह आग्रह है कि सब-कुछ एक है और एक ही केन्द्र है और इन दोनों का सहज सन्तुलन यहाँ निभता चला गया है। इसी को मैं समझता हूँ कि हमारी प्रतिभा की विशेष देन की भावना चाहिए।

क्या कभी-कभी एक बात विचित्र-सी नहीं लगती? कभी भारत ने जहाँ से शुरू किया और आगे बढ़ा, और उधर पश्चिम ने जहाँ से शुरू किया और आगे बढ़ा-ये दो बिलकुल विपरीत दिशाएँ और गतियाँ थीं। आज का सबसे बच्चा ‘सायंस’, सबसे हाल का ‘सायंस’ यह पर्यावरण-विज्ञान है, इसे देखें या ‘एन्थ्रोपालाजी’ (नृतत्व) को देखें-विज्ञान अपने निष्कर्षों से हमें उस किस्म के बोध सा संवेदन की ओर ले जाते हुए प्रतीत होता है जिसकी ओर भारत का ‘मिथिक माइंड’ शुरू से ही संकेत करता रहा?

जहाँ से हमने आरम्भ किया था? ऐसा कह लीजिए। एक व्यापक परस्पर-निर्भरता का बोध फिर हो रहा है-बिलकुल दूसरे कारणों से।

तो कहीं इसका भयंकर परिणाम यह तो नहीं निकलता कि अगर ऐसा है तो यह ऐतिहासिक नियम है, अनिवार्यता है, कि अब वे तो इधर रह आवें, स्वस्थ हों, और हमें उनकी पूरी इतिहास-प्रक्रिया में से गुजरना पड़ें, जो उन्होंने भोगा है वह हम भुगतें?

नहीं, यह परिणाम तो नहीं निकलता! लेकिन जो समस्या या कि शंका हो सकती है वह यह कि अगर उनकी संस्कृति अभी तक प्राणवान् संस्कृति है, तब वह इस नयी स्थिति को देख कर, इस जोखम को उठाकर, अपने लिए नया रास्ता बनाएगी जो कि उसी संस्कृति का नया रास्ता होगा। लेकिन अगर उसमें ऐसी प्राणवत्ता नहीं रही है और आत्म-विश्वास खोकर वह एक पराया रास्ता अपनाती है, चाहे हमारा ही रास्ता-जैसा कि हम भी कर रहे हैं, आत्म-विश्वास खोकर उनके रास्ते पर चल रहे हैं-तब जरूर एक खतरनाक स्थिति होगी। लेकिन अगर हममें भी यह पहचान जागती है कि हमारा रास्ता गलत नहीं था, कि कोई कारण नहीं है कि हम आत्म-विश्वास खो बैठें और ऐसा रास्ता अपनाएँ जिसकी गवाही हमारा अनुभव नहीं देता, या अगर हम रास्ता बदलें भी तो इसी कारण बदलें कि वह हमारा नया रास्ता है, तब तो इसमें कोई जोखम नहीं है। इसकी सम्भावनाएँ तो एक ऐसे साक्षात्कार की भी हैं जिसमें दोनों के लिए नयी दृष्टि मिल सकती है।

लेकिन फिर जो विश्व-संस्कृति का स्वप्न दिखाया जाता है उसमें तो यह एक तरह से अनिवार्य मान लिया जाता है कि अत्यन्त विरोधी स्वभाव की संस्कृतियों में भी, अत्यन्त भिन्न प्रस्थान-बिन्दुओं से परस्पर प्रेरित संस्कृतियों का भी परस्पर पास आना और अन्तत: एक हो जाना अनिवार्य है और ‘विश्व-सभ्यता’, ‘विश्व संस्कृति’ जैसी कोई एक चीज़ इसी तरह निर्मित होगी। तो आप यह मानते हैं कि ऐसा भी तभी होगा जब कि ये दोनों संस्कृतियाँ अपने-अपने तर्क और अपने भीतरी तर्क से भी अपना मार्ग ढूँढेंग़ी?

हाँ। अपने अनुभव को जीते हुए और अनुभव के सहारे जीते हुए वे इस तरह के एकीकरण की ओर बढ़ती हैं तो ठीक है। यह सारा जितना जैसा विकास हो रहा है, उससे कई समाज एक-दूसरे के निकटतर आ रहे हैं, प्रभावों का एक दबाव भी पड़ रहा है, उसकी तेजी भी बढ़ती जा रही है। और इन सभ्यताओं में जो प्राणवान् हैं वे प्रभावों को बड़ी आसानी से ग्रहण करके अपना बना लेती हैं। और जिनमें प्राण कम हैं, जो कि वैसे ही मुरझा रही थीं, लगभग मर रही थीं, वे बिलकुल आत्म-समर्पण करके दूसरे में डूब जाती हैं, खो जाती हैं।

एक दृष्टि से, बड़े विचलित करने वाले यथार्थ की दृष्टि से, यह लगता है और इसकी अनदेखी करना सम्भव नहीं है, कि किन्हीं मानों में अमेरिका का जैसे भारतीयकरण हो रहा है योग वगैरह के जरिये, उसी तरह से भारत का अमेरिकीकरण हो रहा है। एक सबसे जवान देश जिसकी सभ्यता सबसे ताजी या कि हाल की है, और एक सबसे बूढ़ा या कि पुराना देश? तो यह मूल्यों की या प्रभाव की अदला-बदली है, यह एक तरह का ‘सिम्प्टोमैटिक’ कलि बड़ा साफ-सा दिखाई देता है। तो ‘सिम्प्टम्स’-क्या आप नहीं मानते कि भारतीय समाज में ये बड़े ‘डिस्टर्बिंग सिम्प्टम्स’ हैं, जिस तरह की नवधनाढ्यता है और यह टी.वी. वगैरह के प्रति जो पिछले पाँच-एक वर्षों से आकर्षण...

यह जो हमारे समाज में है वह ज्यादा डिस्टर्बिंग है। आपने जो तुलना की, उसमें जो अन्तर है उसको भी ध्यान में रखिए। वहाँ पर जिन लक्षणों की ओर आपने ध्यान दिलाया ये सब तरह-तरह की टटोल हैं। समाज में छोटे-छोटे अंग हैं जो कि असन्तोष के कारण कुछ टटोल रहे हैं। संंस्कृति की मुख्यधारा उधर जा रही है, ऐसा नहीं है। यानी यह नहीं कह सकते कि अमेरिकी सभ्यता एक अनुकरण की ओर बढ़ रही है। यह है कि उसके भीतर चिन्ता करनेवाले कई पक्ष हैं। यहाँ पर भारत मेंजो मुख्य धारा है, और यह भी कह सकते हैं कि जिसको सरकार का भी अनुमोदन प्राप्त है, वही अनुकरण की ओर प्रवृत्त है जबकि जो छोटे-छोटे टोह लेने वाले दल हैं वे इसके प्रतिकूल हैं। तो इस समय स्थिति यह है कि मुख्य सभ्यता तो अनुकरण की है और उसके भीतर छोटे-छोटे दल हैं जो अपनी पहचान करने का प्रयास करना चाहते हें।

मैं समझता हूँ कि आपका यह विश्लेषण बहुत सही है। पर तब तो यह और भी विचलित करने वाला है।

हाँ। चिन्ता की बात यही है।

तब इसका मतलब यह हुआ कि इस चिन्ता का रूप तो इतना भयावह बनता है, जैसाकि हम देख रहे हैं। एक बहुत छोटा-सा उदाहरण : अभी दो-तीन साल के अन्दर यह टेलीविजन नेटवर्क इतनी तेजी से फैला है, लेकिन अभी से इसके परिणाम जो हम अपने सामने सामान्य अनुभव से, निरीक्षण से देख रहे हैं, तो ऐसा लगता है कि जिसे ‘रजिस्टेंस’, प्रतिरोध कहते हैं वह तो है ही नहीं। बल्कि जो प्रभाव सांस्कृतिक दृष्टि से जितना ही खराब होता है हम उसके प्रति शायद उतने ही बध्य हैं!

हाँ देखिए, टेलीविजन का नेटवर्क कितनी तेजी से फैला है, जिस तरह से फैलाया गया है, उसमें यह तो स्पष्ट था कि केन्द्र की एक आवाज ज्यादा से ज्यादा दूर तक पहुँचाई जा सके, इसका प्रयत्न था। और उसके जवाब में दूसरी तरफ़ से आने वाली आवाज को कम से कम मौका मिले। तो यह तो एक तरह से देश की आवाज को बन्द कर देने का साधन बन जाता है टी.वी.। दूसरी तरफ़ इस बात की और तो बिलकुल ध्यान नहीं था कि यह एक नयी कला है, इसका विकास होना चाहिए। और अब क्यों कि यह रास्ता इतना खुल गया है, ऐसा प्रशस्त हो गया है-सिर्फ एक तरफ़ की आवाज दूसरी तरफ़ पहुँचाने का-इसलिए भीतर से उसको सुधारने या कला का विकास करने, जनमात्र के जीवन को एक नयी अभिव्यक्ति देने और जन की आवाज दूसरे जन तक पहुँचाने की जो सम्भावनाएँ इससे खुलतीं वे तो और भी उपेक्षित हो गयी हैं। यह तो हुआ ही है।

सही बात है। फिर इसका मतलब यह हुआ कि हमें सांस्कृतिक दृष्टि से भी, राजनीतिक दृष्टि से भी, बिगडऩे का, आत्महीन हो जाने का खतरा कोई बाहर से नहीं है, अपने ही भीतर से है। और उद्धारक तत्त्व या कि प्रतिरोध पैदा कर सकने वाला तत्त्व जो है उसके लिए तो फिर सबसे बड़ा उपाय विपक्ष का या कि वैकल्पिक राजनीति का ही जागरण है?

वही है। विकल्प तो वही है। बाहर से जो प्रभाव हैं वे तो होते ही हैं। समर्थ का प्रभाव कम समर्थ पर हो, यह तो स्वाभाविक प्रक्रिया है ही। लेकिन भीतर से तो विकल्प की सम्भावना है। तो जहाँ विकल्प है वहीं गलत चीज़ न चुनी जाए सही चीज़ चुनी जाए इसकी सम्भावना भी है और इसकी जरूरत भी है।

क्योंकि जब सत्ता के लोग-टी.वी. का ही आपने उदाहरण दिया, बड़ा शिक्षाप्रद और तात्कालिक प्रत्यक्ष उदाहरण है यह-सत्ता के लोगों के द्वारा सत्ता का ऐसा दुरुपयोग कियाजा सकता है और समाज में कोई नहीं समझता कि यह सत्ता का दुरुपयोग है और इससे क्या उसकी सांस्कृतिक-आध्यात्मिक हानि हो रही है, उसका व्यक्तित्व कितना दुर्बल बनाया जा रहा है या उसका इस्तेमाल, शोषण जैसा किया जा रहा है-आध्यात्मिक शोषण। तो आखिर यह उसको कौन बताएगा, इस ‘वल्नरेबुल’ समाज को, कि उसका शोषण हो रहा है जो कि महज आर्थिक शोषण से भी ज्यादा भयंकर चीज़ है और जो अगर चलता रहा तो अपने आर्थिक शोषण की भी उसकी समझ कुन्द हो जाएगी। इसका तो निश्चय ही जवाब जो है वह सांस्कृतिक, साहित्यिक उपायों के साथ-साथ और उनसे कहीं ज्यादा भीतर से इसको एक नयी राजनीतिक जागृति के द्वारा ही दिया जा सकता है।

राजनीतिक ही नहीं, एक सामाजिक चेतना भी बढऩी चाहिए, होनी चाहिए।

मुश्किल यही है कि पहले हमारे समाज में धर्म का जो प्रभाव था वह आज राजनीतिक का हो गया है। इसलिए सामाजिक जागृति के लिए भी एक तरह की राजनीतिक जागृति की पहल आवश्यक हो गयी है। आपने देखा होगा कि धर्म और अध्यात्म के क्षेत्र में भी आज हिन्दुस्तान में ही जो असली है उसके प्रति संवेदनशीलता या श्रद्धा नहीं रह गयी है जितनी कि उसकी जो नकली है या जिसका प्रदर्शन-मूल्य ज्यादा है। अब एक भयानक बात यह तो हुई ही है पिछले वर्षों में, कि समाज को जगाने का जो एक मुख्य माध्यम था धार्मिक या आध्यात्मिक व्यक्तित्व या बोध, वह स्वयं भी तो दुर्बल हो रहा है। या क्या आप ऐसा नहीं मानते हैं?

वह दुर्बल है और यह तो जो बात आपने कही है वह ठीक ही है : उदाहरण के लिए जितने बड़े से बड़े धार्मिक सम्मेलन होते हैं सबके उद्घाटन के लिए अथवा वहाँ मूल्यों की चर्चा के लिए राजनीतिक व्यक्ति को बुलाया जाता है और जिनसे धार्मिक प्रेरणा मिल सकती है वहाँ पर उपेक्षित हो जाते हैं। यह तो है। लेकिन यह तो जो स्थिति में है उसका केवल एक प्रकटीकरण है, इससे वैसी स्थिति पैदा हो जाएगी यह नहीं है। क्योंकि स्थिति ऐसी है, उसका यह लक्षण हमें दिख रहा है। राजनीति क्योंकि प्रदर्शनमूलक है, और धर्म बिलकुल ज़रूरी नहीं है कि प्रदर्शनमूलक हो, इसलिए पहले तो इस प्रदर्शन को ही अमान्य कर सकें यह सम्भावना हमें पैदा करनी चाहिए। धर्म तो यह बात नहीं मानता कि कोई चीज़ क्योंकि दीखती है इसलिए सच है। इसी बात को पहले तो काटना चाहिए।

आपके चिन्तन में एकाधिक बार यह तथ्य या यह संकेत उभर कर आया है कि यहाँ भारत के बुद्धिजीवी की वह भूमिका या वह परिभाषा अभी मान्य नहीं हुई है जिसे कि पश्चिम में ‘इंटेलिजेंशिया’ कहा गया है और जिसका वास्तव में कुछ दबाव, कुछ प्रभाव समाज पर, राजनीति पर, साहित्य पर पड़ता है। यह एक शक्ति है। तो उस तरह की बात जब आपने लिखी थी तब से आज तक आप क्या समझते हैं कि भारत में बुद्धिजीवी वर्ग का वैसा कुछ विकास या कि मूल्य उभरना शुरू हुआ है? या क्या उम्मीद की जा सकती है इस ‘इंटेलिजेंशिया’ से भारत में?

अभी तो ऐसा हुआ नहीं लगता है। अभी तो उसकी पराधीनता या पर-निर्भरता ही कुछ बढ़ी है। इसलिए उसका स्वर स्वाधीन चेतना का स्वर हो ऐसा तो नहीं है। और इस तरफ़ अभी कुछ विशेष उन्नति भी नहीं हुई है।

तब तो यह और भी निराशाजनक स्थिति है जब धार्मिक ‘अथारिटी’ के स्रोत पहले की अपेक्षा सूख गये हैं या विकृत हो रहे है, और राजनीतिक ‘अथारिटी’ के स्रोत तो अप्रामाणिक या विकृत हैं ही। तब जो एक तीसरी चीज़ प्रेरणादायक हो सकती या जो इस भ्रंश को प्रतिरोध दे सकती वह तो फिर अनिवार्य रूप से एक बुद्धिजीवी वर्ग का उदय ही हो सकती थी। वही एक विकल्प हो सकता था। जनता को हम किसलिए जिम्मेदार ठहराएँगें? मान लीजिए कि यूरोप की तुलना में हिन्दुस्तान का मध्यम वर्ग अगर ज्यादा प्रलोभनग्रस्त है या प्रलोभनों के सामने कमजोर है, उसमें आन्तरिक प्रतिरोध कम दिखाई देता है, तो उसके इस भ्रंश के लिए जिम्मेदारी फिर कहीं न कहीं बुद्धिजीवी वर्ग पर ही आती है।

तीसरी सम्भावना तो यही है। अगर यहाँ धर्म-संस्थान का वह स्थान नहीं है-और यहाँ इस देश में उस तरह का धर्म-संगठन रहा भी नहीं है जैसा कि पश्चिम में हुआ क्योंकि धर्म भी मतवाद-केन्द्रित धर्म नहीं था-यह तो मैं उसकी प्रशंसा ही कर रहा हूँ, लेकिन तथ्य यही है कि यहाँ ऐसा नहीं है-तो यह ठीक है कि तीसरी सम्भावना फिर एक विवेकवान् वर्ग से यानी बुद्धिजीवी वर्ग से हो सकती है।

लेकिन मुश्किल यह है कि ऐसी परम्परा में जैसी भारत की परम्परा है, जो कि यूरोप से स्पष्टत: अलग परिभाषित की जा सकती है, उनसे ऐसा सीधा प्रभाव डाल सकने वाला, हस्तक्षेप कर सकने वाला, बुद्धिजीवी वर्ग तो उस तरह से मान्य नहीं होता-यानी उस अर्थ में ‘इंटेलिजेंशिया’ ही नहीं होता, क्योंकि मान्यता प्राप्त होने पर ही किसी का अस्तित्व एक तरह से जायज और संगत होता है। तब फिर मान लीजिए हमारी जनता में कोई सच्चे बुद्धिजीवी हैं भी, आपकी परिभाषा से निकलते भी हैं, तो समाज से उनको मान्यता प्राप्त नहीं होगी। फिर क्या यह भी एक जटिल परिस्थिति नहीं है कि किसी समाज को किसी हद तक बुद्धिजीवी की जरूरत ही महसूस न हो? आप देखिए कि कवि भी एक तरह का बुद्धिजीवी है पश्चिम के मुताबिक, लेकिन जो अपने युग के सबसे समर्थ, सबसे संवेदनशील कवि कहे जा सकते हैं, या जिन्हें आज के भी समर्थ कवि कहा जा सकता है, उनकी कविता के प्रति एकाएक वैसी दिलचस्पी या ऐसी जिज्ञासा अमूमन अब पढ़े-लिखे लोगों को नहीं होगी। अभी कल मैं रेडियो पर कवि-सम्मेलन में बैठा हुआ था, सभी खासे पढ़े-लिखे लोग वहाँ थे; और मुझे ऐसा लगा कि उनमें मुश्किल से पाँच प्रतिशत भी ऐसे होंगे जो कि उस कविता को पढ़ते हों जिसमें वह बौद्धिक ऊर्जा है, जो भारत के जन-मानस का प्रतिनिधित्व करती हो-और जो कविता के स्तर पर भी यानी ‘एस्थेटिक’ मानदंडों पर भी खरी हो।

यह तो फिर आपने जो उदहरण लिया है वही गलत जगह से लिया है, गलत चुनाव पर आधारित है। रेडियो कवि-सम्मेलन से आप ऐसी आशा करें क्यों? लेकिन मैंने तो देखा है कि इस देश में अभी तक कवि के प्रति एक तरह की आस्था है। इसलिए मैं सोचता हूँ कि यह सम्भावना तो अभी है कि कवि प्रबुद्ध वर्ग का प्रतिनिधि बन सके। अभी यह सम्भावना मिटी नहीं है। हाँ, आज की वास्तविक स्थिति ऐसी नहीं है।

यह तो मैं कहना चाहता था कि कवि के प्रति, कवि-रूपी ‘इंटेलिजेंशिया’ के प्रति, आज भी समाज संवेदनशील है। हालाँकि यह भी है कि पिछले चालीस-पचास वर्षों में हमारी कविता में अनिवार्य कारणों से जो बौद्धिक संस्कार आया है उसके प्रति अभी ‘रजिस्टेंस’ है, यह मैं कहना चाहता था। अभी उस कविता को स्वाभाविक तौर पर स्वीकर लिया गया हो, उसका सन्देश पढ़ लिया गया हो, सुन लिया गया हो-ऐसा अभी नहीं लगता है।

हाँ, लेकिन यह मान भी लें कि ऐसा अभी नहीं हुआ तो भी यह तो है कि कवि के प्रति एक उन्मुखता है।

उसका कारण तो संस्कार में है।

वही सही। लेकिन वह आशा का एक केन्द्र तो है।

क्योंकि जन-मानस को धार्मिक-आध्यात्मिक बातें भी, उपलब्धियाँ भी काव्य के जरिये ही ‘रिसीव’ करने का ही अभ्यास रहा है। इसलिए यह ‘पॉजिटिव’ बात तो है। लेकिन आधुनिक शास्त्रों के भीतर से आने वाले बुद्धिजीवी में और साहित्यिक बुद्धिजीवियों में भी कुछ आमना-सामना हो-लेकिन वह तो है ही नहीं।

शमशेर को गलत जगह पर रखकर यह नहीं कहूँगा कि ‘जो नहीं है उसका गम क्या?’ पर ‘साहित्यिक बुद्धिजीवी’ और ‘शास्त्रीय बुद्धिजीवी’ जैसा भ्रामक विभाजन हम क्यों स्वीकार करें? कवि किसी भी विद्यानुशासन से आ सकता है-हाँ, कुछ उससे बाहर के भी होंगे। (हिन्दी में साहित्यकारों में दूसरी विद्याओं में दीक्षित लोगों का अनुपात कुछ कम है, पर कुल मिलाकर तो ऐसे लोग बढ़ रहे हैं जो दूसरे क्षेत्रों में निष्णात होकर साहित्य-रचना में आते हैं।) पर फिर सभी की बौद्धिकता को हम एक स्तर पर तो नहीं रखते। पश्चिम में तो पेशेवर सभी लोग इंटेलिजेंशिया में आ जाते हैं। यहाँ, उदाहरण के लिए वकील के बारे में हम थोड़े सतर्क रहते हैं। मैं जो कभी-कभी ‘बुद्धिजीवी’ और ‘बौद्धिक’ में भेद करता हूँ वह इसीलिए! जिस संस्कारिता की बात आपने ही, उसमें भी बुद्धि से आजीविका कमाने वाले आदमी की वह प्रतिष्ठा नहीं थी जो कवि की या अध्यापक की-पुरानी परिपाटी का अध्यापक विद्या-दान की बात करता था, वेतन या फीस नहीं लेता था। मैं इस बात को यों कहना चाहता हूँ कि बौद्धिक या प्रबुद्धचेता व्यक्ति की प्रतिष्ठा का-उसमें और निरे बुद्धिजीवी में अन्तर का-एक आधार यह भी रहा कि ‘बुद्धिजीवी’ वह जो बुद्धि के सहारे समाज को दुहे (चाहे मर्यादाओं को निबाहते हुए ही दुहे), और ‘बौद्धिक’ वह जो समाज को कुछ दे, समाज के लिए कुछ छोड़े। बौद्धिकता की कसौटियों में इस निस्पृहता को भी जोडऩा, जोड़े रखना, मेरी समझ में गलत तो नहीं था। यदि आज का पढ़ा-लिखा समाज यही मानता है कि ‘बिना स्वार्थ के कोई कुछ नहीं करता, और अगर किसी का स्वार्थ दीख नहीं रहा तो उससे और अधिक चौकन्ने रहो’, तो यह समाज का दुर्भाग्य ही है, यथार्थवादिता नहीं है। यथार्थ यह है कि आज भी मानव को आदर्श ललकारते हैं, भाव-विगलित भी करते हैं और प्रेरणा भी देते हैं-समूह को भी और इकाइयों को भी। ऐसे लोग बहुत थोड़े दीखते हैं, और कम भी होते जा रहे हैं, इसे लक्ष्य कीजिए और दुखी होइए, जरूर होइए-पर वह जो छोटी-सी ज्योति है उसे भी अनदेखा क्यों कीजिए? बल्कि जब तक वह है तभी एक तो बौद्धिक के लिए भी करने को कुछ है, तभी तो बौद्धिक भी आपको दीखेगा-नहीं तो टोटल अन्धकार में वह भी कहाँ है?



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