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कन्हैयालाल नंदन
संपादन - कन्हैयालाल नंदन

अनुक्रम

अनुक्रम अज्ञेय के पत्र     आगे

(अज्ञेय जी को लिखे गये कुछ पत्र)


***

सीता निवास,
बनारस-5
अप्रैल 5,1954

प्रिय अज्ञेय जी,

अत्यन्त आश्चर्य का विषय है कि मैंने इधर आपको कई कई पत्र दिये किन्तु एक भी उत्तर नहीं। ब्लाकों की बहुत आवश्यकता है, क्योंकि विश्वविद्यालय इस समय कला भवन का एक एलबम निकलवा देने को प्रस्तुत है। कृपया इस ओर दत्तचित हूजिए।

पत्र वाहक श्री वरुआ जी एक बड़े उत्साही नवयुवक हैं और दद्दा का समादर ग्रन्थ निकालने के लिए कृतसंकल्प हैं। मैं निम्नलिखित शर्तों पर उन्हें अपना सहयोग देने के लिये प्रस्तुत हूँ-


1. इस कार्य के लिए एक प्रतिष्ठित प्रतिनिधि समिति संगठित की जाये जिसमें सीतारामजी सेक्सरिया और भागीरथजी कानोडिय़ा अवश्य रहें।
2. संपादक मंडल में बरुआ जी का होना नितान्त आवश्यक है। साथ ही मेरे सन्तोष और सहयोग के लिए मोहन सिंह सेंगर, आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, और सर्वोपरि अज्ञेय अवश्य रहें। बिना इन तीनों व्यक्तित्वों के मैं किसी प्रकार का सहयोग देने में असमर्थ रहूँगा।
3. मैटर के अन्तिम एरेंजमेंट, चित्रों के चुनाव और ग्रन्थ की साज-सज्जा का भार एक-कलम अज्ञेय पर रहेगा और उनके सहायक रूप सर्वश्री अम्बिका प्रसाद दूबे, आनन्दकृष्ण, विजयकृष्ण और कृष्णदास काम करेंगे। किसी पाँचवें व्यक्ति का हस्तक्षेप इस विषय में मुझे स्वीकार वा सह्य न होगा।
4. योजना बहुत भारी भरकम न बनाकर ऐसी सुबुक और सुन्दर बनायी जाए कि वह चल जाय। साथ ही वह दद्दा की पद-मर्यादा के अनुरूप गौरवशालिनी भी हो।

आशा है, आप मेरी बातों से सहमत होंगे और इसमें जो कुछ छूट वा कमी रह गयी होगी, उसकी पूर्ति कर देंगे। मैंने ऊपर जो नाम दिये हैं उनके अतिरिक्त संपादक मंडल और परामर्श मंडल में जो भी विशिष्ट नाम उचित हों, अवश्य रखे जाएँ। किन्तु कार्य का विकेन्द्रीकरण नहीं होना चाहिए।

श्रीबरुआ जी लगभग पन्द्रह दिन यहाँ रहे हैं। उनमें कार्यनिष्ठा और कार्यशक्ति दोनों हैं। इस समय में उन्होंने दद्दा के पूरे पौने दो सौ पत्र टाइप किये और उनके आरम्भिक अंश पर मेरा दीबाचा भी लिया। उन्हें दिल्ली जाना है अन्यथा मैं इन सभी पौने दो सौ पत्रों पर टिप्पण लगवा देता। मैंने उन्हें सलाह दी है कि दद्दा को यह सामग्री दिखा कर उनका आदेश प्राप्त करें, क्या इसमें से अभी प्रकाश में आवे, क्या नहीं। आप भी इस सम्बन्ध में उचित परामर्श दीजिएगा और स्वयं सब बातें दद्दा से डिस्कस कर लीजिएगा। मैं जानता हूँ कि वे उस स्तर पर पहुँच गये हैं जहाँ से ‘स्व’ के विषय में भी तटस्थ सम्मति दी जा सकती है। कृपया यह पत्र दद्दा को सुना दीजिएगा।

दिल्ली में बरुआजी दद्दाकी एक मूवी तैयार कराना चाहते हैं। इस कार्य में भी आपका पथ-प्रदर्शन आवश्यक होगा, उसे प्रदान कीजिएगा।

शेष प्रसन्नता।

स्नेही,
रायकृष्ण दास

श्री अज्ञेय
नयी दिल्ली

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