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कविता

अगली हराई के लिए
राजेंद्र प्रसाद पांडेय


अब भी खड़ा हूँ
श्रम के ढहते मकान-सा सीना ताने
नींव-जैसे मजबूत पैरों के सहारे
झड़ रहे प्लास्टर-सी लुप्त होती मांसलता में
ईंटों-नुमा ढड्ढर झलकाता
कमाई का सबसे अनुपयोगी हिस्सा ले
प्रकृति को कोख से उर्वर बनाये
आँसू, फेन और खून मक्खियों-मच्छरों से बाँटता

मेरा होना मकान की एक परिचित गंध है
जो उसे गोशाला-सा पुराना पड़ रहा
धार्मिक नाम देती है

यद्यपि ट्रैक्टर की फटफट और डीजल की धुआँस में आँखों से बंद हूँ
फिर भी विकल्पों से अँटी पड़ी दुनिया में
खेती की कविता का
चार पदों की लय पर
यतियों में चलता छंद हूँ

नये-नये कोणों से नटखट नाटे
घावों-भरे तन-मन पर जब-तब ठोकर मार जाते हैं
उन्हें उन्हीं के बल झेलता हूँ
जो दो समानांतर परंपराओं-सी
मौर बनी सिर पर डटी हैं अक्षत-यौवनाएँ

जितना कुछ जुएँ से खींचा है
कंधे पर ढड्ढों में अंकित है
गर्दन से बँधे-बँधे
पैरों से दमड़ी में कितना-कुछ टूटा है
कि हृदय पथराकर
दो हिस्सों में खुर बन गया है

अब तो सिर्फ
पूँछ, खाल, सिर और कानों का हिलना है
दूसरों की खुशी के लिए गले बँधी घंटी है
थोड़ा-बहुत सह भी लूँ मरोड़ी गयी पूँछ तो
अगली हराई के लिए ललकारते हाथों में
लचकदार शंटी है

 


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