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कविता

अछूत जनता !
मृत्युंजय


देखो, देखो, छू मत जाना,
जनता से !

बंद कक्ष की कठिन तपस्या खंडित होगी
पोथे-पत्रे क्रांतिकारिता के सब गंदे हो जाएँगे
मंदे पड़ जाएँगें धंधे क्रांति-व्रांति के
सात हाथ की चौकस दूरी हरदम रहो बनाए
छाया भी न कहीं पड़ जाए...

जनता संघी, जनता पागल, जनता है बदमाश
मध्य वर्ग कैंडिलधारी है, निम्न वर्ग बकवास
दिल्ली, बंबई, बंगलोर में लघु कमरों के अंदर
पाँच-पाँच रहते हैं सब है अन्ना टीम के बंदर
नौजवान-नवयुवती करते पिकनिक में आंदोलन
तुम पवित्र अति धीर भाव करते विचार उत्तोलन

यह जनता अब काम न देगी
जनता नई गढ़ाओ
कुछ सुमेरु कुछ मंगल ग्रह से
कुछ नेपाल से कुछ क्यूबा से
जनता माँग ले आओ
क्रांति की अलख जगाओ !

देखो बंधू, छू मत जाना
मत शरमाना
जनता नई मँगाना
फिर बदलना जमाना

 


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