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आत्मकथा

शब्दकाया
सुनीता जैन

अनुक्रम


रामसिंग को पहले-पहल मैंने देखा, वह कहाँ से आया था, उसकी वय तब क्या थी - यह सब बताना शायद आज संभव न हो। हाँ, मुझे ठीक-ठाक याद है कि वह हमारे चाँदनी चौक वाले घर (मेरी ससुराल) में था, जब 1963 में भारत-चीन युद्ध छिड़ने पर मैं उस घर में रह रही अपनी दो वर्ष की बेटी, अन्नु, को लेने भारत आई।

मेरा अन्नु को लेने आना, अन्नु का भारत और हमारा स्विट्जरलैंड में होना भी अपने-आप में एक कथा है, जो भुलाई नहीं जा सकती। अन्नु जब 8-9 महीने की थी, हम उसे उसकी दादी से मिलवाने भारत आए। वैसे भी हमें न्यूयार्क छोड़ स्विट्जरलैंड जाना था, जहाँ मेरे पति ने आई बी एम में नई नौकरी ली थी। किंतु स्विट्जरलैंड में घर कठिनाई से मिलते हैं और हमारा नंबर आने में कुछ देर थी। वे मुझे यहीं छोड़कर चले गए। उनके जाने पर उनकी माँ एकदम बेहाल थीं। मेरे पति अपनी माँ के एकमात्र बेटे थे। उनका बिछोह मेरी सास से सहन न होता। वे बीमार भी थीं।

पति के स्विट्जरलैंड प्रस्थान के बाद यह मालूम हुआ कि दूसरा बच्चा आने को है। बस तो क्या। मेरी सास, उनकी सात बहनें तथा अन्य परिजन बारी-बारी से कभी हँस के, कभी नसीहत दे मेरे पीछे पड़े कि मैं अपनी बेटी, अपनी पहली संतान अपनी सास के पास छोड़ दूँ, तो उनका मन लगा रहेगा। पहले तो मुझे विश्वास नहीं हुआ कि कोई ऐसा कह भी सकता है। फिर डर लगा कि ये लोग अन्नु को मुझसे जुदा न कर दें। वे बहुत सारे थे, मैं एकदम अकेली और दूसरे बच्चे के गर्भ के कारण अस्वस्थ थी। तिस पर छोटा-सा घर। भारत की गरमी।

ज्यों-ज्यों मेरे जाने का दिन निकट आने लगा मेरी सास का रोना और वेदना बढ़ने लगी। वे बार-बार यही कहतीं कि 'अब के तुम जब लौटोगे, मैं नहीं रहूँगी।' - इत्यादि सुनकर कष्ट होता। वे बताती रहतीं कि अपने बेटे को उन्होंने कितने कष्ट से पाला था। अपनी विधवा सास का यह विलाप मुझे सालता रहता। लगता, मैं बहुत स्वार्थी हूँ। जिस दिन मेरा प्रस्थान था, उस दिन तो वे जैसे धरती पर बिछ गईं। बो‍लीं, 'बहू तेरे तो एक और हो जाएगा, अन्नु को मुझे दे दे...।' 'जिस मुख निकसत नाही' के अपने स्वभाव से विवश और बड़ों के आशीर्वाद से अपने को वंचित करने के डर से डरी, मैंने विमान में बैठने से पहले अन्नु को उनकी गोद में दे दिया। और विमान में बैठने के बाद मुझ पर जो गुजरी वह शब्दों में न बँधे तो ही ठीक।

समय निकलता गया। दूसरा बच्चा (पहला बेटा) रवि, स्विट्जरलैंड में पैदा हुआ। उसे देखती तो अन्नु और याद आती। कभी किसी बच्चे को 'मम्मी' कहते सुनती, तो ठगी रह जाती। मैं दो बच्चों की माँ थी, पर मैंने अभी तक 'मम्मी' नहीं सुना था। जब अन्नु। को छोड़ा, वह बोलना नहीं सीखी थी। रवि तो पाँच के महीने का ही था। इसी सब उदास करने वाली स्थिति के कारण हो सकता है, मेरा मन पीछे-पीछे समय में जाने लगा हो और कई सौ कविता के साथ या बाद, एक दिन एक कहानी आरंभ की, जो होते-होते इतनी लंबी हो गई कि छोटा-मोटा उपन्यास बोज्यू थी।

और तभी भारत-चीन के बीच युद्ध छिड़ गया। उन दिनों न तो घरों में टेलीविजन होते थे, न विदेश से आप दनादन फोन कर सकते थे। मात्र पत्रों का सुभीता था और उन्हें भी आने-जाने में पूरा मास ही बीत जाता था। मेरे निरंतर अन्नु-अन्नु की रटन से तंग मेरे पति ने भारत में 'पूल ऑफिसर' का पद स्वीकार कर लिया था (साइंटिफिक पूल), पर मैं रुकने को एक दिन भी तैयार न थी और उन्हें जाकर पद पर पहुँचने में अभी समय था। सो मुझे और पाँच-छह महीने रवि को उन्होंने इटली से पानी के जहाज में बैठकर बंबई के लिए रवाना कर दिया - बंबई से दिल्ली का सफर था। शब्दकाया



पानी की यह दुखदायी यात्रा कर और फिर ट्रेन से दिल्ली एक नन्हें बच्चे को साथ लेकर मैं पहुँच ही गई, इससे पहले कि दिल्ली पर (मेरी कल्पना में) कोई चीनी आक्रमण हो जाता और अन्नु को मैं खोज न पाती। अन्नु तब तक दो वर्ष से बड़ी हो चुकी थी। बोलने लगी थी। किंतु जब उसे कहा गया कि 'यह तुम्हारी माँ है' तो उसका वह भय सारा मुख देखते ही बनता था। वह आँख में आँसू भर कभी मेरी सास को देखती, जो अन्नु के लिए अंत तक माँ थी, कभी मेरी ओर। जब मेरी सास ने भी उसे कहा कि 'हाँ, हाँ, अन्नु् जाओ न, यह तुम्हारी माँ है - तुम्हारी मम्मी है।' तो वह आहत बच्ची डरकर जिसकी गोदी में जा छुपी, वह रामसिंग था। और रामसिंग को जाने कैसे हमसे अधिक समझ थी कि वह सैर कराने के बहाने उस घबराई और डरी बच्ची को घर से बाहर ले गया।

रामसिंग जब तक हमारे पास रहा और जिया, मेरे और मेरे बच्चों के बीच ढाल बना रहा। उन्हें मुझसे, मेरी झुंझलाहटों और नासमझियों से बचाता रहा। बीच-बीच में जरुरी हो तो मुझ से खफा भी हो जाता।

फिलहाल मैं खफा थी। स्वयं से। जिस बच्ची की याद में एक वर्ष एक युग-सा बिताया, वह मुझे 'माँ' नहीं मान पा रही थी। यह एक खीज और झेंप का कारण तो था ही और अपनी इस पीड़ा में मै अकेली थी। 'भाभो' (मेरी सास) अपने प्रेम से लैस थी और मैं अपने माँ होने के अधिकार से। इस ठनाठनाई में बच्ची पर क्या न बीतती। मेरे लिए नियति का क्रूर उपहास भी था और आत्मग्लानि जैसा भी कि भावुकता के एक क्षण में मुझसे जो वर्ष भर पहले हुआ उससे अब कितने प्राणी प्रभावित थे - अबोध अन्नु , जिससे पहले उसकी एक 'माँ' छूटी, अब दूसरी छूटने को थी, मेरी सास जो पहले अकेली थीं, अब अन्‍नु के मेरे पास आ जाने के बाद कितनी अधिक अकेली होंगी - और में मूढ़-सी इस सबका कारण भी थी और अवश भी।



शायद स्थिति इतनी गंभीर नहीं थी, जितनी मेरे कवि मानस में उसकी स्मृति। कुछ महीने बाद जब पति दिल्ली लौट आए, तो उन्होंने ही निर्णय लिया कि दोनों बच्चे साथ पालेंगे और चाँदनी चौक में अन्नु को अधिक नहीं छोड़ा जा सकेगा। अब तक मैं अपनी अति-उदार-मना जेठानी की अतिथि थी - जाहिर था कि उस घर में इतनी जगह नहीं थी कि एक और गृहस्थी बस सकती। सो पति के नौकरी सँभालते ही हमने अपने लिए घर देखना आरंभ किया। दिल्ली में घर भी इतनी सुभीता से मिलते नहीं। न ही उन दिनों दिल्ली में इतनी कॉलोनी बनी थी। मेरी माँ के घर के पास एक घर खाली था - उनके किसी परिचित का। माँ की सहायता से वह हमें मिला और विवाह के 4 वर्ष बाद मैंने दिल्ली में अपना घर जमाया - रोहतक रोड पर।



किंतु चाँदनी चौक छोड़ना अन्नु के लिए कितना दारुण रहा होगा, यह कौन जाने। यदि रामसिंग न होता तो जाने क्या होता हम दो माँओं के बीच तीसरी और असली 'माँ' - रामसिंग, अन्नु को बहलाकर हमारे साथ रोहतक रोड ले आया। गनीमत कि बच्ची अपने भाई से प्यार करने लगी थी और दोनों संग खेलते भी थे।

धीरे-धीरे मेरी इस छोटी गृहस्थी को चलाने वाला भी रामसिंग ही था। क्योंकि रोहतक रोड आने के कुछ ही महीने बाद जिस सूचना ने मुझे सुन्न कर दिया, वह यह कि मैं एक फिर माँ बनने वाली थी। उस समय मेरी वय मात्र 22 वर्ष की थी। जब मेरी माँ को यह पता लगा, वे भी मुझसे नाराज हुई कि कैसे इतने बच्चे पालोगी। किंतु आज की लड़कियों की तरह मेरी कल्पना में भी यह बात नहीं आई कि बच्चे की हत्या की जा सकती है। हाँ, यह प्रण अवश्य किया कि यह बच्चा हमारी अंतिम संतान होगा। क्योंकि मैं स्वयं अंदर तक दुखी थी और चिड़चिड़ी हो गई थी। रामसिंग ही दोनों बच्चों को तैयार कर नर्सरी स्कूल पहुँचाता, लाता और घर का सब काम करता।

इन्हीं दिनों मेरी पहली कहानी धर्मयुग में स्वीकृत हुई। स्विट्जरलैंड में लिखे हुए उपन्यास की चोरी पकड़ी गई और वह भी छपा। और मैंने दूसरा उपन्यास भी लिखा। जैनेंद्र जी ने उसे पढ़ा, उन्हें अच्छा लगा और वह पूर्वोदय प्रकाशन से छपा भी। यह एक नई सुनीता थी, जो शायद गृहस्थी के घिराव से मेरा पलायन थी - मेरा बचे रहने का एकमात्र उपक्रम। जब दोनों बच्चे स्कूल में होते और छोटे को रामसिंग देखता, तब घंटों में कुछ लिख रही होती।



क्या था इस एकदम कृष्ण वर्ण कद के तीसेक के वर्ष के व्यक्ति में कि उसने मेरे सारे कामों को अपने सिर ओढ़ लिया। आज भी याद आता है वह, तो आँसू रुकते नहीं। बहुत कम बोलता था वह। बच्चों से बोलता था। उनका कोई भी काम उसे अरुचिकर नहीं लगता। न मैले कपड़े, न नहलाना-धुलाना, न बार-बार गीले बिस्तर को बदलना। किसी बच्चे के बिस्तर गीला करने पर यदि मेरा धीरज छूटता, तो वह कहता, 'सीख जाएँगे, अम्मा। आपने कभी किसी को बड़े होकर गीला करते देखा है? ये भी नहीं करेंगे।'

कैसे अदभुत बात, कितनी सरल उक्ति। ऐसा ही था वह। शायद बिहार का था। पूछने पर कहता, 'हमारा कोई नहीं। यही तो अपने हैं अब।' और बच्चों के साथ उलझा रहता।

रोहतक रोड के घर की छत दो-तीन घरों से जुड़ी थी। एक छत से दूसरे मकान की छत पर जाया जा सकता था। छत पर बरसात के बाद कुछ कीमती सामान धूप लगवाने के लिए भेजा। शाम को उसमें से एक कंबल चोरी हो गया। पति घर आए उन्हें पता लगा। रामसिंह पर संदेह का तो सवाल ही नहीं था। किंतु जाने कैसे और लोगों ने उनसे कहा, 'पहले तो अपने घर के नौकर को पुलिस में दो। वे भी मान गए। पर ज्यों ही उन्होंने मुझसे कहा कि पुलिस को फोन करेंगे, मैं दोनों हाथ फैलाकर रामसिंग के आगे खड़ी हो गई और बोली, 'यह गया तो मैं भी जाऊँगी इसके साथ!' वे मेरे इस दुस्साहस पर आवक रह गए। क्योंकि मैं तब तक बहुत ही भीरु थी और कभी उनका सामना मैंने नहीं किया था। एक बार तो वे लाल-पीले होने को हुए, फिर उन्हें स्वयं समझ में आया कि मेरा आशय क्या है। रामसिंग मेरे पीछे से गिड़गिड़ करता रहा, 'अम्मा, कोई बात नहीं। ले जाने दो पुलिस को।'

'नहीं रामसिंग, तुम नहीं जाओगे,' मैंने रोकर कहा, 'मैं रामसिंग पर इससे ज्यादा कीमती चीजें वार सकती हूँ। यदि यह चोर है, तो कोई ईमानदार हो नहीं सकता।'

मेरे इस अकस्मात रौद्र रूप से सारा घर सामान्य हो गया। पर एक उदासी थी जो मुझे बहुत दिन घेरे रही। उस दिन मैं और रामसिंग जिस रिश्ते में बँधे वह आज भी मेरे लिए वैसा ही है, यद्यपि रामसिंग को गुजरे आज 30 वर्ष से अधिक हो गए।



इस घटना के कुछ ही महीने बाद हम फिर से अमरीका चले आए और रामसिंग मेरी जेठानी की गृहस्थी में लौट गया। जाते-जाते मैंने पूछा, 'हम आएँगे तो तुम मिलोगे न?' 'तो और कहाँ जाएँगे हम', कहकर वह बच्चों के बार-बार लिपटकर रोने लगा।

और सच ही जब अमरीका से सात बरस बाद हम लौटे तो वह वहीं था। इन सात बरस में मैंने एम.ए. और पी-एच.डी, कर ली थी। कुछ दिन पढ़ाया भी था। आते ही इंद्रप्रस्थ कॉलेज में मेरी नियुक्ति हो गई। सर्वोदय इनक्लेव का हमारा घर जो मेरी अनुपस्थिति में बना, मेरे कॉलेज से बहुत दूर था। प्रतिदिन 18 किलोमीटर जाने और आने में शाम हो जाती। अन्नु दसेक वर्ष की थी, रवि आठ-नौ और शशि सात का। तीनों को हिंदी नहीं आती थी, मुझे समय नहीं था। ऊपर से नई-नई बीमारियाँ दिल्ली की - कभी पेट खराब, कभी वायरस, इन सब भीषण परिस्थितियों में मेरा एक ही कर्णधार था, रामसिंग। आज सोचती हूँ तो अन्याय-सा लगता है - एक व्यक्ति पर यों लद जाना। मैं तो कठिनाई से शाम का खाना बना पाती थी। शेष सब वह देखता।



उसका बोझ हल्का करने के निमित्त मैंने घर के पास बने नए कॉलेज, अरविंद में स्थानांतर करवा लिया। और उसके बाद अरविंद कॉलेज को भी छोड़कर आई.टी. में नौकरी ले ली। किंतु उसका बोझ घटा, यह दावा तो नहीं कर सकती। मैं जितने समय घर पर रहती भी तो कुछ-न-कुछ लिख रही होती या परीक्षा की कॉपियाँ जाँच रही होती। मेरे बच्चों की फिर असली माँ, हमारा रामसिंग ही था। यहाँ तक की हमारा घर जब बना उसमें भी वह चौकीदार की तरह रहा, तभी निर्माण संभव हुआ। यह बात बाद में मेरे परिवार वालों ने मुझे बताई कि मेरे घर की एक-एक ईंट रामसिंग की देख-रेख में लगी। एक-एक सीमेंट की बोरी और लोहे की छड़ का उसने हिसाब रखा। क्योंकि हम लोग विदेश में थे और मेरी ससुराल में कोई भी इस योग्य नहीं था कि आकर मकान के निर्माण को सँभालता। मेरे बड़े भाई ने मकान बनवा तो दिया, किंतु चौबीस घंटे चौकसी पर जो रहा, वह रामसिंग ही था।



दुर्भाग्य कि हमारे भारत लौटने के बाद उसी मकान में रामसिंग बहुत दिन नहीं जिया। अब तक वह शायद चालीस बरस का हो गया था। ठीक से तो वह भी नहीं बता पाता कि क्या उम्र थी उसकी। उसकी दोनों टाँगे धीरे-धीरे वक्र-सी होने लगी थीं। पहले भी बहुत सीधी तो नहीं थीं। यदि मैं अपनी व्यस्तताओं से इतनी घिरी न होती तो जल्दी ही भाँप लेती कि उसकी तबीयत ठीक नहीं। किंतु मेरे लिए तो वही लौह पुरुष था। उसके बीमार होने की बात की मैं कल्पना तक नहीं कर सकती थी।

जिस वर्ष वह गया, उस वर्ष उसका व्यवहार अटपटा होने लगा था। कभी-कभी आँखे लाल हो उठतीं और वह मुझ पर गुस्सा जाता कि काम ज्यादा है। कभी खाना नहीं खाता। यदि वह सेवक न होता तो हम समझ लेते कि उसका रक्तचाप बढ़ा हुआ है। एक नासमझी थी मेरी, एक उस पर विश्वास। दूसरा वह कभी कुछ बताता भी तो नहीं था।

एक दिन वह उठकर नहीं आया। जाकर देखा तो सन्निपात जैसी स्थिति में था। पास के डॉक्टर को बुलवाया। उसने जो आकर कहा तो उससे मेरे हाथों के तोते उड़ गए। रामसिंग बचपन से अफीम जैसा कुछ खा रहा था। इधर उसकी मात्रा बढ़ा दी थीं। उसका गुर्दा फेल हो गया है, डॉक्टर को ऐसी आशंका थी।

रामसिंग को सफदरजंग में भर्ती करवा दिया गया। मैं कॉलेज जाती, बच्चों को दिन का खाना बनाकर देती, भागकर शाम को उसे देखने अस्पताल जाती। आकर रोने लगती। फिर शाम का खाना, कपड़े धोना, घर की सफाई, खरीदारी। पति का दफ्तर शहर के दूसरे सिरे पर था। जल्दी जाते, देर से आते। बच्चे छोटे थे, होमवर्क से घिरे थे और मैंने कभी रामसिंग के अतिरिक्त किसी को रखा नहीं था। इतनी जल्दी मिलता भी कौन। और वह नहीं रहेगा, यह तो कोई मुझे कह देता, तो मैं ही फिर बिस्तर से उठती नहीं।

उसे देखने जाती रही। वह दिन-दिन 'कोमा' में जाता रहा। कभी-कभी बात भी नहीं होती। जो कुछ उसके लिए ले जाती, पास में रखकर चली आती। एक दिन नर्स मुझ पर झल्लाई कि 'इस मरीज के पास कोई घर का क्यों नहीं रहता?' यह बात एक तमाचे-सी लगी। जो सबसे अधिक हमारा था, हम ही उसके घर के न हो सके। हम दोनों नौकरी पर थे, सौ कौन उसके पास रहता। उसका बक्सा खोलकर उसके सामान की पड़ताल की। पर किसी भी परिजन का कोई नाम-पता न मिला।



मुझे याद है, दशहरे की सुबह चार बजे का समय रहा होगा। वह सफेद उजले कपड़ों में स्वस्थ, स्फूर्त मेरे सम्मुख मेरे स्वप्न में खड़ा था। मैंने ललककर कहा, 'रामसिंग तुम ठीक हो गए?'

'हाँ अम्मा, हम ठीक हो गए।'

और तभी दरवाजे की घंटी बजी। मेरी आँख खुली। अस्पताल से तार था कि 'आपका मरीज नहीं रहा। आकर उसे ले आइए।'

वह जाते-जाते भी मेरे पास आया था। सपने याद नहीं रहते। किंतु उसका वह रूप, वह सपना आज भी ज्यों का त्यों साफ है। वहीं खड़ा है वह साफ धुले सफेद कुर्ते-पाजामें में। रामसिंग यदि स्वर्ग नहीं गया तो कौन जाता होगा वहाँ?

आज तीस वर्ष बाद भी वहीं तो है जो लिखवा रहा है मुझसे, इस लिखे का हर एक शब्द। और इस तरह मुझे आत्मग्लानि से मुक्त करने के अपने इस उपक्रम में वह लौह पुरुष अपनी ही कृति में अचल है। उसकी जिस काया को मैं बचा न सकी उसके बदले यह शब्दकाया मुझसे ले वह मुझ पर अंतिम उपकार ही तो कर ही रहा है।


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