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कविता

अपनी छत
संतोष कुमार चतुर्वेदी


जब बहुत छोटा था मैं
तब बनवाई गई यह छत
जैसे जैसे बड़ा हुआ मैं
बढा मेरा कद
नीची पड़ती गई छत
इतनी नीची कि
कमर झुका कर चलने पर भी
ठेक जाता कहीं न कहीं सिर

वैसे कहते हैं कि
अपनी धरती का आसमान भी
कभी बहुत करीब हुआ करता था
इतना करीब
कि धान कूटती एक स्त्री के मूसल का सिरा
लड़ गया तब के धरती के आसमान से
और एक गर्जन तर्जन के साथ
चला गया आसमान असीम ऊँचाइयों में
अपनी तमाम आकाशगंगाओं
तमाम सूरज चाँद सितारों
और पृथिवी को समेटे हुए

बदलते जमाने में
आदमी के मुताबिक तो होनी ही चाहिए उसकी छत
जिसके तले उठा कर चल सके वह अपना माथा
और सोच सके अपने आसमान के बारे में

 


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