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शोध

प्रतिरोध की संस्कृति, नुक्कड़ नाटक और महिलाएँ
सुप्रिया पाठक


असल में नुक्कड़ नाटक का जन्म व उभार पूरी दुनिया में, समाज में जनवादी-आंदोलनों के साथ एक राजनीतिक जरूरत के तहत हुआ है। यदि विश्व में नुक्कड़ नाटक के जन्म पर नजर डालें तो पता चलेगा कि रूस में समाजवादी स्थापना के बाद सांस्कृतिक-आंदोलन के लिए रंगमंच के प्रयोग के दौरान और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान नाजीवाद और फासीवाद के विरुद्ध सेना को तैयार करने के लिए इसका प्रयोग किया गया। चीन में क्रांति के लिए किसानों को तैयार करने के लिए तीसरे दशक में इसका जन्म हुआ, तो स्पेन में गृहयुद्ध के दौरान, वियतनाम में जापानी, फ्रांसीसी और अमेरिकी हमलावरों के विरुद्ध युद्ध के दौरान, क्यूबा में क्रांति के तुरंत बाद और पूरे लैटिन अमेरिका व अफ्रीका में राष्ट्रीय मुक्ति-संग्राम के दौरान और अमेरिका में यह खेत मजदूरों और नीग्रो के बीच संघर्ष और संगठन के साधन के रूप में लोकप्रिय हुआ।
                           (प्रज्ञा , नुक्कड़ नाटक : रचना और प्रस्तुति, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय)


भारत में यद्यपि रामलीला व रासलीला आदि की लोक-प्रस्तुतियों में नाटक के इस रूप के पैदा होने की संभावना मौजूद थी, परंपरागत तौर पर इस तरह के प्रहसन या तो राजाओं की खिल्ली उड़ाकर उनके प्रति अपने रोष को जताने का माध्यम थे या फिर धार्मिक भूख को शांत करने का जरिया। इन दो तत्वों की अधिकता के कारण यह एक मनोरंजन प्रधान विधा ही बनकर रही, इसमें कोई विशेष गुणात्मक परिवर्तन नहीं हुआ। इसलिए भारतेंदु हरिश्चंद्र ने अँग्रेजी शासन की पोल खोलने की सोची तो उनको यह सशक्त माध्यम तो नजर आया, पर वे इसकी सीमा को नहीं लाँघ सके। उनके नाटकों के कथ्य बेशक अँग्रेजी शासन की नीतियों के बारे में जनता को आगाह करते थे, लेकिन उनमें हास्य की अधिकता होने के कारण वे मनोरंजन करने तक ही सीमित रहे और अँग्रेजी शासन की असलियत बताने और उसके विरुद्ध आंदोलनकारी चेतना निर्माण करने में आंशिक रूप से ही सफल हुए। राजनीतिक स्पष्टता और जनता के प्रति नाटककार की प्रतिबद्धता के कारण नुक्कड़ नाटक की जिस तरह की पहचान बनी उस दृष्टि से भारतेंदु के नाटकों को नुक्कड़ नाटकों की श्रेणी में तो बेशक नहीं रखा जा सकता। लेकिन यह भी सच है कि जब कलाकारों ने अपना सामाजिक दायित्व निभाने के लिए नुक्कड़ नाटक को चुना तो उनकी नाटक के इस परंपरागत रूप ने बहुत मदद की, बल्कि यह भी कहा जा सकता है कि उन्होंने इस रूप की मनोरंजन-प्रधानता को दूर करके इसका राजनीतिक संस्कार किया। जनता तक पहुँच को देखते हुए कभी सरकारों ने अपने प्रचार के लिए इसका इस्तेमाल करना चाहा तो कभी प्रतिक्रियावादी ताकतों ने, लेकिन नुक्कड़ नाटक के प्रारूप में ही कुछ बात है कि वे अपने मकसद के लिए इसका प्रयोग नहीं कर सके।

मध्यवर्ग की मानसिकता से ग्रस्त विद्वानों ने लंबे समय तक नुक्कड़ नाटक को विधा के तौर पर स्वीकार नहीं किया। नुक्कड़ नाटक में शुरू से ही बड़े कलाकारों की समृद्ध परंपरा होते हुए भी इसके कलाकारों को असल में तो कलाकार का दर्जा ही नहीं मिला और यदि कलाकार माना भी तो दूसरे दर्जे का। उसकी जनपक्षधरता को तो सराहा गया, लेकिन इसके कला-पक्ष की घोर उपेक्षा की गई। बावजूद इसके नुक्कड़ नाटक के कलाकारों ने अपनी सामाजिक प्रतिबद्धता के ऐतिहासिक दायित्व को निभाते हुए अविस्मरणीय पहचान बनाई। स्वतंत्रता के बाद भारत के शासक वर्ग ने विकास का पूँजीवादी रास्ता अपनाया जो जनता की आकांक्षाएँ पूरी नहीं कर पाया। महँगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार जैसी समस्याएँ विकराल रूप धारण करती गईं और असमान विकास के चलते अलगाववाद, क्षेत्रवाद, जातिवाद जैसी समस्याओं ने जनता की एकता को तार-तार करना शुरू किया। इस स्थिति को देखते हुए जनता के संघर्षशील व जुझारू तबकों ने विरोध करना शुरू किया। किसानों, मजदूरों, स्त्रियों, विद्यार्थियों के छोटे-छोटे आंदोलनों को नुक्कड़-नाटक ने अभिव्यक्ति दी।

नुक्कड़ नाटक की राजनीतिक प्रखरता एवं प्रतिबद्धता की वजह से इस पर राजनीतिक प्रोपगंडा का नाटक होने के आरोप हमेशा लगते रहे हैं, वैसे तो प्रत्येक युग में राजनीति, समाज के केंद्र में रही है और जनजीवन को नियंत्रित व संचालित करने वाली शक्ति रही है, लेकिन वर्तमान लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीति समाज की चर्चा का केंद्रीय सवाल है। कोई जागरूक रचनाकार और नागरिक राजनीति से अछूता नहीं रह सकता। मानव समाज के सामने प्रस्तुत अधिकांश समस्याएँ राजनीति की देन हैं और निःसंदेह उनका समाधान भी राजनीति में ही है। कालजयी रचनाएँ वही बन सकी हैं जिनमें तत्कालीन राजनीति के मुख्य सवालों व संघर्ष को उजागर करने की क्षमता थी। विमर्श के केंद्र में सर्वाधिक रहने वाले महाकाव्य रामायण और महाभारत से यदि राजनीति निकाल दी जाए तो इनमें शायद ही कुछ मनुष्य के काम का बचे। भारत के स्वतंत्रता-आंदोलन के दौरान वही रचनाएँ लोकप्रिय हुई जिन्होंने तत्कालीन राजनीति को अपना विषय बनाया।

भारतीय समाज में वर्चस्वशाली वर्गों की विचारधारा, पितृसत्ता और वर्ण-व्यवस्था के माध्यम से लोगों के विचार व व्यवहार को नियंत्रित करती है। समाज की लगभग दो-तिहाई आबादी के शोषण को यह विचारधारा वैध ठहरा देती है। स्त्रियों और दलितों को बराबरी का दर्जा मिले बगैर जनवादी व न्यायपूर्ण समाज की कल्पना ही नहीं की जा सकती। नुक्कड़ नाटकों ने स्त्री के आर्थिक व दैहिक शोषण तथा विकास के उचित अवसरों से वंचित करने के चित्र दर्शाए हैं और समाज के विकास में स्त्रियों के योगदान को प्रस्तुत किया है। समाज में शासक वर्गों द्वारा फैलाई जा रही मिथ्या-चेतना को दूर करने व संघर्ष चेतना को प्रखर करने में नुक्कड़ नाटक की भूमिका महत्वपूर्ण है। जनता के जनवादी संघर्षों के स्वरों ने जहाँ नुक्कड़ नाटक के विकास में योगदान दिया है वहीं नुक्कड़ नाटक ने भी जनवाद के पक्ष में उठे स्वरों को अभिव्यक्ति प्रदान करके व इन्हें सूत्रबद्ध करके इन्हें मजबूती प्रदान की।

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद निर्मित नवीन राजनीतिक स्थिति में एक नई सांस्कृतिक पहचान के निर्माण हेतु एक राष्ट्रवादी परियोजना के तौर पर साम्यवादी दल की सांस्कृतिक इकाई के रूप में 'इप्टा' का गठन किया गया था। 'इप्टा' की पहली कोशिश थी एक नए तरह के थिएटर का निर्माण करने की, जो मुख्यधारा के थिएटर की अपेक्षा अधिक यथार्थपरक हो। युद्धकालीन परिस्थितियाँ, 'ब्लैकआउट', देश के विभिन्न भागों में अकाल, आर्थिक बाधाएँ और सर्वव्यापी आतंक, इन सबने इस नई थिएटरीय विधा को अत्यंत प्रासंगिक और सटीक बना दिया। 'इप्टा' ने अपनी प्रथम थिएटर परियोजना 'नवान्न' में दो अभिनेत्रियों (तृप्ति मित्रा, शोभा सेन) को शामिल और प्रशिक्षित कर रंगमंच पर उतारा। इन्हें अलग किस्म की अभिनेत्रियों के रूप में प्रचारित किया गया। ये दो अग्रणी अभिनेत्रियाँ बाद में दो प्रमुख थिएटर-समूह की सह आयोजक बन गईं, जो 'इप्टा' के बाद की अवस्था में एक दूसरे में विलीन हो गए। बंगाल के प्रगतिशील स्वैच्छिक कलाकार आंदोलन की अगुआ बनी इन दोनों ने आगे चलकर दो निर्देशकों से विवाह कर लिया। तृप्ति मित्रा ने शंभु मित्रा के साथ विवाह किया और शोभा सेन ने अपने पूर्व पति को तलाक देकर उत्पल दत्त से 1961 में विवाह किया। वे थिएटर की दुनिया की मुख्य अभिनेत्री बन गईं। ऐसी स्थिति में, जब हमेशा अभिनेत्रियों की कमी बनी रहती थी, उनकी सुनिश्चित निष्ठा ने निर्देशकों के हित में अच्छा काम किया।

अभिनेत्री-कथा का यह नया दौर संभवतः स्वयं अभिनेताओं की कथा के भीतर अपना स्थान बनाने के लिहाज से काम कर रहा था। यह नई पीढ़ी, जो थिएटर की स्थिति को उभार रही थी शिक्षा, श्रेणी और सामाजिक पृष्ठभूमि की दृष्टि से व्यावसायिक अभिनेताओं से काफी भिन्न थी। एक नए ऐतिहासिक थिएटर आंदोलन के रुप में इप्टा एक महत्वपूर्ण साधन था। इस संबंध में, अभिनेताओं ने नामकरण की पद्धति के रूप में 'सांस्कृतिक कार्यकर्ता' को अपनाया, लेकिन अभिनेत्रियों ने बड़ी मुश्किल से इसे अपनाया। 'अभिनेत्री' नाम आम तौर पर प्रचलित रहा।

द्वितीय विश्वयुद्ध के अंत में वीमेंस इंटरनेशनल डेमोक्रेटिक फेडरेशन की तुलना में अधिक राजनीतिक संगठन 'नेशनल फेडरेशन ऑफ इंडियन वीमेन' का गठन हुआ। तब तक एम.ए.आर.एस का विलय एन.एफ.आई.डब्ल्यू. में हो गया था। 1948 में कम्युनिस्ट पार्टी पर प्रतिबंध के साथ ही महिला-गतिविधियाँ भी अन्य पार्टी नेताओं के साथ भूमिगत हो गईं। वीमेंस इंटरनेशल डेमोक्रेटिक फेडरेशन (डब्ल्यू आई डी एफ) के 1945 में संपन्न तृतीय कांग्रेस में रेणु चक्रवर्ती, सुशीला गुप्ता और विद्या मुंशी की सक्रिय भूमिका के कारण एम.एफ.आई.डब्ल्यू को पुनर्जीवित कर दिया गया। विभाजन और कम्युनिष्ट पार्टी के भीतर असहमति के कारण 1960 के दशक में भारत-चीन युद्ध एवं सरकार की नीतियों के प्रति भय से संबंधित एन.एस.आई.डब्ल्यू. मार्स से अलग हो गया, जिसको भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी मार्क्सवादी, पंकज आचार्य, ज्योति चक्रवर्ती, माधुरी दासगुप्ता और कनक मुखर्जी ने पुनर्जीवित किया।

महिलाओं के आंदोलन और उनकी सांस्कृतिक सक्रियता के परिप्रेक्ष्य में एन.एफ.आई.डब्ल्यू. अथवा एम.ए.आर.एस. ने कभी भी सांस्कृतिक आंदोलन में भाग नहीं लिया। इन्होनें कामकाजी वर्ग की महिलाओं को प्राथमिकता दी तथा उनमें स्वास्थ्य, स्वच्छता जैसे विषयों पर जागरुकता पैदा की। विधा मुंशी ने एन.एफ.आई.डब्ल्यू. का इतिहास लिखते हुए उन व्यापक सांस्कृतिक आंदोलन का जिक्र किया है, जिनका प्रचार आंरभिक वर्षों में लैंगिक जागरुकता के लिए किया गया।

महिलाओं के लिए खास तौर पर संचालित सांस्कृतिक कार्यक्रमों यथा, पंजाब में गिद्धा, गुजरात में 'गरबा' अथवा महाराष्ट्र में 'लावनी' का उपयोग व्यापक रूप से सांस्कृतिक संबंध विकसित करने हेतु किया जाता था। उदाहरणार्थ, पंजाब में यह रिवाज था कि गाँव की सारी महिलाएँ उस घर के सामने जमा हो जाती थीं, जहाँ कोई पुत्र पैदा हुआ करता था, और उस अवसर पर आनंद मनाने के लिए 'गिद्धा' नृत्य का आयोजन किया जाता था। लोक स्त्री सभा के सदस्यों ने ठीक वैसे ही पुत्रियों के जन्म के अवसर पर इसका आयोजन कर इस परंपरा को बदल दिया। उत्तर प्रदेश और बिहार में प्रचलित 'नौटंकी', गुजरात में 'भवई', बंगाल में 'जात्रा' अथवा महाराष्ट्र में 'पावड़ा' का आयोजन भी सामाजिक मुद्दों को प्रचारित करने के उद्देश्य से किया जाता था।

महिला आंदोलन की क्रियात्मक रणनीति : नुक्कड़ नाटक

दीनबंधु मित्रा के 'नील दर्पण' से लेकर हरिश्चंद्र के "दुर्लभ बंधु" जैसे तमाम नाटक जो इप्टा द्वारा मंचित किए गए, उन सबने औपनिवेशिक काल के दौरान होने वाले स्त्रियों के शोषण तथा स्वाधीनता आंदोलन में उनकी सहभागिता को एक साथ प्रस्तुत किया। हालाँकि ये सभी कथानक राष्ट्रवाद के ईद-गिर्द ही बुने जा रहे थे। नाटककार स्त्रियों के प्रति होने वाली हिंसा को समुदाय अथवा राष्ट्र की प्रतिष्ठा के प्रति हो रही हिंसा के साथ जोड़ कर देख रहे थे। दूसरे, उन्होंने महिला कार्यकर्ताओं की छवि को उस बलिदानी रूप में प्रस्तुत किया जिसमें राष्ट्र की रक्षा के लिए वे अपने प्राण भी न्यौछावर करने को तैयार थी। अर्थात स्त्री की बदलती हुई भूमिका को भी पितृसत्तात्मक राष्ट्रवादी विमर्श में समाहित करने का प्रयास किया जा रहा था।

इस दृष्टि से प. राधेश्याम कथावाचक द्वारा लिखित नाटक 'परिवर्तन' उल्लेखनीय है। 1926 में लिखित यह नाटक अपने नाम के अनुरूप ही परिवर्तनकारी था। इस नाटक को सबसे पहले न्यू अल्फ्रेड नाटक कंपनी ऑफ बंबई द्वारा एशिया महाद्वीप के कई हिस्सों में मंचित किया गया। यही वह दौर भी था जब स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाओं की सहभागिता राजनीतिक एजेंडे के तहत चरम पर थी। इस नाटक का कथानक त्रिकोण पर आधारित था जो समाज सुधार तथा देश भक्ति के प्रश्न में निहित जटिलताओं पर प्रकाश डालता था। नाटक की तीन प्रमुख पात्र लक्ष्मी (एक समर्पित एवं सुघड़ गृहिणी), चंदा (एक वेश्या) तथा माया (एक अँग्रेजीदाँ महिला जिसने परंपरागत मूल्यों को खारिज कर दिया था) थीं। तीनों महिलाएँ केंद्रीय भूमिका में थीं। इस नाटक में पुरुष पात्र के मन में नैतिक दुविधा को उठते हुए दिखाया गया था जिसे अपनी पत्नी और वेश्या में किसी एक का चुनाव करना था। अंततः वह एक नैतिक चुनाव के रूप में अपनी पत्नी को चुनता है। इस नाटक के जरिए राष्ट्र की परिधि के अंदर एक पत्नी, वेश्या तथा अँग्रेजी शिक्षा-दीक्षा प्राप्त महिला के लिए 'स्थान' को लेकर बहस पैदा करने की कोशिश की गई थी। अंततः यह नाटक चंदा के सुधार के साथ समाप्त होता था जहाँ वह अपना जीवन राष्ट्र की सेवा के लिए समर्पित करने को तैयार होती है और अपनी कमाई हुई संपत्ति से एक महिला महाविद्यालय खोलने का निर्णय लेती है। नाटककार चंदा के इस कृत्य के लिए उसे देवी का स्थान देते हैं और उसे विभिन्न हिंदू धार्मिक नामों जैसे सावित्री, दमयंती, गार्गी तथा गांधारी से विभूषित करते हैं। वहीं माया को अपनी भूल का अहसास होता है और वह लक्ष्मी की तरह ही आदर्श गृहिणी बनने का निर्णय लेती है। अंततः यह नाटक भी अन्य नाटकों की तरह नैतिक शिक्षा के साथ खत्म होता है कि स्त्रियों की छवि राष्ट्र हित में होनी चाहिए। इस तरह के नाटकों की हमारे पास भरमार है जो वर्चस्वशाली राष्ट्रवादी विमर्श को मजबूती प्रदान करने के लिहाज से लिखे गए थे और हिंदू स्त्री-पुरुष पर भिन्न-भिन्न तरीके से नैतिक दबाव बना रहे थे।

यहाँ इस नाटक का जिक्र करने का मकसद दरअसल औपनिवेशिक शासन काल के दौरान रंगमंच की दुनिया में स्त्रियों के प्रश्न को लेकर पनप रही दुविधा को व्यक्त करना था। राष्ट्रवादी पुरुष स्त्रियों की भूमिका को परिभाषित करते हुए उससे आदर्श पत्नी और माँ होने की अपेक्षा कर रहा था। इसके साथ ही, आधुनिक एवं परंपरागत स्त्री के मध्य उनकी भूमिका को लेकर भी बहस जारी थी। राष्ट्रवादी पितृसत्ता ने 'संभ्रांत स्त्री' को जिस रूप में प्रस्तुत किया था उसमें वेश्या और अँग्रेजीदाँ स्त्री किसी भी लिहाज से फिट नहीं बैठती थी। जो स्त्री अपनी शिक्षा के बल पर आधुनिक हो रही थी, सुगृहिणी के रूप में उसकी विश्वसनीयता भी घर-गृहस्थी के प्रति उसके समर्पण भाव से तय होती थी। घर एक ऐसा स्थान था जो राष्ट्रवादी पितृसत्ता का आधार था जहाँ से राष्ट्र एवं स्त्रियों के सवाल हल हो रहे थे।

'संभ्रांतता' के इस मापदंड का असर यह हुआ कि स्त्रियों की आवाज एक बार फिर दबा दी गई और वे हाशिए पर धकेल दी गई। राष्ट्रवाद के पूरे विमर्श में स्त्रियों की भूमिका एक सहयोगी की रह गई। उन्हें सिर्फ वही भूमिकाएँ निभानी थीं जो उन्हें प्रदान की गई थीं। ठीक यही स्थिति थिएटर की दुनिया में भी थी। साथ ही, राष्ट्रवाद की पितृसत्तात्मक मनोवृत्ति एवं रंगमंच में विद्यमान स्त्रियों के प्रति धारणा, वैचारिक तौर पर एक दूसरे को संबल प्रदान कर रहे थे। जो महिलाएँ रंगमंच में आ रही थीं आमतौर पर उन्हें वेश्या के रूप में देखा जाता था। यही कारण था कि अनेक नाटक कंपनियाँ अपने यहाँ महिला कलाकारों को नियुक्ति नहीं करती थीं। महिला कलाकारों और नर्तकियों के प्रति यह रवैया 1947 तक कायम रहा। विनोदिनी दासी बंगाल में 19वीं सदी की एक मशहूर अभिनेत्री थी जिसने अपना सर्वस्व जीवन थिएटर को समर्पित कर दिया था, को भी समाज में सम्मान प्राप्त नहीं हो सका। इसके दो कारण थे; एक तो वह एक वेश्या की पुत्री थी, दूसरे उसने रंगमंच को अपना व्यवसाय बनाया था। इतना ही नहीं, राष्ट्रवादी आंदोलन के दौरान वामपंथी सांस्कृतिक इकाई के रूप में उभरी इप्टा जिसकी शुरुआत एक महिला ने की थी और अनगिनत महिलाएँ इसमें सक्रिय थीं उसका एजेंडा भी राष्ट्रीय हित था जिसका परिणाम यह हुआ कि घरेलू दुनिया में महिलाओं के मुद्दों को लगातार अनदेखा किया गया।

यह रवैया 1970 में जाकर तब कम होना शुरू हुआ जब विभिन्न नारीवादी समूहों ने महिला मुद्दों के प्रति चेतना जागृति का कार्य शुरू किया और अपने संघर्षों को नुक्कड़ नाटकों के जरिए सड़क पर लेकर आईं। कुछ महत्वपूर्ण नारीवादी संगठनों जैसे जागोरी, स्त्री मुक्ति संगठन, गरीब, जोगरी संस्थान, थिएटर यूनियन तथा सहेली ने इस कार्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हालाँकि इस संबंध में अधिक लिखित दस्तावेज उपलब्ध नहीं है परंतु व्यक्तिगत प्रयासों के कारण जो थोड़े बहुत साक्ष्य उपलब्ध हैं, उनसे यह पता चलता है कि किस प्रकार इन स्वायत्त संगठनों ने औरतों की कहानी और रोजमर्रे की उनकी तकलीफों को सार्वजनिक मुद्दे के तौर पर पेश किया।

1947 के बाद स्त्री सशक्तीकरण तथा सामाजिक परिवर्तन के उद्देश्य से महिला नुक्कड़ नाटकों की शुरुआत हुई। स्वतंत्र भारत के अग्रणी नेताओं द्वारा सभी नागरिकों को समान अधिकार दिए जाने का वायदा किया गया था। परंतु संवैधानिक रूप से स्त्री-पुरुष को समान नागरिक अधिकार एवं दर्जा दिए जाने के बावजूद नारीवादियों ने यह महसूस किया कि वे सभी वायदे कहीं पीछे छूट गए थे। खासतौर पर यह बात हिंदू कोड बिल के संदर्भ में महसूस की गई। 1955 में पास हुए इस बिल में महिलाओं को संपत्ति में कुछ अधिकार देने के वायदे किए गए तथा विवाह एवं तलाक संबंधी मामलों में स्त्री पुरुष को समान दर्जा देने का आश्वासन भी दिया गया। परंतु समानता के अधिकार के ये वायदे बहुत हद तक एकांगी थे जिसके कारण महिलाएँ लगातार सार्वजनिक एवं घरेलू जिंदगी में सामाजिक अन्याय की शिकार होती रहीं।

1970 के दशक में सामाजिक हिंसा और महिलाओं के प्रति हो रहा शोषण 'दहेज हत्याओं' के रूप में हमारे सामने आया। ये हत्याएँ वधू पक्ष द्वारा वर पक्ष की माँगों को पूरा न कर पाने के कारण होती थीं। भारत में इस प्रकार के 'पारिवारिक झगड़े' लगभग सभी जातियों, वर्गों, धर्मों तथा समुदायों में सामान्य बात थे। वास्तविकता यह थी कि दहेज की शर्त पत्नी उत्पीड़न का पर्याय बन गई थी। महिला आंदोलन के लिए उस दौर में यह क्रूरता प्रमुख मुद्दा थी। कम्युनिस्टों तथा वामपंथी पार्टियों ने भी क्षोभ के साथ यह बात स्वीकारी कि यह कुरीति उनके अपने सदस्यों के बीच भी जारी है।

पत्नी-उत्पीड़न का यह मुद्दा सारे देश के महिला आंदोलन का केंद्र-बिंदु बन गया। दहेज के विरुद्ध चलाए जाने वाले अभियान के अंतर्गत महिला कार्यकर्ताओं को पीड़ित महिलाओं से बार-बार होने वाली मुलाकातों और उनकी व्यथा-कथा सुनकर यह बात समझ में आ रही थी कि इस देश में स्त्रियों को अनेक संकटों का सामना करना पड़ रहा है। नारीवादी समूह स्वयं भी उनकी कोई सहायता कर पाने में खुद को लाचार महसूस कर रहे थे।

समकालीन नारीवादी आंदोलन में दहेज के विरुद्ध प्रारंभिक विरोध हैदराबाद में सन् 1975 में प्रगतिशील महिला संगठन द्वारा दर्ज कराया गया। अनेक बार संगठन द्वारा आयोजित प्रदर्शनों में महिलाओं की संख्या सौ तक पहुँच गई फिर भी उनका विरोध प्रदर्शन पूर्णरूपेण आंदोलन की शक्ल नहीं ले पाया। लगभग दो वर्षों की खामोशी के बाद दहेज के विरुद्ध आंदोलन दिल्ली में शुरू हुआ। यह आंदोलन इस बार महिलाओं के दहेज-उत्पीड़न पर केंद्रित था। खासतौर से दहेज हत्या के विरुद्ध पंजाब, महाराष्ट्र, कर्नाटक, गुजरात, मध्य-प्रदेश, पश्चिम-बंगाल सहित भारत के अनेक भागों में विरोध अभियान चल रहे थे परंतु दहेज संबंधी अपराधों के विरुद्ध विस्तृत आंदोलन दिल्ली में ही चल रहा था। इसका कारण यह था कि दिल्ली में दहेज के कारण होने वाली हत्याओं की संख्या सबसे अधिक थी।

अब तक आग लगने से होने वाली मौतों को आत्महत्या के रूप में लिया जाता था, और दहेज-उत्पीड़न को आत्महत्या का कारण बहुत कम माना जाता था। आमतौर पर पुलिस द्वारा भी ऐसे मामलों को 'पारिवारिक और निजी' कहकर नजरअंदाज कर दिया जाता था। इसे राज्य की चिंता का विषय नहीं माना जाता था। बहरहाल, दशकों से चली आ रही इस उदासीनता का नारीवादियों ने विरोध किया तथा आग लगने से होने वाली मौतों को यह कहते हुए कि उनकी औपचारिक 'आत्महत्याएँ' आत्महत्याएँ नहीं, बल्कि हत्याएँ है, उसे दहेज उत्पीड़न से जोड़ना शुरू किया गया। कुछ मामलों में दहेज हत्या की शिकार महिलाएँ बयान देने के लिए काफी देर तक जीवित रहीं और उन्होंने अपने मृत्यु-पूर्व बयान में सास-ससुर द्वारा दहेज के लिए तंग किए जाने का उल्लेख भी किया परंतु पुलिस ने इतनी सुस्त और देर से कारवाई की कि हत्यारे साक्ष्य मिटाने में कामयाब हो गए और हत्या के मामले को आत्महत्या कह कर सारा मामला रफा-दफा कर दिया गया।

बहरहाल, नारीवादियों ने इस स्थिति के विरुद्ध यह कहते हुए आवाज बुलंद की कि मृत्यु-पूर्व महिला द्वारा दिए गए बयान को साक्ष्य माना जाए और पुलिस के तौर तरीकों को चुस्त किया जाए तथा समाज हत्यारों का बहिष्कार करे। कुछ लोगों पर इसका असर भी हुआ। उन्होंने सहमति जताते हुए धरने में भी भाग लिया। स्त्री संघर्ष द्वारा किया गया विरोध प्रदर्शन इतना तीव्र था कि अभियुक्तों के घर पहुँचते-पहुँचते जुलूस तीन गुना बड़ा हो जाता। इस जुलूस में हत्यारों के पड़ोसी, अपने बच्चों के साथ शामिल होते, सफाई कर्मचारी, घरेलू नौकर तथा आसपास से गुजरने वाले लोग भी इसमें शामिल हो जाते। इस सफलता को देखते हुए नारीवादियों ने दहेज के मुद्दे को उठाने के लिए लोगों से संवाद का सीधा तरीका खोजने की जरूरत महसूस की। नए तरीके तलाशने के लिए हुई चर्चा के दौरान 'नुक्कड़ नाटक' का सुझाव उभरा। जिसके पश्चात दहेज हत्या पर आधारित पहला नुक्कड़ नाटक 'ओम स्वाहा' खेला गया। नाटक की कहानी दो महिलाओं की दहेज हत्या पर आधारित थी। इसकी लोकप्रियता इतनी बढ़ी कि सभी क्षेत्रों से समिति के पास नाटक के प्रदर्शन के अनुरोध आने लगे। लोगों ने नारी रक्षा समिति को पत्र लिखकर उनके क्षेत्रों में आने तथा 'नुक्कड़ नाटक' करने का अनुरोध किया। नाटक करने वाली अधिकतर महिलाएँ मध्यवर्गीय थी। उनकी ओर से पहली बार यह सक्रिय प्रयास किया गया।

राजनीतिक रूप से अस्थिर इस वातावरण में कई प्रतिरोधी आंदोलन जैसे - छात्र आंदोलन, मजदूर हड़ताल, कृषक आंदोलन का जन्म हुआ था जिसके परिणामस्वरूप आनन-फानन में सरकार को इमरजेंसी (1975-77) की घोषणा करनी पड़ी। इसी क्रम में कई महिला संगठनों का भी गठन हुआ जैसे बंबई में फोरम अगेंस्ट ऑप्रेशन ऑफ वुमेन, विमोचना, स्त्री शक्ति संगठन, सहेली, जागोरी आदि। इन सभी संगठनों ने राज्य को इस बात के लिए सीधे तौर पर उत्तरदायी ठहराया कि वह महिलाओं के प्रति हो रही हिंसा के प्रति जरा भी सजग नहीं है और सरकार से इस तरफ विशेष ध्यान देने की अपील की।

1979 में दिल्ली में नारीवादियों के एक समूह ने पहली नारीवादी पत्रिका 'मानुषी' की शुरुआत की जिसने बुलंद आवाज में दहेज जैसी कुप्रथा की विरोध करते हुए महिला आंदोलन को एक महत्वपूर्ण मंच उपलब्ध कराया। 1978 में दिल्ली में सुभद्रा बुटालिया ने दहेज को अपने प्रतिरोध का मुख्य विषय बनाया। अन्य सभी गतिविधियों के अतिरिक्त इन संगठनों ने नारे लिखे, दहेज पीड़ितों के घर के सामने धरना प्रदर्शन किया तथा पुलिस के दस्तावेजों की छानबीन शुरू की।

नारीवादी कार्यकर्ताओं ने नुक्कड़ नाटकों के माध्यम से इन सामजिक कुप्रथाओं को सबके सामने उठाने का तरीका अपनाया। यह नाटक सिर्फ निर्देशात्मक ही नहीं थे, बल्कि मनोरंजक भी थे। उदाहरण के लिए कई महीनों तक लगातार दहेज हत्याओं के विरुद्ध धरना प्रदर्शन करते हुए, नारे लगाते हुए, पोस्टर लगाते हुए 'स्त्री संघर्ष' ने यह महसूस किया कि 'नुक्कड़ नाटक वास्तव में लोगों को संबोधित करने का सबसे सीधा और सरल तरीका था'। अनुराधा कपूर, रति बार्थोलोम्यू तथा माया राव के प्रयासों से 'स्त्री संघर्ष' ने 'थिएटर यूनियन' नाम की इकाई का गठन किया जिसका उद्देश्य नाटकों के माध्यम से स्त्री अधिकारों के प्रति जनता में जागरूकता पैदा करना था।

1980 में पहली बार थिएटर यूनियन द्वारा 'ओम स्वाहा' नामक नुक्कड़ खेला गया जिसे जनता ने इतना पसंद किया की बाद में कई स्थानों पर इसे खेला गया। पूरे नाटक का कथानक एवं संवाद जैसा कि अनुराधा कपूर बताती हैं :

"पंजाबी लोकगीत और वहाँ की स्थानीय बोली में लिखे गए इन नाटकों ने आम लोगों के बीच ऐसा असर पैदा किया कि ज्यादा से ज्यादा लोग दहेज जैसी कुप्रथा के खिलाफ बोलने लगे और औरतों की वर्तमान दशा से मुक्ति के लिए कृतसंकल्प होने लगे। 'ओम स्वाहा' जैसे नाटक ने जनता में यह संदेश फैलाने में सफलता हासिल कर ली थी कि घरों के बंद दरवाजों के भीतर अभी बहुत कुछ ऐसा है जिस पर बात किया जाना जरूरी है"।

अनुराधा कपूर इस प्रदर्शन की सफलता का जिक्र करती हुई बताती हैं कि नाटक का दर्शकों पर इतना जबरदस्त असर होता था कि नाटक खत्म होने के बाद औरतें झुंडों में हमारे पास आती थीं और पूछती थी कि 'हमें किसी चीज की जरूरत तो नहीं'।

भारत में महिला थिएटर ग्रुप के रूप में थिएटर यूनियन ने न सिर्फ दहेज हत्या जैसे मुद्दों को उठाया बल्कि सती-प्रथा और पुलिस हिरासत में होने वाले बलात्कारों को भी अपने प्रदर्शनों में मुद्दा बनाया। बलात्कार के मुद्दे को नाटक दफा 108 में उठाते हुए पुलिस हिरासत में महिलाओं के अधिकारों से दर्शकों को अवगत कराया जाता। समूह ने इस नाटक को कॉलेजों, पार्कों तथा उन झुग्गी बस्तियों में कई-कई बार दिखाया जहाँ की औरतों को पुलिस वेश्या होने के संदेह पर गिरफ्तार करती थी और जेल के अंदर महिलाएँ कई दिनों तक बलात्कार का शिकार होती थीं।

दिल्ली में थिएटर यूनियन के अतिरिक्त भारत के अन्य शहरों और गाँवों में भी कई थिएटर कार्यशालाओं का आयोजन किया गया जिसमें जन नाट्य मंच जिसे माला हाशमी चला रही थीं, शमशुल इस्लाम की निशांत जिसमें हबीब तनवीर और बादल सरकार जैसे कार्यकर्ता शामिल थे, अह्वान जैसे संगठन सभी साथ मिलकर आवाज उठा रहे थे। इनमें से कई समूहों ने अपने नाटक खुद लिखे और खुद ही उनका निर्देशन किया। झुग्गी-बस्तियों, सड़कों, पब्लिक-पार्कों, फुटपाथों, विश्वविद्यालय-परिसरों में इन नाटकों को खेलते हुए आवश्यकतानुसार इसमें परिवर्तन और संशोधन भी किए जाते रहे।

इन संगठनों के अतिरिक्त कई छोटे-मोटे संगठन भी थे जिन्होंने अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान दिया परंतु मुख्यधारा की मीडिया द्वारा उसका दस्तावेजीकरण नहीं किया जा सका। 1991 में हेमा रैंकर के निर्देशन में 15 किसान महिलाओं और दो पुरुषों के साथ किए गए नाटक 'अबला स्त्री' पर एक सामूहिक चर्चा आयोजित की गई और इसी के आधार पर एक और नाटक भी किया जिसका नाम था, 'सामाजिक बंधन'। स्त्री मुक्ति संगठनों ने 'मुलगी झाली आहे' नामक नाटक किया जिसे महाराष्ट्र के 2000 लोगों के बीच प्रदर्शित किया गया। ज्योति म्हापसंकर जो इस संगठन की निर्देशिका थी ने बताया हैं कि :

"मैंने इस नाटक को लिखा था। यह नाटक उन महिलाओं से प्रेरित था जो इतने शोषणकारी एवं दमनकारी परिस्थियों में अपना जीवन गुजारती हैं, इस नाटक को देखने के बाद कई लोग इस संगठन के सदस्य बने"।

इसके अतिरिक्त, शीला रानी द्वारा शुरू किए गए एक समूह ने दो महीने तक तमिलनाडु में नुक्कड़ नाटकों का आयोजन किया। यह आयोजन उस शिक्षा अभियान का हिस्सा था जो कन्या भ्रूण हत्या के विरुद्ध जागरूकता पैदा करने के लिए चलाया जा रहा था। रंगमंच के अधिकांश कलाकार यह मान रहे थे कि महिलाओं द्वारा झेले जा रहे शोषण को व्यक्त करने का थिएटर एक आसान और प्रभावकारी माध्यम था। अपनी गतिशीलता के कारण लोगों के थिएटर पहुँचने की बजाए यह लोगों तक पहुँच रहा था। वे लोग जिनके पास बहुत कम समय होता था, जो धरने में भाग लेते थे, उनके घरों के सामने होने वाले इस प्रकार के नुक्कड़ नाटकों ने स्त्रियों द्वारा किए जा रहे संघर्ष को और मजबूती प्रदान की। कई बार नाटक पीड़ित महिलाओं को भी यह अवसर उपलब्ध कराते थे कि वे अपने अनुभव लोगों से साझा करें। नुक्कड़ नाटकों के प्रदर्शन में बहुत कम संसाधनों की आवश्यकता पड़ती थी, वे कम खर्चीले भी थे, छोटे बजट में किए जा सकते थे और कलाकारों को कोई मेहनताना भी नहीं देना पड़ता था।

सहेली के साथ जुड़ी एक कार्यकर्ता का मानना है कि :

"वे सभी कार्यकर्ता जो सामाजिक मुद्दों पर नाटक किया करती थीं, उन्हें नुक्कड़ नाटक में यह संभावना दिखती थी कि वे अपने मुद्दों और प्रतिरोध को सड़क पर ला सकें। महिलाओं के अधिकारों के लिए अभियान चला सकें तथा मीडिया, राजनीति और सरकार की स्त्री संबंधी नीतियों एवं कार्यक्रमों में हस्तक्षेप कर सकें"।

सहेली की इस कार्यकर्ता ने इस माध्यम के प्रभाव तथा महिलाओं के स्वास्थ्य, दहेज तथा अन्य मुद्दों पर बने नाटकों की रचना तथा प्रस्तुति पर भी विस्तारपूर्वक चर्चा की। महिलाओं के थिएटर की एक और ध्यान वाली बात यह थी कि वे अपनी घरेलू जिंदगी की तकलीफों और समस्याओं को जाहिर करने के लिए मशहूर नारों और लोक परंपराओं का सहारा लेती थी। खासतौर पर, नारों के जरिए वे नाटकों को बोझिल और उबाऊ बनाने की बजाए रोचक और मरोरंजक बनाती थीं। साथ ही, इस क्रम में वे दर्शकों के साथ एक रिश्ता भी बनाती थीं। वे जताती थीं कि जिस तरह हमारे गीत तुम्हारे हैं, उसी तरह हमारे संघर्ष भी तुम्हारे हैं। कई थिएटर ग्रुप ऐसे भी थे जो अपना शीर्षक ही ऐसा चुनते जिसमें सामूहिकता का बोध हो। उनके नाम से ही दर्शकों को उनके एजेंडे के बारे में पता लग जाता था। वे सभी समस्याएँ जिनका सामना औरतें कर रही थीं उन्हें सिर्फ एक सामाजिक कारण के रूप में ही नहीं देखा गया बल्कि उन्हें जाहिर करने के लिए नाट्य प्रविधि का भी सहारा लिया गया। इन संगठनों ने इस कार्य के लिए बड़ी संख्या में महिलाओं को कलाकार, लेखिका तथा कहानी सुनाने वाली के रूप में शामिल किया। अपनी कहानी कहते हुई अभिनेत्रियाँ सिर्फ अपने व्यक्तिगत अनुभवों पर ही केंद्रित नहीं थी, बल्कि वे उन तरीकों को भी उजागर करती थीं जिनके द्वारा सामाजिक मूल्यों एवं अपेक्षाओं की परिधि में उन्हें बाँधकर रखने का प्रयास करती थीं। नाटकों को रचने की प्रविधि में भी यह कोशिश की जाती थी कि उनकी आपबीती को साझा करने के क्रम में ही नाटक का कथानक भी तैयार हो सके और थोड़ी बहुत फेरबदल के साथ उसे प्रस्तुत किया जा सके। इसका अर्थ यह था कि दर्शकों के बीच से ही सवाल पैदा हों और उन सवालों को स्त्री सशक्तिकरण के संदर्भ में समझने की कोशिश की जाए।

कई महिलाओं को नुक्कड़ नाटकों में भाग लेने के कारण अपनी घरेलू पहचान के इतर एक सीमित भूमिका की बजाए एक नई स्वतंत्र सामाजिक पहचान बनाने का मौका भी मिल रहा था। नुक्कड़ नाटक की एक रिपोर्ट में एक महिला कलाकार के अनुभव का उल्लेख करते हुए बताया गया कि यह महिला 10वीं पास थी जिसे आगे पढ़ने की अनुमति नहीं दी गई। एक बार जब महिला नाट्य समूह उसके गाँव अपनी प्रस्तुति देने गया तब वह इस समूह में शामिल हो गई। उसने थिएटर समूह को अपने सशक्तिकरण के रूप में देखा। उसकी आजादी तथा महिला मुद्दों के प्रति उसके योगदान ने गाँव के अन्य स्त्री पुरुषों को भी इस काम के लिए प्रेरित किया। कई महिला कलाकारों ने इसमें काम करते हुए 'सामाजिक सम्मान' का भी अनुभव किया।

इन्‍हीं महिलाओं में से कुछ अकादमिक जगत की भी महिलाएँ भी थीं जिनका जुड़ाव हमेशा महिला आंदोलनों के साथ बना रहा। अनुराधा कपूर, रति बार्थलोम्यू, माया कृष्‍ण राव, उषा गांगुली, त्रिपुरारी शर्मा तथा कीर्ति जैन जैसी स्त्रियों ने नाटक को एक माध्‍यम के रूप में स्‍त्री-प्रतिरोध की सांकेतिक अभिव्‍यक्ति प्रदान की। यह सिर्फ तत्‍कालीन घटनाओं पर केंद्रित अभिव्‍यक्ति नहीं थी, बल्कि समाज में गैर बराबरी और दोयम दर्जे से पैदा होने वाले दंश की अभिव्‍यक्ति भी थी। उनके द्वारा निर्देशित नाटकों, अभिनीत पात्रों तथा रचित कथानकों के कारण एक तरफ जहाँ महिला आंदोलनों को संबल मिला, वही दूसरी तरफ नाटक की दुनिया में अब वे मात्र पात्र न होकर अपनी मजबूत उपस्थिति भी दर्ज करा रही थीं। अब यह समूह स्‍थापित नाट्य परंपरा, नाट्य प्रविधि और संरचना में अपना सकारात्‍मक हस्‍तक्षेप दर्ज करा पाने की स्थिति में पहुँच चुका था। नाट्य जगत के बुद्धिजीवियों ने भले ही उनके कार्यों को पुरुषों के समकक्ष नहीं माना परंतु उनकी समझ और निर्देशकीय क्षमता को नजरअंदाज भी नहीं कर सकते थे। कई बार इन महिलाओं द्वारा किए जाने वाले कार्यों को एक खास पुरुषवादी मनोवृत्ति के तहत 'नारीवादी' या महिला निर्देशिका, महिला अभिनेत्री कह कर उन्‍हें अलग पहचान देने की कोशिश भी की गई। अनुराधा कपूर, त्रिपुरारी शर्मा, माया राव जैसी स्त्रियाँ है जो यह मानती है कि नाटक 'स्‍व की जड़ता' से मुक्ति का माध्‍यम है जिसे पुरुष या स्‍त्री के खाँचों में विभाजित नहीं किया जा सकता। परंतु यह भी उतना ही सत्‍य है कि नाटक के निर्देशन के दौरान एक स्‍त्री की दृष्टि वही नहीं हो सकती जो एक पुरुष की होती है। निस्संदेह महिलाएँ ज्‍यादा संवेदनशीलता एवं एक नवीन दृष्टि के साथ काम करती है, जिसके कारण प्रस्‍तुति में भी फर्क पड़ता है। किसी व्‍यक्ति की निर्देशकीय या अभिनय क्षमता का मूल्‍यांकन उसके स्‍त्री पुरुष होने के आधार पर किया जाना अनुचित है। दरअसल यह एक खास किस्‍म की पुरुषवादी मनोवृत्ति है जो महिलाओं को अलग पहचान देने के क्रम में भी उनके बराबरी के अधिकार का हनन करती है। साथ ही, वे यह भी मानती हैं कि अपनी रंगयात्रा में उन्‍होंने और उनकी जैसी लगभग सभी साथी कलाकारों ने अनगिनत बार पुरुषों के साथ काम करते हुए एक अहम भाव और संरक्षित किए जाने की स्थिति का सामना किया

इन समस्‍त महिलाओं की जीवन एवं रंगयात्रा को जानने-समझने के क्रम में यह तथ्‍य स्‍पष्‍ट हुआ कि रंगमंच की दुनिया में स्त्रियों की बतौर निर्देशिका, अभिनेत्री, समीक्षक उपस्थिति पहले की अपेक्षा बढ़ी है। उन्‍होंने अपने कौशल और क्षमता से स्‍वयं को स्‍थापित किया है। इन महिलाओं के आने का सबसे व्‍यापक असर यह हुआ कि विश्‍व-भर में वृहद स्‍तर पर चल रहे विभिन्‍न आंदोलनों एवं प्रतिरोध के अंदर स्‍त्री संघर्ष को एक अलग समझ के साथ अभिव्‍यक्‍त करने का अवसर मिला। इस क्रम में बी जयश्री की 'मंथरा', उषा गांगुली की 'रूदाली', अनुराधा कपूर की 'एंटीगनी प्रोजेक्‍ट', माया कृष्‍ण राव की 'ए डीप फ्राइड जैम', त्रिपुरारी शर्मा की 'महाभारत से', कीर्ति जैन की 'और कितने टुकड़े', अमाल अल्‍लाना की 'सोनाटा', जे शैलजा की 'थात्री' मीता वशिष्‍ठ की 'नीति मानकीकरण', वीणा पानी चावला की 'वृहन्‍नला', नीलम मानसिंह चौधरी की 'किचन कथा' तथा मलयश्री हाशमी की 'वो बोल उठी' महत्‍वपूर्ण नाटक है। हालाँकि इनमें से अधिकतर निर्दोशिकाएँ स्‍वयं को 'महिला निर्देशिका' कहलाना पसंद नहीं करती बावजूद इसके, उनके नाटक स्‍त्री संवेदना एवं सरोकारों से जुड़े रहे हैं। कुछ महिलाएँ ऐसी हैं जो सहर्ष यह स्‍वीकार करती हैं कि वर्ततान सामाजिक परिदृश्‍य में यदि उनके द्वारा निर्देशित नाटक स्‍त्री संघर्ष एवं उसके प्रतिरोध को स्‍वर प्रदान करते हैं तो एक नारीवादी कार्यकर्ता के रूप में यह उनकी रणनीति का हिस्‍सा है। कीर्ति जैन तथा उषा गांगुली जैसी निर्देशिकाएँ यह मानती हैं कि :

"समाज में महिला निर्देशक अपना स्‍थान बनाने के लिए काफी काम कर चुकी हैं। कुछ लोगों को हमारे काम को मान्‍यता प्रदान करने में समस्‍या हो सकती है परंतु हमें इस समस्‍या का सामना करना है। हमारे नाटकों की विशिष्‍ट शब्‍दावली तथा सौंदर्यबोध को परंपरागत रंगकर्म के मापदंड पर आँका जा रहा है। महिला निर्देशक का लेबल लगने के कारण हमें जो अनुभव हुए उन्‍हीं के फलस्‍वरूप हमने उसका प्रतिकार किया। नारीवादी या महिला निर्देशक कहकर हमारी रचनात्‍मकता को नकारा जाता है और इस प्रकार के वर्गीकरण से हमें एक कमजोर श्रेणी में रखा जाता है ये वो लोग हैं जो आपकी सोच और सृजनात्‍मकता को प्रभावित करने का प्रयास करते हैं।"

अपनी रंगयात्रा के अनुभवों को साझा करने के क्रम में उन्‍होंने यह स्‍वीकार किया कि अभी भी रंगमंच की पितृसत्‍तात्‍मक व्‍यवस्‍था में महिलाओं के लिए वह स्‍थान निर्मित नहीं हो पाया है जिसकी वे हकदार हैं। नाट्य निर्देशन ऐसा क्षेत्र है जहाँ हमेशा से पुरुषों का वर्चस्व रहा है और इसलिए रंगमंच में संप्रेषण की जो भाषा बनी है उसका एक खास स्‍वरूप है। महिलाओं को अभी लंबा सफर तय करना है। इतने सारे बदलावों के बावजूद जो नहीं बदला है वह है समाज का महिलाओं के प्रति दृष्टिकोण। आज भी उन्‍हें सम्‍मानजनक दर्जा प्राप्‍त नहीं है। अभिनय या रंगमंच की किसी भी विधा में सक्रिय महिलाओं को आज भी पितृसत्‍तात्‍मक मनोवृत्ति 'संभ्रात स्‍त्री' मानने को तैयार नहीं है। इन महिलाओं के सार्वजनिक एवं व्‍यक्तिगत जीवन में कई विरोधाभासी परिस्थितियाँ विद्यमान हैं।

रंगमंच के इतिहास को तलाशना किसी भी क्षेत्र में महिलाओं की सहभागिता के इतिहास को जानने की तरह ही है। वस्‍तुतः यह प्रतिरोध और पुनर्सृजन का दस्‍तावेजीकरण है। जिसे संपन्‍न करने के दौरान कई रोचक कई बहसधर्मी एवं कई कड़वे तथ्‍यों से सामना हुआ। रंगमंच और महिलाओं के अंतर्सबंध को तलाशने के क्रम में यह आलेख अशंतः ही सफल हो पाया है। इसमें अभी आगे भी शोध कार्य किए जाने की प्रचुर संभावनाएँ विद्यमान हैं। हिंदी रंगमंच में विशेष तौर पर साहित्यिक हलकों के अतिरिक्‍त जो बहसें तत्‍कालीन पत्र-पत्रिकाओं में चलीं, उनका अलग से अध्‍ययन किया जाना शेष है, जिसके उपरांत हिंदी प्रदेशों में विद्यमान जेंडर पूर्वाग्रहों को रंगमंच की दृष्टि से जानने-समझने की संभावनाएँ पैदा होंगी। साथ ही जनवादी नाट्य समूहों और नारीवादी नाट्य समूहों द्वारा प्रस्‍तुत किए गए नाटकों का अध्‍ययन एवं विश्‍लेषण किए जाने की आवश्‍यकता है ताकि मुख्‍यधारा द्वारा व्‍याख्‍यायित स्‍त्री विषयक मुद्दों एवं नारीवादी समूहों द्वारा सामाजिक सांस्‍कृतिक व्‍यवस्‍था पर प्रश्‍न उठाने के क्रम में उसे स्त्रियों की दृष्टि से देखे जाने की प्रविधि के बीच के फर्क को समझा जा सके।


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