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बात-चीत

समाज में शोषक नहीं बदला बल्कि बदले केवल रूप : अभिमन्यु अनत
डॉ. अमित कुमार विश्वास


हिंद महासागर में मोती माने जाने वाले द्वीप मॉरीशस के त्रियोले में 09 अगस्‍त, 1937 को जन्‍मे अनत ने कवि, उपन्‍यासकार, कहानीकार, जीवनीकार, आत्‍मकथा लेखक, पत्रकार, संपादक, नाट्य निर्देशक, चित्रकार, फोटोग्राफर आदि अनेक रूपों में साहित्‍य और कला की असीम सेवा की है। अठारह वर्षों तक हिंदी का अध्‍यापन करने के पश्‍चात वह तीन वर्षों तक युवा मंत्रालय में नाट्य प्रशिक्षक रहे। मॉरीशस के ' महात्‍मा गांधी इंस्‍टीट्यूट' में उन्‍होंने भाषा प्रभारी के रूप में सेवा की। वे अपने देश की नैसर्गिक सुषमा से भाव विभोर नहीं होते, बल्कि मानसिक त्रासदी से उद्वेलित होते हैं। तकरीबन छह दशकों से 70 से अधिक रचनाओं के माध्‍यम से अनत अपने समाज पर होने वाले अत्‍याचार और शोषण के खिलाफ प्रश्‍नावाचक मुद्रा में खड़े होते हैं। उनकी लेखनी में सदैव आमजन की भावनाएँ मुखरित होती हैं और जमीन से जुड़ी भी। जमीन से जुड़ी रचनाओं की प्यास जीवन की वास्तविक प्यास होती है। इनकी रचनाएँ इसी प्यास को जगाती हैं। ' गिरमिटिया' कहे जाने वाले भारतीयों की निष्ठा, आस्था और श्रम के अवदान ने ही मॉरीशस की मिट्टी को ' लाल पसीना' से सींचकर हरा-भरा किया। अपने उपन्यासों में अभिमन्यु अनत अपने माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी के शोषण के अनुभवों को उकेरते हैं। इसमें मॉरीशस गए भारतीय गिरमिटिया मजदूरों की दासता, दमन और शोषण के गूँगे इतिहास को लेखक ने जीवित और जीवंत कर दिया है। उनका पहला उपन्‍यास 'और नदी बहती रही', सन् 1970 में प्रकाशित हुआ। उनका प्रसिद्ध उपन्‍यास ' लाल पसीना' 1977 में छपा था, अब इसका अनुवाद फ्रेंच भाषा में भी हो चुका है। हिंदी को विश्‍व मंच पर स्‍थापित करने में अपना अप्रतिम योगदान देने और भारत-मॉरीशस की निकटता एवं मैत्री का मार्ग प्रशस्‍त करने वाले विद्रोही लेखक अभिमन्‍यु अनत मॉरीशस को जन्‍म और कर्म की भूमि मानते हैं और भारत को सांस्‍कृतिक भूमि। कथा साहित्य की कोख से जीवन की लोककथा को प्राणवान बनाकर संस्कृति को समुन्नत बनाना ही साहित्य का सत् होता है जो अनत के रचना संसार का वैश्विक परिदृश्य है। हाल ही में साहित्‍य अकादेमी, नई दिल्‍ली ने उन्‍हें महत्‍तर सदस्‍यता प्रदान की है। श्री अनत महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के आमंत्रण पर ऐतिहासिक प्रथम दीक्षांत समारोह में बतौर मुख्‍य अतिथि के रूप में शिरकत करने वर्धा आए थे। उस अवसर पर उनसे विभिन्न मुद्दों पर लंबी बातचीत हुई जिसके कुछ अंश यहाँ प्रस्तुत हैं।

आप अपनी लेखन-यात्रा के संबंध में बतलाएँ?

मेरी लेखन यात्रा उस समय शुरू हुई जब मैं निर्धनता के कारण प्राथमिक शिक्षा के बाद माध्यमिक शिक्षा को बरकरार नहीं रख सका। किशोरावस्था में ही माँ के साथ मुझे भी गन्ने के खेतों में मजदूरी करनी पड़ती थी। उन दिनों मेरे हमउम्र बच्चे भी उस 'शक्कर कोठी' में काम करते थे, जहाँ मैं काम करता था। उन लोगों के दर्द को अपने दर्द के साथ आत्मसात करते हुए मुझे एहसास हुआ कि हमारे पूर्वजों के साथ तो गोरे लोग अमानवीय ढंग से पेश आते थे पर ये तो अपने ही लोग 'सरदार' हैं, जो हमारे साथ अमानवीय व्यवहार करते हैं। मैंने सोचा कि शोषण व अन्याय के विरोध का स्वर हमारी लेखनी बने। घर में पढ़ाई का माहौल था, घर में पुस्तकें थीं। उन पुस्तकों को पढ़ता, सोचता - काश! मैं भी लिख सकता। इस प्रक्रिया में मैंने लेखनी चलाई, छोटी-मोटी रचनाएँ की। यहीं से मेरी लेखन-यात्रा की शुरुआत हुई।

आपकी कृति ' लाल पसीना' बेहतरीन उपन्‍यासों में गिनी जाती है, इस रचना के कारण आपकी तुलना प्रेमचंद से होने लगी, इसे लिखने की प्रेरणा आपको कैसे मिली?

संवेदनशील व्‍यक्ति हूँ, भारतीय मजदूरों के शोषण, दमन और अत्‍याचार के खिलाफ आवाज बुलंद करने के लिए 'लाल पसीना' लिखा। बचपन में दरअसल हम अपने माता-पिता से दंतकथाएँ नहीं, अपितु अंग्रेजों द्वारा हमारी पीढ़ियों के उपर किए गए दमन की यथार्थपरक संघर्ष कथाएँ सुनता था। यह कथाएँ मुझे परियों की कथाओं से भी अधिक प्रभावित करती थीं। जब खेतों में पत्‍थरों की मेड़ों को देखता तो जमीन से निकला एक-एक पत्‍थर मुझे सौ साल पहले की कहानी सुनाने लगता। चारों ओर खेतों की हरियाली मुझे बरसात के पानी की सिंचाई का फल न लगकर गन्‍नों की जड़ों में प्रवाहित हो रहा पुरखों का खून-पसीना लगता, जो आज भी तरलता के साथ प्रवाहमान है। आर्थिक तंगहाली की वजह से जब मैं खेतों में काम करने से जुड़ा तो वहाँ के मजदूरों की स्थितियों से रू-ब-रू होते हुए मेरे भीतर 'लाल पसीना' लिखने की छटपटाहट शुरू हुई। मुझे लगा कि आज समाज में शोषक नहीं बदले हैं बल्कि उनके रूप बदल गए हैं। वर्तमान व्‍यवस्‍था में जिस प्रकार से साजिशन मानसिक गुलामी की प्रवृत्तियाँ काम रही हैं और हम मौन हैं। यही सोचकर मैं 'लाल पसीना' लिखने बैठ गया।

प्रवासी भारतीयों ने भारत की सांस्कृतिक विरासत को बचाए रखा है? क्या भारतीय संस्कृति आपके मन को तृप्त करती है?

देखिए, भारत एक बहुसांस्कृतिक देश है। यहाँ की सांस्कृतिक विरासत को प्रवासी भारतीयों ने भी सहेजकर रखा है। मैं भाषा, साहित्य और संस्कृति (तीनों) को सत्यम, शिवम, एवं सुंदरम मानता हूँ। यहाँ की संस्कृति से बाहर वाले प्रभावित होते रहे हैं। जब भारत से प्रवास हुआ तो भारतीयों ने अपने साथ पवित्र ग्रंथ भी ले गए। भारतवंशी मजदूर अंग्रेजों की दमनात्‍मक शोषण के बावजूद अपनी भाषा, धर्म, संस्‍कृति एवं अस्मिता को बचाकर रखने में सफल हुए हैं। वे आज भी भारतीय सांस्कृतिक अस्मिता को बचाए रखने के लिए भारतीय भाषाओं, पर्व-त्यौहारों की परंपराओं को बरकरार रखा है। दुर्गापूजा, दीपावली, रक्षाबंधन आदि त्योहार वहाँ धूमधाम से मनाये जाते हैं। महाशिवरात्रि तो कुंभ मेले से भी अधिक भव्य होता है। पूजा-पाठ, शादी-विवाह, जन्म-मृत्यु आदि के अनुष्ठान भारतीय परंपरानुसार किए जाते हैं। ये तो सत्य है कि प्रवासी भारतीय चाहे वे पैदा भारत से बाहर हुए हों लेकिन उनके दिलों में भारतीय संस्कृति से अगाध प्रेम है। भारतीय संस्कृति मेरे मन को लुभाती है।

आज भारतीय समाज में राजनीति की वर्चस्ववादी नीति व्याप्त होती जा रही है। यहाँ भाषाई युद्ध शुरू हो गया है; इस संदर्भ में आप क्या कहना चाहेंगे?

राजनीति हमें तोड़ती है और संस्कृति, साहित्य, कला जोड़ने का काम करती हैं। जब से मैं भारत आया हूँ तो मैं टीवी चैनलों व अखबारों में देख रहा हूँ कि यहाँ भाषाई युद्ध शुरू है। धर्म, संप्रदाय, जाति, क्षेत्र के नाम पर लड़ना राष्ट्रीय एकता के लिए धातक है। किसी भी देश की अस्मिता की पहचान वहाँ की भाषा से होती है। भाषा के नाम पर लड़ना एक तरह से अपनी अस्मिता को खोते जाना है। भाषा के नाम पर यहाँ (बंबई में) बिहारियों के साथ मार-पीट की जा रही है। भाषा भी राजनीतिक षड्यंत्र का शिकार हो रही है। मराठी भाषा के नाम राजनीति करने वाले लोगों को सोचना चाहिए कि सिर्फ बिहारी ही बाहर नहीं गए हैं बल्कि मराठी भी बाहर गए हैं। गौतम बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति बिहार में हुई। वहाँ से बौद्ध भिक्षुओं विश्व के कोने-कोने में महात्मा बुद्ध के संदेशों को फैलाया। भारतीय, चाहे वे बिहारी हों, मराठी हों, तेलुगु हों, वे मेहनत से रोजी-रोटी कमा रहे हैं। मॉरीशस में यहाँ से तमिल, तेलुगु, मराठी, हिंदी और उर्दू भाषा के लोग गए। वहाँ पाँचों भाषाओं के लोगों ने एकता के लिए भोजपुरी (हिंदी-हिंदुस्तानी) को अपनाया फिर यहाँ 'हिंदी-मराठी' का विवाद क्यों? आखिर 'हिंदी-मराठी' दोनों तो देवनागरी लिपि में है। इसलिए भाषा के नाम पर विवाद न कर आपसी एकता व सौहार्दता से हमें रहने की आवश्यकता है ताकि बाहरी दुनिया भारतीय संस्कृति से कुछ सीख ले सकें।

मॉरीशस में हिंदी की स्थिति कैसी है?

मॉरीशस में हिंदी की स्थिति बेहतर है। यहाँ पाँचों भारतीय भाषाएँ (तमिल, तेलुगु, मराठी, हिंदी, उर्दू) प्राथमिक विद्यालयों से विश्वविद्यालयों तक में निःशुल्क पढ़ाई जाती है। सृजनात्मक लेखन भी पाँचों भाषाओं में हो रहा है। हालाँकि अधिकांश सृजन हिंदी भाषा में होता है। आजकल जिस तरह से मॉरीशस के लोग हिंदी फिल्मों, हिंदी गानों की प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेते नजर आते हैं इससे हिंदी की मान्यता वहाँ के गैर हिंदी वालों के बीच में भी फैल रही है। हिंदी के प्रति अनुराग और शक्ति दोनों बढ़ते नजर आ रहे हैं।

वैश्विक पटल पर हिंदी का विस्तार किस प्रकार से हो रहा है?

हिंदी वैसे भी विश्वभाषा का स्वरूप ले चुकी है। आज हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा का दर्जा दिलाने के लिए विश्व के कई देशों के पुरजोर प्रयासों से साफ प्रमाणित होता है कि हिंदी अपनी यात्रा को विस्तार दे चुकी है और साथ ही साथ अपने प्रति रुचि भी अन्य देशों मे पैदा किए जा रही है। हिंदी साहित्य का विदेशों में अध्ययन-अध्यापन, अनुसंधान और अनुदित होना इस बात का प्रतीक है कि हिंदी का विस्तार पहले से आज बहुत अधिक हो सका है। मॉरीशस जैसे और बहुत सारे देश भी हिंदी को अपने शिक्षण प्रणाली में जोड़ते जा रहे हैं। इस विस्तार को और भी गति प्रदान की जा सकती है। अगर भारत सरकार इस भाषा के प्रचार-प्रसार में अधिक ध्यान दें और विदेशों में चल रहे अभियानों को शक्ति प्रदान करें। इतना ही नहीं वैश्विक परिप्रेक्ष्य में हिंदी को साहित्यिक एवं संपर्क भाषा बनाने के लिए प्रचार-प्रसार इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों के द्वारा भरपूर हो ही; साथ ही साथ भारत सरकार अपने दूतावासों में हिंदी के खिलाफ उठनेवाले आवाजों को बंद करने की चेष्टा करें और ऐसे लोगों को दूतावासों में भेजे जिनकी धमनियों में हिंदी के प्रति प्रेम बहता हो।

आप विश्व साहित्य की तुलना में हिंदी साहित्य को कहाँ पाते हैं?

हिंदी साहित्य की तुलना विश्व साहित्य से करने की जरूरत को मैं बेकार की सोच समझता हूँ। साहित्य किसी भी देश का हो; वह एक स्वर समन्वय का आभास देता है। इसलिए साहित्य में प्रतियोगिता की भावना लाना साहित्य की गरिमा को घटाना है। जिस तरह हर देश की नदी चाहे वह गंगा हो, चाहे वह वोल्गा हो, नाइल हो या टेम्स; सभी की अपनी खास धाराएँ होती है और कोई एक नदी किसी दूसरे नदी की धारा को कम या ज्यादा नहीं कर सकती है। इसलिए हिंदी साहित्य की समृद्ध ज्ञान शक्ति को अन्य भाषाओं की ज्ञान शक्ति से तुलना करना उचित नहीं है।

विश्व साहित्य की तुलना में हिंदी साहित्य का स्वरूप कैसा है? क्या आपको यह नहीं लगता है कि हिंदी साहित्य में भी गुटबाजी, खेमेबाजी की बू आने लगी है?

मैं विश्व साहित्य की तुलना में हिंदी साहित्य को बहुत पीछे नही रखता हूँ। हालाँकि हर देश का अपना सत्य हुआ करता है। अलग-अलग संघर्ष होते हैं। इसके बावजूद विश्व साहित्य में इस बात की चिंता जरूर रहती है कि शोषण के खिलाफ लड़ा जाय, अन्याय को रोका जाय, इनसान भेदभाव को कम किया जाय तथा मानवीय प्रेम का विस्तार किया जाए। इन बातों को ध्यान में रखते हुए मुझे नहीं लगता है कि हिंदी साहित्य की रफ्तार सही नहीं है। हमें इस बात की चिंता जरूर सताती है कि हिंदी साहित्य सेनानी, जब अपने आप में उटकापेंची करने लग जाते हैं और गुटबंदी, खेमेबाजी के चक्कर में एक-दूसरे को नकारने लगते हैं तो हिंदी की इस विश्व अभियान की शक्ति लड़खड़ा जाती है।

हिंदी साहित्य में स्त्री, दलित जैसे विमर्शों का दबदबा बढ़ता जा रहा है, क्या आप इसे उचित मानते हैं?

मेरा मानना है कि कोई भी लेखक, मानवता को केंद्रित कर लिखता है। अगर उसके विषय के अंतर्गत सवाल स्त्री का आ जाता हो तो लेखक का कर्तव्य बन जाता है कि वह निष्पक्ष होकर उसकी यातनाओं को समझे और शब्द/वाणी दे। जिस तरह से लेखक को वादों का दलाल नहीं समझता इसी तरह से मैं रचनाओं के पात्रों को स्त्री-पुरुष के वर्ग में रखकर उनके दर्द को नही समझता। मैं सिर्फ उन्हें इनसान और गैर इनसान कटघरे में पाकर उसके यातनाओं का एहसास करने की कोशिश करता हूँ, फिर व्यक्त करता हूँ और जहाँ तक सवाल दलित का है। मेरी कुछ रचनाएँ विशेषकर 'लाल पसीना' दलितों की पीड़ा का स्वर बुलंद करता है। इसी तरह से 'और पसीना बहता रहा', 'गांधी जी बोले थे' शोषण के विरोध की अभिव्यक्ति हैं। दलित को मैं किसी जाति से नहीं जोड़ता हूँ। मेरे लिए हर वह व्यक्ति दलित है, जो शोषण का शिकार है।

बाहरी हिंदी लेखकों की रचनाओं को प्रवासी हिंदी साहित्य कहा जाता है, क्या आप इससे सहमत हैं?

मॉरीशस का हिंदी साहित्य भारतीय हिंदी साहित्य से अलग नहीं है। जब यह साहित्य हिंदी में लिखा जाता है तो इस कड़ी में वह पहले से ही भारत से जुड़ जाता है। दुनिया भर की खुशियाँ अलग-अलग ढंग की हो सकती है, लेकिन दुनिया के दर्द एक जैसे होते हैं। वह चाहे फ्रेंच, अमेरिकन, भारतीय, स्पेनिश राइटिंग हो, इन सभी का दर्द एक तरह का होता है। मुझे जो बात खटकती है, वह यह है कि मॉरीशस में लिखने वाले हिंदी लेखकों के साहित्य को प्रवासी हिंदी साहित्य क्यों कहा जाता है? क्या उसे विदेशों में लिखा हुआ साहित्य नहीं कहा जा सकता है? क्या दूर-दराज में कई संघषों व साधनाओं में लिखे साहित्य को भारत अंगीकार नहीं कर सकता है? इसे भारत क्यों नहीं स्वीकार करता। क्या 'लाल पसीना' जीवनभर प्रवासी साहित्य ही बना रहेगा?

आप भारत के हिंदी साहित्यकारों के संपर्क में रहे हैं। मॉरीशस और भारत के हिंदी साहित्य लेखन को यदि तुलनात्मकता से देखा जाय तो इनमें आपको क्या साम्य या वैषम्य नजर आता है?

साहित्य चाहे किसी भी देश में लिखा जाय, लेकिन साहित्य तभी अच्छा होता है जब वह अपने इर्द-गिर्द के लोगों की व्यथाओं, उनके जनांदोलनों को अभिव्यक्ति देता हो। मुझे याद है कि जब 'लाल पसीना' का विमोचन नई दिल्ली में हुआ था तो मेरी एक संपादकीय टिप्पणी के कारण मुझे भारत आने से रोका गया था। मैं भारत नहीं आया, मॉरीशस के शिक्षा मंत्री जगत सिंह दिल्ली आए और तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के हाथों पुस्तक 'लाल पसीना' का विमोचन हुआ। इस दौरान चंद्रशेखर ने कहा था कि ''वही लेखक सही होता है जो आम आदमी की पीड़ा के बारे में लिखता है औ 'लाल पसीना' ऐसी ही पुस्तक है। लेखक आम आदमी का लेखक है।'' जहाँ तक रही भारत और मॉरीशस के हिंदी साहित्य की तुलना की तो यह सही है कि भारत और मॉरीशस की रचनाओं में अंतर है क्योंकि भारत की साहित्यिक रचनाओं की उम्र सैकड़ो वर्षों की रही है जबकि मॉरीशस की साहित्यिक रचनाओं की उम्र महज कुछ वर्षों की। मॉरीशस में रचे गए साहित्य को प्रवासी साहित्य कहने को मैं उचित नही मानता हूँ। 'लाल पसीना', 'गोदान', या 'मैला आँचल' एक जैसी कृति होने का दावा नहीं कर सकती किंतु मुद्दे सभी में एक जैसे हैं। सभी ने शोषण के विरोध में जमकर बात की है।

क्या कारण है कि किसी हिंदी रचनाकार को नोबल पुरस्कार प्राप्त नहीं हो पाया है, इस संदर्भ में आप क्या कहना चाहेंगे?

समकालीन हिंदी साहित्य आसमान छू रहा है। लेकिन एक बात है जिससे बात बनती नहीं। क्या बात है कि आज आधुनिक लेखकों के बीच यह खेमेबाजी, यह गुटबाजी और एक दूसरे को नकारने की प्रवृत्ति भी आसमान छू रही है। अगर हिंदी साहित्‍य में आज तक किसी को नोबल प्राइज नहीं मिला तो इसके लिए भी ये साहित्यिक माफिया ही जिम्‍मेदार हैं। एक वर्ग, दूसरे वर्ग का लेखन पंसद नहीं करता तो अच्‍छी कृति भी पाठकों तक नहीं पहुँचने दी जाती। अगर आज इस तरह की जलन का भाव हिंदी के साहित्यकारों में नहीं होता तो कौन कहता है कि फणीश्वरनाथ रेणु की रचना 'मैला आँचल' को नोबेल पुरस्कार नहीं मिलता। अगर इस रचना को सही ढंग से अनुदित करके विश्व समुदाय के समक्ष रखा जाय तो इसे नोबल प्राइज मिल जाएगा। खुद एक बार नोबेल प्राइज के सेक्रेटरी ने कहा था कि अगर हिंदी रचनाओं को आज भी परखने का अवसर नहीं मिला तो केवल इसलिए कि उनका अच्छा अनुवाद हमारे सामने नहीं आया। इसलिए हिंदी रचनाएँ नोबल प्राइज की पंक्ति में नहीं आ पाईं। मेरा मानना है कि भारतीय हिंदी साहित्य का विश्व की भाषाओं में उत्कृष्ठ अनुवाद हो तथा विश्व भाषाओं की उत्कृष्ठ रचनाओं का अनुवाद हिंदी भाषा में हो जिससे कि हम एक दूसरे की कला, साहित्य, संस्कृति से जुड़कर एक बेहतर समाज का निर्माण कर सकेंगे।

जिस प्रकार भारत में हिंदी बनाम अंग्रेजी की बहस जोरों से चल रही है, क्या यही स्थिति मॉरीशस में भी है?

विश्‍व में ऐसा कोई भी देश नहीं जहाँ अपनी ही भाषा को हिकारत की नजर से देखा जाता है। भारत में अपनी ही भाषा के प्रति लोग हीन भावना रखते हैं और यहाँ अंग्रेजी भाषा को प्राथमिकता देने के पीछे लोगों की दिखावे की प्रवृत्ति है। अंग्रेजी का प्रचार-प्रसार आपके भारत में बहुत ज्यादा हो रहा है, मॉरीशस में बहुत कम। वैसे भी हिंदी जब वहाँ की सशक्त फ्रांसिसी भाषा के सामने मात नहीं खाई तो ये अंग्रेजी किस खेत की मूली है। गांधी जी 'मेरे सपनों का भारत' में लिखते हैं कि 'अंग्रेजी कुछ लोगों के सीखने की चीज हो सकती है लाखों-करोड़ों की नहीं। आज जब हमारे पास प्राइमरी शिक्षा को भी मुल्क में लाजिमी बनाने के जरिए नहीं है तो हम अंग्रेजी सिखाने के जरिए कहाँ से जुटा सकते हैं? रूस ने बिना अंग्रेजी के विज्ञान में इतनी उन्नति की है। आज अपनी मानसिक गुलामी की वजह से ही हम यह मानने लगे हैं कि अंग्रेजों के बिना हमारा काम नही चल सकता मै इस चीज को नहीं मानता।' (पृष्ठ 221) मॉरीशस में न तो फ्रेंच हिंदी को कमजोर कर पाई और न ही अंग्रेजी। मॉरीशस में हिंदी आज अपने तेज प्रवाह के साथ बहती जा रही है।

गांधी जी मॉरीशस गए तो उन्होंने ऐसा क्यों कहा था कि आप अपने बच्चों को वहाँ की भाषा फ्रेंच भी पढ़ाइए?

साहित्य में संवेदनाएँ समाहित रहती हैं। हम साहित्य के माध्यम से समाज में व्याप्त शोषण, अन्याय के खिलाफ जागृति लाने का प्रयास करते हैं। समाज में शोषण व्याप्त है, शोषक नही बदलता बल्कि रूप बदल जाते हैं। पहले गोरों ने हमारे उपर शोषण किया पर आज चारों ओर बहुराष्ट्रीय कंपनियों, पूँजीपतियों के शोषण का तांडव व्याप्त हो रहा है। मॉरीशस में भी गोरों के अत्याचार के खिलाफ प्रवासी भारतीयों का हौसला बढ़ाने के लिए गांधीजी 1901 ई. में मॉरीशस आए थे। वहाँ उन्होंने कहा था कि ''आप अपने बच्चों को मातृभाषा सिखाइए, यहाँ की स्थानीय भाषा फ्रेंच भी सिखाइए।'' गांधी जी मेरे सपनों का भारत' में लिखते है कि 'मेरी मातृभाषा में कितनी ही खामियाँ क्यों न हों, मैं उससे उसी तरह रहूँगा जिस तरह अपनी माँ की छाती से। वही मुझे जीवनदायी दूध दे सकती है। मैं अंग्रेजी को भी उसकी जगह प्यार करता हूँ।। लेकिन अगर अंग्रेजी उस जगह को हड़पना चाहती है जिसकी वह हकदार नहीं है तो मैं उससे सख्त नफरत करूँगा।' आप त्रिभाषा फार्मूला के अनुसार हिंदी-हिन्दुस्तानी भाषा को पढ़ाइए। साथ ही वहाँ की भाषा फ्रेंच को भी पढ़ाइए ताकि वे अपने अधिकारों की माँग कर सकें, शोषण के खिलाफ आवाजें बुलंद कर सकें। हमें शोषण व अन्याय को परखकर उनसे कड़ा मुकाबला करना चाहिए।

हिंदी के प्रचार-प्रसार में जनसंचार माध्यमों का कहाँ तक योगदान है?

हिंदी के प्रचार-प्रसार में जनसंचार माध्यमों का योगदान अतुलनीय रहा है। खासकर के हिंदी फिल्मों ने हिंदी के प्रचार-प्रसार में जबरदस्त प्रभाव छोड़ा। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हिंदी फिल्मों के आने के बाद हिंदी का प्रचार-प्रसार हुआ है बल्कि इन के पहुँचने से पहले विद्वान, पुस्तकें, पत्रिकाएँ, भारत से आती रहती थी। शुरुआत से ही मॉरीशस में मंदिरों, सार्वजनिक स्थलों, बैठकों में हिंदी गति पकड़ती रही फिर इसके बाद टेलीविजन के आगमन से यह गति और भी तीव्र हो गई, टेलीविजन के माध्यम से हिंदी गानों के द्वारा हिंदी में चार चाँद लगा। इतना ही नहीं, मॉरीशस में बहुतायत में सृजन भी होने लगा था। आज मॉरीशस में हिंदी साहित्य जिस डगर पर आ पहुँचा है वहाँ तक शायद ही दूसरा देश पहुँच पाया है। इसलिए मॉरीशस की हिंदी अपनी पूरी पराकाष्ठा पर है। इसे अंतरानुशासनिक विमर्श के द्वारा सँवारने की जरूरत है।

आप महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय का भविष्य किस प्रकार से देखते हैं?

महात्मा गांधी की ख्याति वैश्विक जगत में है। उनके नाम पर स्थापित विश्वविद्यालय गांधी जी के अधूरे सपने को पूरा करने के लिए स्थापित किया गया। विश्वविद्यालय ईंट कंक्रीट से नहीं अपितु विचार व ज्ञान से जाना जाता है। भारत का एकमात्र अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय नालंदा व तक्षशिला विश्वविद्यालय के समान ख्याति प्राप्त करेगा। विश्वविद्यालय के 'विजन' से स्पष्ट होता है कि अगर इसे सही दिशा मिलेगी तो यह विश्वविद्यालय विश्व के उम्दा श्रेणी के विश्वविद्यालयों में गिना जाएगा। यहाँ से भी नए विचारक, दार्शनिक, वैज्ञानिक निकलेगें और वे वैचारिक क्रांति से देश दुनिया को एक नई दिशा प्रदान करेंगे। इन्हीं शुभकामनाओं के साथ विश्वविद्यालय परिवार को साधुवाद!


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हिंदी समय में डॉ. अमित कुमार विश्वास की रचनाएँ