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सिनेमा

एक आधा गीत और ढेर सारी जिद : नॉट वन लेस
विमल चंद्र पांडेय


चीन के मशहूर फिल्म निर्देशक चांग यिमोउ ने 1987 में 'रेड सोर्घम' (जिस उपन्यास पर यह फिल्म बनी उसके उपन्यासकार मो यान को 2012 का नोबल मिला।) से शुरुआत करने के बाद एक से बढ़कर एक खूबसूरत और अपने समय को दर्ज करने वाली फिल्में बनाई हैं लेकिन 1999 में आई 'नॉट वन लेस' उन सारी फिल्मों से अलग भारतीय दर्शकों के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह बहुत कुछ हमारी कहानी कहती है और जो संदेश दे जाती है वो वैसे तो सार्वभौमिक है पर हमारे लिए कुछ ज्यादा ही काम का है।

'नॉट वन लेस' कहानी है एक 13 साल की बालिका की, जिसे एक अध्यापक गाओ की अनुपस्थिति में एक महीने के लिए एक प्राइमरी स्कूल की वैकल्पिक अध्यापिका बनाया जाता है। चीन के किसी पिछड़े गाँव में पहाड़ियों के बीच है "शुई क्वान प्राइमरी स्कूल" जिसकी हालत बहुत खराब है। अध्यापक गाओ की माँ बीमार है और वह उसे देखने अपने गाँव जा रहा है। गाँव का प्रमुख और वह अध्यापक मिलकर उस छोटी बच्ची को यह जिम्मेदारी देकर जाते हैं कि वह सभी बच्चों को अच्छी तरह पढ़ाएगी और सब का ध्यान रखेगी। लेकिन इसके साथ ही सबसे कठिन आदेश वह अध्यापक यह देता है कि चूँकि स्कूल से कई बच्चे स्कूल छोड़ कर जा चुके हैं और अब कोई बच्चा स्कूल छोड़ के न जाए यह उस छोटी अध्यापिका यानि टीचर वेई की जिम्मेदारी है। एक महीने के 30 दिनों में से चार रविवार निकालने के बाद 26 दिन बचते हैं और उन 26 दिनों के लिए वेई को 26 चाक दिए जाते हैं। क्लास के बच्चे बहुत उद्दंड हैं और उन्हें सँभालना वेई के बस की बात नहीं। गाओ के यह पूछने पर की उसे क्या क्या आता है, वह बताती है कि उसे एक गीत आता है। गीत सुनते वक्त पता चलता है कि उसे आधा ही गीत याद है। वह पूछने पर यह भी बताती है कि वह लिखे हुए अवतरणों की नकल भी कर सकती है। इन दो कामों के सहारे उसे कक्षा के 28 बच्चों, जिनमें से ज्यादातर बहुत बदमाश हैं, का ध्यान रखना है और उनमें से एक भी बच्चे को स्कूल नहीं छोड़ने देना है। वह गाओ की बात को गाँठ बांध चुकी है लेकिन एक लड़की को गाँव के प्रमुख की सहायता से स्कूल छुड़वा दिया जाता है क्योंकि वह एक अच्छी एथलीट है और उसे एक प्रतियोगिता में भाग लेना है। वेई बहुत कोशिश करने के बावजूद उसे रोक नहीं पाती। लेकिन असली परेशानी तब शुरू होती है जब क्लास का सबसे शरारती बच्चा झांग अपने घर वालों द्वारा मजदूरी कर पैसे कमाने के लिए शहर भेज दिया जाता है। पूरी फिल्म वेई के शहर जाने और उस बच्चे को वापस ले आने की प्रक्रिया में उसके संघर्ष की गाथा है। इस सफर में हम उसके साथ बहुत कुछ देखते हैं। उस लड़की की जिद पूरे उरूज पर दिखाई देती है और शहर हमारे सामने कई रूपों में आता है। कड़ियों पर कड़ियाँ जुड़ती जाती हैं और वेई आखिरकार झांग को अपने साथ गाँव ले जाने में कामयाब होती है। फिल्म आमतौर पर ऐसी रियलिस्टिक फिल्मों का जैसा अंत होता है, उसके उलट फिल्म एक हैप्पी एंडिंग को प्राप्त होती है। लोगों के डोनेशन से उस गरीब स्कूल को स्कूल में प्रयोग होने वाली सामग्री मिलती है और ढेर सारा डोनेशन। उस डोनेशन से झांग के परिवार का कर्ज चुका दिया जाता है और स्कूल की ईमारत का पुनरुद्धार भी हो जाता है। फिल्म के अंतिम दृश्य में वेई अपने शिष्यों के साथ जब स्कूल के लिए मिली चीजों को देख रही है तो सारे बच्चे उनमें ढेर सारे रंगीन चाक देख कर बहुत खुश होते हैं। वेई सभी बच्चों को उनके कहने पर रंगीन चाक से सिर्फ एक एक शब्द लिखने की इजाजत देती है क्योंकि वह सारे चाक टीचर गाओ के लिए बचा कर रखना चाहती है। टीचर वेई लिखती है 'आसमान' और दूसरी बच्ची लिखती है 'खुशी'। सभी बच्चे अलग अलग शब्द लिखते हैं तो झांग अपनी टीचर से एक से अधिक शब्द लिखने की इजाजत चाहता है। वह न आसमान लिखता है न ही पानी, वह एक से अधिक शब्दों में लिखता है 'टीचर वेई'। कक्षा की सबसे छोटी बच्ची जो अभी कुछ लिखना नहीं जानती, एक फूल बनाती है और फिल्म अपने समय के सबसे आशाजनक अंतों में से एक अंत के साथ खत्म हो जाती है।

फिल्म अपनी सीधी सादी प्रस्तुति में बहुत सारी बातें इतनी आसानी से कहती दिखाई देती है कि यहाँ देख कर ही लगता है कि वाकई ये तो बहुत आसान है। टीचर वेई शहर जाने के लिए पैसों का इंतजाम कर रही है और इसके लिए उसने ईंटें उठाने का उपक्रम चुना है। पूरी क्लास को वेई हिसाब लगाने में जुटा देती है और सभी मिल कर इस गणित को सुलझाते हैं कि शहर जाने और वहाँ से आने के लिए कितने पैसों की जरूरत पड़ेगी। अगली बार, जबकि अधिक किराए के हिसाब से अधिक पैसे जुटाने हैं, क्लास के बच्चे इतनी मुस्तैदी से इतने बड़े बड़े सवाल हल करते हैं कि देख कर आश्चर्य होता है। कितनी ईंटें उठाने से कितने पैसे बनेंगे और इसमें कितना समय लगेगा, ये बच्चे एकाध गलतियों और उनके सुधार के बाद फटाफट बता देते हैं। यहाँ वेई अनायास ही सहभागी शिक्षण और टीम वर्क का एक शानदार नमूना पेश करती है। उसे नहीं पता की किसी भी क्लास को पढ़ाने का यह सबसे बेहतरीन तरीका है कि सबको अपने साथ शामिल किया जाए और खेल की तरह पढ़ाया जाए। उसका तो लक्ष्य सिर्फ इतना है कि क्लास से एक भी बच्चा कम न हो जैसा कि गाओ का आदेश है क्योंकि इसके बाद उसे वह रुपये मिलने हैं जिसका वादा गाओ और गाँव के प्रमुख ने किया है। यह वाकई उसके बस का नहीं है और न ही उसके बस का है झांग जैसे शरारती बच्चों को सँभालना। वह म्यूजिक की क्लास में एकाध गाने भूलने के बाद कोई गीत गवा सकती है और टेक्स्ट कॉपी करने के लिए बोर्ड पर उतार सकती है, इसके बाद वह सीधे दरवाजा बंद कर के बाहर बैठ जाती है ताकि एक भी बच्चा बाहर न जा सके। झांग का शहर चले जाना उसकी जिद का इम्तिहान है जिसमें उसे क्लास से एक भी बच्चा कम नहीं होने देना था।

गाँव में जब बच्चे ईंटें उठा कर पैसे कमाते हैं तो वे गाँव की दुकान पर पहुँचते हैं जो दरअसल एक मल्टीस्टोर टाइप की चीज है और आश्चर्य होता है कि पहाड़ियों के बीच पसरे इस गाँव में इतनी बड़ी दुकान कहाँ से आ गई और अगले ही पल ये आश्चर्य दुगुना हो जाता है जब बच्चे पीने के लिए कोका कोला माँगते हैं। बचे पैसों में से सिर्फ दो कैन खरीदे जाते हैं जिसमें से सभी घूँट लगाते हैं। गाँव में इतनी बड़ी दुकान का दिखाया जाना और बच्चों का सीधे कोका कोला पर हाथ डालना यूँ ही नहीं है।

शहर में जब वेई टीवी स्टेशन पर जाती है तो टीवी स्टेशन की रिसेप्श्निष्ट उससे बद्तमीजी से पेश आती है लेकिन वेई वहीं बाहर बैठ कर स्टेशन मैनेजर का इंतजार करती है। उसे पता चलता है की स्टेशन मैनेजर चश्मा पहनता है और वह हर चश्मे वाले आदमी को रोक रोक कर पूछती है कि क्या वह स्टेशन मैनेजर है। शहर की घटती जा रही संवेदना इतने निचले स्तर की है कि कोई भी रुक कर उस बच्ची से ये जानने की कोशिश नहीं करता कि आखिर क्यों वह स्टेशन मैनेजर का इंतजार कर रही है। अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए वेई इतनी चुस्त है कि वह एक भी चश्मे वाले आदमी को यूँ ही नहीं जाने डे सकती और उनके पीछे दूर तक दौड़ भी सकती है। इस दृश्य को देखते हुए अनायास ही वरिष्ठ कथाकार उदय प्रकाश की कहानी तिरिछ याद आ जाती है जो शहरों की खत्म होती जा रही संवेदनशीलता पर प्रहार करती है।

फिल्म बेसिक शिक्षा के बारे में और खास तौर पर चीन के गाँवों में शिक्षा के बारे में जो बात सादगी और ईमानदारी से कहना चाहती है उससे भारत भी पूरी तरह इत्तेफाक रख सकता है। स्कूल में न पढ़ाने के लिए पर्याप्त टीचर हैं, न इमारत ही ऐसी है की बच्चे सुरक्षित बैठ सकें और न ही गाँव में परिवारों की हालत ऐसी है कि वे अपने बच्चों को कामों में लगाने की बजाय पढ़ने भेज सकें। फिल्म पूरी तरह से भारत के गाँव में चल रही प्राथमिक शिक्षा की दुकानों की कहानी कहती है। मगर इन सब के ऊपर वेई की जिद और उसकी लगन से असंभव को संभव बनाने की इस यात्रा के लिए इस फिल्म को जरूर देखा जाना चाहिए।

फिल्म में ज्यादातर कलाकार उसी गाँव के थे और उन्होंने अपने असली नामों के साथ फिल्म में अभिनय किया है। वेनिस फिल्म फेस्टिवल में गोल्डन लायन पुरस्कार जीतने के साथ ही फिल्म ने ढेर सारे अन्य पुरस्कार जीते थे।


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