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कविता

अपनी ही डाल
प्रेमशंकर शुक्ल


अपने सच से तौलते हैं हम
दूसरे का सच
अक्सर हम पाते हैं -
अपने सच से अलहदा होता है
किसी और का सच

कुछ सच ऐसे हैं जो सबके लिए हैं समान
इन्हीं को बरतते शायद हम
दूसरे से अपने सच को
अपनी ही तरह देखने की करते हैं उम्मीद

कई-कई बार
अपने सच की तरह मानकर
दूसरे का सच समझने में
गलती कर बैठते हैं हम बहुत बड़ी

कविता हमें यह गुंजाइश तो देती ही है
कि कई सच सहेज सकें हम
और पूरी आत्मीयता से उन से करें संवाद

टहनी से टूटकर
हर पत्ती सीधे जमीन पर नहीं आती
हिलगा लेती है कभी-कभी उसे
अपनी ही डाल

 


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