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कविता

असंबद्ध
गीत चतुर्वेदी


कितनी ही पीड़ाएँ हैं
जिनके लिए कोई ध्वनि नहीं
ऐसी भी होती है स्थिरता
जो हूबहू किसी दृश्य में बँधती नहीं

ओस से निकलती है सुबह
मन को गीला करने की ज़िम्मेदारी उस पर है
शाम झाँकती है बारिश से
बचे-खुचे को भिगो जाती है

धूप धीरे-धीरे जमा होती है
क़मीज़ और पीठ के बीच की जगह में
रह-रहकर झुलसाती है

माथा चूमना
किसी की आत्मा चूमने जैसा है
कौन देख पाता है
आत्मा के गालों को सुर्ख़ होते

दुख के लिए हमेशा तर्क तलाशना
एक ख़राब किस्म की कठोरता है


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हिंदी समय में गीत चतुर्वेदी की रचनाएँ



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