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कविता

अघायी औरतें
वंदना गुप्ता


मर्दों के शहर की अघायी औरतें

जब उतारू हो जाती हैं विद्रोह पर

तो कर देती हैं तार-तार

सारी लज्जा की बेड़ियों को

उतार देती हैं लिबास हया का

जो ओढ़ रखा था बरसों से सदियों ने

और अनावृत हो जाता है सत्य

जो घुट रहा होता है औरत की जंघा और सीने में

अघायी औरतों के तिलिस्म

यूँ ही नहीं टूटा करते हैं

परिपक्व होने में बरसों

मिटटी में जमींदोज होना पड़ता है

फिर काटने और तराशने की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है

तब कहीं जाकर अघायी औरत का स्वरूप निखरता है

तब जाकर वो अपने तिलिस्म के

भेदों को अनावरित करती है

तब जाकर वो अपनी बुनियादों से निकलती है

और करती है बेनकाब मर्दों के शहरों को

करती है ध्वस्त बरसों से बनाए गए मर्दों के अहम के किलों को

जब होती है वो भी संलग्न

मर्दों की बनाई दुनिया के रिवाजों में

अघायी औरत बनने के सफर में

आते हैं जाने कितने जलजले

सिल बनी बट्टे के मार में

पिसती रहती हैं उसकी संवेदनाएँ

फिर चाहे चोट धड़ के निचले हिस्से पर हो या ऊपरी हिस्से पर

आघात शारीरिक हो या मानसिक

सहनशीलता के रक्त की अंतिम बूँद तक करती है कोशिश

मर्द के शहर की ईंट-ईंट को जोड़े रखने की

उसे स्थायित्व प्रदान करने की

मगर जब मर्द की संवेदनहीनता का पाँव

अंगद सा औरत के स्वाभिमान को ललकारता है

उसे नेस्तनाबूद करने को लालायित होता है

तब अघायी औरत उतार देती हैं खोल

सदियों से ओढ़ी सभ्यताओं का

कर देती हैं खुद को निर्वस्त्र

उतार देती है लिबास

मर्द और औरत के बेजान रिश्ते से

खोल लेती है बाल तब तक

जब तक न मर्दों के शहर पर

बिजली बन गिरती है ये

जब खोलने लगती है उसके

अतिक्रमण के पेंचों को कि

कैसे अमानवीयता चरम को छूती गई

जब उसने लड़की से औरत के सफर को तय किया था

फिर चाहे उसका शारीरिक दोहन हुआ हो

मानो बिछी है धरा चटाई सी

और हल की फाँक उसकी अस्मिता पर गाड़ी हो

और बो दिया गया हो बीज उसकी कोख में

बिना सींचे, सहेजे, सहलाए

फिर भी तिरस्कार, उपेक्षा की

शिकार होती रही हो मानसिक शोषण के साथ

आखिर कब तक ?

कब तक स्वयं का दोहन होने दे

कब तक मर्द के शहर की

बेजुबान मिटटी बन धूल-धूसरित होती रहे

और जब हो जाती है

दोहन और शोषण की पराकाष्ठा

और सहने की अति कर देती है अतिक्रमण हर सीमा रेखा का

तब

अघायी औरतों का हल्ला, कानफोड़ू शोर

कर देता है भंग शांति

मर्दों के शहर के गली-कूचों की

आखिर ये बोली कैसे ?

कहाँ से सीखी जुबान ?

किसने दिया इसे कलम रूपी हथियार ?

कैसे आया इसकी वाणी में व्यभिचार ?

कैसे छोड़ दी इसने अपनी मर्यादा ?

कैसे लाँघ दी इसने लक्ष्मण रेखा ?

कैसे खोल रही है ये भेद

ना केवल मर्द के शहर के

बल्कि उसके गुप्त रास्तों पर भी कर रही है प्रहार

कभी वाणी द्वारा तो कभी लेखन द्वारा

कहाँ से पनपा इतना विद्रोह

जो मर्द के शहर की दीवारें भरभराने लगीं

आखिर कैसे ये इतनी उच्छृंखल हुई

जो मर्द के बिस्तर की सलवटें भी खोलने लगी

वो बिस्तर जिसे वो जैसे चाहे जब चाहे अपनी सुविधानुसार

ओढ़ा, बिछाया, लपेटा या तोड़ा मरोड़ा करता था

मगर बिस्तर की सलवट के माथे पर ना कोई खम पड़ता था

और मर्द अपने शहर का एकछत्र बादशाह बन

जिसे चाहे जब चाहे

अपने हरम की जीनत बना लिया करता था

कैसे बर्दाश्त हो सकता था

अघायी औरत का गुप्तांग पर वार

जब खोलने शुरू कर दिए

उसने मर्द के हरम के किवाड़ पर किवाड़

होने लगी मुखर, बन गई वाचाल

और कह उठी वो भी

उस किसी एक को, जो अपना सा लगा हो

जिसमे पाया होता है उसने अपना स्वर्णिम संसार

तब कह उठती है ...उसकी शोखी बेबाकी से

काश वो मर्द तुम होते

जिसके लिए कौड़ी में भी मैं बिक जाती

तो भी आरती का दीया ही कहलाती

काश तुम पहले मेरे जीवन में आए होते

तो संपूर्णता पाने को इधर उधर न भटक रहे होते

एक संपूर्ण मर्द से एक संपूर्ण औरत तब गुजरी होती

कायनात के जर्रे जर्रे पर उस मोहब्बत की दास्ताँ उभरी होती

देह की रश्मियाँ भी निखरी होतीं

रूह की बेचैनी भी मोहब्बत के जलाशय में भीगी होती

तो आज ना कोई अघायी औरत होती

उफ ! आखिर किसने दिया

अघायी औरत को ये अधिकार

जो हो जाए वो इतनी मुखर, इतनी वाचाल

स्त्री पुरुष अंतरंग संबंधों पर

चलने लगी हो जिसकी कलम

कैसे उसे होने दिया जाए इतना बेबाक

कैसे उतारने दिया जाए उसे लज्जा के घूँघट को

जो कर दे निर्वस्त्र मर्दों की पूरी सभ्यता को

और होने लगते हैं उस पर तुषारापात

बेमौसम गिराई जाती हैं

उसकी मान मर्यादा और अस्मिता पर

शब्दबाण रूपी बिजलियाँ

काटने होते हैं अघायी औरत की सोच की उड़ान के पंख

ताकि मर्द के शहर की निर्वस्त्र सभ्यता न हो जाए और निर्वस्त्र

"कुल्टा, कुलच्छिनी ख्याति पाने को आतुर होती हैं अघायी औरतें"

नवाजी जाती हैं इन विशेषणों से

संज्ञा और सर्वनाम से परे

विशेष विशेषणों से सुसज्जित

बेपरवाह अघायी औरतें

आखिर बना ही लेती हैं अपना एक शहर

"अघायी औरतों का शहर"

स्वतंत्रता, उन्मुक्तता, बेबाकी का शहर

आजादी की साँस का शहर

कुछ पल अपने साथ जीने का शहर

हँसी की खिलखिलाहट का शहर

और जब बसा लेती हैं शहर को खिलखिलाहट से

तब उनके हौसले,

उनके जज्बे,

उनके साहस के आगे

नतमस्तक हो जाता है

मर्दों का शहर

और स्वीकार कर ही लेता है उपादेयता अघायी औरतों की

पूरे मनोयोग के साथ

बस जरूरत होती है

तो सिर्फ इतनी

कि

अघायी औरत पहला पत्थर अपने हाथ में उठा ले...


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