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आत्मकथ्य

कहनी-अनकहनी
प्रेमशंकर मिश्र


ये कविताएँ है? कितनी दूर तक कविताएँ है? इसे आप सुधी पाठक जानें। क्‍योंकि आज कविता का कोई मानक, कोई अनुशासन या कोई शास्‍त्र नहीं रह गया है मेरे देखने में। कविता आज सिद्धि न रहकर अपनी-अपनी अन्‍यान्‍य सिद्धियों विशेष की साधिका मात्र हैं। एक खेमे की कविता दूसरे खेमे के लिए कूड़ा घोषित हो रही है। संतुष्‍ट इसलिए हूँ कि मैंने कभी भी प्रचलित अर्थों में कवि होने का भ्रम नहीं पाला है।

मेरे तई ये पंक्तियाँ समय समय पर मेरे निजी जरूरतो की उपज रही है। थोड़ा और साफ करूँ मैं हमेशा से स्थितियों को सहता और समझौता करता रहा हूँ। फिर भी कुछ असहनीय स्थितियों से उबरने के लिए प्रतिक्रिया स्‍वरूप ऐसी पंक्तियाँ बरबस निकलती हैं।

यह असंगति जिंदगी के द्वार सौ-सौ बार रोई।

चाह में है और कोई बांह में है और कोई।।

सुकवि भाई भारत भूषण की ये पंक्तियाँ ही इन रचनाओं और मुझ रचयिता के केंद्र में हैं। रचनाएँ इस लिए कहता हूँ कि असहनीय मजबूरियों में बुदबुदा उठे इन शब्‍दों को अंतत: देखना समझना पड़ा है फिर रच रचकर इन्‍हें उपयुक्‍त बनाना, आप तक पहुँचने लायक बनाने का प्रयास करना पड़ा है। कितनी दूर तक इस संक्रांतिकाल में ये शब्‍द ये पंक्तियाँ आप के भी काम आ सकेगी मैं नहीं कह पा र‍हा हूँ। इस बोध के साथ यह भी एहसास है कि इन सारे काले पन्‍नों में से जाने अंजाने कुछेक किसी खास खेमे में टिक भी सकते हैं।

सवाल उठता है कि जब रचइता एवं से कविता नहीं कह पा रहा है तो फिर यह राष्ट्रीय अपव्‍यय क्‍यों? अपनी सफाई में सिर्फ इतना ही कह पा रहा हूँ कि जिन्‍होंने इन्‍हें देखा पढ़ा या सुना है, उन्‍होंने इन्‍हें भी कविता इस हद तक माना कि आज पुस्‍तकाकार आपके हाथ में जा रहा है यह संकलन।

बड़े छोटे साहित्‍यमर्मज्ञों की सहानुभूति, प्‍यार और दुलार मुझे इस सीमा तक प्राप्‍त है कि मेरे ऊपर कृपा करके वे दो शब्‍द कह भी सकते थे, पर जानबुझकर अपने और अपने पाठक के बीच किसी ऐसे महारथी को भूमिका लेखक के रूप में लाना उचित नहीं लगा जो आपकी दृष्टि पर अपना चश्‍मा पिन्‍हा दे। अपने और आप के बीच सीधा संवाद इससे बाधित हो सकता है इसी भय से साहस करके यी सीधे आपके हवाले है।

जैसा कि ऊपर अपनी स्थिति स्‍पष्‍ट कर चुका हूँ कि व्‍यावसायिक रूप से काव्‍यसाधना कभी नहीं कर पाया हूँ, नहीं किसी खास खेमे में खूँटे से अपने को बाँध सका हूँ। यदि ऐसा कुछ हुआ होता तो बहुत पहले ही ऐसे कई संकलन आ चुके होते।

जिंदगी के साथ अपनी काव्‍य साधना का भी ग्राफ बहुत टेढ़ा-मेढ़ा रहा है। कई-कई बार उनके तार टूटते जुड़ते रहे हैं। एक अत्‍यंत उत्‍कृष्‍ट और उदार कविता और संगीत के वातावरण में मैंने आँखे खोली है। मेरे पूज्‍य पिताश्री पं. बलराम प्रसाद मिश्र 'द्विजेश' के लिए उन दिनों देश के जाने माने दिग्‍गज कवि कलावंत महीनों मेरे यहाँ ठहरते। सुबह-शाम अखंड काव्‍य और संगीत गोष्ठियाँ हुआ करती थीं। महाकवि जगन्‍नाथदास 'रत्‍नाकर' पं. अयोध्‍या सिंह उपाध्‍यय 'हरिऔध', पं. रमा शंकर शुक्‍ल 'रसाल' के अतिरिक्‍त रीवां के महाकवि 'ब्रजेश', पं. बालदत्‍त, यज्ञराज, विचित्र मित्र ऐसे आचाय्र कवि, अजीम खाँ, झंडे खाँ ऐसे उस्‍ताद यनायत खाँ ऐसे सितारवादक, उनके पुत्र उस्‍ताद अजीम खाँ साहब ऐसे संगीतज्ञों की सन्निधि मुझे बचपन से प्राप्‍त हुई है। आज के आफताबे गजल उस्‍ताद मेंहदी हसन और सितार नवाज उस्‍ताद शाहिद परवेज ऐसे आज के विश्‍व विश्रुत कलाकारों का बचपना अपने पिताओं के साथ मेरे साथ गिल्‍ली गोली खेलते बीता है। (मेंहदी हसन उस्‍ताद अजीम खाँ के सुपुत्र और शाहिद परवेज उस्‍ताद अजीम खाँ के बेटे हैं।) इस तरह साहित्‍य और संगीत मेरी घुट्टी में रहा। विरासत में मुझे काव्‍यरचना और मेरे अग्रज और उनके पुत्र को सितार वादन मिला।

छात्र जीवन में एक घटना के चलते कविता मुझसे कुछ दिनों के लिए छूट गई। एक प्रतियोगिता में मेरा प्रथम पुरस्‍कार इसलिए काट दिया गया कि उस पर पिता श्री की रचना का संदेह किया गया। जो 10, 20 सवैया घनाक्षरी उन छोटी कक्षाओं में बन सकें थे, उनका प्रवाह वहीं अवरूद्ध हो गया। फिर 3, 4 वर्षों के बाद लगभग 49-50 में फिर एक और झोंका आया। खड़ी बोली के उन दिनों के प्रचलित गीत 10, 20 लिख उठे। सन 59 में पिता का तिरोभाव हुआ। सारा पारा खसक कर शून्‍य पर आ गिरा। सारा वातावरण जैसे डूब गया। पर कविता, साहित्‍य और संगीत का रक्‍त में रचा-बसा संस्‍कार पिताजी के एक प्रशंसक अपने समय के प्रसिद्ध उपन्‍यासकार, कहानीकार पं. गंगाप्रसाद मिश्र तत्‍कालीन राजकीय हाईस्‍कूल बस्‍ती के प्रधानाचार्य ने 'द्विजेश-परिषद' साहित्यिक संस्‍कृतिक संस्‍था के स्‍थापना के माध्‍यम से पुन: जगाया। कवि, कलाकार, संगीतज्ञों का एक नए प्रकार का जमघट फिर इर्द-गिर्द जमने लगा। सन 60 में एक नया सिलसिला शुरू हुआ। जीवन की यह नई घुटन-टूटन जब असहनीय लगती तो कुछ बड़बड़ाहटें उभरने लगीं और उन्‍हें सहेजने सवारने की दुर्निवार स्थितियाँ इस रूप में आकर लेने लगीं। यह भी बीत में टूट फूट गया होता यदि उसी बीच 'द्विजेश-परिषद' के माध्‍यम से तब का एक सामंती नवयुवक बस्‍ती जिले का ही निवासी श्री माहेश्‍वर तिवारी 'शलभ' जो आ भारत प्रसिद्ध नवगीतकार माहेश्‍वर तिवारी के नाम से जाना पहचाना जाता है, मुझसे न टकराया होता। अन्‍यान्‍य कारणों से यह मंचमोहन गीतकार मुझमें ऐसा घुसा कि अपनी पत्‍नी और बच्‍चों के साथ बरसों मेरे गाँव घर में रम गया। एक नई गोष्ठियों और सम्‍मेलनों का दौर शुरू हुआ। नई प्रतिभाएं पनपने लगीं और मुझमें भी मुरझाई संवेदनाएँ फिर पनपने लगीं। अपनी फूस की बैठक में अबाध गति से चल रही ये गोष्ठियाँ देर रात तक न चल पाती यदि एक मौन सहमति स्‍वीकृति मेरी धर्मपत्‍नी श्रीमती राजेश्‍वरी देवी की न मिल पाती, जो वैसे तो ऊपर से भुनभुनातीं रहतीं लेकिन माहेश्‍वर के गीत से उनका मूड सम्‍हल जाता। लकड़ी के चुल्‍हे पर रह-रह कर चाय बनाना और फिर भोजन गरम करके मुझ और अपने धर्म-देवर माहेश्‍वर तिवारी को खिलाती रहतीं। अपनी रचनाधार्मिता की इस टूटी-फूटी पंगडंडी के साथ इन रचनाओं को देखने से ही इनकी बेतरतीबियों का थोड़ा बहुत समाधान हो सकता है इसलिए संक्षेप में इतना देना आवश्‍यक लगा। इस प्रकाशन का सारा श्रेय सबसे पहले मित्रों के हठाग्रह को ही जाता है। फिर भी इसे आकार देने का संकल्‍प अनुज श्री भानु प्रकाश श्रीवास्‍तव का रहा है। यत्र तत्र बिखरे इन कागज के टुकड़ों को बटोरकर एक दिन वह उठा ले गए। ये कुछ आगे करते कि उनकी पदोन्‍नति हिंदी अधिकारी भारतीय स्‍टेट बैंक मंडलीय शाखा लखनऊ से स्‍टाप कालेज गुड़गाँव दिल्‍ली में हो गई। जाते जाते अपने अधूरे कार्य को अपने अभिनन एक मित्र श्री जी.एम. खान भारतीय स्‍टेट बैंक फैजाबाद के सहायक को सौंप गए। श्री खान के अनवरत श्रम से यह संकलन तैयार होकर पुस्‍तकाकार हो गया। फिर भी इसके प्रकाश की बात नहीं ही बन पाती यदि समकालीन कविता और समीक्षा के एक नए हस्‍ताक्षर चि. रघुवंशमणि की सक्रिय प्रेरण और सहकार से पांडुलिपि नई कविता के मौलिक प्रवक्‍ता प्रख्‍यात कवि समीक्षक आदरणीय श्री लक्ष्‍मीकांत वर्मा तत्‍कालीन र्काकारी अध्‍यक्ष उ.प्र. हिंदी संस्‍थान लखनऊ के समक्ष न प्रस्‍तुत हुई होती। वर्मा जी ने इसे संस्‍थान की सहायता से प्रकाशित होने योग्‍य समझा। संयोग से वर्मा जी बिना इसको कार्यान्वित कराए यहाँ से चले गए। जाते जाते इस कार्य को वह अपने सुयोग्‍य निदेशक हिंदी बाल साहित्‍य के समपर्ति रचनाकार कविवर पं. विनोद चंद्र पांडेय 'विनोद' आई.ए.एस. को सौंप गए। इस संकलन पर फिर ग्रहण लगा, पांडुलिपि इधर उधर हो गई, फिर निराशा छाई, किंतु बीच में एक रसज्ञ सुधी नवयुवक चि. रामशरण अवस्‍थी स्‍थानीय ब्‍यूरो प्रमुख 'दैनिक जागरण' आ गए। फिर सब समेटा गया और नई पांडुलिपि तैयार हुई। इस तरह अंतिम रूप से पांडुलिपि निदेशक श्री पांडेय जी के हवाले हुई। इस सारे उपक्रम में श्री विजय रंजन एडवोकेट एवं 'अवध-अर्चना' त्रैमासिक के संपादक मेरे साथ रहे।

इस संकलन का और मेरा सौभाग्‍य रहा कि वर्तमान कार्यकारी अध्‍यक्ष हिंदी संस्‍थान डॉ. शरण बिहारी गोस्‍वामी ने भी अपने पूर्वाधिकारी के इस निर्णय पर अपनी मुहर लगा दी। फिर मेरे और मेरे मुद्रक के बीच कुछ अविश्‍वसनीयता को पनपाने की कोशिश होती कि अपने प्रशंसक सुकवि साहित्‍यकार डॉ. सुधाकर अदीब ए.डी.एम. वित्‍त एवं राजस्‍व आ गए और मुद्रक आश्‍वस्‍त हुए और काम आगे बढ़ा। फिर तो संयोजन और प्रूफ रीडिंग समाचार संपादक दैनिक जनमोर्चा सुकवि चि. के.पी. सिंह ने सम्हाला। इस तरह यह संकलन 'अपने शहर में' अपने हाथ में आ सका है और इस संकलन का प्रकाशन अपने में एक घटना हो गई है। इसके बहाने मुझ में एक आत्‍मसंतोष नए सिरे से पनपा है कि इतनी सारी सात्विक सहानुभूतियाँ मुझे मिली हैं। इन सभी महानुभावों के समक्ष नतशिर होकर आभार ज्ञापित करता हूँ। परमआदरणीय डॉ. रमाशंकर तिवारी, डॉ. राधिका प्रसाद त्रिपाठी और डॉ. स्‍वामी नाथ पांडेय ने यदि औपचारिक संस्‍तुति न की होती तो नियमानुसार संस्‍थान उसे संज्ञान में न ला पाता। इस प्रकार अपने इस प्रारंभिक समीक्षकों का हृदय से अभारी हूँ। आत्‍मीयता से अक्षरसंयोजन के लिए वी.के. कंप्यूटर्स, साहबगंज, फैजाबाद तथा कठिन परिस्थिति में मुद्रण के लिए रघुवंशी प्रेस गद्दोपुर, फैजाबाद के सहयोगियों को मैं हृदय से आर्शिवाद देता हूँ। अंत में उन मित्रों को भी सभार स्‍मरण करता हूँ, जिन्‍होंने न केवल मुझे बराबर हतोत्‍साहित करने का प्रयत्‍न किया है अपितु अपने टिप्‍पणियों से रह रहकर आहत भी किया है। प्रतिक्रियास्‍वरूप उनमें मेरी रचनाधर्मिता को बल ही मिला है। मैं उनका भी आभार मानता हूँ। नीचे दो पंक्तियाँ उन्‍हें समर्पित है :

मैं जितनी पाता आग तुम्‍हारी दुनिया से,

उतना ही तुमको मधु मस्‍तानी देता हूँ।

प्रणामांते

फैजाबाद, कृष्णजन्माष्टमी


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