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कविता

एक साजिश हो रही है
अंजना वर्मा


अब वह अड़तीस पूरे करेगी
चलते-फिरते
दिमाग में एक फिल्म की तरह
वह अपनी ही काया देखने लगती है
देखती रहती है
यह कौन है और कोट और पैंट में ?
हाथों में लैपटॉप का बैग लिए ?
अंकिता नाम है इसका
अंकिता मैडम
हठात् कोई बात नहीं कर सकता मैडम से
चेहरे पर बहुराष्ट्रीय संस्कृति की छाप
बता देती है कि कमी किस बात की ?
पद, अपार्टमेंट, गाड़ी, बैंक बैलेंस
सब कुछ तो है !
रोंएँ फुलाए चिड़िया-सी फूल उठती है वह
लेकिन फिर तुरंत ही
अपने दिवास्वप्न में वह देखती है अपने गाल|
परिपक्व घीये-से रुखे हो गए हैं
बचपन से पिता कहते थे
''यह मेरी बेटी नहीं, बेटा है''
माँ तो कहने ही लगी
''मेरी राजा बेटा''
वह बन भी गई बेटी से बेटा
और बन गई राजा
किसी की रानी नहीं बन पाई अब तक
पर अब ये ही शब्द डराने लगे हैं उसे
उसे शिद्दत से महसूस होता है
कि वर्षों से शापा जाता रहा है उसे
हर दिन
दिन में कई-कई बार
पहले जो संबोधन
उसे पंख दे देता था उड़ने के लिए
आज वही संबोधन
शहतीरों का दर्द दे जाता है
वह टूट-पिसकर धूल-मिट्टी बन जाती है
अखबार के पन्नों में 'वैवाहिक' देखते ही
वह चीखना चाहती है -
''अरे, किसी को याद भी है कि मैं बेटी हूँ?''


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