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कविता

माँ
अंजना वर्मा


पहले जब तुम कहा करती थी
''तुम लोग इतना तंग करोगे तो मैं
भाग जाऊँगी''
''मत जाओ माँ,
अब हम शैतानी नहीं करेंगे''
छोटे-से थे तब हम दोनों भाई-बहन
यह कहते हुए
तुम्हारी कमर से लिपटकर
तुम्हारे चेहरे को
मुँह उठाकर ऊपर देखते हुए
दीन हो जाते थे
तुम्हारे ऐसा कहते ही हमें
सारी दुनिया अपरिचितों से भरी लगती
और हम काँप उठते
कि तुम चली जाओगी तो हम
तुम्हारे बिना कैसे रहेंगे?
कैसे जी पाएँगे?
और एक दिन
तुम सचमुच हमें छोड़कर चली गई
फिर कभी न लौटकर आने के लिए
और हम तुम्हें बाजा-गाजा के साथ
नदी के सूने घाट पर विदा कर आए थे
उस घाट पर
जहाँ कोई नहीं होता
न दिन में
और न ही रात में
तुम कभी अकेले न रही
इतना डरती थी अकेलेपन से|
पर तुम्हें वहाँ छोड़कर
हम सब लौट आए थे
तुम छोड़ ही दी गई थी वहाँ पर अकेली
हमने हाथ जोड़कर
आँखें मूँदकर
ईश्वर से प्रार्थना की थी
कि तुम
हमारे मोह-बंधन से छूट जाओ
और हमारे पास
इस धरती पर कभी लौटकर न आओ


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