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कविता

जंगल में बारिश
अंजना वर्मा


 

बारिश हो रही है लगातार
सामने दिखते उस जंगल में
यद्यपि वह सचमुच जंगल नहीं है
दूर तक पसरे हैं घने पेड़
पेड़ों के कुनबे बेरोक-टोक बढ़ते जा रहे हैं
वे ही जंगल होने का भ्रम देते हैं
बारिश हो रही है लगातार
मैं आठवीं मंजिल पर हूँ
और हैरत में भरकर देख रही हूँ
पेड़ों को इस तरह नहाते हुए बरखा में
महानगर के
पेड़ काटो और बसो अभियान से
भाग्य से बच गए ये दरख्त
राहत की साँस ले रहे हैं
अपनी मृत्यु से छूटकर मजे कर रहे हैं
इस झिमझिम वर्षा में
हो रहे है निहाल
वृक्ष झूम रहे हैं इधर से उधर
भीगी हवा चल रही है
आसमान से लटकती
बूँदों की असंख्य मोती-झालरें
हवा के ठेलने से
बाएँ से दाएँ चली जा रही हैं
लहरें बनाती हुई
पी रहे हैं झरती बूँदों को ये श्याम-तन
खामोशी से
दुनिया से छुपकर रस पीने में तल्लीन हैं
ये नहीं है हम-जैसे मानव-तनधारी
फिर भी क्यों लगते हैं इतने सगे
जैसे हों कोई भाई-बंधु हमारे
इनसे एक नाता जरूर है हमारा
ये हैं हमारे ही पुरखे
खून दौड़ रहा है एक ही
उनकी और हमारी शिराओं में
विकास की यात्रा में चलते-चलते
वे खड़े-खड़े सुस्ताते हुए
जम गए जमीन में
रुक गए थककर राह में ही
लेकिन वे रहते हैं तैयार हमेशा
आते-जाते हुए काफिले को
अपना सब कुछ दे देने के लिए
अपनी देह तक।


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