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कविता

झाड़ू और आदमी
श्रीप्रकाश शुक्ल


बड़ी गंदगी थी वहाँ पर

चारों और का प्लेटफार्म कचरे से भरा था
कुछ लगातार खाए जा रहे थे केले
छिलके थे कि थमने का नाम ही नहीं ले रहे थे
भीड़ थी कि बस पूछिए मत!

वहीं पास में रखा था एक कूड़ेदान
एक पीकदान
भीतर से खाली
और बाहर से भरा हुआ!

उसी के पास सो रहा था एक आदमी
अपने तन से झाड़ू को चिपकाए
आती थी जब कभी किसी सीटी की आवाज
वह मुँह से चादर हटाकर
पवन एक्सप्रेस के बारे में पूछ लेता

इस प्रकार वह जाने कितने समय से लेटा रहा वहाँ
जाने कितनी ट्रेनें गुजरी होंगी वहाँ से
पैसेंजर की तो बात ही मत पूछें
माल के आने से तो मुँह ही बना लेता

उसे तो इंतजार था बस
बंबई से आने वाली पवन एक्सप्रेस का
जिसमें कचड़े की अनंत संभावना थी!
('बोली बात' काव्य-संग्रह से)


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