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कविता

अलविदा गाज़ीपुर
श्रीप्रकाश शुक्ल


पिछले वर्ष को जैसे इस वर्ष विदा किया
गाज़ीपुर को काशी से कुछ यूँ अलविदा किया

यह एक वर्षों पुरानी बात है

नौकरी की तलाश में निकला मैं
एक दिन अचानक इस शहर से टकराया था
और शहर अपनी नींद में अनकने लगा था

इस शहर में रहते हुए मैंने
शहर की तमाम क्रियाओं को ठीक से महसूस किया था
जिसमें एक का साक्षी तो मेरे महाविद्यालय के ठीक सामने का वह मकबरा है
जहाँ लार्ड कार्नवालिस की साँसों का आना-जाना
अभी भी महसूस किया जा सकता है

यह वह शहर है
जहाँ एक तरफ पवहारी बाबा का आश्रम है
तो दूसरी तरफ भूड़कुड़ा का मठ
और इन दोनों के बीच
गुलाबों का सूखता हुआ वह गुल्फ है
जिसकी गमक से प्रभावित होकर
कभी टैगोर इस नगर में पधारे थे

यहाँ बसंत के ठूँठ पर बैठी
मेरी नसों में फड़फड़ाहट होती थी
और उदासी के तमाम स्फुरण के बीच
जीवन के संगीत मचलते थे

यहीं पर मैंने पहली बार
दीपक की लौ में दिपदिपाते
छठ की औरतों को देखा था
और देखा था उन सपनों को भी
जो भोजपुर के इस छोटे से अंचल से उठकर
समूची पृथ्वी को आच्छादित कर रहे थे

यह एक ऐसा शहर है
जहाँ मुझे कुछ फूल मिले थे
कुछ फिकरे


यह अपनी आसपास की हलचलों से बेखबर
जितना जल्दी तमतमाता है
उतना ही जल्दी तृप्त भी होता है
इस शहर में गोलियों की गरमाहट के बीच
कविता-कहानी पर फिर भी चर्चा होती है
और शहर के तमाम 'जै श्रीराम' के बीच
'लाल सलाम' तब भी दागा जाता है

यहाँ के लोग हर आनेवाले का
बहुत धधाकर स्वागत करते हैं
और हर जाने वाले को
उतनी ही तेजी से भूल जाते हैं

यहाँ सिर्फ जन्म के उत्सव होते हैं
मृत्यु तो इसने काशी के लिए छोड़ रखी है

यहाँ एक तरफ 'आधागाँव' हैं
तो दूसरी तरफ 'सोनामाटी'
और इन दोनों के बीच
करइल का वह क्षेत्र है|
जहाँ की मिट्टी कुछ इतनी जरखेज है|
कि हर आदमी एक संभावना है

इस शहर से मैं बहुत धीर-धीरे गया हूँ
जैसे धीरे-धीरे जाता है माँ का दूध
धीरे-धीरे जाती है ललाई
धीरे धीरे जाती है स्मृति

यह जो धीरे-धीरे जाना है
शहर को धीरे-धीरे पाना है
और मुड़-मुड़ के देखना है

आज जब शहर को अंतिम बार मुड़ कर देखता हूँ


यह ऊपर से धुंधुआता दिखा था
और नीचे से अंकुआता!

यहाँ चूल्हे में सन्नाटा था
और चक्की में हलचल!

अब यह एक विचित्र बात थी
कि बाजार से सब्जी गायब थी
बच्चे दूध व चावल को तरस रहे थे
और शहर में अपनी तरह की शांति थी

मैं इस शहर की समूची शांति के साथ
शहर को अलविदा कहता हुआ आज
भरा महसूस करता हूँ
और भारी भी!

   ('बोली बात' काव्य-संग्रह से)

 


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