डाउनलोड मुद्रण

अ+   अ-

कविता

अथ काशी प्रवेश
श्रीप्रकाश शुक्ल


धूल व धुएँ के बीच
लपकों व गपकों से आते पड़े
अभिजात गरीबों के इस पुरातन शहर में
मेरा प्रवेश
ग़ालिब के काबा-ए-काशी जैसा नहीं हुआ
बल्कि होल्कर हाउस के ठीक सामने लगे इमली के स्वाद जैसा हुआ

यह वही इमली का पेड़ है
जहाँ सदियों से कई 'देवदत्तों' का वास है
जिसकी तरफ 'होल्कर हाउस' की सीढ़ियाँ चढ़ते
मित्र वाचस्पति ने चुपके से बताया था
और जैसे ही कहा था कि कुछ को तो काशीनाथ जी ने
अपने संस्मरणों में कैद किया है
शहर की तमाम दाढ़ियों में जूओं के रेंगने की आवाज आई थी

इस शहर से मैं कई बार गुजरा हूँ
कभी ओस की तरह
तो कभी दूब की तरह

कभी शिशिर की तरह
तो कभी बसंत की तरह

जब कभी गाज़ीपुर की गंगा में लहरें उठी हैं
या कि वहाँ की स्त्रियों ने गुनगुनाए हैं छठ के गीत
इस शहर के तट पर न जाने कितनी बार
गंगा की लहरों में उतरती आरती की तरह
देखा है अपने चेहरे को चुनचुनाते

इस शहर में ठीक मणिकर्णिका की लहरों के बीच
इसी बीस सितंबर को
अपनी माँ को रख आया था चुपचाप
और वहाँ से लौटते वक्त
उसकी अंतिम एक मुट्ठी देह को सँभालता
मैंने जाना कि मैं
एक बार फिर जना गया हूँ।

मैं जब कभी यहाँ से गुजरा हूँ
मैंने हमेशा महसूस किया है
कि रांड़ों, साँड़ों व सीढ़ियों के इस सारस्वत प्रदेश में
डाड़ों की कोई भूमिका नहीं हैं
जबकि पूरे शहर को अपने ही कंधों पर उठाए
ये धाँगड़ लोग
पंडे व पुरोहितों से दिपदिपाते इस शहर को
धार देते हैं और धाह भी!

यह एक अजीब शहर है जिसका कोई समय नहीं है
जिसे कहीं भी पहुँचने की कोई जल्दबाजी नहीं है

जहाँ रात रात नहीं होती
दिन दिन नहीं होता
यहाँ जो भी होता है
या तो ठेके पर होता है
या फिर ठेंगे पर।

यहाँ हर आदमी
एक तरफ अपने कंधे पर अपनी चिता को उठाए
मस्ती से टहल रहा होता है
तो दूसरी तरफ
अपनी जाँघों में अपने हुस्न को दबाए
अपने मरकज की तरफ माइले परवाज रहता है

यह वह शहर है
जो जहाँ पर खड़ा है
वहीं पर पड़ा है
घोड़े की तरह अड़ा है

यदि आपको विश्वास न हो तो
गोदौलिया से रेंगते-रेंगते
लंका तक चले आइए
और इन दोनों को मिलाने वाली अस्सी को
जरा ठहरकर ठकठकाइए

वहाँ ठीक पप्पू चाय की दुकान पर
भनभनाती हुई
एक ऐसी आवाज मिलेगी
जो स्पांडीलाइटिस की तरह
शहर के पूरे खिंचाव को महसूस करती
अपनी जीभ से
पूरे शहर को सहलाती रहती है।

यह गया सिंह की आवाज है

जो काशी के अस्सी परिक्षेत्र में
अपने ही दाँतों में उलझकर
किटकिटा रही है

मेरे लिए यह काशी प्रवेश
लपरी गंगा से झपरी गंगा में प्रवेश जैसा है
जहाँ दुनिया रोज बदल जाती है।
('बोली बात' काव्य-संग्रह से)


End Text   End Text    End Text

हिंदी समय में श्रीप्रकाश शुक्ल की रचनाएँ