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कविता

घुरफेकन लोहार
श्रीप्रकाश शुक्ल


अपने कंधे पर टंगारी को लादे जाता घुरफेकन लोहार
हमारे लोकतंत्र का सबसे महत्वपूर्ण नागरिक है
जब वह चलता है
हमारे लोकतंत्र का सबसे सजग पात्र चल रहा होता है
जिसकी टाँगों व टंगों में अद्भुत लोच है

उसकी टंगारी से आती आवाज
हमारे लोकतंत्र से आती आखिरी आवाज है
जिसे सिर्फ वह जानता है

कितनी रातों से लादा है इसने इस टंगारी को
कितनी शामें गुजारी हैं इसके नीचे
कितने जंगल में कितनी बार
इसने बसाई हैं बस्तियाँ
यह और सिर्फ यह घुरफेकन जानता है

यह खटिया के चूर का हिस्सा है
घर की थूनी व थंभा है
लगातार खुलते व बंद होते दरवाजे का चौकठ है

जब कभी इस चौकठ में घुन लगता है
घुरफेकन हो जाता है उदास
टंगारी से उठती है एक आवाज

यह लोहे की नहीं
हड्डी की आवाज है।
(-'बोली बात' काव्य-संग्रह से)


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