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कविता

धूप
श्रीप्रकाश शुक्ल


रूप रेत भर
धूप खेत भर
फैल गई है चादर ताने
तट पर

सूरज नभ पर
हाँफ रहा है आशा कर कर
लौटेगी उसकी यह आभा
भर-भर रेत
नदी के तट पर

पर कैसे लौटेगी
छोड़ उम्र भर
अभी-अभी तो आई है
धूप कहाँ भेंटी
रेती को

जी भर!
   ('रेत में आकृतियाँ' संग्रह से)

 


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