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कविता

रेत में कलाकार
श्रीप्रकाश शुक्ल


बालू के कण साथ ले चलो, उड़ जा हारिल की नाईं
सुबह हुई अब सपने छूटे, उठ जा हरकारे की ठाईं।

ठोक-पीटकर आकृति दे दो, बाँधों नदी नाव की खाईं
जग जीतो सब लहरें गिन लो कर लो तट को वश में साईं।

तेरे हाथों में है ताकत, बढ़ो सृजन पथ माथ न दो
तेरी मुटठी में दुनिया है, बाँधों हाथ विराम न दो।

बालू गंगा का स्वरूप है गंगा क्या इतनी-सी, पर है
बालू बालू में प्रवाह को किसने धारा दी, जी भर है!

लोग रहेंगे आते-जाते तन-भर तुझको देखेंगे
उठते-गिरते जो संभलेंगे मन-भर तुमको भेटेंगे।

इस या उस की बात नहीं है हर आकृति में तेरा बल है
जो दुनिया से चलकर जाता तेरी नजरों की हलचल है।
    ('रेत में आकृतियाँ' संग्रह से)

 


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