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कविता

रेत में शाम
श्रीप्रकाश शुक्ल


चल पड़ी नाव
धीरे-धीरे फिर संध्या आई
नदी नाव संयोग हुआ अब
मन में बालू की आकृतियाँ छाईं

टूटा तारा
टूटी लहरें
टूटा बाट-बटोही
टूट-टूट कर आगे बढ़ता
पीछे छूटा गति का टोही

चाँद निराला
मुँह चमकाता
चमका-चमका कर मुँह बिचकाता
बचा हुआ जो कुछ कण था
आगे-पीछे बहुत छकाता

आया तट
अब लगी नाव
लहरें हो गईं थोड़ी शीतल
मन का मानिक एक हिराना
लहरों पर होती पल
हलचल!
   ('रेत में आकृतियाँ' संग्रह से)

 


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