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कविता

तनी हुई विफलता
श्रीप्रकाश शुक्ल


 

अकड़ी हुई रस्सी
बची रहती है जलने के बाद भी
राख में

वह आदमी जिसकी आँखों में चमक थी
गिरने के बाद भी छोड़ देता है कुछ रोशनी
बनिस्बत उस आदमी के जिसकी आँखें झुकी रहती हैं

अपनी लघुता में पड़ी रहकर
मुट्ठी जो तनी रहती है
ज्यादा भरोसे की होती है

उन खुली हथेलियों से
जो चिपचिपा जाती हैं
दूसरे की महानता को ढोते-ढोते

आँधी में टूटकर गिरा हुआ मकान
तूफान में सूखकर रेत हुई नदी
थककर गिरा हुआ आदमी
ज्यादे भरोसे का होता है
अपनी-अपनी संभावनाओं में

समर्पित सफलता से
ज्यादा मूल्यवान होती है
तनी हुई विफलता!
    ('ओरहन और अन्य कविताएँ' संग्रह से)


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