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कविता

यह कैसा समय है
श्रीप्रकाश शुक्ल


यह कैसा समय है जिसकी सबसे ज्यादे हम बात करते है ,वही हमारे जीवन में अनुपस्थित रहता है

मसलन प्यार
मसलन विश्वास
मसलन जनतंत्र

मसलन सत्ता से जुडा हुआ बहुत कुछ का प्रतिरोध
जब हम सत्ता के बाहर होते हैं

इस समय तो हमें उनकी याद सबसे ज्यादे आती है
जिन्होंने इस संसार को बहुत सुंदर बनाने के वायदे के साथ सभ्यता में प्रवेश किया था
और संस्कृति को बहुत सुंदर
बहुत उदार
बहुत सहनशील बनाने के वायदों के साथ हमारे कन्धों पर अपना मुलामय हाथ रखा था

हमें क्या पता था की जिन्होंने कंधे पर रखे पावों का पता बदलने के लिए कन्धों पर हाथ रखा था
वे अपने वायदों के साथ लापता हैं और जिनसे हथेलियों की गर्माहट की आस लिए हम अपने जीवन पथ पर बढ़ते जा रहे थे उन्होंने अब हमारे सर पर अपने नाखून रख दिए है

हमारा लहू जो टपकता है उसे हम ही जानते हैं जिसे हमारी क्रांति के नाम पर उन्होंने टपकने से रोक भी रखा है

इस जनतंत्र में चीजे ऐसे ही नष्ट होती रहेंगी और हमारी आवाज यौ ही इस धरा पर गूंजती रहेगी

बोलने को वे रोक सकते हैं
हमारे प्रदर्शन को भे वे नष्ट कर सकते हैं
लेकिन हमारे सोचने का वे क्या करेंगे
जहाँ डी०एन ०ए० नहीं
हमारा वजूद सोचता है!

मित्रों यह कोई कविता नहीं है
यह एक ऐसे परिसर का बयान है जहाँ हमें सब कुछ को देखने की आजादी है लेकिन बहुत कुछ को न बोलने की मनाही है

यह एक चुप्पी का शोर है
कराहना जहाँ अपराध है
और उलाहना अवसरवाद !

इस व्यवस्था में असली चीजें इसी अवसरवाद के नाम पर मारी जाती हैं और नकली चीजें यूँ ही फलती फूलती रहती हैं .


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