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कविता

कन्फुकवे
श्रीप्रकाश शुक्ल


आज कल काशी मे कान फूकने वालों की एक बड़ी प्रजाति विकसित की गई है
यह विलुप्त होती हुई कनफुकवा प्रजाति की आधुनिक उपस्थिति है
जिसे विज्ञानं की अति आधुनिक उपलब्धि माना जा रहा है

ए कंफूकवे बहुत मीठा बोलते हैं
ए कन्फूकवे बहुत अच्छा बोलते हैं
ए कंफुकवे बहुत प्यारा बोलते हैं

जब कभी ए मिलते हैं आपसे
आपकी जरूरत पूछते हैं
आपके अधूरे काम की जानकारी जुटाते हैं
अगर आपके पास कुछ सपने हैं तो उनकी उडान का ऊँचा आश्वासन देते हैं

ए बार बार पिछले को भूल कर अगले की बात करते हैं और आपसे यह अपेक्षा करते हैं की आप भी इनके अतीत को भूल जाये
आप ऐसा कुछ भी न सोचें जिससे उन्हें अपने वर्तमान पर घृणा आवे

घृणा फैलाना इस तरह यूं भी अपराध माना जायेगा जिसके लिये आपको कभी भी कोई दंड दिया जा सकता है

मुकदमा तो यूं भी इनके लिए कूड़े के ढेर में पड़ी हुई धाराएँ हैं जिसे ये जब चाहे रीसायकिल कर सकते है !

सच इनके लिए उतना ही है जितना इनकी जीभ और कान की दूरी होती है
पड़ोस की बात जाने ही दें
दिल्ली भी इनके लिए इतनी ही महफूज है
जहाँ हत्या भी एक सूझ है
सब कुछ अबूझ!

आखिर इनको कैसे समझाया जाय की जिस शहर में रोज ही सैकड़ों लाशें फूकी जा रही हों और इन लाशों में अधजले बूढों व् बच्चों के साथ महिलाओं की भी लाशें शामिल हैं
सब कुछ का सच एक कंफुकवे में ही कैसे हो सकता है

सच की दूरी या कि गति इतनी छोटी कैसे हो सकती है की हम उन चीखों को सुनना बंद कर दें जो भोपाल और दिल्ली से उठ कर हमारी आत्मा में हथोड़े की तरह बज रही हैं
या की उन लड़कियों का क्या करें जो अपनी सुरक्षा में पवित्रता के सबसे मारक मोर्चे पर हम पवित्रतम गुरुओं से सवाल करती हैं
और समर्थन न मिलने के वावजूद अपनी लड़ाई अपने आप लडती हैं
हम यह कैसे मान लें की हमारी भूमिका सिर्फ उस देवता की अभ्यर्थना में है जिसके सामने हम अपनी आवाज कहने जाते हैं तो पता चलता है की इसका कान तो पहले ही फूका जा चुका है .
और सब कुछ का मीठा मीठा सुनते सुनते इसके दिमाक की नसों को दीमक चाट गया हैं .

अब आप इस पर विल्कुल ही शर्मिंदा न हों की फूकने वाले के पास बहुत दिमाग है जबकि फुकाने वाला तो बेचारा है और पूरी तरह खाली है

इतिहास भी तो यही कहता है की सभ्यतों का संघर्ष तो फूकने वालों के बीच ही हुआ है

फुकाने वाले तो केवल दक्षिणा देते हैं और हर समय परलोक में जीते हुए गंगा स्नान करते हैं

जब कभी आप गंगा की सीढियों पर बैठें तो फुकाने वाला आपको नदी के ठीक बीचोबीच बहता हुआ मिलेगा
जबकि फूकने वाला घाटों की चमकती रोशनी में झूमता हुआ दिखाई देगा .


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