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कविता

अपनों के मन का
जितेंद्र श्रीवास्तव


मैं कवि नहीं झूठ फरेब का
रुपया पैसा सोने-चाँदी का

मैं कवि हूँ जीवन के सपनों का
उजास भरी आँखों का
मैं कवि हूँ उन होठों का
जिन्हें काट गई है चैती पुरवा
मैं कवि हूँ उन कंधों का
जो धँस गए हैं बोझ उठाते

मैं कवि हूँ
हूँ कवि उनका
जिनको नहीं मयस्सर नींद रात भर
नहीं मयस्सर अन्न आँत भर

मैं कवि हूँ
हाँ, मैं कवि हूँ
उन उदास खेतों के दुख का
जिनको सींच रहे हैं आँखों के जल

मैं कवि हूँ उन हाथों का
जो पड़े नहीं चुपचाप
जो नहीं काटते गला किसी का
जो बने ओट हैं किसी फटी जेब का

मैं कवि हूँ
जी हाँ, मैं कवि हूँ
अपने मन का
अपनों के मन का


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