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कविता

अबकी मिलना तो !
जितेंद्र श्रीवास्तव


मोबाइल में दर्ज हैं
कई नाम और नंबर ऐसे
जिन पर लंबे अरसे से
मैंने कोई फोन नहीं किया

उन नंबरों से भी कोई फोन आया हो
याद नहीं मुझको
मेरी ही तरह
उन्हें भी प्रतीक्षा होगी
कि फोन आए दूसरी तरफ से ही

हो सकता है
एक हठ वहाँ भी हो
मेरे मन की तरह

यह भी हो सकता है
न हठ हो न प्रतीक्षा
एक संकोच हो|
या कोई पुरानी स्मृति ऐसी
जो रोकती हो उंगलियों को
नंबर डायल करने से

आखिर कभी-कभी रिश्तों में
आ ही जाती हैं
ऐसी स्मृतियाँ भी

तो क्या ऐसे ही

उदास पड़े रहेंगे ये नंबर
मोबाइल में

मुझे भय है कहीं गूँगे न हो जाँय ये
या मैं ही उनके लिए

इसलिए आज बतियाना बहुत जरूरी है
उन सबसे
जिनकी आवाज सुने बहुत दिन हुए

तो लो
यह पहला फोन तुम्हें
मित्र 'क'

बोलो चुप क्यों हो
आवाज नहीं आ रही तुम्हारी
कहाँ हो
आजकल
क्या कर रहे हो

हँसते हो ठठा कर पहले ही जैसे
या चुप रहने लगे हो
जैसे हो इस समय

कुछ तो कहो दोस्त
कि कहने सुनने से ही चलती है दुनिया
अबोले में होती है मृत्यु की छाया
मुझे सुननी है तुम्हारी आवाज
बोलो मित्र
बताओ हाल-चाल... ... ...
सुनो, अभी करने हैं मुझे बहुत सारे फोन
योजनाएँ बनानी हैं मिलने की
पूरे मन से धोनी हैं
रिश्तों पर जमी मैल

चाहें वह जमी हो मेरे कारण
या किसी के भी

सोचो दोस्त
यदि हमारे पैर छोड़ दें आपस में तालमेल
या करने लगें प्रतीक्षा हमारी तरह
पहले 'वो' पहले 'वो'
तो ठूँठ हो जाएगा शरीर बिलकुल अचल
और हर अचल चीज अच्छी हो
जरूरी तो नहीं

तो छोडो पुरानी बातें
हँसो जोर से
और जोर से
इतनी जोर से
कि भीतर बचे न कुछ भी मलीन

और हाँ अबकी मिलना
तो आखों में आँखें डालकर मिलना
सचमुच
धधा कर मिलना


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