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बाल साहित्य

हवाई सैर
मनोहर चमोली ‘मनु’


बरगद का एक पेड़ था। वह बूढ़ा हो चला था। एक दिन बरगद सोचने लगा - 'सालों से एक जगह पर खड़ा हूँ। जिसे देखो। वह मेरी काया पर शरण लिए हुए है। मेरी किसी को चिंता नहीं है।' तभी उसे किसी के रोने की आवाज आई। एक तितली रो रही थी। एक गिद्ध का बसेरा भी इसी बरगद पर था।

गिद्ध ने तितली से पूछा - 'नन्ही रानी। क्या हुआ?' यह सुनकर तितली दहाड़ें मारकर रोने लगी। बरगद के पेड़ पर बया का घोंसला भी था। बया ने अपने घोंसले से झाँका। गिद्ध ने फिर पूछा - 'अब रोती ही रहोगी या बताओगी भी कि हुआ क्या है?'

तितली ने अपने आँसू पोंछे। फिर सुबकते हुए बोली - 'काश! मेरे पंख भी तुम्हारी तरह होते। मैं भी हवाई सैर करती।' गिद्ध को हँसी आ गई। वह बोला - 'ओह! तो यह बात है। लेकिन तुम्हारे भी तो पंख हैं। तुम्हें आसमान में उड़ने से भला किसी ने रोका है। उड़ो। खूब उड़ो।'

तितली ने मुँह बिचकाया। कहा - 'मेरा उड़ना भी कोई उड़ना है। थोड़ा सा उड़ती हूँ। फिर थक जाती हूँ। उड़ान हो तो तुम्हारे जैसी। वाह! ऊपर, ऊपर और ऊपर।' गिद्ध ने कहा - 'अच्छा। अब समझा। तो तुम आसमान की ऊँचाई देखना चाहती हो?'

तितली ने कहा - 'हाँ। नहीं। हाँ। मैं आसमान से धरती को भी देखना चाहती हूँ। क्या धरती वाकई गोल है? समुद्र कैसा दिखता है? नदी, पहाड़, पेड़ कैसे लगते होंगे? बड़ा मजा आता होगा न?' गिद्ध ने कहा - 'तो चलो। आओ। मेरे किसी एक पैर पर आराम से बैठ जाओ।' तितली ने डरते हुए कहा - 'न बाबा न। तुम जैसे ही अपने पंख फड़फड़ाओगे, वैसे ही मैं तिनके की तरह उड़ जाऊँगी।'

बया सारा माजरा समझ चुकी थी। वह हँसते हुए तितली से बोली - 'तुम मेरा घोंसला ले लो। गिद्ध भाई उसे मजबूती से अपने पंजों में पकड़ लेगा। तुम मेरे घर की खिड़की से इस दुनिया को आराम से देखना।' तितली खुश हो गई। कहने लगी - 'यह ठीक रहेगा। लेकिन...।'

'लेकिन क्या?' गिद्ध ने पूछा। तितली ने सोचते हुए कहा - 'अगर बारिश हो गई तो? मैं भीग गई तो? मुझे भीगने से जुकाम हो जाता है।' गिद्ध ने जवाब दिया - 'मेरे पंख किसी छतरी से कम नहीं। डरो मत। तुम पर बारिश की एक बूँद भी नहीं गिरने दूँगा। अब चलो।'

तितली ने हँसते हुए कहा - 'अरे हाँ। यह तो मैंने सोचा ही नहीं। लेकिन...।'

अब बया ने चौंकते हुए पूछा - 'लेकिन क्या?' तितली ने आँखें मटकाते हुए कहा -'घूमते-घूमते अगर मुझे भूख लग गई तो?' सब सोच में पड़ गए। बया ने सुझाव दिया -'तो तुम फूलों का रस जमा कर लो।' 'हाँ। ये ठीक रहेगा। लेकिन...।'

तितली फिर सोच में पड़ गई। 'अब क्या हुआ।' बया ने पूछा। तितली उदास हो गई। कहने लगी - 'मैं फूलों का रस कब जमा करूँगी? रस जमा करने में तो समय लगेगा न।' मधुमक्खियों का विशालकाय छत्ता भी बरगद की दूसरी शाख पर था। अब तलक रानी मधुमक्खी चुप थी। वह सब सुन रही थी।

रानी मधुमक्खी भी तितली के पास मँडराने लगी। कहने लगी - 'मैं बताती हूँ। तुम मेरा छत्ता ले जाओ। इसमें खूब सारा शहद है।' तितली खुश हो गई। तालियाँ बजाते हुए कहने लगी - 'अब आएगा मजा! आप सब कितने अच्छे हो। ये बरगद का पेड़ ही तो है, जिसमें हम सभी मेल-जोल से रहते हैं।'

सबने तितली की हवाई सैर का इंतजाम कर दिया। गिद्ध ने उड़ान भरी। तितली मुस्करा रही थी। बया के साथ-साथ रानी मधुमक्खी भी नाच रही थी। बरगद भी खुशी से झूमने लगा।

 


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