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लेख

पात्रिक मोदियानो और स्मृतियों की भूलभुलैया
मदन पाल सिंह


एक असर मेरे अंदर गुजरकर भी शेष रह गया जैसे टूटे हुए सपने के ये छोटे-छोटे टुकड़े हों, जिन्हें आप जागने पर एक पूरा स्वप्न बनाने के लिए जोड़ते हैं।

- उपन्यास 'रु दे बुतीक ऑब्स्क्यूर' (अंधियारी दुकानों वाली गली) से।

इस बार भी हमेशा की ही तरह साहित्य के नोबेल पुरस्कार की घोषणा होते ही नोबेल समिति की निर्णय प्रक्रिया और उसके मंतव्य पर, आम पाठकों और साहित्य से जुड़े अनेक समूहों की आशा-निराशा का द्वंद्व आरंभ हो गया जो बदस्तूर जारी है। यह यूँ ही चलता रहेगा और अगले वर्ष अक्टूबर में फिर कुछ नए नामों और मुद्दों के साथ इसकी पुनरावृत्ति होगी। अनेक वर्षों से जहाँ लेखन के सात दशक समेटे प्रसिद्ध फ्रांसीसी कवि ईव बोनफुआ के लिए विश्व भर में फैले उनके पाठक इस पुरस्कार की आस लगा रहे थे, वहीं अमरीका के उपन्यासकार फिलिप रॉथ का नाम भी ऊपर था। खैर इस वर्ष के साहित्य के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित लेखक हैं पात्रिक मोदियानो। इस छोटे से आलेख में विभिन्न विद्वानों, समिति के नजरिए और महान-शाश्वत-साहित्य जैसे बड़े शीर्षकों की ऐनक से उनके रचना कर्म को न देखकर, एक पाठक के रूप में उनके साहित्य की विषय-वस्तु और साहित्य के पीछे के नियामक कारकों की आंशिक पड़ताल की गई है। आंशिक पड़ताल इसलिए क्योंकि उनके लेखन और स्मृतियों का फलक व्यापक है और नम्रतापूर्वक मुझे यह कहने में कोई गुरेज नहीं है कि मैं उनकी यादों का एक छोटा हिस्सा ही स्पर्श कर पाया हूँ।

बचपन की स्मृतियों का भार मोदियानो स्वयं वहन करते है परंतु इससे लेखक के रचनाकर्म को समझने में बड़ी मदद मिलती है। जिसमें वह परिवेश, समाज, घटनाओं, संबंधियों और संबंधों की पड़ताल कर उनकी पहचान तो खोजते ही है, इसके साथ ही इस कड़ी में वह अपनी स्वयं की पहचान और सरोकार भी खोजते हैं। और इसमें कोई आश्चर्य भी नहीं है जब वह इन सबके बीच उलझ से जाते हैं। फिर पाठक भी स्वयं को मतिभ्रम की स्थिति में पाता हैं। लेखक को हमारे समय का प्रूस्त या अन्य लेखकों के नजरिए से देखने की अपेक्षा उसके जीवन में झाँकने से यह स्पष्ट हो जाता है कि मोदियानो के लेखन की थीम उनके जीवन में ही छुपी है। 1945 में पेरिस के उपनगर बूलोन बियंकूर में जन्में इटालियन यहूदी पिता और बेल्ज माँ की संतान पात्रिक को पंद्रह वर्ष की आयु से ही अपने पिता की अपेक्षा दूसरे लोगों का अधिक सानिध्य मिला। उनमे से एक थे उनकी माँ के एक मित्र गणितज्ञ और समकालीन फ्रेंच कविता के एक प्रयोगवादी कवि रेमॉ केनों। साथ ही लेखक के पिता अपनी पत्नी के स्थान पर अपनी खुशी एक इतालियन औरत में तलाश रहे थे। ऐसी ही बहुत से वजहों के कारण अपने पिता से उनके संबंध कभी भी सामान्य नहीं हो पाए। और उनकी सौतेली माँ ने तो उन्हें घर में स्थान देने से ही इनकार कर दिया। फिर दस वर्ष की उम्र में अपने छोटे भाई की मृत्यु से अकेलेपन का बोध और भी पुख्ता हुआ। किशोर अवस्था में भावनात्मक अस्थिरता, असहायता तथा माँ की आर्थिक अक्षमता ने लेखक की स्मृति पर गहरा प्रभाव छोड़ा। भले ही पश्चिमी जगत में पारिवारिक बंधन की अस्थिरता सामाजिक स्तर पर कोई बहुत हलचल नहीं मचाती पर एक बच्चे के मानस पर इसके चिह्न अंकित न हों यह भी तो असंभव है। रही सही कसर लेखक के पिता ने अपने पुत्र को पुलिस विभाग में ठग और उचक्का घोषित करके पूरी कर दी। यद्यपि युवा पात्रिक धनार्जन के लिए की जाने वाली कुछ छोटी घटनाओं में शामिल जरूर थे परंतु ये घटनाएँ जैसे उस अस्थिरता का एक मोड़ थीं, नियति नहीं। इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि भग्न बचपन जीने वाले मोदियानो पिता के संबंधों की अनेक स्तर पर व्याख्या करते हैं। स्मृति और समय के कठिन तालमेल को बुनते हैं। और वह इसी दुख से प्रेरित होते हैं तभी तो ईमानदारी से लेखक ने 1978 में प्रकाशित और प्री गौंकूर से सम्मानित उपन्यास 'रु दे बुतीक ऑब्स्क्यूर' (अंधियारी दुकानों वाली गली) अपने पिता और भाई को समर्पित किया है।

इस उपन्यास की प्रथम पृष्ठ में ही शुरुवात जिस वाक्य से होती है, वह है : 'केवल एक स्पष्ट ढाँचे के अलावा, मैं कुछ भी नहीं हूँ।' यह उपन्यास गी रोलां नाम के एक जासूस के इर्द-गिर्द बुनी गई कहानी है, जो एक दुर्घटना के कारण अपनी स्मृति और उत्पत्ति का अतीत खो देता है। यहाँ तक की उसे अपना नाम भी याद नहीं रहता। लेकिन वह यह नहीं भूलता कि उसे अपनी पहचान चिह्नित करनी है। इस तरह वह अपने भूतकाल को जानने के लिए बैचैन है क्योकि इसी के सहारे वह जान सकता था कि आखिर वह कौन है, उसका स्वयं का वजूद क्या है। और इस खोज को दूसरे विश्व युद्ध के आलोक में देखा गया है, जहाँ पहचान का संकट मुँह बाए खड़ा था। इस उपन्यास में जहाँ लेखक के अपने छवि चित्र हैं वहीं यहूदियों की समस्याएँ भी। सबसे बड़ी बात है उपन्यास की कथावस्तु जो अनेक घटनाओं, पहचान और परिवर्तन के साथ पाठकों को उनके अपने विचार और प्रश्नों की जद्दोजहद के साथ छोड़ती है। और ये प्रश्न हैं कि क्या हम अपने आपको, अपने वजूद को सचमुच जानते हैं। उपन्यास के संवाद और उसमें आए वर्णनों के पीछे की संश्लिष्टता इसी उपन्यास के एक अंश में देखी जा सकती है : 'तब मेरे दिमाग में अचानक एक गुब्बार छा गया। जैसे इस कमरे की छवि ने मुझे चिंतामग्न कर दिया हो। और इस भाव से तो मैं पहले से ही परिचित था। मकानों की ड्योढ़ी, खाली सुनसान गली, साँझ के धुंधलके में इन छायाओं के समूह ने मुझे अशांत कर दिया था। जैसे की एक गीत या जानी-पहचानी पुरानी सुगंध बेचैन कर देती है। और मैं आस्वस्त था कि अक्सर इसी समय मैं यहाँ बिना हिले-डुले खड़ा होता था। चुपचाप, इंतजार करते हुए। बिना किसी खास भाव भंगिमा के, और एक लैंप को जलने का साहस भी नहीं होता था।'वहीं दूसरी और उनके उपन्यासों में नाजियों द्वारा फ्रांस पर कब्जे के दौरान यहूदियों पर किए गए अत्याचार का भी विषादपूर्ण वर्णन है। हालाँकि लेखक का जन्म दूसरे विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद हुआ था लेकिन मोदियानो के अनेक उपन्यासों में यह केंद्रीय विषयवस्तु रही है। इसके सामाजिक-मानसिक दुष्प्रभाव का उन्होंने व्यापक अध्ययन किया है। जैसे कि उपन्यास 'दोरा ब्रूदैर', पेरिस की एक यहूदी लड़की के भटकाव और पीड़ा की कहानी है। साथ ही इसमें अनेक व्यक्तियों की कहानी खुलती जाती हैं और दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान यहूदियों की आपबीती और यूरोपियनो द्वारा उनके उत्पीड़न का खुलासा भी होता है।

इसी विषयवस्तु पर उनका प्रथम उपन्यास 'ला प्लास द लेतवाल' (सितारे का स्थान) भी आधारित है जिसमे फ्रांसीसी यहूदी राफेल श्लेमिलोविच की कहानी है। इस विषाद कथा का नायक नैरेटर की भूमिका में भी हैं। यह उपन्यास यहूदियों के विरुद्ध घोषित युद्ध और अत्याचार और उनके प्रभाव का ही अक्स न होकर लेखक के स्वयं के यथार्थ, भटकाव का भी प्रतिबिंब है। स्वयं की स्मृतियाँ, स्थान और वास्तविकताएँ किस तरह से कथा साहित्य में दूसरे लोगों की विपदा के साथ पुनर्जीवित हो सकती हैं, इसी का उदाहरण यह उपन्यास है। यहाँ यह रेखांकित करना भी उचित है कि लेखक द्वारा पिता के साथ असहज संबंधों से उपजी समस्याएँ भी इस उपन्यास में उपस्थित हैं। इस तरह यह उपन्यास विभ्रम, कल्पना और यथार्थ के टोन में आपबीती और जगबीती का आख्यान बन जाता है। स्वयं का आलाप और कथा लेखन में इसके सशक्त प्रयोग को इस तरह भी समझा जा सकता है कि 'मैं' से मुराद है कि यह मैं हूँ, लेकिन मैं नहीं हूँ। फिर भी 'मैं' का इस्तेमाल करने से मैं एकाग्र होता हूँ। यह ऐसा ही है जैसे मैंने एक आवाज का लिप्यंतरण किया है, जिसने मुझसे बात की और बताया की यह 'मैं' हूँ... यह 'मैं' दूसरे चरित्र का है जो मुझसे बात करती है और जिसे मैं सुनता हूँ। यही 'मैं' मेरी आत्मकथा से मुझे दूर करती है यद्यपि मैं भी कभी-कभी कथा में शामिल हो जाता हूँ।'

मोदियानो ने उपन्यासों के अतिरिक्त कुछ गीत भी लिखे और फिल्मों की पटकथा भी। परंतु वह मूलतः उपन्यासकार हैं और उन लेखकों में से हैं जो अपनी विषयवस्तु और उसके प्रस्तुतीकरण पर बिना कोई लंबी-चौड़ी बात करे या तहलका मचाए सालों-साल काम करते रहते हैं। अपने आपको खामोशी से अपने रचनाकर्म पर, खास विषयवस्तु पर केंद्रित रखते हैं। करीब तीस पुस्तकों के लेखक मोदियानो के 1968 में प्रकाशित प्रथम उपन्यास 'ला प्लास द लेतवाल' (सितारे का स्थान) ने पाठकों और आलोचकों का ध्यान आकृष्ट किया और इसके लिए वह पुरस्कृत भी हुए। वहीं उन्हें 'रु दे बुतीक ऑब्स्क्यूर' (अंधियारी दुकानों वाली गली) के लिए प्री गौंकूर पुरस्कार दिया गया। इस पुरस्कार के बारे में लेखक ने कहा था कि 'मेरे लिए प्री गौंकूर, कुछ मिस फ्रांस के चुनाव की तरह है। बिना भविष्य के। यह आश्चर्यजनक तो है लेकिन पुरस्कार लेखक की लेखन-वृत्ति पर कोई प्रभाव नहीं डालता। क्योंकि शायद ऐसा इसलिए भी है कि पुरस्कार, दूसरी पुस्तकों को अलग करके, एक पृथक पुस्तक को दिया जाता है।' इस तरह वह पुरस्कार की प्राप्ति पर आह्लादित तो होते हैं पर विचलित नहीं, क्योंकि उन्हें पुरस्कार के भविष्य और अनिश्चिंतता का ज्ञान है। वह अपने उपन्यास 'लोरिजॉ' (क्षितिज) में कहते भी हैं कि 'जो भी हम दिन-प्रतिदिन जीते हैं वह वर्तमान की अनिश्चितता और परिवर्तन द्वारा चिह्नित है।'

सम्मान के अलावा जब पाठक जगत में उनकी उपस्थिति के बारे में बात करें तो यही कहा जा सकता है कि न तो वह फ्रांस के बाहर लोकप्रिय उपन्यासकार रहे और न ही उन्होंने फ्रांस में कोई बहुत ज्यादा लोकप्रियता बटोरी थी। ना ही उन्हें फ़्रांस के हर घर में जाना जाता था और ना ही हर कोई उन्हें जानता था। हाँ, एक 'गंभीर लेखक' के तौर पर 'गंभीर पाठकों' के बीच वह समादृत हैं। और इसमें कोई आश्चर्य भी नहीं है क्योंकि लोकप्रिय साहित्य बहुत से अन्य देशों के साहित्य की तरह दूसरे स्रोतों से आता है। उनके लेखकों और प्रकाशकों के सरोकार कुछ और होते हैं। हालाँकि ओरहन पामुक और गैब्रिएल गार्सिया मार्केज़ जैसे अनेक प्रतिष्ठित लेखक अपनी लोकप्रियता के कारण इसके अपवाद भी रहे हैं। जो भी हो नोबेल पुरस्कार के कारण उनकी ओर तेजी से ध्यान गया है और पाठक उनके अनेक उपन्यासों के साथ ही इसी वर्ष प्रकाशित उपन्यास 'पूर की तू न त पर्द पा दा ल क्वार्तीए (जिससे कि तुम मोहल्ले में खो ना जाओ) की ओर तेजी से आकर्षित हुए हैं।

मोदियानो जब कहते हैं कि वह पिछले पैतीस वर्ष से एक ही किताब लिख रहे हैं तो इसका तात्पर्य है कि वह कुछ बीजों से उत्पन्न पौधों की कलम विभिन्न तनों के साथ जोड़ रहे हैं। और ये ही वे स्मृतियाँ, जीवन अनुभव और वृहत घटनाओं के प्रभाव हैं जो उनके साहित्य में स्थान पाते हैं। क्योंकि कहीं न कहीं हम वही बनना चाहते हैं जिससे डरते हैं और वही लिखना चाहते हैं जिन स्मृतियों के प्रेत से हम छुटकारा पाना चाहते हैं। उन स्मृतियों से जो व्यथित करती रहतीं, हमारा पीछा करती हैं और परंतु हमारे निर्माण के केंद्र में भी रहती हैं।

अब यहाँ मोदियानो के साहित्य से पृथक, नोबेल पुरस्कार और भारतीय साहित्य पर भी चर्चा कर ली जाए। क्योंकि अनेक पाठक और विद्वान इस बात से रोमांचित हैं कि आंग्ल साहित्य के बाहर भी साहित्य की एक दुनिया है जिसे पुरस्कृत किया जा सकता है या पुरस्कृत किया जाता रहा है। इसी आलोक में भारतीय पाठकों की भावनाएँ भी गैर आंग्ल साहित्य से एक करीबी रिश्ता बना लेती हैं और इसी संदर्भ में वे अपने साहित्य को भी जैसे पुरस्कृत मान बैठते हैं। मनोवैज्ञानिक तौर पर यह मात्र बेबस शहीद होने की एक जबरदस्त एकतरफा भावना है। इसके पीछे हमारी नैतिक अक्षमता है न कि रचनात्मकता में कमी। जिसे हम भारतीय साहित्य की दृश्यता या प्रस्तुतिकरण की कमी के तौर पर देख सकते हैं। इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि उपलब्धता श्रेष्ठ और उदात्त साहित्य की निशानी है। यहाँ सिर्फ इतना ही तात्पर्य है कि साहित्य की दृश्यता अपना खुद का प्रतिनिधित्व करती है। परंतु जब हमारे तंत्र और हृदयों की साँकलों पर ही ताले लगे हों तो दृश्यता इनसे कैसे बाहर निकले! इसके बाद तो पश्चिम और नोबेल समिति के चुनाव को पक्षपातपूर्ण कहना, बिना 'होमवर्क' करे, खुद अपने ऊपर ताली बजाने जैसा है।


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