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कविता संग्रह

अलंकार-दर्पण
धरीक्षण मिश्र

अनुक्रम 10 अतद्गुण अलंकार पीछे     आगे


लक्षण (चौपई) :- दुइ पदार्थ रहि के एक संग। एक अन्‍य के गुण या रंग।
ग्रहण करत ना जहाँ देखात। उहाँ अतद्गुण मानल जात॥
 
उदाहरण (चौपई) :-
पानी में पुरइन के पात। जनमत और रहत दिनरात॥
लेकिन जल के गुण या रंग। पत्ता लेत न अपना संग॥
भीजत ना पुरइन के पात। तनिको जल ना सटल देखात॥
कोयल के बच्‍चा कुछ काल। पोसल काग जानि निज बाल॥
होत होत बचपन के अंत। कोयल में जा मिलत तुरंत॥
तजत काग के नीड़ समेत। कौवा के गुण कुछ ना लेत॥
 
सार :-
छोटा आम बीजू का पौधा के सिर काटल जाला।
बदला में एक बड़ा आम के टहनी उहाँ बन्‍हाला॥
ऊ यौगिक पौधा कुछ दिन में बड़ा बड़ा फल देला।
बीजू के आकार और गुण किंतु न तनिक रहेला॥
तिल तन्‍दुल दूनूं के केहू केतनो फेंटि मिलावे।
किंतु एक के रंग और गुण ना दुसरा में आवे॥
 
ताटंक :-
चिउरा और दही केहु केतनो सारे और मिलावेला।
लेकिन कवनो में कवनो के गुण तनिको ना आवेला॥
 
वीर :-
लाल और कोमल रसना का साथे दाँत कड़ा अति श्‍वेत।
बसें सदा पर एक दूसरा के गुण रूप कबे ना लेत॥
खिलत फूल पतई में रहि के और रहत पतई का साथ।
पर पतई के रूप लेत ना , ना निज गुण से धोवत हाथ॥
 


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