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कविता संग्रह

अलंकार-दर्पण
धरीक्षण मिश्र

अनुक्रम 13 उल्लेख अलंकार पीछे     आगे

लक्षण (चौपाई) :-
एक वस्‍तु के रूप में अनेक। भिन्‍न भिन्‍न नर लखें प्रत्‍येक॥
अइसन जहाँ सुयोग भेंटात। उहाँ प्रथम उल्‍लेख कहात॥
 
उदाहरण (सवैया) :-
केहु सोहत देखि कहे हमके गृह में अबहीं अनुरक्‍त हईं।
केहु देखि कुटी में निवास कहे जग से हम पूरा विरक्‍त हईं।
केहु ईहो बुझे कि अशक्‍त गुने परिवार से भी परित्‍यक्‍त हईं।
केहु बाँचत पुस्‍तक मोट लखे त कहे भगवान के भक्‍त हईं॥
सब मूरख लोग बुझे हमके हम मूरख एक महान हईं।
बुद्धिमान में कुछ लोग बुझे हमके कि एगो बुद्धिमान हईं।
कवि लोग कहे कवियो हम के उनमें कबे पावत स्‍थान हईं।
निज के हम मानीले छात्र एगो नित देत पढ़ाई में ध्‍यान हईं॥
 
छंद :- तब जेल न गैला से हमके तेजका नेता कायर कहले।
केहु चापलूस भी कहल राज का अमलन का साथे रहले।
पढि़ के हम हाकिम ना भइनी आ दूध दही ना खइनीं हम।
केतने लोगन का अत: दृष्टि में महा अभागा भइनीं हम॥
कोष के पुस्‍तक देखि के छात्र कहे सब शब्‍द के अर्थ बताई।
माई कहे ओकरे इहे बेंचि कई दिन ले चनाचूर किनाई।
बीचहिं में बुढ़ऊ बोलले तकिया के हमार ई काम चलाई।
बूढ़ी कहें कि महीनन एही से चूल्हि में आगि धरावल जाई॥
 
दूसरा उल्‍लेख
 
लक्षण (सार) :-
एक वस्‍तु में एक व्‍यक्ति का कई रूप जब सूझे।
अलंकार उल्‍लेख दूसरा ओके कवि सब बूझे॥
 
उदाहरण (सवैया) :-
दृढ़ सत्‍य में जे हरिश्‍चंद्र क्षमा में जे क्राइस्‍ट देत सदा क्षमादान बा।
करुणामय गौतम बुद्ध सुनीति में जे पवले कवि के सब ज्ञान बा।
भगवान की भक्ति में जे प्रहलाद तथा ध्रुव और भुशुण्डि सुजान बा।
सुअहिंसक युद्ध के योद्धा उहे जेकरा यश के दुनिया में बखान बा॥
लखि फूलन के मुख पंकज सा केतने लोगवा के हिया हरखाइल।
शशि पूनम सा केहु देखल तऽ ओकरा ओहि में कुछ दाग देखाइल।
शुभकारक दूज के चाँद मानि केतने जने का ओके फोटो लियाइल।
केहु जानल जाति मलाह त बूझल सत्‍यवती कलि में उपराइल॥
लट केवल देखि जे पावल ऊ सब नागिन जानि के दूर पराइल।
अँखिये भर देखल जे ओकरा मछरी बुझि के मुँहवाँ पनियाइल।
मुख जोति के सामने आइल जे केहु ओ सब के अँखिया अन्‍हराइल।
केहु देखि न पावल एसे न फूलन देवी पुलीस का हाथ में आइल॥
सदा दान का नाम से आन के वित्त हरे बदे विप्र के पास हवे।
किरिया एकरे खइले करे दोष से मुक्‍त एगो इजलास हवे।
दुइ हिन्‍दू का बीच में भेद के भीति खड़ा करे के शिलान्‍यास हवे।
बड़की जतिया के कहावे बदे उपवीत एगो चपरास हवे॥
 
फूलनाष्‍टक छंद :-
हे फूलन अद्भुत नारी तूँ बीहड़ बन विपिन बिहारी तूँ।
राना का और शिवाजी का कर के तलवार उघारी तूँ॥
निज दल के दुक्‍ख निवारक तूँ बैरी दल के संहारक तूँ।
' पकड़ ' क्रिया द्वारा परधन बिनु हिंसा के अपहारक तूँ॥
यू.पी. बिहार मध्‍यप्रदेश में बन बहुरुपिया विविध वेश।
धइ के घुमलू केहु जानल ना खोजल गइलू यद्यपि विशेष॥
बनि गइलू कहीं भिखारी तूँ कतहीं कुछ के व्‍यापारी तूँ।
कतहीं हिप्‍पी नवयुवक और कतहीं पुलिस अधिकारी तूँ॥
तोहके अजान जन घृणा पात्र जानल जे जानल नाम मात्र।
सिखलू रण कौशल विक्रम से जेकर रहलू पहिले सुछात्र॥
सब अस्‍त्र शस्‍त्र के ज्ञानी तूँ रण बीच खड़ी मरदानी तूँ।
जनता में तूँ आतंक मूर्ति मन के अतिशय अभिमानी तूँ॥
शासन के बड़हन बागी तूँ बन विवश गाँव घर त्‍यागी तूँ।
कुछ मन्‍द कबें कुछ तेज कबें भूसा में सुनगत आगी तूँ॥
वृन्‍दा सम सती सयानी तूँ जालौन जिला के पानी तूँ।
पुतली बाई आ सुल्‍ताना के मिश्रित एक कहानी तूँ॥
 
दोहा:-
धरती के आधार तूँ शंकर के सिंगार।
हे हरि हरि के सेज तूँ तापस पवन अहार॥
*          *          *          *
राति में समूचा लोग सुति जात बाटे तब
जागि के पुलीस योगिराज पद पावता।
बन्‍दी जन का समेत चलत पुलीस तब
जानि परे मानो महराज केहु आवता।
अपना कर्तव्‍य और ग्राम नेता धमकी का
बीचे त्रिशंकु होके कतहीं निमहावता।
या दूगो कर्कशा सवति पति सम विवश
बदलि जात या स्‍वयं बदली मनावता॥


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