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कविता संग्रह

अलंकार-दर्पण
धरीक्षण मिश्र

अनुक्रम 21 दृष्‍टांत अलंकार पीछे     आगे

लक्षण (सार) :-
एक समान स्‍वतंत्र वाक्‍य दुइ कथ्‍य अकथ्‍य धराला।
समता सूचक शब्‍द रहे ना तब दृष्‍टांत कहाला॥
दुओ वाक्‍य के धर्म एक हो अथवा भिन्‍न रहेला।
ओसे अन्‍तर कुछ न परेला चन्‍द्रालोक कहेला॥
दूनूँ वाक्‍य स्‍वतंत्र रहेला चन्‍द्रालोक बतावे।
किन्‍तु दीन जी का ऊ दूनूँ सम सापेक्ष सुहावे॥
 
दोहा :- उपमेय तथा उपमान दुइ भिन्‍न धर्म अपनाइ।
वाचक शब्‍द हटाइ दें तब दृष्‍टांत कहाइ॥
या
समता सूचक शब्‍द बिनु एक समान लखात।
भिन्‍न धर्ममय वाक्‍य दुई तब दृष्‍टांत कहात॥
 
छंद :- बिनु वाचक के एक रूप के जब दुइ वाक्‍य स्‍वतंत्र रहेला।
किंतु धर्म दुइ भिन्‍न रहे तब सुकवि लोग दृष्‍टांत कहेला॥
उदाहरण (दोहा) :-
जीयत टुटही बाँस के खटिया झोंल पुरान।
मुवला पर गद्दा सहित नया पलंगरी दान॥
खिलल कुमुदिनी राति में कमल गइल मुरझाइ।
कुर्सी के कीमत बढ़ल पलंग गइल पछुवाइ॥
अचलासुर का राज में गौ द्विज मारल जात।
रावण आ श्री राव के उदाहरण विख्‍यात॥
बकुला के दिन आ गइल गइले हंस लुकाइ।
कुर्सी के कीमत बढ़ल पलंग गइल पछुवाइ॥
जब कविता में मन बसे अन्‍य विषय न सुहात।
खइला पर चिउरा दही केकरा भावत भात॥
सजी महीना से अधिक देला घाम कुवार।
मानत मरिचा मरिचि सब मरिचाई सेहार॥
उत्‍प्रेक्षा में हेतु आफल ना ठीक चिन्‍हात।
भेद न हिप्‍पी युवक आ युवती में रहि जात॥
चीनी गुड़ के रस गइल चाय मात्र बा पेय।
ज्ञानहीन शिक्षा भइल सनद भइल बा ध्‍येय॥
आरक्षित जन का करी पढ़े बदे उद्योग।
पा कर के वरदान ना करत तपस्‍या लोग॥
पढ़वैयन का पास अब रहत न कलम दुआत।
धोती अब लरिकन बदे छोट न कहीं बिकात॥
जमींदार का जगह अब राजत कुर्क अमीन।
अब धोती का जगह पर लुंगी बा आसीन॥
बाल चंद्र में रहत ना तनिको करिया अंक।
बालक के सब बालपन बीतत बिना कलंक॥
पण्‍डा मिहनत करत ना बइठल खात मोटात।
बढ़त अकास बवंरि सदा बिना डारि जरि पात॥
विद्या देत न शिष्‍य के फीस लेत अनिवार्य।
अँगुठा बिनु विद्या दिहल कटले द्रोणाचार्य॥
मानी आपन मान तजि रहि ना सकत अकेल।
फूलन अपना मान का साथे गइली जेल॥
बड़मनई क्षण एक भी व्‍यर्थन जाये देत।
नेहरू बइठे ट्रेन में पढ़त किताब समेत॥
जे टी.भी. देखत बाटे ऊ कठपुतरी के नाच न देखी।
हलुवा पुडि़ छोड़ के केहू आगी पर लिट्टी ना सेंकी॥
रवि खातिर आयकर धनिके लोग धरात॥
घड़ी हाथ ककना भइल लुँगी भइल पोशाक।
धोती आ ककना दुओ रोवे धइ के नाक॥
घड़ी हाथ कँगना भइल रेडियो गर के हार।
चेन साइकिल के भइल सुलभ मुख्‍य हथियार॥
* * * *
 
सवैया :-
रेल का किराया से बचे के साध संतन का दाहीं झोंटा और चढ़े चंदन भी माथ में।
रेल कर्मचारी तथा कुर्सीधारी नेतन के रहे सरकारी एक पास सदा साथ में।
केहु भिखिमंगा बने केहु एक डिब्‍बा संगेधर्म काज हेतु चन्‍दा चिहुटे के लाथ में।
छात्रलोग चले सदा बस में या टैक्सियों में गोल बान्हि आपन आ पुस्‍तक ले हाथ में॥
लडि़ जाय चुनाव त काहे के दूर ऊ लाज हया के गया करे जायी।
अभिभावक का रही सोर्स त छात्र के के ना परीक्षा में जा के बतायी।
मिले जै गुरुदेव से ज्‍योति जो दिव्‍य त काहे के माटी के तेल किनायी।
बड़का बेंगवा के जे गीत सुनी ओकरा न रुची नवकी कविताई॥
यदि बादर बाटे अकास में तऽ करबे करी ऊ जल दे के सिचाई।
तब काहें जमीन बझावे बदे केहु नाहरि दाम लगा के खुनाई।
करबे करी श्राद्ध केहू मुवला पर और उहे सरगे पहुँचाई।
तब पुन्नि कमाये बदे जियता भरि में केहु काहे के कष्‍ट उठाई॥
नित्‍य नदी में नहात जे बा ओकरा न नहान रुची पोखरी के।
पोसत बाटे जे गाइ के भैंसि के ऊ ना चरावे चली बकरी के।
दोसर आम न मीठ लगी जेकरा मुहें स्‍वाद लगी कपुरी के।
जे ठिकदार बनीं एक बार से चाह करी न कबे नोकरी के॥
बने शब्‍द के रूप कुरूप सदा ओके तानि के राग में बान्हि के गौले।
नसि जात चुनाव के ध्‍येय सजी लोटिया अथवा लठिया बरिसौले।
बनि जात बा नारि महा फुहरी गतरे गतरे गहना पहिरौले।
जग में सही साधु असाधु बने गछिया बछिया दसिया अपनौले॥
हरिगीतिका :-
हरि का हृदय में लात मारल रहे भृ्गु का भागि में।
केहु अन्‍य में साहस भइल कूदे बदे ना आगि में॥
आवत पढ़ायी काम छात्रन का नकल का रोक में।
कृत पुण्‍य आवत काम प्राणी का सदा परलोक में॥
सार :- खिचड़ी फगुवा और जिउतिया तीनूँ खूब खियावे।
नवमी मइया का परता के , किंतु पहुँचि ना पावे॥
चंद्र इंद्र व्‍याकरण कई गो बनल सुने में आवे।
पर पाणिनीय का परता के पहुँचे ना लोग बतावे॥
चौपई :- कृपणन का पाहुन ना भावे। के गदहा से खेत चरावे॥
बिनु अकोर के भंइसि न लागे। अमला पान-पता कुछ माँगे॥
ताटंक :- नाग नाथ या साँप नाथ हों दाँत दुओ के जरीला।
विश्‍वनाथ या चनसेखर हो गर में गरल भरल नीला॥
कुण्‍डलिया :-
होई इण्‍टरभ्‍यु सदा अब से औरे भाँति।
ना पूछी केहु योग्‍यता , पूछल जाई जाति।
पूछल जायी जाति जातिये कामें आयी।
बिनु जल के जल पात्र आज से प्‍यास बुझायी।
देखी ज्‍योति बिहीन आँखियों से सब कोई।
बिल्‍कुल पइया धान कूटले चाउर होई॥
वीर :- पटरी बिना बिछौले अब से दौरत रही राति दिन रेल।
बिना नींव के भीति उठी अब कंकड़ कुटले निकली तेल॥
अब ना केहु जाँच करी कि भोथर बा की पानीदार।
नया डिजाइन के मियान लखि कीनल जाई अब तलवार॥
 
द्रुत विलम्बित छंद :-
नकल के सुविधा यदि प्राप्‍त बा तब किताब रटी दिन रात के?
मिलत बा गरई सुखले भुई जल उलीचल व्‍यर्थ बुझात बा॥
 
छंद :- अलंकार बिनु नइ कविताई युग का साथे बढ़ते जाता।
अब ना तिय का तन पर हैलक बाजू नत्‍थ बुलाक सुहाता॥
चढ़ल बुढ़ापा तब से जेकर टुटही खटिहा ना बदलाता।
पर मुवला पर ओकरा के दुइ पलंग बिस्‍तरा सहित दियाता॥
कौवा के केहु देखि न पारे ढ़ेला मारि भगावत जाला।
पर सराध में ओही कौवा के भरि पेट खियावल जाला॥
बिना जियाने लोग साँप के देखते मारि मुवाये।
पर नागपंचमी के साँपे पर लावा दूध चढ़ावे॥
ओही दिन ओकर दर्शन भी शुभदायक मानल जाला।
जौन सपेरा नाग देखावे ओके किछू दाम दियाला॥
दलबदलू लोगन के गतिविधि ना केहु रोकि सकेला।
छुटहा बेंग तराजू पर धरि ना केहु जोखि सकेला॥
विरुद्ध शब्‍द ऋषि गण के आर्ष प्रयोग कहाला।
कवि लोगन के महालबारी अलंकार बनि जाला॥
कथनी आ करनी नेता के गलत न मानल जाला।
बड़का लोग करे गलती न मानल जाला॥
हाकिम कसम खियाइ झूठ के बिलकुल सत्‍य बनावे।
गलत फैसला दिहला खातिर हाकिम सजा न पावे॥
दुइ मेहरारू के राखे तब एगो मन के बढ़ल रहेली।
एही से रातो दिन गंगा शिव का शिर पर चढ़ल रहेली॥
 
मालाकार सवैया :-
आँखि न ऊ जोहि में अपना सुत के लखि प्रेम के आँसू न छावल।
कैसन ऊ हियरा जेहि में सुत का प्रति प्रेम न गैल बसावल।
वृक्ष न ऊ हवे जे अपना फल फूल से आपन शोभा बढ़ावल।
ओकर जीवन ब्‍यर्थ हवे कुछ बर्धन जे सुत रत्‍नन पावल॥
ह्वेल के छोडि़ के ऊद का नाम पै सिन्‍धु के नाम समुद्र धराइल।
भूमि महत्‍व भगीरथ के रवि वंश रहे रघु वंश कहाइल।
गंगा गंगाधर धारें सदा पर जाह्नवी गंगा के नाम दियाइल।
युद्ध स्‍वराज के नेता कई लड़ले यश गान्‍धी का हाथ में आइल॥
सार :- जे ना जानी पंचसन्धि से संस्‍कृत समुझि न पायी।
दाँत बिना कइसे केहु मकई भूजल मटर चबायी॥
 


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