डाउनलोड मुद्रण

अ+   अ-

कविता संग्रह

अलंकार-दर्पण
धरीक्षण मिश्र

अनुक्रम 26 परिसंख्‍या अलंकार पीछे     आगे

उदाहरण (कवित्त) :-
महँगी बा चाउर आ दलियो के जहिया से
खिचड़ी बनत मंत्रिमण्‍डले सुनात बा।
साँच के जबाना बा उठल जात दुनियाँ से
साँच केहु मिस्त्रिये का हाथ में देखात बा।
रिक्‍सा का आगे अब पालकी के पूछ ना बा
पालकी त कहीं अब सागे में खोटात बा।
चीनी तऽ प्रमेहिये का पास में भेंटात बाटे
ना जाने चीनी अब कइसे लोग खात बा॥
 
दोहा :-

बस्‍तु दुचार बजार में बाटे जवन बिकात।
मेल मिलावट बस उहें बाटे पावल जात॥
गरम विशेषण चाय का साथे हवे सुहात।
या धार्मिक उन्‍माद के लोहूजे बहि जात॥
अब ननकल इसकूल में हवे लिखावल जात।
नकल परीक्षे में हवे चारू ओर सुनात॥
धनुष बादरे में दिखे नदी किनारे तीन।
कवच शिवा का पाठ में सखी कहावत बीर॥
चक्रवर्ति केहु नृपति ना लोकतंत्र में भैल।
अत: कुकुरमुत्ते इहाँ श्‍वेत छत्र रहि गैल॥
ताजमहल का नाम में ताज महल दरसात।
सिंहासन केहु व्‍यक्ति केबनि के नाम सुहात॥
अब कागज के नाम से गज बा पावल जात।
दोसर ओकर॥ जगह बा दुइयो हाथ देखात॥
महिषी अब ना महल में बैठल सजें सिंगार।
अब प्रत्‍येक बलाक में बेंचल जात उधार॥
घोड़ा कागज के बनल सुनल जात अफरात।
आफिस से ऊ आफिसे में दउरावल जात॥
कूँची से दीवाल पर चूना लीपल जात।
उहें लोग का चँवर के दर्शन होत छछात॥
युग अधर्म के आगइल लुप्‍त धर्मयुग भैल।
साप्‍ताहिक एक पत्रिका पन्‍ने पर रहि गैल॥
उहवें ढाल दिखात बा ऊँचा जहाँ अथान।
जाति चिन्‍हात चुनाव में खैर सहितबा पान॥
हाथी अब ना रहि गइल कक्ष कहाँ तब जाय।
बँटि के गृह में रहि गइल नाम विभिन्‍न धराय॥
बचन दान नेता करत लोग करत मतदान।
उहो कबे आवत जबे पर्व चुनाव महान॥

सवैया :-

कोहनाइल दूर के बात हवे रिसिआइल ना कवनो जन में।
कहीं ठान ठनौवल होत न बा दिन बीतत मौज में चोजन में।
सरकार के ताकत बा सगरी जइसे परिवार नियोजन में।
इहाँ सब लोग के बा उपयोग कि भीम बनो सब भोजन में॥
एतना लोगवा सब खायी कहाँ ई सुनाई कहीं नसबन्‍दी प्रचार में।
कथि के बा जरुरत जाने के हो तब वाण्‍ट निहारीं कहीं अखबार में।
कहीं उठक बैठक मल्‍ल करी केहु होई जो एक अनेक हजार में।
केहु व्‍यक्ति अयोग्‍य मिली जहाँ नेता के आदमी गैल होई सरकार में॥
बुनिया बरसे पर भीजत ना कुछ केवल जीभ के जात बा भें के।
पगु से इहाँ पेड़ा चली केहु का जब पेड़ा धरे रहता मुँह में के।
थकि के केहू चूर न होत हवे इहाँ चूरन फॉंकन बा सब जें के।
थरिया भरि आ अरिया न तजे बरिया इहाँ काम करे हजमें के॥
मार बा सुनात मारवाड़ी शब्‍द बीच कहीं अथवा सुनात बाटेता शरंग मार में।
गारी ना दियात सिर्फ गावल जात बाटे ऊ जेंवत बराती लोग जब जेंवनार में।
माँग बा देखात सिर्फ माथे महिला गन का ना कहीं देखात या सुनात नेगचार में।
माख कई मन में बेटिहा का किन्‍तु ऊहो बैर न बढ़ावे आवे बेसन का कार में॥
मीन बारह राशिये का बीच मिले पत्रा में अथवा सुनात ज्‍योतिषीन का जबान में।
मास बा संकल्‍प में सुनात पण्डिते का मुहें बारुणी जोहात इहाँ चैत का नहान में।
नाहीं नाहीं शब्‍द बा सुनात जब थरिया में भोजन गिरावे केहु अधिक प्रामान में।
नाच ना लगावे या मँगावे केहु नाचे इहाँ केहु के कपारे ढेर जर्दा खा के पान में॥
रोला :- ईंट पथल के कोट बनत ना बा अब भूपर।
अब कपड़ेके कोट लसत नर तन का ऊपर॥
नवका पढुवा लोग लिखत शर्मा के सरमा।
विकसित कुक्‍कुर बंश रचत ई सब बिसकरमा।


>>पीछे>> >>आगे>>